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कहानी - आउट ओफ़ डेट - प्रताप दीक्षित

कहानी -


आउट ओफ़ डेट

प्रताप दीक्षित

अंततः मैंने वह पुरानी पोर्टेबिल टाइपमशीन ख़रीद ली थी। बात काफ़ी पुरानी है। टाइपराइटर चलन के बाहर नहीं हुए थे। कचहरी, नगरपालिका के बाहर और दफ़्तरों में इनकी खटखटाहट गूँजती रहती थी। बहुत दिनों से तलाश में था। नयी मशीन की कीमत सुन कर हिम्मत टूट जाती थी। मेरे एक मित्र सक्सेना जी, जो एक टाइप-स्कूल चलाते थे, ने मदद की थी। दरअसल, संपादकों द्वारा टंकित रचनाओं की घोषित-अघोषित मांग के रवैये से ऐसा अनिवार्य लगने लगा था। यूं भी मेरे जैसे अचर्चित लेखक की, ‘आप लिखें, खुदा बाँचे’ वाली हस्तलिपि से माथापच्ची करने की किसे फुर्सत थी। आफिस में हिन्दी की मशीन थी। पहले पाँच बजने के बाद अपने केबिन में चपरासी से मशीन मँगवा कर रचनाएँ स्वयं टाइप कर लेता था। नौकरी के पहले, बेरोजगारी के दिनों में सीखा हुनर अभी याद था। उन दिनों टाइप सीखने का महत्त्व, हमारे जैसे परिवार के लिए, आज के बीटेक, एमबीए से कम नहीं था। तब पचास प्रतिशत प्रेम-कथाओं का प्रारम्भ टाइप-स्कूलों में होता और स्कूल छोडने के बाद समाप्त भी। अनुभवी बुजुर्गों की राय होती – यदि नौकरी न भी मिली तो कचहरी के बाहर एक कुर्सी-टेबिल डाल लड़का कुछ न कुछ कमा कर तो शाम को लौटेगा ही।

परंतु कुछ दिनों बाद महसूस हुआ कि शाम के समय केबिन में टाइप करने को लेकर सहकर्मियों की दृष्टि में संदेहास्पद बनने लगा था। लोग समझते, मैं कुछ गोपनीय टाइप कर रहा हूँ। वास्तविकता से अवगत कराना और मुसीबत। कवि के रूप में कार्यालय ऐसी जगह कौन कुख्यात होना चाहेगा। आप लाख कहें कि आप कविताएं नहीं लिखते। आपको कवि मान लिया जाएगा। फिर मौके-बेमौके फेयरवेल, रिटायरमेंट की पार्टियों में कवि के तौर पर परिचय और कविता की फरमाइश। लोग मंद-मंद मुस्कराते उपहास भरी नज़रों से ‘वाह-वाह’ करते जाते हैं। बाज़ार में टाइप कराने में रचना की दुर्गति हो जाती। अधिकांश टाइपिस्ट कचहरी, नगरनिगम के बाहर बैठने वाले होते। टाइप होने के बाद मुझे याद करना पड़ता कि मैंने क्या लिखा था। एक साहित्यिक रचनाओं को टाइप करने वाला मिला, परंतु उस प्रतिभा-सम्पन्न प्राणी ने मुझे नितांत मूर्ख मान लिया था। शब्द तो शब्द, वह मेरे लिखे पूरे वाक्य बदल देता। बड़ी विनम्रता से कहता – ‘भाई साहब, यह वाक्य मुझे कुछ ठीक नहीं लग रहा था। अब जो धांसू चीज़ मैंने लिखी है, लोग मान जाएंगे आपकी लेखनी को।‘

सक्सेना साहब के मित्र का पुराना पोर्टेबिल टाइपराइटर देख तबीयत खुश हो गई। सलोना, एकदम नया दिखता। सक्सेना ने मज़ाक किया – ‘मेरे मित्र ने मेंटेन करके रखा है। कुछ लोग शौकीन तबीयत के होते हैं। तुम्हारी तरह लापरवाह और लीचड़ नहीं।‘

