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फिल्मी पटकथा लेखन (Script Writing) डॉ. विजय शिंदे

फिल्मी पटकथा लेखन (Script Writing)

डॉ. विजय शिंदे

देवगिरी महाविद्यालय, औरंगाबाद - 431005 (महाराष्ट्र).

फिल्मों के व्यावसायिक और कलात्मक नजरिए से सफल होने के लिए आधारभूत तत्त्व के नाते कथा, पटकथा और संवादों को बहुत अधिक एहमीयत है। कथा या कहानी आरंभिक तत्त्व के नाते एक सृजन प्रक्रिया होती है और इसे साहित्यकार द्वारा जाने-अनजाने अंजाम दे दिया जाता है। सृजन कार्य स्वयं के सुख के साथ समाज हित के उद्देश्य को पूरा करता है, परंतु इसका पूरा होना किसी आंतरिक प्रेरणा का फल होता है। लेकिन इन्हीं कहानियों का जब फिल्मी रूपांतर होता है तब उसका मूल फॉर्म पूरी तरीके से बदल जाता है। एक कहानी की पटकथा लिखना और फिर संवाद स्वरूप में उसे ढालना व्यावसायिक नजरिए को ध्यान में रखते हुए की गई कृत्रिम प्रक्रिया है। इसे कृत्रिम प्रक्रिया यहां पर इसलिए कह रहे हैं कि जैसे साहित्यकार कोई रचना अंतर्प्रेरणा से लिखता है वैसी प्रक्रिया पटकथा लेखन में नहीं होती है, उसे जानबूझकर अंजाम तक लेकर जाना पड़ता है। पटकथा लेखक के लिए और एक चुनौती यह होती है कि निमार्ताओं द्वारा बनाई जा रही फिल्में किसी छोटी कहानी पर बनी हो तो भी और किसी बड़े उपन्यास पर बनी हो तो भी उसे चुनिंदा प्रसंगों के साथ एक समान आकार में बनाना होता है, ताकि वह दो या ढाई घंटे की पूरी फिल्म बन सके। अर्थात् पटकथा लेखक का यह कौशल, मेहनत और कलाकारिता है, जिसके बलबूते पर वह पटकथा में पूरा उपन्यास समेट सकता है और किसी छोटी कहानी में कोई भी अतिरिक्त प्रसंग जोड़े बिना उसको पूरी फिल्म बना सकता है। फणीश्वरनाथ रेणु जी की ढाई पन्ने की कहानी ‘तीसरी कसम’ (मारे गए गुलफाम) पर बनी फिल्म ‘तीसरी कसम’ (1966) और रणजीत देसाई के उपन्यास ‘राजा रविवर्मा’ पर बनी फिल्म ‘रंगरसिया’ (2014) दोनों भी परिपूर्ण है। अर्थात् एक पटकथा का आकार कहानी से बना है और दूसरी पटकथा का आकार व्यापक उपन्यास की धरातल है। इन दोनों में भी साहित्यिक रूप से फिल्म के भीतर का रूपांतर पटकथा लेखक का कमाल माना जा सकता है। आवश्यकता भर लेना और अनावश्यक बातों को टालने का कौशल पटकथा लेखन में अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। जिस प्रकार पटकथा का लेखन और लेखक का कमाल होता है वैसे ही निर्माता-निर्देशक की परख, पैनापन और चुनाव का भी कमाल होता है। मन्नू भंड़ारी लिखती है कि "बरसों पहले मेरी कहानी ‘यहीं सच है’ पर बासुदा (बासु चटर्जी) ने फिल्म बनाने का प्रस्ताव रखा तो मुझे तो इसी बात पर आश्चर्य हो रहा था कि एक लड़की के निहायत निजी आंतरिक द्वंद्व पर आधारित यह कहानी (इसीलिए जिसे मैंने भी डायरी फॉर्म में ही लिखा था) दृश्य-माध्यम में कैसे प्रस्तुत की जाएगी भला? पर बासुदा ने इस पर ‘रजनीगंधा’ (1974) नाम से फिल्म बनाई, जो बहुत लोकप्रिय ही नहीं हुई, बल्कि सिल्वर जुबली मनाकर जिसने कई पुरस्कार भी प्राप्त किए।" (कथा-पटकथा, पृ. 9)

1. पटकथा क्या है?

प्रस्तावना में लिख चुके हैं कि पटकथा फिल्मों के लिए आधारभूत तत्त्व है। कहानी का फिल्मी ढांचे के तहत विकसित रूप पटकथा कहा जाता है। पटकथा लेखक वह पहला व्यक्ति होता है जो फिल्म को परदे पर उतरने से पहले देखता है। अपनी कल्पना की आंख से उसके सामने से कई अदृश्य चित्र सरकने लगते हैं और उसे वह संक्षेप में कागज पर उतारता है। उन्हीं उतरे हुए शब्दों को एक कहानी के तहत फिल्मों से जुड़े अन्य लोगों के सामने बयां करते भी जाता है तब वे अन्य लोग भी पटकथा लेखक के कथन कौशल के आधार पर फिल्म की आरंभिक अवस्था की सही झलक पाते हैं। पटकथा लेखक के दिमाग में कहानी के दृश्य एक क्रम से मानो चलचित्र जैसे चलने लगते हैं। इन्हीं दृश्यों को पटकथा लेखक शब्दों में पकड़ता है और कागज पर उतारते जाता है। इस प्रकार से कागज पर पटकथा को उतारना आसान नहीं होता उसके लिए कल्पना, प्रतिभा, तपस्या, मेहनत और कौशल की जरूरत होती है। इस प्रकार का लेखन अचानक नहीं होता इसके लिए इस क्षेत्र से जुड़े रहना और अभ्यस्त होना भी जरूरी होता है।

