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फुलवा माईं के लुगड़े - आत्माराम यादव पीव

होशंगशाह किले की व्यथा


होशंगशाह गौरी का किला है कुछ खास
खण्डहर हो चुका कभी था वह आवास
नर्मदा का तट था सुल्तान को भाया
सन चौदह सौ एक में किला बनवाया
मंगलवारा घाट से मैं उसे अक्सर निहारूं
किले के अतीत का चिंतन मन में विचारुं
अनगिनत सवालों का सैलाब मन में होता
अपने घर लौट आता ख्याल जिगर में सँजोता । 


     एक दिन यकायक किले ने मुझे पुकारा
     कहा तनिक बैठो, चाहिए मुझे थोड़ा सहारा
     मैं किला हूँ  मेरी तुम विवशता भी सुनो
     क्यों क्षुब्ध हूँ, क्यों व्यथित हूँ इसे भी गुनो
     सदियां बीती बसंत बीते कई पतझड़ भी गए
     स्याह काली रातें उजास भरे दिन भी गए
     दर्द सहते कुछ न कहते मैं अकेला खड़ा हूँ
     मैं ऐतिहासिक किला प्राकृतिक कुचक्रों से लड़ा हूँ ॥


मुझे याद आता है गुजरा हुआ जमाना
प्रेम करने वालों का खाक में मिल जाना  
यही नर्मदातट पर बैठा करता दीवाना
उसकी बंसीधुन में रानी का रीझ जाना
जिस दिन बंसीधुन न सुन पाती रानी
व्याकुल दिल होता आंखों से बहता पानी
दीवाने की आंखों में भी बस गई वह रानी
पागल प्रेमी ओर रानी की शुरू हुई कहानी ॥


     एक दिन सुल्तान ने देखा, सुल्तान हुआ पागल
     रानी का दिल था बंसीवाले पागल पे घायल
      बोला सुल्तान पागल को अगर भूल जाये रानी
      माफ कर दूंगा में रानी की सारी नादानी
      सुनकर राजा की बाते रानी खिलखिलायी
      प्रेम प्रेम है सुन राजा रानी के मन सजा भायी
      सुन बातें पागल हुआ सुल्तान, पागल बुलवाया
     दोनों को मृत्यु दंड का राजा ने फरमान सुनाया॥ 

पर रानी थी पागल को नहीं भूली
रानी संग पागल के फांसी पे झूली
वह फांसी जिसे भुला सारा जमाना
इतिहास भी भूला यह किस्सा पुराना
तभी से दोनों की आत्मायें यहां रोती
पीव आंसुओं से मेरे गुंबज-दीवारें धोती 
गुमसुम सा सुन रहा मैं किले की जुबानी
भवानी मिश्र के सन्नाटा सी ये कहानी ॥


                   (2)
     किले ने नई नई बातों का पिटारा दिया खोल
     होशंगाबाद में मिले दर्द को बता रहा है तोल-तोल
     बोला, मेरे बाद बने अस्थिपंजर से कई किले हैं
     बदरंग किलो के इतिहास में नहीं किस्से मिले हैं
     शिल्पकारों की प्रस्तरखंड सी वे अधूरी रचनायें 
     मरु मरीचिकायें की बनी उद्वेगभरी कल्पनायें   
     सैकड़ों सैलानियों के समूह उन्हें देखने आते हैं
     गाइड उन किलों का गौरव बढ़ा चढ़ा कर बताते है॥


मेरा इतिहास मुझमें दफन है,बस स्मारक बन रह गया
राजा रानी ओर सामंतों का, सब आक्रोश-घृणा सह गया
एक गुमनाम सा स्मारक बनकर रह गया हूँ आज
सन चौदह सौ पाँच में, मेरे वैभव पर था सबको नाज 
रानी ओर उनकी दासियों का प्यार था विछोह था
सुल्तान के लिए रानी का प्रेम दगा था विद्रोह था
मेरे ऐतिहासिक वैभव को, भूली जनता ओर सरकार
अतीत की स्मृतियों में गुम हूँ चाहूं, भविष्य का प्यार ॥ 