मैं खिसियाई हंसी हंसकर रह गया। घर आते समय मन उमंग से भरा हुआ था। दो दिनों का अवकाश लिया। टाइप करने बैठा। छोटी मशीन में हाथ खुलने में समय लगना था। पत्नी ने कहा – ‘यह तुम्हारे हाथों के उपयुक्त है।‘ तिरछी नज़रों से देखते हुए मुस्कुरायी। वह अक्सर मेरे मुलायम, पतले हाथों को लेकर छेड़ती रहती – ‘एकदम नाजुक, लड़कियों जैसे हाथ। मैं कृत्रिमता से झुँझलाता – पहले यही हाथ तुम्हें बहुत पसंद थे। होठों से लगकर ॰ ॰ ॰।‘

‘हिस्स ॰॰॰ बच्चे सुन रहे हैं। तब मैं बेवकूफ थी।‘ लगा, समय की धूप मे सूख गई जमीन में कुछ नमीं बची रह गयी है। ‘वह तो अभी भी हो!’ मैं बुदबुदाया। उसकी आँखों में लाल कतरे झलकते-झलकते रह गए। मन में आया कि टाइप का काम तो बाद में हो जाएगा। परंतु, दुबारा देखने पर महसूस हुआ कि कतरों का कहीं निशान भी नहीं बचा था। वह मुझे लिखते-पढ़ते देख वैसे भी चिढ़ती। मैं टी०वी० देखता रहता, सोता रहता, यहाँ तक मेरे यदा-कदा ड्रिंक करने पर भी उसे शिकायत न होती। लेकिन रीडिंग टेबिल पर मुझे देख कितने बकाया काम याद आ जाते। वह लिस्ट और थैला लिए आती – ‘देखो सब्जी के साथ एक किलो घी, सरसों का तेल भी लाना है। और हाँ, स्टोर रूम का बल्ब भी फ्यूज हो गया है, एक ले आना।‘

‘बल्ब, घी ॰ ॰ ॰! लेकिन कौन जा रहा है सब्जी लाने?’ मैं अचकचा उठता। मेरे सब्जी लाने पर वह लौकी की नरमाई, परवालों के बासी होने, भिंडियों के कड़ेपन की शिकायत करती। उसके हिसाब से मुझे सब्जी खरीदना कभी नहीं आएगा। यह ज़िम्मेदारी उसने अरसे से सम्हाल रखी थी। यही नहीं, उसने लगभग सभी काम जैसे – बच्चों के स्कूल अथवा जरूरत पड़ने पर उन्हें डाक्टर को दिखाना, रिश्तेदारी में सम्बन्धों का निर्वाह आदि, जो अमूमन पुरुष करते, उसने ओढ़ रखे थे।

‘क्यों, यह मेरा काम है क्या? लोग सब्जी नहीं लाते हैं? घर-बाहर के सभी कामों की ज़िम्मेदारी मेरे सिर पर ही है।‘ वह देर तक बड़बड़ाती रहती। चिख-चिख से उस समय तो मेरा लिखना मुल्तवी हो ही जाता।

नए-नए उत्साह में पड़ी हुई कई रचनाएँ टाइप कर डालीं। फिर धीरे-धीरे ऊब होने लगी। सोचा, जो समय कुछ नया लिखने में लग सकता था, एक साधारण से काम में जाया हो रहा है। लंबे समय तक टाइप तो दूर पढ़ना-लिखना भी न हो सका। काफी समय बाद टाइप करने बैठा तो मशीन ने रंग दिखने शुरू कर दिए। एक अक्षर कागज पर पड़ते ही उसका कैरिज खर्र की आवाज के साथ दूसरे सिरे पर भाग जाता। एक पंक्ति भी टाइप न हो सकी। उत्साह मर सा गया। मैं टाइप-स्कूल वाले सक्सेना जी की शरण में गया। उन्होने बताया कि उनके यहाँ एक मिस्त्री आता है। वह है तो होशियार, लेकिन पूरी तरह से बहरा। उसे इशारे से ही बताना होगा। मेरे पास कोई विकल्प नहीं था। कई दिनों बाद डोरबेल बजने पर दरवाजा खोला, तो वह सामने था। उम्र 60 – 65 या कुछ अधिक, छोटा कद, सफ़ेद बाद, दाढ़ी कई दिनों की बढ़ी। पान और गुटखे से दाँत पीले और काले पड़ गए थे। आँखों पर मोटे लेन्सों का चश्मा, घिसी हुई बहुत पुरानी कमीज़ और पतलून।