पटकथा अंग्रेजी शब्द ‘स्क्रीन प्ले’ का अनुवाद है। फिल्मों में और दूरदर्शन पर कई प्रकार के कथात्मक कार्यक्रम बनाए जाते हैं और इसको बनाते वक्त उसके आरंभ, मध्य और अंत की रूपरेखा बनाई जाती है। यह कल्पना की जाती है कि फिल्म बनने के बाद परदे पर किस रूप में उभरेगी और मूल कथा को कैसे प्रकट करेगी। अर्थात् फिल्मों में भूतकाल में चलती मूल कहानी को वर्तमान के साथ जोड़ने का कार्य पटकथा लेखन करता है।

· असगर वजाहत - "पटकथा, कथा का वह रूप है जिसके आधार पर निर्देशक बनाए जानेवाली फिल्म के भावी स्वरूप का अनुमान लगाता है।" (पटकथा लेखन व्यावहारिक निर्देशिका, पृ. 9)

· मनोहर श्याम जोशी - "आप पहले अपने मन के पर्दे पर घटनाओं को होते हुए देखिए और पात्रों को बोलते हुए सुनिए। फिर कागज पर उतारते जाइए कि क्या घटना घट रही है और कौन पात्र क्या बोल रहा है? घटना की नाटकीयता को उभारते जाइए। यह मानकर चलिए कि जैसा नानी से कहानी सुनता बच्चा हर दिलचस्प मोड़ के बाद यह पूछता है कि फिर क्या हुआ, उसी तरह बहुत-से जिज्ञासु दर्शक बैठे हैं जो आपसे जानना चाहते हैं कि ‘फिर क्या होता है?’ इस प्रश्न का जवाब देते रहने से नए-नए सीक्वेंस शुरू होंगे और ये सीक्वेंस आपका ‘स्क्रीन प्ले’ यानी आपकी पटकथा तैयार कर देंगे। गोया पटकथा और कुछ नहीं वह कथा है जो पर्दे पर दिखाई जाने के लिए लिखी गई है।" (पटकथा लेखन एक परिचय, पृ. 20)

· हूबनाथ – "कथा और पटकथा मात्र दो ऐसे तत्त्व हैं जो यंत्र के मोहताज नहीं है। कथा, विचारबीज के रूप में जनमती है और पटकथा जिसे चित्रनाट्य भी कहते हैं उस विचारबीज का मुकम्मल ढांचा रचती है।" (कथा पटकथा संवाद, पृ. 17)

· राजेंद्र पांड़े – "पटकथा यानी सिनेमा, टेलीविजन तथा वृत्तचित्र माध्यम हेतु किया गया विस्तृत लेखन। यह एक अलग शैली का लेखन है, इसलिए इसका नाम भी अलग है, पटकथा लेखन। पटकथा लेखन में कथा-लेखन समाया हुआ है। लेकिन यह कथा लेखन के बाहर के तत्त्वों को भी अपने में समेटे हुए हैं।" (पटकथा कैसे लिखें, पृ. 9)

· यह बातें विशेष रूप से ध्यान में रखें

· फिल्म और टी. वी. के आधार लेखन को पटकथा कहते हैं।

· पटकथा के माध्यम से निर्देशक, अभिनेता, कॅमरा मॅन, साउंड़ रिकॉर्डिस्ट आदि दिशानिर्देशन पाते हैं।

· कहानी पटकथा का आधार होती है।

· पटकथा लेखन को प्रस्तुतिकरण से जोड़ना होता है।

· सही पटकथा लेखक वहीं है जो शब्दों को अपने काबु में रख सके।

· दृश्यों के जरिए वर्णन, दृश्यों का लेखन ही पटकथा है।

· पटकथा कहानी कहने की एक अद्भूत कला है।

· पटकथा लेखक माध्यम की सूक्ष्मताओं को बारीकी से पकड़े।

2. पटकथा के लिए कहानी कैसी हो?

फिल्मों की सफलता और असफलता कहानी और पटकथा पर निर्भर होती है। अतः निर्माताओं द्वारा कहानी का सही चुनाव होना भी अत्यंत आवश्यक है। उनका यह चुनाव गलत हो गया तो आगे चलकर उनके लिए आर्थिक नुकसान की ओर ले जा सकता है। उनका यह नुकसान केवल उनका नहीं रहता है, तो उस फिल्म से जुड़े हर शख्स के लिए होता है। "कहानी फिल्म का मूल आधार बनती है और कहानी ‘अच्छी’ या ‘खराब’ होने से फिल्म की सफलता और असफलता तय होती है। चूंकी फिल्म और टी. वी. बहुत महंगे माध्यम है इसलिए इसके व्यावसायिक पक्ष का ध्यान रखना भी जरूरी होता है। कहानी चुनते समय यह सोचना बहुत आवश्यक है कि कहानी फिल्म के लिए क्यों चुनी जा रही है? क्या कहानी दर्शकों को पसंद आएगी?" (पटकथा लेखन व्यावहारिक निर्देशिका, पृ. 16) कहानी में आरंभ से लेकर अंत तक का सफर बड़ी बारीकी से सजाया हुआ होना चाहिए। उसमें अनावश्यक विस्तार और घटना प्रसंग जुड़े हैं तो पटकथा लिखते वक्त उसे परहेज करना पड़ता है। छोटी कहानी पर बनी फिल्में कम तकलीफ देती है, परंतु बड़े उपन्यास और कहानियों पर बनी फिल्मों पर बहुत अधिक काम करते हुए व्यापक परिदृश्य को फिल्म के हिसाब से छोटा करना अत्यंत जरूरी होता है। पटकथा के लिए कहानी का चुनाव करते वक्त निम्न बातों का विशेष ध्यान रखें –