     मैंने देखी है, सुल्तान के सामंतों की करतूतें
     अत्याचार कर खजाना लूटे, निर्दोषों की मौतें
     मेरे अंचल में यही कहीं, रख छोड़ा है खजाना
     जनश्रुतिवश खजाना खोदने, आता अब भी जमाना
     नगरपालिका को मेरी दशा पर, दया खूब आई
     60 लाख खर्चा करके, की मरम्मत ओर सफाई
     स्याह काली रातों में, तंत्र मंत्र के आते उच्चाटक
     खजाना पाने निरीह पशुओं की, बलि दे करते नाटक॥


  जमाने के  दिये जख्मों की, हर टीस पर मैं कराहता
दर्द असीम लिए, दर्शन, शिल्प ओर कला को तलाशता
अतीत में अमानवीयता खूब सही, अब आत्मा मेरी रोती
भावी पीढ़ी मेरे इतिहास से वंचित, सरकार क्यों है सोती
मेरी तरंगित संवेदनाओं को, क्यों नहीं दुनिया को बताते ?
सुन रहा सन्नाटा की सिसकी, लोग सुनने क्यों नहीं आते ?
अपने स्वर्णयुग के इंतजार में, कब तक दर्द सहता रहूँगा
पीव पर्यटकदल अभिनंदन करे,आगे उपेक्षा मैं न सहूँगा ॥  

खण्डहर लगता पुराना मकान


सदैव अपने बच्चों के भविष्य के लिए
हर पिता बनाता है एक सुंदर सा मकान
जिसमें वह अधिष्ठित करता है
अपने इष्टदेव अपने कुलदेवता को ।


साल दिन महीने वर्ष के साथ
बदलती है ऋतुएं, सर्दी गर्मी ओर बरसात
हर साल वह देवों को सुलाता है
होली दीवाली नवरात्रि मनाता है
गणेश चतुर्थी, शिवरात्रि, जन्माष्टमी
रामनवमी ,ईद ओर क्रिसमस को
धूमधाम से मनाता झूमता गाता है ।


बच्चों के जन्मदिन,शादी विवाह पर
उसकी खुशियां परवान चढ़ जाती है
वह देवों को सुलाता है ओर विधिविधान से
देवों को उठाकर उनकी अगवानी करता है 
मकानों की दीवालों पर पंक्तिबद्ध लगाता है
अपने मन में बसे आराध्य ओर पूर्वजों की तस्वीरें ॥


बच्चों को बचपन जिस मक़ाम में
लोरियां सुनकर बीता, उस मकान में
बच्चों के जीते हुये कप, मेडल्स
ओर तमगों व प्रशस्ति पत्रों से सजाता है ॥


पिता का बनाया वह मकान,
बच्चों के लिए माँ की गोद से बढ़कर होता है,
जहां उनका खेलना कूदना, मस्ती करना पढ़ना लिखना
सोना जागना ओर बहुत सी मधुर यादों में
घर का वह कोना भी होता है जहां वे जन्मे हैं ॥

फुलवा माईं के लुगड़े

 
बगवाड़ा गाँव में सबसे बूढ़ी
सबको भाती अंधी फुलवा माई ।
दो लालों मे एक लाल है पाया
बड़े को खोकर खूब आँसू बहाया ।
वह करवट लेती मिलते दुखड़े
गरीबी घर में जमकर पसरे। 


चेचक में आंखें खोई विधवा होई
विधिना के हाथों वह बेबस रोई ।
जागीर मिली थी पिता से जितनी
करार कर भाई ने की ये विनती ।
जीवनभर दूंगा परिवार को रोटी
पूरा करूंगा जरूरत बड़ी हो छोटी ॥


सुन विनती भैया की वह आगे आई
दौलत सारी  भाई के नाम कराई ।
खुदगर्ज निकला लालची हुआ भाई
करके बेईमानी उसने बहना भुलाई  ॥


बेबसी लाचारी देखो बेटा बेरोजगार
तपती गर्मी में रेत भरने बना कामगार ॥
साल में चार महीने करता वह मजदूरी
8 महीने काम न था किस्मत थी बुरी ॥


सालों में माँ को बेटा खरीद पाता था
मुश्किल से पहनने को एक लुगड़ा ।
पुराने फटेहाल लुगड़े से झाँका करती थी
माई के जर्जर तन की अगणित आंखें
खुद होश नहीं था फुलवा माई को
घर में खाने के भी पड़ते थे फाँके ॥