‘साहब, मैं ज़हूरबख्श। आपके पास टाइपमशीन के लिए मुझे सक्सेना साहब ने भेजा है। अंदर आकर उसने अपना पुराना ब्रीफकेस खोला। ब्रीफकेस का रंग उड़ चुका था। बताना मुश्किल था कि इसका असली रंग क्या रहा होगा। हैंडिल की जगह सुतली एक हुक लगाया गया था। उसके अंदर कई तरह के स्क्रू, पेंचकस, नामालूम से औज़ार, तेल की कुप्पी क्या-क्या भरा हुआ था। वह सामान भी ब्रीफकेस और उसके मालिक की तरह पुराने होने की चुगली कर रहा था। उसने मशीन देखी, ठोंकी-पीटी खोलकर कई पुर्जे अलग किए लेकिन वह ज्यों की त्यों रही। उसने सिर हिलाया – ‘यह ऐसे ठीक नहीं होगी। घर ले जाकर पूरी मशीन खोलनी पड़ेगी। काफी वक़्त लगेगा।‘

मैं आशंकित हो उठा। एक बार भुगत चुका हूँ। एक जिल्दसाज मेरी किताबें, पत्रिकाएँ बाइंडिंग के लिए ले गया था। वे मुझे वापस नहीं मिल सकीं। पत्नी कुछ अधिक ही सजग थी। उसे मेरे दुनियादार होने पर कभी यकीन नहीं रहा। घड़ी, रेडियों, टीवी यहाँ तक कैलकुलेटर तक रिपेयरिंग के लिए देते उसे उसके पुर्जे बदल लिए जाने की आशंका सालती रहती। उसने कहा – ‘इसे मशीन घर ले जाने को न देना। जरूर पुर्जे बदल लेगा।‘ यह बात उसने हमेशा की तरह अलग बुला फुसफुसा कर नहीं कही। वह जानती थी कि बहरा मिस्त्री इसे सुन नहीं पाएगा।

ज़हूर ने संभवतः होंठों की गति से समझ लिया था। उसने कहा – ‘साहब इससे निशाखातिर रहें। मशीन आपको पूरी तरह ठीक होकर मिलेगी। पुर्जे तो अब इसके आते नहीं, इन्हीं से कोशिश करूंगा।‘

उसने अपनी ईमानदारी, विश्वसनीयता सिद्ध करने के लिए मेरे कार्यालय और शहर के कितने संदर्भ डाले, लेकिन मुझे बेवकूफ बनाना आसान नहीं था। ‘इससे क्या होता है। क्या वह किसी से लिखवा कर अपनी गारंटी दे सकता है?’ मैंने इशारे से कहा और विजयी दृष्टि से पत्नी की ओर देखा।

‘मेरी बेइज्जती होगी। लोग मुझ पर हँसेंगे। कहेंगे – बुड्ढे पर ऐतबार नहीं किया। लेकिन साहब आपकी बात भी गैर वाजिब नहीं है। मिस्त्रियों की कौम बदनाम है। आप मुझ पर यकीन कर भी कैसे सकते हैं। मशीन कोई दो टके की तो आती नहीं।‘ वह बड़बड़ाता जा रहा था। अगले दिन आने को कह कर चला गया। मैं पछताने लगा। आदमी लग तो ठीक रहा था। उम्र भी तो कितनी थी। पुरानी मशीन लेकर जाता कहाँ। अब पड़ी रहेगी कूड़े की तरह। अगले दिन वह सक्सेना जी की स्लिप लिए हुए आया। वह मगन था – ‘आपके बैंक के आलम साहब मेरे रिश्तेदार हैं। लेकिन मना कर दिया। इतना भी नहीं कर सके। आखिर आदमी ही आदमी के काम आता है। सक्सेना साहब ने पर्ची दी। बहुत दिनों से उनके स्कूल में आ रहा हूँ।