· कहानी में मनोरंजन के तत्त्व होने चाहिए।

· मौलिकता कहानी की अनिवार्य शर्त है।

· कहानी के कथानक का सीधा, स्वाभाविक होना आवश्यक है।

· कहानी का प्रासंगिक होना जरूरी है।

· कहानी के तत्त्वों में संतुलन होना चाहिए।

· पात्रों की संख्या संतुलित और कथानक के अनुसार हो।

· कहानी में अत्यधिक घटनाएं, उलझी हुई उपकथाएं नहीं होनी चाहिए।

· पात्रों और घटनाओं के बीच संतुलन होना चाहिए।

· कहानी में द्वंद्व आवश्यक है। आंतरिक द्वंद्व और बाह्य द्वंद्व का संयोजन आवश्यक है।

· कहानी का परिवेश स्पष्ट हो।

· कहानी में स्पष्ट चरम उत्कर्ष हो।

· मुख्य कथा और उसकी उपकथाओं के बीच एक गहरा संबंध होना चाहिए।

· कहानी में किसी विचारधारा, पात्र या समस्या के प्रति अनावश्यक मोह नहीं होना चाहिए।

· कहानी का काम उपदेश देना नहीं है।

3. पटकथा का स्वरूप

कहानी और सिनेमा की पटकथा में जमीन-आसमान का अंतर होता है। सिनेमा की पटकथा लिखते वक्त लेखक को सिनेमाई जानकारी आवश्यक है। फिल्में बनती कैसी है और उसका उद्देश्य क्या है, यह भी जानना जरूरी है। फिल्में बनाने के तरीकें और उसके तकनीक की बारिकियों पर भी पटकथा लेखक को गौर करना पड़ता है। अगर यह पता नहीं है तो पटकथा लेखक से कई गलतियां होगी और गलतियों के साथ बनी फिल्में व्यावसायिकता की कसौटी पर सबका नुकसान करेगी। अब निर्माता-निर्देशक व्यावसायिक नफे-नुकसान के बारे में सोचने लगे हैं। प्रत्येक फिल्म उनके लिए कमाई का जरिया होता है। बहुत अधिक नफा नहीं परंतु नुकसान तो बिल्कुल उठाएंगे नहीं जैसी मानसिकता हर फिल्मी शख्स की है और यह गलत भी नहीं है। पटकथा लेखक और लेखन फिल्मों के लिए आरंभिक सीढ़ी है और इस सीढ़ी का अतुलनीय, तराशा हुआ तथा ताकतवर होना जरूरी है; अगर यह नहीं है तो पटकथा का कोई मोल नहीं और पटकथा लेखक का भी कोई मोल नहीं। ऐसे कई उदाहरण हिंदी और अन्य भारतीय तथा विश्व भाषाओं की फिल्मी दुनिया में देखें जा सकते हैं कि जो एक साहित्यकार के नाते सातवें आसमान पर चढ़े लेकिन एक पटकथा लेखक के नाते धराशायी हो गए। हिंदी साहित्यकार और कथाकार के नाते मुंशी प्रेमचंद, भगवतीचरण वर्मा, सुदर्शन, जैनेंद्र कुमार जैसों के नाम बहुत बड़े नाम हैं परंतु यहीं जब फिल्मों के साथ जुड़ते हैं और पटकथा लिखने लगते हैं तो उसके फॉर्म और तकनीक के आदी नहीं होते तो असफल होते हैं। अंततः इन बड़े लेखकों को फिल्मी दुनिया से निराशा होती है और वापस लौटते हैं। राही मासूम रजा, कमलेश्वर जैसे लेखक फिल्मी दुनिया की तकनीक से आदी हो गए तो उन्होंने सफलता पाई। "पटकथा अथवा स्क्रिप्ट लेखन कार्य आम लेखन से बिल्कुल दूसरी तरह का लेखन कार्य है, जिसे दृश्यों के आधार पर लिखा जाता है, वह व्यक्ति उतना ही अधिक सफल पटकथा लेखक होता है, जिसे लेखन के साथ-साथ निर्देशन, संपादन और छायांकन का भी अनुभव हो। इसलिए यह आवश्यक है कि सफल पटकथा लेखक बनने हेतु निर्देशन, संपादन और छायांकन का कुछ-न-कुछ अनुभव होना चाहिए।" (पटकथा लेखन फीचर फिल्म, पृ. 12) पटकथा के स्वरूप की जानकारी लेते वक्त निम्न बातों पर गौर करना जरूरी है –

· पटकथा लेखन का सही स्वरूप तो वही होगा, जो दृश्य-श्रव्य के अनुकूल हो।

· पटकथा प्रभावकारी होती है, उसके प्रभाव से दर्शक, पाठक और श्रोता के पास पहुंचना होता है।

· पटकथा लेखक द्वारा पटकथा को कागज पर लिखा जाता है परंतु उसका माध्यम बदलने से मतलब फिल्मी बनने से अधिक प्रभाव निखरता है। अर्थात् अधिक प्रभाव निखारनेवाली पटकथा का होना जरूरी है।

· यह जरूरी नहीं है कि पटकथा कहानी की पूरी प्रतिछाया हो। लेखक कहानी के किसी ऐसे बिंदु से भी पटकथा शुरू कर सकता है जो कहानी का प्रारंभिक बिंदु न हो।

· पटकथा लेखन फिल्म की गति, रोचकता और नाटकीयता तथा चरित्र विकास को ध्यान में रखकर होना चाहिए।

