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स्व0 नेकपाल सिंह चौहान ‘बाबाजी‘ के मुक्तक

स्व0 नेकपाल सिंह चौहान ‘बाबाजी‘ के मुक्तक

(1)

होंगे आप रईस मुझे क्या।

नौकर हों दस-बीस मुझे क्या।

दर-दर भटक रहा शरणागत,

बने रहो जगदीश मुझे क्या।

(2)

सत्कर्मों की एक कली भी नहीं पास है।

दीन-दुखी हित जिसके कुछ भी नहीं पास है।

ना महेश सी तनिक प्रेम की खुशबू जिसमें,

नहीं कभी भी हो सकता वह राम-पास है।

(3)

नहीं प्रथम सा चाव तुम्हारा।

बदल गया है भाव तुम्हारा।

मगर तुम्हारी इस बदली से,

बदला नहीं स्वभाव तुम्हारा।

(4)

जितने थे मजबूर उस समय।

उतने थे हम दूर उस समय।

तुमको मेरी देख मौनता,

लगा नशे में चूर उस समय।

(5)

लगातार तू लगा तार सदगुण से मन का।

लगातार तू हटा तार दुर्गुण से मन का।

जीवन का उद्देश्य जानना हो यदि तुझको,

लगातार तू लगा तार निर्गुण से मन का।

(6)

दुनिया कितनी बेढंगी है।

भीतर से बिल्कुल नंगी है।

खुद के सभी विधान भंग हैं,

मुझको कहती जो भंगी है।

(7)

प्यार काँटों का सदा उपवन रहा है।

किन्तु चाहत का सदा खंजन रहा है।

मत करो तुम प्यार का परिहास साथी,

प्यार गंगा की तरह पावन रहा है।

(8)

क्यों नहीं मूरख इधर को आ रहा है।

भीड़ में धक्के अनेकों खा रहा है।

व्यर्थ के अभिमान का क्यों बोझ लादे,

मूढ़! अनजानी डगर पर जा रहा है।

(9)

प्रबल वासनाओं का मग है।

ठौर-ठौर पर बैठा ठग है।

क्यों गफलत की नींद सो रहा,

प्यारे तू जग जा ये जग है,

(10)

चाहे जैसे काट जिन्दगी।

दुश्कर्मों से डाट जिन्दगी।

काँच नहीं नर तन कंचन है,

मत कर बारह बाट जिन्दगी,

(11)

वैसे कोई बैर नहीं है।

हरकत की तो खैर नहीं है,

हर पग तले कँटीली झाड़ी,

फूल बाग की सैर नहीं है।

(12)

क्यों उजाला देख कर तू जल रहा है।

क्यों अमन-पथ पर नहीं तू चल रहा है।

अनगिनत गलियाँ तिमिर से हैं ढँकी,

क्यों अँधेरे में नहीं तू जल रहा है।

(13)

कहीं किसी का तन जलता है।

कहीं किसी का धन जलता है।

इस जलती दुनिया में यारों,

कहीं किसी का मन जलता है।

(14)

पीर अब बढ़ने लगी है।

गीत से गढ़ने लगी है।

मौत के ऊँचे शिखर पर

श्वाँस अब चढ़ने लगी है।

(15)

लत गलत यदि लग गयी दौलत कहो कैसे रुके।

भावना लिख भेज दो फिर खत कहो कैसे रुके।

था तनिक सोचा प्रथम अब व्यर्थ क्यों पछता रहे,

बो चुके जब बीज तुम नफरत कहो कैसे रुके।

(16)

एक पाई गर किसी को दे नहीं सकते।

चार पाई तुम किसी से ले नहीं सकते।

चाहते लेना अगर तो सीख लो देना सखे,

तुम दिये से बिन दिये लौ ले नहीं सकते।

(17)

आसमाँ को छू रहे जो सिद्ध हैं।

उच्च सबसे उड़ रहे प्रसिद्ध हैं।

गंध स्वारथ की जिन्हें लगती भली,

कारनामों से घिनौने गिद्ध हैं।

(18)

दानवता किलकार हँस रही।

दुर्योधन उर रार बस रही।

विदुर, भीष्म अब चुप बैठे हैं,

मानवता मँझधार फँस रही ।

(19)

क्रम यही दुष्कर्म का चलता रहेगा।

भाग्य भारत का सदा टलता रहेगा।

कट न सकी यदि जड़ नेता नाम की,

वट पतन का फूलता-फलता रहेगा।

(20)

अब सियासत पर दरिन्दे छा रहे हैं।

परकटे काफी परिन्दे आ रहे है।

लग रहा ये कल चमन बर्बाद होगा,

इसलिए अब गीध भी मँड़रा रहे हैं।

(21)

पर-दुख देख दुखी होता कवि।

पर-सुख देख सुखी होता कवि।

कवि दर्पण है पर दुख-सुख का,

स्वयं न दुखी-सुखी होता कवि।

(22)

क्यों नम हैं ये नैन तुम्हारे।

क्यों बदले हैं बैन तुम्हारे।

जीने के अब तौर-तरीके,

क्यों लगते बेचैन तुम्हारे।

(23)

बहुत अधिक चल चुके उताने।

करो न अब तुम अधिक बहाने।

कहीं टूट कर बिखर न जायें,

ये जीवन के ताने बाने।

(24)

केवल कविता के लेखन से ज्ञान नहीं होता है।

देने से उपदेश दूर अज्ञान नहीं होता है।

स्वयं नहीं तुम चले वहाँ की डगर बताने वाले,

मंजिल तक के दर्दों का अनुमान नहीं होता है।

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प्रस्तुति

- डॉ0 हरिश्चन्द्र शाक्य, ‘डी0लिट्0

शाक्य प्रकाशन, घंटाघर चौक

क्लब घर, मैनपुरी-205001 (उ0प्र0) स्थाई पता- ग्राम कैरावली, पोस्ट तालिबपुर

जिला- मैनपुरी (उ0प्र0)

इमेल - harishchandrashakya11@gmail.com

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