वह मशीन बॉक्स में रख डोरी से बांधने लगा। मैंने इशारे से पूछा, ‘इसमें खर्चा कितना आगा। वह बुदबुदाते हुए जोड़ता-घटाता रहा – ‘तीन सौ पचास।‘

मेरा दिल बैठ गया। पुरानी मशीन में इतने से काम का इतना ज्यादा। सरासर ठग रहा है। मैं उखड़ गया – ‘नहीं बनवानी। पचास लेने हों तो बोलो।‘

वह समझा मैं सक्सेना साहब की पर्ची के बावजूद मशीन उसे नहीं देना चाहता। वह फिर अपनी और सक्सेना साहब की निकटता, आदमी पर विश्वास और अपनी ईमानदारी की दुहाई देने लगा। मैं खीझ गया। सुन वह सकता नहीं था। मैंने उसके हाथ से पर्चा छीनते हुए उस पर पचास रुपए लिखा। उसने देख कर आश्वस्त करते हुए कहा – ‘हाँ, अभी पचास दे दीजिए, बाकी बाद में दीजिएगा। कोई जल्दी नहीं है।‘

हील-हुज्जत में उत्तेजना के कारण मेरे होंठों की गति असंगत-लयहीन हो गई होगी। इससे उसे समझने में कठिनाई आ रही थी। वह असमंजस में सिर हिलाते हुए अनुमान लगा पा रहा था। मुझे उसके कपड़े, शक्ल-सूरत और उम्र उसकी मांग के अनुरूप नहीं लग रहे थे। आखिर, टी०वी०, फ्रिज, मशीन रिपेयर करने वाले नौजवान आते, उनके बंधे रेट होते। यहाँ तक कि चीजें बनवाएँ या नहीं, उनके आने पर परीक्षण शुल्क देना निश्चित था। उसकी गिड़गिड़ाहट से लग रहा था, पैसे तो वह कम करेगा ही। आखिर डेढ़ सौ पर तय हुआ। वह एक हफ्ते बाद आने को कह कर चल दिया। फिर रिक्शे के लिए दस रुपए पर अड़ गया – ‘साहब, यूं तो पैदल चला जाता। थोड़े दिन पहले तक बड़ी मशीन लेकर मीलों तक चला जाता था। उम्र ज्यादा नहीं हुई, लेकिन बीमार था न। अच्छा जाने दीजिए, पैदल ही चला जाऊंगा। गुटखे के लिए दो रुपए दे दीजिए।‘

चेहरे पर झलक आयी दयनीयता को छिपाने के लिए वह मुस्कराया। उसके मुंह का गुटखा खत्म हो गया था। आखिर वह दो रुपए ले ही गया। उसके जाने के बाद पत्नी ने आँखें तरेरी थीं। उसके चेहरे पर जुगुप्सा के भाव थे, ‘अब यह कौन साफ करेगा? कामवाली तो कल आएगी।‘

वाशबेसिन थूक, पीक, थूके गए पानमसाले से भरा हुआ था। मैंने अपराध-भाव से उसकी ओर देखा जैसे मेरी ही करतूत हो। मैंने कहा कि मैं ही नहाने के पहले साफ कर दूँगा। दूसरा रास्ता नहीं था। वह मेरी ओर देख व्यंग्य से मुस्कराई, जैसे मेरे उपयुक्त काम मुझे मिल गया था।