बीस अगस्त उन्नीस सौ त्रियानवे को
फुलवा माई को संग ले गई मौत
मृत देह को शमशान ले जाने को
जुड़े सैकड़ों रिश्तेदार ओर सारे दोस्त ॥


पीव जिस फुलवा माई को जीते जी
पहनने को नहीं मिल पाते थे नये लुगड़े ।
शव पर उसके कपड़ों का अंबर लग गया
जग दिखावे को शब दिखाते लोग

किस किस ने ओड़ाये थे लुगड़े॥  

उजागर हुआ आदमी


मेरे अवचेतन मन में
दफन है शब्दों का सागर
जब कभी चेतना आती है
मेरा मन भर लाता है
शब्दों की एक छोटी सी गागर।
जब मैं गागर को उलीचता हूँ
तो शब्दों के जल में मिलते है
सांस्कृतिक मूल्य,परनिंदा ओर
कल्पनाओं का सुनहरा संसार ।


सत्य धीरे धीरे बन जाता है
कल्पनाजीवी शब्दों का जाल
जिसमें मनोरम शब्द धर्म-कर्म ओर 
आदमी के प्यार, त्याग, विश्वास के
शब्द हो जाते है महाकार से पर्वताकार।


आदमी चक्कर लगाता है ब्रह्मांड के
विकास का पहिया थमता नहीं दिखता
चाँद तारे ओर ग्रहों की दूरियां नापकर
पीव आदमी ने भले जीत लिया हो जगत को
पर संस्कृति ओर संस्कार की पताका
वह अपने मन पर अब तक नहीं लहरा सका
आदिम हब्बा का वंशज यह आदमी 
आदिम भावों को नहीं जीत सका है ।


आज भी अवचेतन मन के शब्द सागर में
आदिम भावों को जीता है हर आदमी 
पीव नैतिक मूल्यों का लबादा ओड़े
अवगुणों को अपने छिपाता है आदमी
एक गागर शब्दजल के दो शब्द टटोलने से
कितना नंगा/ओछा है, उजागर हुआ आदमी ॥


शब्दसागर की असीम शब्द-गागरों में
कोटि कोटि शब्द जन्म लेने की प्रतीक्षा में
सदियों से पल बढ़ रहे विगत की कोख में
ताकि कोई शुद्ध बुद्ध के अवतरित होने पर
उनके प्रज्ञावान अवचेतन से वे अज्ञेय शब्द
जगत के कल्याणार्थ जन्म ले उद्घाटित हो सके ॥

शीशे का शहर होशंगाबाद


नर्मदातट पर बसा होशंगाबाद
एक पारदर्शी शीशे का शहर है
महत्वपूर्ण बात यह है कि
इसमें कुछ ऊंचे लोग बसते हैं
जो शहरवासियों को दुर्भावनाओं
षडयंत्रों ओर दुरभिसंधिओं के
काँच से निहार, पत्थर बने हैं ॥


आधे अधूरे गुमनाम से ये लोग
एक नहीं दो-दो पहचान रखते हैं
सत्ता के गलियारे ओर दरवाजे पर
गिरगिट से रंग बदलकर चलते है, ताकि 
खुद के काले कारोबार को नजर न लगे ॥


इनके मुखारबिन्द पर नकली मुस्कुराहट
नवयौवना के यौवन जैसी बिखरी होती है
क्रोध,घृणा से लबरेज इनके हाथ फेरना
एक बहाना है लोगों को सम्मोहित करने का
पीव इनके, उनके ओर भक्तों के बीच
अपना-अपना ख्याल रखो ,खेल चलता है ।


भूखे अजगर सा, इनका जीभ लपलपाना
पीव शिकार छोड़े नहीं, मित्र ये पहचानते हैं
होशंगाबाद पारदर्शी काँच का शहर है
शहरवासी समझ चुके, सबको जानते हैं
दस्ताने हाथों में पहन, लोग सुरक्षा आजमाते हैं
शीशा कही टूट न पाये, वे शीशमहल बचाते हैं ॥

                आत्माराम यादव पीव (वरिष्ठ पत्रकार )
               काली मंदिर के पीछे,पत्रकार

गली,ग्वालटोली वार्ड नंबर 31 होशंगाबाद मध्यप्रदेश

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