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होली गीत - नाथ गोरखपुरी

होली के पावन पर्व पर होली विशेष रचना -

!! होलीगीत !!

आजु मचि है होरी रे रसिया
भिजत होइहें मोर मन बसिया

जूही हाथ गुलाल लइ हो
चंपा श्याम रंग लाल लइ हो
रंग सेवाती कमाल लइ हो
देवपुष्प बवाल लइ हो
मोरे मति गई फोरी रे रसिया
आजु- - - - -

सुतल श्याम सपन लइ आयो
मोरे अंग अंग तपन लइ आयो
लागे गुलाल मोहे श्याम लगायो
श्याम छुअन सो बदन सिहरायो
लइ कै गयो ब्रज खोरी रे रसिया
आजु- - - - -

इंद्रधनुषी बिरज कै खोरी
झूम उठी है बिरज कै गोरी
मेघ बरसे झकोरी झकोरी
मोहन बहियाँ दियो ह मरोरी
मोरे मन भए चोरी रे रसिया
आजु - - - - -


!! कुण्डलिया !!

तरस गये जिस दीप को,अन्धकार हो दूर
चंदा सूरज वो नहीं , शिक्षा वो कोहिनूर
शिक्षा वो कोहिनूर , जीवन राह दिखाये
चंदा सूरज सब मिले,जो इसके द्वारे आये
ज्ञान हुआ बुद्धि खुली, हुए हृदय तब सरस
शिक्षा से जो दूर हुआ,जीवन को गया तरस

02

साथ रहे संसार में , साँस कभी ना पाय।
हृदय बीच जो बसा, पास कभी ना आय।।
पास कभी ना आय,सुख चैन औ संतोष।
लालच तृष्णा साथ फिरै ना काहुँ कै दोष।।
सब लूटा संसार में, फिर भी खाली हाथ।
सब छूटा संसार में, नेकी पहुँचा साथ।।

03

सबको अपनी फ़िक्र है,दूजा करे न कोय।
ग़ैरों कि परवाह करे , वो ही इंसां होय।।
वो ही इंसां होय ,जो करे भलाई चारि।
दियो सहारो रोगी जोगी बालक अरु नारि।।
नाथ कहे बन्दा इक दिन चंदा जैसा चमको।
करे प्रेम स्नेह दुलार,जो इस जग में सबको।।

04

मानव मन निर्मल नहीं, दूषित भई है सोच
सम्बन्धो को तोड़त है, लाई लगाई कोंच
लाई लगाई कोंच इक दूजे को दिया भिड़ाय
रात दिवस बस सोचता आपन काम हो जाय
रिश्ते नाते लूटे हरपल बनके जैसे दानव
"नाथ" नीचे और गिरेगा कपटी कामी मानव?

05

नए जमाने में पहुँचे, कहें डिजीटल लोग
काम पुराना करत है , कैसा है संयोग?
कैसा है संयोग , खतम हुई ना जाति
ऊंच नीच कै सोच ,जग से नाहि ओराति
कहने को हम नए ,पर मनसे हुए पुराने
संस्कार को छोड़ा तो, हो गए नए जमाने?

06

जिसको समझले अपना, उसपर कर विश्वास।
कहा सुना ना ध्यान दे , रख उम्मीदो आस।।
रख उम्मीदो आस , अंतिम अंतर्मन तक।
जन के द्वारा उसके , बात पहूँचे मन तक।।
इक उम्मीद अंतिम तक करती जिन्दा कृष को।
आने का इंतजार कर, समझो अपना जिसको।।


!! भूख !!

सुना बेरहम ये निवाले हुए हैं
तो लो भूख अब हम भी पाले हुए हैं

तुम जान लेने की तरक़ीबें सोचो
क्योंकि हम मौत को अब सम्भाले हुए हैं

उन्हें भी , हादसों का एहसास होगा
देखकर जो सब कुछ भी, टाले हुए हैं

बुलाओ महफ़िल में, जरा हम भी तो देखें
सुना है , वो बड़े गज़ल वाले हुए हैं

ऐ बादलों जरा ठहरो, बरसना बाद में
लहू बरसेगा , तलवारें वो निकाले हुए हैं

लाशों की गिनती , अब वो भी करेंगे
जो फ़िजा में, नफ़रत की आग डाले हुए हैं

!! फूल खिलेंगे !!

तप्त धरा अभिशप्त धरा
वारिद से मुक्ति साध्य बनें
अंध-धरा-अरि बंध धरा
को है जग में आराध्य बने

मृगतृस्ना कृष्णा सी छाई
दिवस उदय मोहताज़ हुआ
धूमिल दृष्टि मनुजा की हुई
विधना लगता नाराज़ हुआ

पुण्य प्रसून पाषाण पड़ा
पगडंडी पग पग काट रहा
पाप ही पाप खिले हैं सुमन
जग बारी बारी बाँट रहा

बेलि अनीति बढ़े जग में
कहीं सच सींचे है संत कोई
आस में वास करे हैं सब
कभी आयेगा भगवंत कोई

भूखे को भोजन दान करे
निर्धन का है खास वही
पुष्प पल्लवित होगा कभी
निर्बल को है आस यही

!! मानवता चली गई क्या !!