ज़हूरबख्श मशीन ले आया था। वह लगातार मशीन की तारीफ किए जा रहा था, ‘मशीन बहुत अच्छी क्वालिटी की है। आजकल यह मॉडल मिलना मुश्किल है। रेमिंग्टन कंपनी भी तो बहुत अच्छी थी, लेकिन बंद हो गई। जाने कितने लोग बेकार हो गए होंगे। मेरे वालिद बताया करते थे कि इस कंपनी ने दुनिया की पहली पिछली सदी में 1873 में टाइपमशीन बनाई थी। इसके पहले वहाँ हथियार बना करते थे। और साहब हरूफ़ भी तो हथियार का ही काम करते हैं। किन्हीं जनाब लैथम साहब (क्रिस्टोफर लैथम) ने इसकी ईजाद की थी।‘

मैंने उसकी ओर घूर कर देखा। मुझे उसकी जानकारी पर आश्चर्य हुआ। वह अपनी धुन में बोलता जा रहा था – ‘मेरे वालिद बहुत काबिल आदमी थे। मशीन के कल-पुर्जों की रग-रग से वाकिफ थे। उनकी टाइप की स्पीड की वजह से अंग्रेजों के वक़्त उनकी नौकरी इंपीरियल बैंक में लग रही थी, लेकिन उन्होने नौकरी न करके टाइप-स्कूल खोला था। लेकिन साहब, मैं तो कुछ नहीं सीख पाया। वैसे भी आजकल दफ्तरों में कंप्यूटर लग रहे हैं। यह तो अब आउट ऑफ डेट हो चुकी है। पुरानी चीजों को अब कौन पूछता है। फिर भी साहब, ओल्ड इज़ गोल्ड जैसे मैं’, वह अपनी ओर इशारा करते हुए ज़ोर से हंसा, ‘जैसे उसने बहुत बड़ा मज़ाक किया हो।

उसने कहा, ‘आप टाइप करके देख लें। मशीन कंप्यूटर को मात करेगी।‘ मेरे टाइप करने पर उसने मेरी तारीफ की – ‘आपकी टाइप की स्पीड अच्छी है। बैंक में हैं न!’

मैं कुढ़ गया। मैं बैंक में अफसर हूँ, यह टाइपिस्ट समझ रहा है। मैंने रूखे स्वर में कहा, ‘ठीक है, ठीक है। इतने पैसे लिए है, इसकी कुछ गारंटी है या नहीं।‘

‘हुजूर छह महीने बोलना भी नहीं पड़ेगा। यूं मैं हर महीने आकर फ्री सर्विस करूंगा। इस बीच कोई परेशानी हो तो सक्सेना साहब से कह दें, मैं हाजिर हो जाऊंगा।‘

इस बीच व्यस्तता बहुत रही। नया शौक खत्म हो गया था। काफी समय बाद एक दिन टाइप करने बैठा, तो मशीन जस की तस थी। ज़हूर पर बहुत गुस्सा आया। मुंह से निकाल गया – यह दोगले होते ही ऐसे हैं। अब कहाँ ढूढूँ उसे। एक नयी लघु पत्रिका के लिए बेमन से टाइप करने बैठा था। एक प्रकार से बहाना मिला। दो-चार दिन बाद सक्सेना साहब के यहाँ ज़हूर के लिए संदेश दे आया। अगले दिन आकर वह मशीन ठीक कर गया। जीवन पुराने ढर्रे पर चलने लगा था। रचनाएँ फिर कंप्यूटर पर टाइप होने लगीं। कभी कोई पत्र या लघुकथा टाइप कर लेता। ज़हूर जब-तब आकर पूछ लेता – ‘साहब, मशीन ठीक चल रही है? कोई प्रोब्लम तो नहीं है?’ उसे मशीन दिखाने पर बीस-तीस देना तो लगभग तय था। न कुछ करता, तो झाड़-पोंछ, तेल आदि डाल देता। एक प्रकार से उसकी हमें आदत से पद गई थी। जैसे अखबार के साप्ताहिक परिशिष्ट की। उसकी बातों का प्रारम्भ दफ्तरों में कम्प्यूटरों के प्रचलन की वजह से उसके काम की जरूरत के कम होते जाने से और अंत टाइपराइटर पर होता। मेरे संकेतों को न समझ पाने पर मेरे समझाने की कोशिश, उसका बेतुके जवाब से बच्चों का मनोरंजन होता, वे हँ। साथ में वह भी हँसता। टुकड़ों-टुकड़ों में ज़हूर के बारे में जानकारी मिली थी। उसके एक मात्र फर्जन्देआलम दो साल हुए रियाद में नौकरी करने चले गए थे। पिता का टाइपस्कूल और घर उनके पार्टनर रहे रिश्तेदार ने हड़प लिया था। उसके मकान और टाइपस्कूल का मुकदमा अदालत में कई सालों से विचाराधीन था। बीवी गुजर चुकी थी। वह दूर एक बस्ती में कमरा लेकर रह रहा था। बाजार में खाना खाता। बीच-बीच में बंद स्कूल को बाहर से ही देख जरूर आता। अगले दिन कहीं नदारत न मिले। अक्सर उसके आने पर, 'अभी मशीन ठीक चल रही है', 'फुरसत नहीं है, फिर आना' जैसे बहाने बनाने पड़ते। फिर भी उसके गुटखे के लिए दो-चार रुपए तो बंधे ही थे। आखिर इतनी दूर से आया हूँ - उसका तर्क रहता। पत्नी भुनभुनाती रहती। यदि उसका मूड ठीक होता तब उसके लिए चाय के साथ कुछ बिस्किट वगैरह ले आती।