· पटकथा लेखक कहानी को दृश्यात्मक रूप में देखता है और कहानी के जो प्रसंग किसी खास तरह के ‘विजुवल’ की मांग करते हैं उन्हें पूरा करता है।

· पटकथा कहानी को उस रूप में प्रस्तुत करती है जिस रूप में वह पर्दे पर दिखाई देगी।

· यह जरूरी नहीं कि कहानी के क्रम से ही पटकथा लिखी जाए।

· कहानी की प्रत्येक घटना एक निश्चित स्थान पर निश्चित समय में घटीत होती है। अतः एक स्थान और एक समय पर घटनेवाली घटना से दृश्य बनता है।

· पटकथा लेखन में छोटी और बड़ी घटनाओं को स्थान और समय के आधार पर सूचिबद्ध किया जाता है।

· कहानी में किसी घटना का स्थान या समय बदल जाने से पटकथा के भी दृश्य बदल जाते हैं।

· कहानी छोटी-बड़ी घटनाओं का एक संकलन होती है। समय और स्थान के आधार पर सीन (दृश्य) बनते हैं। एक फीचर फिल्म की कहानी में प्रायः 100 से 150 सीन होते हैं। पटकथा लेखक दृश्यों को आपस मे जोड़ने के लिए कुछ ऐसे दृश्यों की कल्पना करता है, जो सब सीन (उपदृश्य) कहे जाते हैं। इन उपदृश्यों में दो-चार ही शॉट्स होते हैं, लेकिन इससे दृश्य को स्थापित किए जाने में मदद मिलती है।

कुलमिलाकर कहा जा सकता है कि पटकथा लेखन ही फिल्मों के लिए सफलता की सीढ़ी है, जिस पर चढ़कर दर्शकों के मन पर राज किया जा सकता है। कहानी को फिल्मी पटकथा के भीतर ढालना एक विशेष प्रकार की कला है और इस कला को आत्मसात करना एक नई दुनिया का खुल जाना है। इस क्षेत्र में अपना भविष्य बनाने के इच्छुक पटकथा की बारिकियों को समझे और अभ्यास तथा अनुभव के बल पर नए रोजगार क्षेत्र को खोले।

4. पटकथा के अंग

किसी भी साहित्य की विधा के अंग होते हैं वैसे ही पटकथा के भी अंग होते हैं। पटकथा फिल्मों के नजदीक जैसे है वैसे ही वह साहित्य के भी नजदीक है। सिनेमा और साहित्य को जोड़ने का काम पटकथा करती है। राजेंद्र पांड़े जी ने पटकथा के तीन अंग बताए हैं –

अ. कहानी,

आ. दृश्यमय बुनावट,

इ. संवाद।

कहानी, दृश्यमय बुनावट और संवाद पटकथा के तीन स्वतंत्र अंग हैं। "ये तीनों अंग एक-दूसरे में मिले हुए हैं और एक-दूसरे के पूरक भी। ऐसा नहीं हो सकता कि बगैर कहानी के पटकथा लिख ली जाए... उसी तरह कहानी हो, पटकथा हो, लेकिन उनमें संवाद न हों। जब तक फिल्में मूक हुआ करतीं, तब तक उनमें अधूरापन हमेशा खलता रहा। आज बोलती फिल्में देखकर लगता है कि फिल्में पूर्णतः को प्राप्त कर चुकी हैं। इससे यह साबित होता है कि शब्द की अपनी ताकत होती है। इन तीनों अंगों में संतुलन बनाए रखना जरूरी है। इस संतुलन से ही एक दूसरे अंग को बल मिलता है, और वे एक दूसरे को सम्हाल लेते हैं।" (पटकथा कैसे लिखें, पृ. 16)

5. पटकथा लेखन का तकनीकी तरीका

इससे पहले भी स्पष्ट कर चुके हैं कि पटकथा लेखन करना मेहनत, अभ्यास, कौशल और सृजनात्मक कार्य है। कोई लेखक जैसे-जैसे फिल्मी दुनिया के साथ जुड़ता है वैसे-वैसे वह पटकथा लेखन की सारी बातें सीख लेता है। पटकथा लेखक को उसकी बारिकियां अगर पता भी न हो तो कम-से-कम उसे ऐसा लेखन करने की रुचि होनी चाहिए। निर्माता-निर्देशक लेखक से अच्छी पटकथा लिखवा लेते हैं, कमियों को दुरुस्त करने की सलाह देते हैं। हिंदी की साहित्यकार मन्नू भंड़ारी ने कई टी. वी. धारावाहिकों के साथ फिल्मों हेतु बासु चटर्जी जी के लिए पटकथा लेखन किया। वे लिखती हैं कि "इस विधा के सैद्धांतिक पक्ष की ए बी सी डी जाने बिना ही मैंने अपना यह काम किया (कभी जरूरत हुई तो आगे भी इसी तरह करूंगी) और इसलिए हो सकता है कि मेरी ये पटकथाएं इसके तकनीकी और सैद्धांतिक पक्ष पर खरी ही न उतरें। फिर मैंने कभी यह सोचा भी नहीं था कि मुझे इन पटकथाओं को प्रकाशित भी करना होगा।... मैंने तो इन्हें सिर्फ बासुदा के लिए लिखा था और उनकी जरूरत (जिसे मैं जानती थी) के हिसाब से लिखा था, सैद्धांतिक पक्ष के अनुरूप नहीं... (जिसे मैं जानती ही नहीं थी)।" (कथा-पटकथा, पृ. 11) खैर मन्नू भंड़ारी पटकथा लिखना नहीं जानती थी परंतु उनमें पहले से मौजूद प्रतिभा, रुचि और बासु चटर्जी का मार्गदर्शन सफल पटकथा लेखन करवा सका है। पटकथा लेखन के दो तकनीकी तरीकें जो आमतौर पर फिल्मी दुनिया में अपनाए जाते हैं। एक है घटना-दर-घटना, दृश्य-दर-दृश्य, पेज-दर-पेज लिखते जाना। इसे लेखन की गतिशील (रनिंग) शैली या क्रमबद्ध तरीका कहा जाता है, और दूसरा तरीका है स्थापित लेखन तरीका।

