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22 मार्च जल दिवस....... अमृत- तुल्य जल के प्रति हम कब होंगे सचेत ! शुद्धता के नाम पर हो रही जल की बर्बादी.... -डॉ. सूर्यकान्त मिश्रा

22 मार्च जल दिवस.......

अमृत- तुल्य जल के प्रति

हम कब होंगे सचेत !

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शुद्धता के नाम पर हो रही जल की बर्बादी....

वर्तमान में समस्या का रूप ग्रहण कर चुके जल संरक्षण ने इस बात का ऐलान कर दिया है कि आज जो पीने का पानी बड़ी मशक्कत के बाद प्राप्त हो रहा है , वह भविष्य में एक विकराल समस्या के रूप में उभरेगा। हम सुनते आ रहे हैं कि अगला विश्व युद्ध पानी को लेकर ही होगा। हमने जिस तरह से जंगलों का दोहन किया है ,ठीक इसी तरह वह समय दूर नहीं जब प्रकृति हमारा दोहन करेगी। इस बात से सभी वाकिफ हैं कि इस पृथ्वी पर 100 प्रतिशत जल है किंतु पेयजल मात्र 2. 5 प्रतिशत ही है। इस 2.5 प्रतिशत जल की सुरक्षा हम नहीं कर पा रहे हैं। दूसरी ओर जल को शुद्ध करने के फेर में हम 75 प्रतिशत पेयजल को बर्बाद कर रहे हैं। आरओ के माध्यम से पानी को शुद्ध करने के चक्कर में हम केवल 25 प्रतिशत शुद्ध पानी इकट्ठा कर पा रहे हैं। बाकी पानी को आरओ मशीन बाहर फेंक देती है। यदि हम पानी की बर्बादी रोकना चाहते हैं तो सबसे पहले आरओ पर प्रतिबंध लगाना होगा। पिछले तीन दशकों से पूरा विश्व इसी बात की चिंता कर रहा है कि भविष्य में पीने का पानी कैसे मिल पायेगा ? यही कारण है कि सन 1993 से 22 मार्च को हर वर्ष " जल संरक्षण दिवस " के रूप में मनाया जाने लगा।

जल संकट से हमारा मानवीय समाज अनभिज्ञ हो ऐसा मैं नहीं मानता। जल की कीमत हमारे समाज में जब तक वास्तविक रूप में समझी जाएगी , तब तक शायद बहुत देर हो चुकी होगी। सोना- चाँदी, हीरे- जवाहरात, या फिर अन्य प्रकार के निवेश से अर्जित संपत्ति की कीमत , पानी के आगे क्या हो सकती है यह हमें उसी समय समझ आयेगा जब यह धरती जल विहीन हो जाएगी। हमें अपना जीवन चलाने कहीं सोने- ,चाँदी की तरह तोला और माशा में पानी न खरीदना पड़े ! इससे पूर्व हमें इसकी कीमत समझ लेनी चाहिए। बारिश के मौसम में हमें जल संकट का सामना बिल्कुल ही नहीं करना पड़ता है , लेकिन जैसे ही बारिश का मौसम बिदायी पर होता है , धीरे- धीरे जल - स्तर घटने लगता है। शीतऋतु के बाद पड़ने वाली तेज गर्मी में नदी- नाले ,तालाब- पोखर सूखने लगते हैं। भू- जल स्तर बहुत नीचे चला जाता है ,तब हम एक- एक बून्द पानी को सहेजने चिंतित होने लगते हैं। यह स्थिति उस वानर से कम नहीं जो बरसात में भीगते हुए यह सोचता है कि अब वह भी अपने लिए घर बनाएगा,किन्तु बरसात के बाद अपने वादे को भूल जाता है। हम अमृत रूपी जल को सहेज कर रखने की कोई जुगत नहीं करते , जबकि इस बात को अच्छी तरह जानते हैँ कि भीषण गर्मी के समय हमें यह जल प्राप्त नहीं हो सकेगा। यही अमृत जल भंडारण के अभाव में नालों और अन्य माध्यमों से होता हुआ नदियों और फिर समुद्र में जाकर मिल जाता है। मीठा और अमृत जल समुद्र में मिलते ही खारा हो जाता है ,फिर वह पाइन लायक नहीं रह जाता है।

