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स्वर्गलोक-भूलोक हो एकीभूत - आत्माराम यादव पीव

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माता-पिता की दुआओं का उपहार लो


बड़ा ही मलंग है भई मेरा बिरादर
बुद्धि और बल में है, होशियार सबसे हाजिर।
चले गये तत्वदर्शी हो या दिगदिगन्त विजेता
अहं बिरादर को है, दुनिया का खुद है विधाता।
शहनशाहों की शहनशाही, कब तलक तक टिकी
नेक नीयतवालों ने हरदम, गुजारी अपनी नेकी।।
किसे मिलता है दोस्त, दोस्ती को तरसे जमाना
मतलब के सब रिश्ते है, तू क्यों हुआ दीवाना ।।
कैसी किससे यारी, बुना सभी ने झूठ का तानाबाना
माता पिता को छोड़ा जिसने, कहे खुदको परवाना।।
पीव इंसान पैदा हुआ था, शैतान का ओढ़ा लबादा
जमाना खराब बताकर, बिरादर निभ रहा सीधा-सादा।।
ताकत हाथी की लेकर, बिरादर डोले यहॉ-वहॉ
जमाना कब करवट बदले, पराजय की सोचे कहॉ।।
बेअकल करता है नकल, क्या अकलबान बन जायेगा
बचपन की अकल के भरोसे, क्या राजपाट पा जायेगा।।
बूढ़े माता-पिता का दरद, पीव जो अनदेखा कर जाता है
ऊॅगली पकड़ बॉहों में झूला, वह नाता तोड़ जाता है।।
माता पिता को छोड़े, उसका संगी साथी न हो कोई भी
तेरा बुढ़ापा आयेगा,  रोयेगा अकेला न होगा कोई भी।
कुछ न बिगड़ा अब तो संभलजा,गल्तियॉ अपनी सुधार लो
माता पिता है करूणासिंधु, माफी दुआओं का उपहार लो।।


स्वर्गलोक-भूलोक हो एकीभूत


जो गिरा हुआ है, उसे गिरने का क्या डर होगा
जो नतमस्तक है, उसे घमण्ड ने क्या छुआ होगा।
खुद मालिक उसे राह दिखाये,जो नम्र हुआ होगा।
जिसने जीत लिया मन को,वह संतोशी रहा होगा।
जो शरण प्रभु की पा जाये,समर्पित वह रहा होगा।।
जो दिल का बोझ उठाये, वासनाओं में घिरा होगा।।
जो सत्य का साथ निभाये, वह इंसान खरा  होगा।।
पीव मुश्किल हुआ जीना,पर सबको ही जीना होगा।।
स्वर्गलोक-भूलोक होवे एकीभूत,तैयारी ऐसी करना होगा।
समस्तजनों का सर्वस्य मिले,तब यह संकल्प करना होगा।।



प्रभु तूने तो नहीं सौंपी है


किसी के भी हाथ में
अपने मरने और जीने की डोर।
प्रभु तुझे प्यार करना
या नफरत करना
खुदगर्जो का काम है।
प्रभु तेरा ही चाकर रहूं
तेरी करूणा बनी रहे
यह,अधिकार तो देना होगा।
प्रभु अगर मेरे जीवन का
कालचक्र दीर्घ है
और मुझे लम्बी आयु तक जीना है
तो बस अपने चरणों से
विलग न करना,
यही चाकरी मुझे प्राप्त हो।
दीर्घकाल के जीवन में 
कुछ दिन होंगे उदासी भरे
कुछ दिन होंगे दुखभरे
कुछ दिन होंगे सुखभरे
तेरी करूणा होगी तो प्रभु
सहज ही ये दिन
राम के वनवास की तरह
एक अवसर बन जायेंगे।
प्रभु अगर मेरे जीवन का
कालचक्र लघु है
और मेरी आयु कम है
तो अनंतकाल तक
जीने की इच्छा क्यों रखूॅ ?
अंधेरों से राम भी गुजरे है
अंधेरों से कृष्ण भी गुजरे है
अंधेरों से मसीह भी गुजरे है
अंधेरों से बुद्ध भी गुजरे है
उनके जैसा अंधेरा
क्या मेरी इस अल्पायु में है।
प्रभु संसार के सभी प्राणियों का
जीवन एक अंधकार ही है
अंधकार के द्वार पर
दस्तक देकर ही सबको गुजरना है
लौकिक-अलौकिक कर्मो की देशना
तुम्हारी करूणा से मिलती है
तब तुम्हारे दर्शन की पात्रता होती है
तुम दिव्य-दैदिव्यमान हो
जिसपर करूणा करते हो
उसकी श्रद्धा की परीक्षा लेकर
दुर्बल चर्मचक्षु के लौकिक जगत को
अपनी दिव्यता का दर्शन कराने
पीव अलौकिक दिव्य चक्षु प्रदान कर
बना लेते हो अपना,
थाम लेते हो
उसकी  अंगुली
दिखाते हो अपना विराट रूप
जिसमें सर्वज्ञ समाया है।