अ. क्रमबद्ध तरीका – हमारे यहां फीचर फिल्म तथा टेलीविजन धारावाहिक हेतु यह तरीका अपनाया जाता है। इसके अनुसार पटकथा की शुरुआत दृश्य एक से की जाती है और वह लगातार, क्रमवार ढंग से, एक के बाद एक दृश्य के रूप में लिखी जाती है। जिस तरह किताब लिखी जाती है, वही तरीका यहां भी अपनाया जाता है। क्रमबद्ध (रंनिग) शैली में लिखते समय हर दृश्य स्वतंत्र पेज पर भी लिखा जाता है, या पेज की चिंता न करते हुए लगातार लिखा जाता है। (पटकथा कैसे लिखें, पृ. 141)

आ. स्थापित तरीका – दूसरे तरीके में पेज को उसकी लंबाई के हिसाब से दो समान हिस्से में बांटा जाता है। यानी ऊपर से नीचे तक एक साक्षात या काल्पनिक रेखा खिंच ली जाती है। एक हिस्से में शीर्षक के रूप में ऊपर लिखा जाता है – Visual यानी दृश्य। दूसरे हिस्से में शीर्षक के रूप में ऊपर लिखा जाता है – Audio यानी आवाज या ध्वनि। (आकृति देखें)

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दृश्य के हिस्से में दृश्य का वर्णन लिखा जाता है। क्रियाकलाप या साक्षात्कार संबंधी संकेत लिखे जाते हैं। आवाज या ध्वनि के हिस्से में साक्षात संवाद या कमेंटरी लिखी जाती है। इस तरह माना जाता है कि अमुक हरकत के साथ अमुक संवाद जुड़ा है। दोनों को मिलाकर दृश्य (शॉट) बन जाता है। यह तरीका अभी तो हमारे यहां वृत्तचित्र और विज्ञापन लेखन के क्षेत्र में अपनाया जाता है। विज्ञापन लेखन हेतु प्रयुक्त शैली को स्टोरी बोर्ड (Story Board) कहा जाता है। विदेशों में अभी भी फिल्म, धारावाहिक, वृत्तचित्र तथा विज्ञापन क्षेत्र की पटकथा लिखने के लिए एक ही तरीका अपनाया जाता है। वह है दृश्य और ध्वनि को पन्ने के दो हिस्सों में बांटनेवाला। (पटकथा कैसे लिखें, पृ. 141-142)

6. पटकथा लेखक के गुण

कहानी का सृजक अपनी प्रतिभा के बलबूते पर कहानी की रचना करता है। उसका यह लेखन अपने अंतर की प्रेरणा का स्वरूप होता है। लेखक जो लिखता है उसका व्यावसायिक लाभ कमाने का उद्देश्य कम होता है, अर्थात् उसका लेखन करने का उद्देश्य स्वांतः सुखाय अधिक होता है। लेकिन यहीं कहानियां फिल्मों के भीतर पटकथा का स्वरूप धारण कर जब परदे तक का सफर तय करना शुरू करती है तब हर जगह पर उसके साथ व्यावसायिकता जुड़ जाती है। अर्थात् फिल्मों में पटकथा लिखना भी व्यावसायिक मांग की तहत आता है। पटकथा लेखक के हाथों में कहानी सौंपी जाती है और उसे कहा जाता है कि फिल्म के लिए इसकी पटकथा तैयार करें। बहुत जगहों पर ऐसे पाया जाता है कि मूल कहानी का लेखक और पटकथा लेखक दोनों एक ही है। मूल लेखक ही कहानी को पटकथा के स्वरूप में ढालता है। व्यावसायिक धरातल पर उस लेखक के लिए लेखक और पटकथा लेखक दोनों का मानधन भी दिया जाता है। फिल्मों के अनुकूल पटकथा लिखना एक कला है। आज-कल हमारे आस-पास फिल्मों के अलावा ऐसे कई मनोरंजन के साधन, टी. वी. चॅनल्स और अन्य क्षेत्र है वहां पर पटकथा लेखन की आवश्यकता पड़ती है। प्रतिभावान और इस क्षेत्र में रुचि रखनेवाले लोगों के लिए पटकथा लेखन करना आय के स्रोत की उपलब्धि करवाता है।

पटकथा लेखन अभ्यास, मेहनत और स्वाध्याय के साथ-साथ एक व्यावसायिक लेखन है। जाहिर है कि लेखन की इस विधा के लिए स्वाध्याय के साथ-साथ लेखन के व्यवसायिक गुणों का होना जरूरी है। पटकथा लेखन के लिए आवश्यक गुणों को निम्न रूप में विश्लेषित किया जा सकता है –

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6.1 स्वाध्याय श्रेणी के गुण

1. नैसर्गिक प्रतिभा - स्वाध्याय श्रेणी का यह गुण ‘इन-बिल्ट’ और ‘डिफ़ॉल्ट’ गुण हैं। इसे निसर्गतः प्राप्त प्रतिभा भी कह सकते हैं। प्राप्त प्रतिभा और रुचि को जब मौका मिल जाता है तब वह इस क्षेत्र में आगे बढ़ता है। कहानियां पढ़ने और इसे चलचित्रों जैसा अनुभव करने की तथा लिखने की रुचि ही उसकी मूल नैसर्गिक प्रतिभा को तराशती है। सफल पटकथा लेखक बनने के लिए नई-नई कहानियां पढ़ने और सुनने का केवल शौक नहीं बल्कि एक जुनून होना जरूरी है।