जब इसी जल के लिए हमारी जरूरत बढ़ जाती है और जल की मात्रा कम हो जाती है , तब हम अपने घरों पर इसी जल की बर्बादी शुरू कर देते हैं। नलों अथवा अन्य माध्यमों से प्राप्त जल को शुद्ध करने के लिए हम घरों में आरओ मशीन का उपयोग करते हैं। इस मशीन के द्वारा जो पानी हमें शुद्ध करके दिया जाता है ,उसमें वे सारे तत्व खत्म हो जाते हैं ,जो वर्षा जल में समाये होते हैं। दूसरा सबसे बड़ा नुकसान यह होता है कि मशीन के द्वारा शुद्धिकरण प्रक्रिया में 75 प्रतिशत पानी बेकार पानी के रूप में फेंक दिया जाता है। हमें केवल 25 प्रतिशत पानी ही पीने के लिए प्राप्त होता है। हम प्राप्त पानी को उबालकर या फिर उसमें फिटकरी घोलकर भी उसे पीने योग्य बना सकते हैं, जिससे पानी की बर्बादी रोकी जा सकती है। हम पानी को सहेजने के प्रति वह गंभीरता नहीं दिखा पाते जो अन्य जरूरी सामग्री के लिए दिखाते हैं। हमें बरसात के मौसम में प्रकृति द्वारा प्रदत्त जल को संग्रहित करने घरों में "रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम " का उपयोग कर प्रकृति के अनमोल उपहार को खुद के लिए बचाना सीखना होगा। सरकारी तंत्र पर निर्भर रहने के कारण हमारे अंदर जल प्रबंधन की सामुदायिक जिम्मेदारी का अभाव स्पष्ट परिलक्षित हो रहा है। परंपरागत रूप से हमारे देश में जल संचयन के तरीकों के अंतर्गत बावड़ी, स्टेपवेल, झिरी, लेक टैंक आदि का इस्तेमाल किया जाता रहा है। ऐसे जल स्रोतों का रख- रखाव आम लोगों द्वारा खुद किया जाता था। यही कारण था कि भू- जल का स्तर प्राकृतिक रूप से भरा रहता था। अब हर जगह कांक्रीटीकरण के चलते बरसाती पानी भू- जल तक नहीं पहुँच पा रहा है।

पेयजल की उपलब्धता एक प्राथमिक जरूरत है , किन्तु विकास तथा आर्थिक प्रगति के बावजूद महानगरों से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों तक पेयजल संकट विकराल होता जा रहा है। पानी की खपत की दृष्टि से विश्व में भारत का दूसरा स्थान है , फिर भी प्रति- व्यक्ति पेयजल की स्थिति चिंताजनक है। नदियों में औद्योगिक कचरों और रासायनिक खाद के उपयोग के चलते इतना जहर घुल चुका है कि इनका पानी पीने योग्य तो क्या नहाने योग्य भी नहीं रह गया है। गंभीरता पूर्वक विचार किया जाए तो प्यास बुझाने से लेकर खाना पकाने और जरूरी सफाई के लिए पानी की व्यवस्था नहीं की जा सकी है। इसका मुख्य कारण यह है कि विकास के प्रचलित मॉडल में इस सबसे बडी जरूरत को उचित अथवा महत्वपूर्ण स्थान प्रदान नहीं किया गया है। शासन की बातों पर विश्वास करें तो जल संरक्षण के साथ - साथ शहरों एवम गावों में जलापूर्ति के अनेक कार्य किये गए हैं , किन्तु स्पष्ट है कि वे नाकाफी ही रहे हैं। इस मामले में भी बहुत हद तक राजनीति व आर्थिक शक्ति- संतुलन दिखायी पड़ता है। पानी कहीं पहुंचता है और कहीं नहीं। यह पूरी तरह इसी पर निर्भर है। प्यास तो सभी को समान रूप से लगती है ,पर मौजूदा शक्ति - संतुलन में गरीब बस्ती के लोगों की प्यास को महत्व नहीं मिल पा रहा है।

हमारे देश भारतवर्ष में एक राज्य तमिलनाडु है, जहाँ पर अधिकांश लोगों ने अपने घरों के छत पर वर्षा- जल संचयन का पुख्ता इंतजाम किया हुआ है। प्रदेशभर के हर घर में  "वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम " सुचारू रूप से काम कर रहा है। प्रदेश सरकार ने इसे न मानने वालों के लिए सजा का प्रावधान भी किया है। यही कारण है कि तमिलनाडु में पानी की कमी भीषण गर्मी में भी दिखायी नहीं पड़ती है। आम जनता को स्वच्छ पेयजल मुहैया कराना किसी भी सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी होती है। हमारे देश की केंद्रीय सरकार सहित प्रदेश सरकारों ने इस दायित्व से कब का पल्ला झाड़ लिया है। बड़े- बड़े उद्योगपतियों को लाइसेंस प्रदान कर पानी बेचने की छूट इसका बड़ा उदाहरण है। पानी पर केवल सरकार का अधिकार होना चाहिए और तब नदियों का गोदामों में बंद होना रुक सकेगा। शुद्धता के नाम पर व्यवसाय को संरक्षण देना बन्द करना होगा। सरकार क्यों शुद्ध जल अपने संयंत्र के माध्यम नहीं दे सकती ? इस पर विचार करना होगा।

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डॉ. सूर्यकान्त मिश्रा

न्यू खंडेलवाल कॉलोनी, ममता नगर

प्रिंसेस प्लैटिनम, हाउस नंबर 05 ,

राजनांदगाँव (छ. ग. )

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