इसके बाद एक लंबे अरसे तक वह नहीं आया। सक्सेना साहब को भी ठीक से मालूम नहीं था। पता नहीं बीमार है या कुछ और ॰ ॰। बूढ़ा शरीर है आखिर। एक दिन शहर का जीवन थम सा गया। कुछ वर्षों पहले एक नई सी परंपरा के तहत पहले किसी महत्वहीन से मुद्दे पर तनाव, छिटपुट हिंसा की शुरुआत। फिर कर्फ़्यू लगना लाज़िमी था। इस बार भी जन-जीवन ठहर कर पंगु हो गया था। लोग घरों में बंद रहने को मजबूर हो गए थे। अफवाहों का बाजार गरम था। पत्नी की बेचैनी बढ़ गई थी। पुरानी आदत थी। मनोभावों को छिपाए सब काम निपटाते हुए चुप्पी ओढ़े रहती। आखिर उसकी चुप्पी टूटी, 'पता नहीं क्या होता जा रहा है शहर को। वह इलाका तो कट्टर सुना जाता है। पिछली बार कितनी झुग्गी-झोपड़ियाँ जला दी गई थीं। प्रशासन भी इन्हीं का साथ देता सुना जाता है। और ॰ ॰ वह तुम्हारा टाइपमशीन वाला मिस्त्री भी तो वहीं कहीं रहता है। कुछ पता करो।'

मैंने अपने संपर्क याद करने की कोशिश की। एक-दो जगह फोन भी किए, लेकिन कुछ न हो सका। पत्नी ने कहा, 'बस हो गए तुम्हारे रिसोर्सेस! कहते हो इस साहित्य की वजह से बड़े-बड़े लोगों से तुम्हारी पहचान है। वह अकेला बूढ़ा कहाँ होगा! बाहर ढाबे में तो खाना खाता है। इस समय तो वो सब बंद होंगे।' कुछ देर निरुद्देश्य सी टहलती रही, फिर पास आकर बोली, 'अच्छा इस दौरान मैं, तुम, बच्चे कोई भी गंभीर रूप से बीमार हो जाए, तब कर्फ़्यू-पास कहाँ से जारी होते हैं?' मेरे मन में आया – इसी लिए कहा गया है – ‘बहु स्वतंत्र व्है बिगरहि नारी।‘ मैं कुछ कहता, लेकिन उसकी आँखों में दृढ़ निश्चय की चमक देखकर टाल गया। शायद इसी जुनून में, तमाम विरोधों के बीच, मुझसे विवाह का निर्णय लिया होगा।