चितवृत्ति सरोज धूमिल क्यूँ है
कहीं मनुजा का तो नाश नहीं
कहीं धर्म लड़े कहीं कर्म लड़े
रक्तिम हृदया विष श्वाँस नहीं

चहुंओर धधकता हृदय मिला
निर्मल क्यूँ है परिवेश नहीं?
क्यों राम ही राम जलाते हैं
कहीं रावण राम का भेष नहीं?

तिमिर उजास करे क्योंकर
जब सकल सृष्टि में सत्ता है
दिनकर दिन की चाह लिये
क्यों मन ही मन में तरसता है

जब दिशा ज्योतिवत होती है
तब तिमिर तरसती रोती है
पै हृद्यतिमिर को निकाले कौन
ज्ञानज्योति को संभाले कौन

मन ग्रंथि पड़ी है बड़ी निष्ठुर
है हृदय भीष्म हुआ कबका
धर्मी ज्ञानी अब कौन विदुर
जो प्रलय देखता हो सबका

है कौन युधिष्ठिर जो रण में
कभी सत्य राह ना भटका हो
क्या अब भी अर्जुन है जग में
जो अरि के मोह में अटका हो

जग में क्या अब भी बोलो
कहीं भरत दिखाई देते हैं
भाई - भाई के प्रीति कहीं
इस जग में सुनाई देते हैं

क्या कोई राम नहीं जग में
जो तात वचन निभा जाये
जिसके मन में भेद ना हो
उसे जूठे बेर भी भा जाये

संसार की सारी मर्यादा
मानव ने अब खो दी है
प्रीति भूल के इस जग में
कांटे ही कांटे बो दी है

!! हे युवा: तू है कर्मयोगी !!

तू मान ले ये जान ले
ये आसमाँ औ ये धरा
क़दमों की तेरे धूल है
समझा नहीं तो भूल है

घन तिमिर का तू नाश कर
अन्तस् को तू उजास कर
दिव्य दे तू अंध को
मुक्ति दे तू बंध को

तू बैठ ना चीत्कार कर
कर्मों से तू प्रहार कर
तू बन्द मुठ्ठी खोल दे
दुर्दिन पे धावा बोल दे

पाषाण को तू रेतकर
महलों का कंकर छीन ले
सागर से जाकर भेंटकर
एक एक मोती बीन ले

तू कृष्ण है तू राम है
तू सत्य का ही नाम है
विषवमन कर मधुपान को
वनगमन कर कल्याण को

तू हवा है निर्बाध बह
दोषी का तू अपराध कह
चाहत अगर मधुपान का
मंथन को तू तैयार रह

तू युवा है तू धीर है
कायर नहीं तू वीर है
तू लक्ष्य अपना बांध ले
कर्मों से उसको साध ले

!! हे युवा : तू है कर्मयोगी !!

चप्पा चप्पा राज है जिसका
चाँद औ तारे ताज हैं जिसका
निर्भय निर्जन निशा निरेखे
जिसको काल दूर से देखे
ऐसे मस्त परिंदे ही तो, गगन छोर चढ़ा करते हैं
कुछ स्यारों के चिल्लाने से,केहरि कहाँ डरा करते हैं

लम्बी दुरी चलने वाले
कर्म की भट्टी जलने वाले
क्षितिज तुंग पर जाने वाले
मलय मेघ बन छाने वाले
ऐसे अल्हड़ दीवाने ही तो इतिहास गढ़ा करते हैं
कुछ स्यारों के चिल्लाने से,केहरि कहाँ डरा करते हैं

आँधी की परवाह नहीं है
हृदय में कोई आह नहीं है
सिंधु लहरियां उफ़न रही पर
कश्ती की भी चाह नहीं है
सागर तलक जाने वाले, मोती ताज जड़ा करते हैं
कुछ स्यारों के चिल्लाने से, केहरि कहाँ डरा करते हैं

जिसके पाँव ने वेग को पकड़ा
गति थाम के तेज को जकड़ा
रुकना उसका काम नहीं है
मंजिल तक आराम नहीं है
बाधाओं के आ जाने से, धावक नहीं थमा करते हैं
कुछ स्यारों के चिल्लाने से, केहरि कहाँ डरा करते हैं

अपनी चाल में चलने वाले
अरि मस्तक को मसलने वाले
आग की लौ सह जायेंगे
जग से लोहा मनवायेंगे
कुछ श्वानों के आ जाने से गज भी कहाँ खड़े रहते हैं

इस सारी सृष्टि से हटकर
अटल इरादों के संग डटकर
अपनी दुनिया गढ़ने वाले
दुर्गम चोटी चढ़ने वाले
अपने बलपर वो परवाने लक्ष्य की ऒर बढ़ा करते हैं
कुछ स्यारों के चिल्लाने से, केहरि कहाँ डरा करते हैं


     - नाथ गोरखपुरी

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