2. प्रेक्षक और विश्लेषक - पटकथा लेखक केवल कहानियां पढ़ने और सुनने के जुनूनी नहीं होते हैं, बल्कि इससे दो कदम आगे वे कहानियां देखने में यकीन रखते हैं। इसलिए समाज से कटकर नहीं, समाज से जुड़कर सामाजिक गतिविधियों पर पैनी नजर रखते हैं। कहने का तात्पर्य है, एक पटकथा लेखक बनने के लिए घटनाओं और परिघटनाओं का अच्छा प्रेक्षक यानी ऑब्जर्वर और विश्लेषक होना आवश्यक है।

3. किस्सागो वृत्ति - केवल कहानियां देखने से क्या होता है? सबसे जरूरी है कहानियां कहना, किस्सागो होना। पटकथा लेखक द्वारा कहीं और कथन की गई सफल कहानी दर्शकों को सिनेमाघरों में खिंच लाती है। एक सफल किस्सागो होना एक सफल पटकथा लेखक होने का एक महत्त्वपूर्ण गुण है।

6.2 व्यावसायिक श्रेणी के गुण

1. भाषा पर असाधारण पकड़ - जिस भाषा में पटकथा लिखी जानी है, उस भाषा पर अच्छी पकड़ होनी चाहिए। इससे भावनाओं को सहजता से व्यक्त किया जा सकता है। असहज भाषा में लिखी गई पटकथा को कोई पढ़ने के लिए तैयार नहीं होता है। यह ध्यान रहे कि फ़िल्म-निर्माण से जुड़े अधिकांश लोग भाषा के विद्वान नहीं होते हैं। वे आम बोलचाल की भाषा में लिखी गई पटकथा को ज्यादा पसंद करते हैं।

2. उच्च कल्पना शक्ति - उच्च कल्पनाशक्ति पटकथा लेखन की दूसरी सबसे बड़ी जरूरत है। जिनकी कल्पनाओं के घोड़े जितनी तेज दौड़ते हैं, वे उतनी ही अच्छी पटकथा लिख सकते हैं। जैसा कि ऊपर कहा गया है कि भाषाई रूप से समृद्ध होने पर एक पटकथा लेखक अपनी कल्पना को स्पष्टता से अभिव्यक्त कर सकता और सादगी से कह सकता है।

3. दृश्य-श्रव्य बोध - पटकथा पाठक द्वारा पढ़ी नहीं जाती है बल्कि दर्शक द्वारा देखी और सुनी जाती है। दूसरे शब्दों में कहें तो पटकथा एक काग़जी और कच्चा दस्तावेज है, जिसका रूपांतरण फ़िल्म या धारावाहिक में होता है। इसलिए एक सफल पटकथा लेखक बनने के लिए जरूरी है कि दृश्य-श्रव्य बोध (ऑड़ियो-विजुअल सेंस) काफी विकसित हो। (ई-संदर्भ, ब्लॉग – कथा पटकथा)

7. पटकथा कैसे लिखें?

पटकथा लेखन एक चरणबद्ध प्रक्रिया है। इसके कुछ मौलिक सिद्धांत हैं, जिसे जानना जरूरी है। कहानी या कथा किसी की भी हो सकती है। एक पटकथाकार केवल उस कहानी या कथा को एक निश्चित उद्देश्य यानी फिल्मों के निर्माण के लिए लिखता है, जो पटकथा (Screenplay) कहलाती है। और दूसरी ओर एक कथाकार स्वयं पटकथाकार भी हो सकता है यानी कहानी भी उसकी और पटकथा भी उसी की। सवाल है कि पटकथा लेखन के सिद्धांत क्या हैं? यह कैसे लिखें? क्या लिखें और क्या न लिखें? एक फ़िल्मी कथानक का बीजारोपण कैसे होता है, इसका प्रारूप कैसा होता है? इसे निम्नानुसार समझाया जा सकता हैं।

7.1 प्रस्थान बिंदु (प्रिमाईस)

एक कथा का पटकथा के रूप में रूपांतर और लेखन के लिए सबसे शुरूआती चरण है कि कहानी को तीन प्वायंट पर कसें। ये तीन प्वायंट है - प्रस्तावना, संघर्ष और समाधान। अनेक विद्वान इन तीन बिंदुओं को कहानी की समस्या, नायक-प्रतिनायक का संघर्ष और कहानी का उपसंहार कहते हैं। अंग्रेजी में इन्हें 1. प्रपोजिशन (Proposition), एक्सपोजिशन (Exposition) या कनफ्लिक्ट (Conflict), 2. स्ट्रगल (Struggle) या प्रोटागोनिस्ट्स (नायक) एंड़ एन्टागोनिस्ट्स (प्रतिनायक या विलेन) एक्शंस (Protagonist’s and Antagonist’s Actions) और 3. रिजॉल्यूशन (Resolutions) कहते हैं। प्रस्तावना, संघर्ष और समाधान को पटकथा का त्रिक-बिंदु (Three Points of Screenplay) या पटकथा का प्रस्थान-बिंदु (Starting Point of Screenplay) भी कहते हैं। आइए इसे समझने के लिए एक वर्कआउट करते हैं। इसे ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ (DDLJ) फिल्म के संदर्भ में समझने की कोशिश करते हैं कि इस फ़िल्म की प्रस्तावना, संघर्ष और समाधान क्या हैं? आपमें से बहुत लोगों ने यह फ़िल्म जरूर देखी होगी, जिन्होंने नहीं देखा हो, प्लीज देख लें, ताकि पटकथा-लेखन की इस बुनियादी विषयवस्तु को भली-भांति समझ सकें।