अपना आपा खो दॅू


अपने घर -परिवार के लिये,
अपने सगे संबंधियों के लिये
अपने समाज व देश के लिये
मैं जीना चाहता हॅू सभी के लिये
इस हद तक,
कि अपना आपा खो दॅू।
मैं अपने सारे स्वार्थो के बिना
मैं अपने सारे हितों के बिना
दूसरों के लिये
अपना सारा जीवन जीना चाहता हॅू
इस हद तक,
कि अपना आपा खो दूं।
अपने जीवन के दुखों में
मैं अकेला ही गाता रहा हूं
हर अंधेरे रातों -जज्बातों को
मैं अकेले ही सहलाता रहा हूं
मेरे अहम के चक्रव्यूह में फंसा
अब तक खुद एक अहंकारी रहा हॅू
अहम को जीत लू
इस हद तक
कि अपना आपा खो दूं।
मेरे एक- एक विचार स्वार्थभरे हैं
मेरे विचारों में शब्दों के किलेगढ़े हैं
खुदका दुनिया से बेहतर दिखाने में लगा हूँ
दुनियावाले करे मेरी प्रशंसा यह जताने लगा हूं
अपने अहम की घृणा को छोड़़ दू
पीव इस हद तक
कि अपना आपा खो दूं।

बुर्जग पिता का दर्द


बड़ी मासूमियत से
बुजुर्ग पिता ने कहा-
बेटा ,
बुढ़ापा अजगर सा आकर
मेरे बुढ़ापे पर सवार हो गया है
जिसने जकड़ रखे है मेरे पैर
न चलने देता है
न उठने-बैठने देता है।
बेटा,
मेरे बाद
तेरी मॉ को
अपने ही पास रखना।
पिता के चेहरे पर
पॅसरी हुई थी उदासी
सारा दर्द छिपाकर वे
मुस्कुराने का अभिनय कर रहे थे।
उनकी बेबशी पर
मैं अबाक था!
पिता के गालों पर
अनगिनत झुर्रिया
रोज-रोज बढ़ती जाती है
और उनके पैरों पर सूजन है।
मेरी पूरी कोशिश
मेरा पूरा उपक्रम
पिता को निरोगी रखने में लगा है
और वे स्वस्थ्य रहने का
हर विधान का पालन भी करते हैं।
मेरा पूरा विश्वास
पिता के मन में
अंतिम सॉसों तक
जीवन से कभी हार न मानने
मौत से अपराजेय रहने की
असीम ताकत जुटाने में लगा है।
वे टूट जाते हैं
जब उन्हें अपनी ही औलाद
खून के ऑसू रूलाती है
बिना बातचीत किये
बेशर्मी से उनके पास से गुजर जाती है।
वे खुद पर झल्लाते हैं
अपने बुढ़ापे से विद्रोह कर
बुढ़ापे को अजगर बताते हैं, ताकि
मजबूर और लाचार करने
सपनों को मुर्दा करने वाली संतान,उन्हें न भूले।
पीव उन औलादों को
वे आज भी सीने से लगाने को
तरस रहे है
और अपने बुढ़ापे की मजबूरी में
उनका मन भर आने के बाद भी
औलाद को माफ करके उनके लौट आने के
विश्वास में सारा दर्द पीकर
खुद अकेले कमरे में
बुढ़ापा को गले लगाकर जी रहे हैं।