अगले दिन दो घंटों के लिए कर्फ़्यू में छूट मिली थी। दफ्तर बंद था। जाता कहाँ। एक किताब पढ़ते-पढ़ते सो गया। नींद खुली तो पत्नी घर में नहीं थी। घड़ी देखी तो दो घंटे से ज्यादा सोता रहा था। बच्चे अपने कमरे में सो रहे थे। सोचा बगल के फ्लैट में गई होगी। आखिर सभी तो छुट्टी के मूड में हैं। मन चिंतित हो गया। क्या किया जाए सोचते हुए फिर झपकी आ गई। नींद खुली तो पत्नी चाय के साथ पकौड़ियाँ तल लाई थी। सुबह के तनाव का नामोनिशां तक नहीं था। मैंने पूछा तो वह टाल गई। दो-चार दिनों में हमेशा की तरह जन-जीवन सामान्य हो गया।

एक रविवार सुबह दरवाजे पर घंटी बजी। मैं ड्राइंगरूम में ही अखबार पढ़ रहा था। पत्नी ने दरवाजा खोला। बाहर हमेशा की तरह हँसता, लार बहाता ज़हूर था, 'साहब, यदि आप उस दिन ॰ ॰ ॰' वह जाने क्या-क्या बोलता रहता, लेकिन पत्नी उसकी बात काट कर बोली, 'साहब व्यस्त हैं, मशीन ठीक चल रही है, उन्हें कहीं जाना भी है।'

'हुजूर, एक गिलास पानी मिल जाता तो ॰॰॰' कहता हुआ वह अंदर आ गया। पत्नी पानी लेने चली गई। मुझे देख वह खिल उठा, 'साहब आपसे एक जानकारी लेनी है। मैंने एक सरकारी ऑफिस में काम किया था। महीनों बाद चेक से भुगतान हुआ। चेक वहीं एक बाबू की ड्रार में पड़ा रह गया था। चेक बैंक से वापस आ गया है।'

मैंने उसके चेहरे की तरह जर्जर हो गए चेक को देखा। चेक की मियाद जाने कब पूरी हो गई थी। चेक के साथ लगी पर्ची से ज्ञात हुआ कि चेक बैंक द्वारा 'आउट ऑफ डेट' की आपत्ति के साथ वापस किया गया था।


प्रताप दीक्षित

एम0डी0एच0 2/33, सेक्टर एच,

जानकीपुरम, लखनऊ 226 021

Email dixitpratapnarain@gmail.com

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परिचय

नामः प्रताप दीक्षित

जन्मः 30 सितंबर 1952

शिक्षाः एम0ए0 (हिंदी)

रचनाएं: हंस, वागर्थ, नया ज्ञानोदय, वर्तमान साहित्य, कथाक्रम, कथादेश, वर्तमान साहित्य, पाखी, संचेतना, लमही, उत्तर प्रदेश, जनसत्ता, दैनिक जागरण, अमारउजाला, अक्षरा, शुक्रवार, जनसत्ता, हिन्दुस्तान, नवभारत, पंजाबकेसरी जनसंदेश टाइम्स आदि में 150 से अधिक कहानियां, समीक्षाएँ, लघुकथाएं, आलेख, व्यंग्य प्रकाशित।

दो कहानी संग्रह (‘विवस्त्र एवं अन्य कहानियां‘ तथा ‘‘पिछली सदी की अंतिम प्रेमकथा’) प्रकाशित।

उत्तर प्रदेश हिन्दी प्रचारिणी सभा द्वारा आयोजित कविता प्रतियोगिता में तत्कालीन राज्यपाल उत्तर प्रदेश (श्री अकबर अली खान द्वारा पुरस्कृत 1973

प्रताप दीक्षित के रचनाओं पर रूहेलखंड विश्वविद्यालय में एक छात्रा द्वारा पी.एचडी हेतु शोध.

संप्रतिः भारतीय स्टेट बैंक में प्रबंधक पद से सेवानिवृत्ति के बाद स्वतंत्र लेखन.

जानकीपुरम, लखनऊ 226 021

संपर्कः Email dixitpratapnarain@gmail.cpm

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