अ. प्रस्तावना - लंदन में रहनेवाले एक भारतीय आप्रवासी बलदेव सिंह की इंट्रोवर्ट और आज्ञाकारी बेटी सिमरन और एक एक्सट्रोवर्ट मॉड़र्न लड़के राज को यूरोप की एक टूर के दौरान एक-दूसरे से प्यार हो जाता है।

आ. संघर्ष - भारतीय रीति-रिवाजों को दिल से माननेवाले बलदेव सिंह को यूरोपीय रहन-सहन से चिढ़ होती है, लिहाजा वे सिमरन की शादी अपने दोस्त के बेटे से करवाने के लिए भारत चले आते हैं, तो दूसरी ओर राज अपने पिता की सलाह मानकर अपने प्यार सिमरन को पाने उनके पीछे भारत आ जाता है।

इ. समाधान - राज और सिमरन का प्यार देखकर सिमरन की मां उन्हें भाग जाने के लिए कहती है, लेकिन राज कहता है कि वह बाबूजी के दिल में अपनी जगह बनाकर उनकी मर्जी से ही सिमरन को दुल्हन बनाएगा और आख़िरकार राज और सिमरन की दीवानगी देखकर बलदेव सिंह को उनके प्रेम को स्वीकार करना पड़ता है।

7.2 पटकथा लेखन का OBE या OBC सूत्र

पटकथा के कथानक को समस्या, संघर्ष और समाधान में बांटने की एक सर्वमान्य लेखन-परंपरा है। इन तीन बिंदुओं के रूप में कथानक को प्रस्तुत करने का चलन सर्वथा नया नहीं है। स्कूली शिक्षा में हमें सिखलाया जाता है कि अपने प्रत्येक आलेख को तीन भागों यानी शुरुआत (Opening), मध्य भाग (Body) और अंत (Ending) में बांटे। आलेख-लेखन का यह सूत्र OBE (Opening-Body-Ending) या OBC (Opening-Body-Conclusion) के रूप में जाना जाता है। ओपनिंगवाले हिस्से में जहां प्रस्तावना या विषयवस्तु का परिचय होता है, बॉड़ीवाले भाग में विषय-वस्तु का वर्णन होता है, तो वहीं एंड़िंगवाले पार्ट में विषय-वस्तु का निष्कर्ष या आलेख का उपसंहार होता है। कमोबेश पटकथा लेखन भी इसी अवधारणा पर नियोजित होती है।

सदियों से और आज भी स्कूल में आलेख लिखने का यह प्रारूप जरूर सिखलाया जाता है। रोचक यह है कि इस रीति का पालन नहीं करने पर परीक्षक नंबर काट लेते हैं। अगर किसी आलेख के लिए 10 नंबर निश्चित है और किसी छात्र ने OBE के ढर्रे का पालन नहीं किया है, तो उसके 2-3 नंबर तो शर्तिया काट लिए जाते हैं। सवाल है फिल्मी दुनिया में OBE के इस बहस से क्या मतलब है? मतलब है, बड़ा गहरा मतलब है। क्या यहां भी नंबर कटता है। जी, बिलकुल कटता है और 2-3 नंबर नहीं, पूरे-का-पूरा नंबर कट जाता है और आपकी पटकथा को कचरे के डिब्बे में फेंक दिया जता है।

7.3 प्रिमाईस के गुण

पटकथा लेखन के प्रस्थान बिंदु यानी किसी कथानक को समस्या, संघर्ष और समाधान के रूप में प्रस्तुत करने की अवधारणा को फिल्मी लेखन की भाषा में ‘प्रेमाईस’ या ‘प्रिमाईस’ (Premise) कहते हैं। विद्वानों के अनुसार जैसे किसी कहानी को लिखने से पहले उसका ‘प्लॉट’ (Plot) लिखा जाता है, ठीक उसी तरह किसी पटकथा को लिखने से पहले उसका प्रिमाईस लिखना अनिवार्य है। संक्षेप में कहें, तो पटकथा का आधार, उसकी जमीन है - ‘प्रिमाईस’। सवाल यह उठता है कि एक कथानक को समस्या, संघर्ष और समाधान के रूप में क्यों बांटे यानी प्रिमाईस के रूप में क्यों लिखे? इनके कारणों पर अगर नजर डालेंगे तो प्रिमाईस के गुण पता चलते हैं।

अ. मूल विषय और दार्शनिक पृष्ठभूमि - पटकथा के कथानक को समस्या, संघर्ष और समाधान में बांटना इसलिए जरूरी है, क्योंकि यह कथानक को उसकी मूल विषय और दार्शनिक पृष्टभूमि से जोड़े रखता है। कथा और पटकथा के विस्तार के समय भटकाव की गुंजाइश लगभग नहीं के बराबर होती है। दूसरे शब्दों में कहें तो यह कथानक को दिशा और उसका आधार देता है, लिहाजा पटकथा कहीं से लचर नहीं होती है। कमजोर और लचर पटकथा यह आज के अधिकांश फिल्मों की एक सबसे बड़ी समस्या है। एक सुपर-डुपर हिट फिल्म में दो मिनट की कमजोर और लचर पटकथा भी अक्षम्य है।

आ. अंतर्संबंध - कहानी को समस्या, संघर्ष और समाधान के रूप में बांटना इसलिए जरूरी है कि कथानक के साथ-साथ उपकथा, समांतर कथा, अवांतर कथा, घटनाओं और प्रतिघटनाओं का सीधा संबंध इन्हीं तीन बिंदुओं से होता है। एक कथानक का सारा ताना-बाना इन्हीं तीन बिंदुओं के इर्दगिर्द घूमता है। जैसे ही यह ताना-बाना इस त्रिक-बिंदु से दूर होता है, पटकथा बिखरने लगती है।