जीवन का अधूरापन


मुझे याद है प्रिय
शादी के बाद तुम
दूर-बहुत दूर थी
मैं तुम्हारे वियोग में
दो साल तक
अकेला रहा हॅू।
बड़ी शिद्दत के
बाद तुम आयी थी
तुम्हारे साथ रहते
तब दिशायें मुझे
कॉटती थी और
तुम अपनी धुन में
मुझसे विलग थी।
तुम्हारा पास होना
अक्सर मुझे बताता
जैसे जमीन-आसमान
गले मिलने को है।
मैंने महसूस किया
दिशायें दूर बहुत दूर
असीम तक पहुंच गयी है।
तुम मेरे साथ थी
पर दूर इतनी थी
जैसे चांद आसमान में।
मेरी दुनिया सिमट कर
तुम्हारे ईर्द गिर्द थी
तुम रास्ते को दूर
बहुत दूर बनाती रही
मैं हर राह को
तुम्हारे लिये छोटी करता रहा।
मैं हर दिशा को
तुम्हारे आसपास
तुम्हारे कदमों में लाया
मैं तुम्हारी-मेरी दुनिया को
एक सुन्दर आंगन बनाता रहा।
तुम्हारी बातों का
तुम्हारे जज्बातों का
तुम ही मतलब समझती थी
मेरी बातें और जज्बात
तुम्हारे लिये बेमतलब थे।
मेरे मन की व्यथा
मेरे दिल की प्यास
तुम अपने कदमों में
रोंधती रही मैं सहता गया।
तुम्हारा मस्तिश्क
अवरोधित रहा है बातों से
तुम अज्ञेय रही हो जज्बातों से
मैं प्रेम की पराकाश्ठा को
जीना चाहता था
तुमसे प्रेम करता था
पीव न प्रेम कर सका
न ही जी सका
बाधा हमेशा से
तुम रही हो, तुम्हारा
अवसादित मन रहा है
तुम अब भी अवसाद से
मुक्ति पाने के परामर्श
परामर्शदाता के बतायें
उपायों को अपनाकर
सालों से अवसाद में हो।
सिरफिरेपन में प्रेम नहीं
वासना की लपटों में
सुलग रहे हम दोनों के बीच
एक अधूरापन आज भी जिंदा है।


प्रथम प्रेमानुभूति


जब नवयौवना 
बंध जाती है
पति के बन्धन में
तब पति के पास
निर्लज्ज/अश्लील होते ही
उसकी काया को
पति अर्पित करता है
अपने अंग।
दोनों भीतर ही भीतर
अपनी भावनाओं के
सागर में गोता लगाते हैं
अच्छे-बुरे विचारों का बवंडर
उड़ा ले जाता है उन्हें
और वे एक दूसरे के चरित्र को
मापते हुये अंत में करते हैं मंथन।
जब वे विचारों के सागर में
तैरते-उतराते करते हैं
देह का समर्पण तब उनमें
कुछ विचार टूटते हैं
कुछ भावनायें बिखरती है
और वे सुखद पीड़ा के साथ
एक दूसरे की काया को
उन्मुक्तता से रौंदते हैं ।
तब देह के भीतर से
सैकड़ों बिजलियॉ कड़कडाकर
दूसरी देह में गिरती अनुभव करते हैं
मानों घनघोर मेघ
बरस चुके है और
अलौकिक आनंद के साथ ही
पीव नवपरिणिता पति-पत्नी
निस्तेज हो जाते हैं।

                          आत्माराम यादव पीव वरिष्ठ पत्रकार
                 काली मंदिर के पीछे,पत्रकार आत्माराम यादव गली,
                 वार्ड नं. 31होशंगाबाद मध्यप्रदेश
                    पिन-461001

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