इ. पटकथा की टॅगलाईन - प्रिमाईस कथानक के थीम (What), सब्जेक्ट (Who, Why, Where) और (When) और क्लाइमेक्स (Now what & How) को परिभाषा देता है। यह पटकथा के टॅगलाईन जैसा होता है, जिसे पढ़ने मात्र से ही आगे के कथानक को जानने की बेचैनी और उत्सुकता बढ़ जाती है।

ई. नाटकीयता - एक अच्छा प्रिमाईस न केवल अच्छे कथानक और बेहतर पटकथा को आधार देता है, बल्कि यह कथा-पटकथा में पर्याप्त नाटकीयता भी लाता है।

उ. दो मिनट की फिल्म (Two Minute Movie) - हॉलीवुड़, बॉलीवुड़, टॉलीवुड़ या और भी जितने फिल्म निर्माण क्षेत्र हैं, वहां के प्रबुद्ध फिल्ममेकर्स (प्रोड्यूसर्स, डायरेक्टर्स आदि) के बीच थ्री प्वायंट्स ऑफ स्क्रीनप्ले यानी पटकथा का त्रिक-बिंदु ही प्रचलित है। फिल्म निर्माण की भाषा (शब्दावली) में, ये फिल्ममेकर्स ‘समस्या, संघर्ष और समाधान’ या ‘प्रिमाइस’ (Premise) को ‘टू मिनट मूवी’ (Two-minute Movie) के रूप में ज्यादा जानते हैं। (ई-संदर्भ, ब्लॉग – कथा पटकथा)

सारांश

भारत में फिल्म उद्योग और इसीसे जुड़े विविध चॅनल्स पर चलनेवाले धारावाहिक, विज्ञापन तथा तत्सम क्षेत्र की बहुत बड़ी दुनिया है। हॉलीवुड़ की तुलना में ही नहीं तो विश्व के किसी भी फिल्म जगत् की अपेक्षा भारत में सबसे अधिक फिल्में बनती है। यह बात केवल फिल्मों की हो गई, साथ ही विविध भाषाओं और चॅनल्स के चलते धारावाहिक का भी बहुत अधिक प्रचलन है। इन सबके लिए कहानियों की जरूरत होती है। यह कहानियां लिखित रूप में उपलब्ध है तो उसका फिल्मी रूपांतर करने के लिए या धारावाहिक रूपांतर करने के लिए पटकथा लेखक तथा पटकथाओं की आवश्यकता होती है। अर्थात् पटकथा लेखन की कला को अगर अवगत किया तो अपना बाजारमूल्य बढ़ सकता है। पटकथा लेखक एक साहित्यकार और व्यावसायिक भी हो सकता है। उसके भीतर मौजुद सृजक शक्ति व्यावसायिकता के साथ तालमेल बिठाती है और पटकथा लेखन की कला को समझ सकती है।

पटकथा कहानी को दृश्य रूप में उतारने की कला है। पटकथा लेखक का लेखन दर्शकों को बांधे रखता है, साथ ही वहीं अगर पढ़ा जा रहा है या सुना जा रहा तो भी उतना ही प्रभावी होता है। पटकथा के अनुकूल कहानी में विविध दृश्य, घटना प्रसंग, विषय का सिलसिलेवार होना, संघर्ष, मसालेदार, कौतुहल बनानेवाला और दर्शकों को बांधे रखनेवाला होना जरूरी है। कहानी, बुनावट और संवाद पटकथा के महत्त्वपूर्ण तीन अंग है। प्रस्तावना (समस्या), संघर्ष और समाधान पटकथा के प्रस्थान बिंदु है और यहीं इसके सफलता का सूत्र OBE या OBC है। मूल विषय और दार्शनिक पृष्ठभूमि, अंतर्संबंध, पटकथा की टॅगलाईन, नाटकीयता और दो मिनट की फिल्म (Two Minute Movie) पटकथा प्रस्थान बिंदु के गुण हैं।


संदर्भ ग्रंथ सूची

1. कथा-पटकथा – मन्नू भंड़ारी, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2004, द्वितीय संस्करण 2014.

2. कथा पटकथा संवाद – हूबनाथ, अनभै प्रकाशन, मुंबई, 2011.

3. पटकथा लेखन एक परिचय – मनोहर श्याम जोशी, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2000, आवृत्ति 2008.

4. पटकथा कैसे लिखें – राजेंद्र पांड़े, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण 2006, आवृत्ति 2015.

5. पटकथा लेखन फीचर फिल्म – उमेश राठौर, तक्षशीला प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2001, द्वितीय संस्करण 2005.

6. पटकथा लेखन व्यावहारिक निर्देशिका – असगर वजाहत, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, छात्र संस्करण 2015.

7. पटकथा सौंदर्य और सृजन – डॉ. चंद्रदेव यादव, डॉ. मनोज कुमार, अनंग प्रकाशन, नई दिल्ली, 2015.

8. मानक विशाल हिंदी शब्दकोश (हिंदी-हिंदी) – (सं.) डॉ. शिवप्रसाद भारद्वाज शास्त्री, अशोक प्रकाशन, दिल्ली, परिवर्द्धित संस्करण, 2001.

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डॉ. विजय शिंदे

देवगिरी महाविद्यालय, औरंगाबाद - 431005 (महाराष्ट्र).

ब्लॉग - साहित्य और समीक्षा डॉ. विजय शिंदे

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