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दरवाजों को दंश चुभे टूटे महराबों के - अविनाश ब्यौहार की काव्य रचनाएँ

//-नवगीत-//

कैसे कैसे
दस्तूर चलन
नए जमाने के।
लायक नहीं
तौर तरीके
तभी अपनाने के।।

बदन पर पहना
वस्त्र झीना।
चाल चलन से
हुई करीना।।

पीजा-बर्गर-चाऊमीन
आइटम-
खाने के।

स्कूटी हुई
रेस का घोड़ा।
चेहरे पर
मेकअप थोड़ा।।

उनका कोई
काम नहीं है
सिवा रिझाने के।

रखा टेबिल पर
वाइन कोक।
लड़कों संग
रहना है शौक।।

लव जेहाद होता
भूले-
ढंग शरमाने के।

अविनाश ब्यौहार
जबलपुर

//-दोहे-//

वक्त हुआ है स्वारथी, पैसा सबका मूल।
सीधे सच्चे यहाँ पर, फाँक रहे हैं धूल।।

रिश्वत  ऐसे  खा  रहे, जैसे  हो  अधिकार।
सर्विस अब लगने लगी, ज्यों मछली बाजार।।

रंगों की पिचकारियाँ, उड़ता रहा अबीर।
जो  होली  से  दूर  हो, ठहरा  वो  बेपीर।।

ऋतुओं में सबसे सुखद, लगता है मधुमास।
मौसम  गंधों  से  भरा, बैठा  मेरे  पास।।

युवती से गदरा गए, हैं मधुऋतु के अंग।
खुला पिटारा गंध का, मौसम हुआ अनंग।।

मौसम  भरता  रंग  है, टेसू  होता  लाल।
दरस परस ऋतुराज का, हवा बजाती गाल।।

है नदिया सा सड़क पर, बहता यातायात।
दुर्घटनाएं कर रहीं, जीवन पर आघात।।

न्यायालय के घाट में, अधिवक्ता की भीड़।
तिनके तिनके बिखर गया, है न्याय का नीड़।।

//-नवगीत-//

दरवाजों को
दंश चुभे
टूटे महराबों के।

घर का खालीपन
होता खूँखार भेड़िया।
पगडंडी पर चलते-
चलते फँटी एड़ियां।।

खड़े रहते हैं
दरके-भिसके
महल ख्वाबों के।

सूरज की किरणें
जैसे गर्म सलाखें हैं।
मानो झुलस गईं
आज हवा की पाँखें हैं।।

हैं होश उड़ गए
जेठ माह में
तालाबों के।

//-नवगीत-//

दूर से
आ रहे हैं
स्वर शहनाई के।

पड़तीं हैं ढोलक पर
मधुरिम थापें।
और मायूसी यहाँ
थर थर काँपे।।

दिखते हैं
जीवाश्म आज
पहुनाई के।

बंद खुशियों की
मेहमाननवाजी।
अंधकार जीतें
बाजी पर बाजी।।

चींटी जैसे
पर उगते
महँगाई के।

//-हिंदी ग़ज़ल-//

वो जमाना लौट आए।
अब न कोई गम बताए।।

साजिशों के गाँव में ज्यों,
शख्स कोई फंस जाए।

मार्ग काँटों से भरा हो,
और मानव खार खाए।

खंडहर सब रो रहे हैं,
आपबीती कौन गाए।

वक्त अब इतना बुरा है,
जन्तु जहरीले सुहाए।

नाखुदा का क्या भरोसा,
बीच में ले जा डुबाए।

अविनाश ब्यौहार
रायल एस्टेट कटंगी रोड
जबलपुर, म.प्र.
--

//-नवगीत-//

वक्त जो भी
कह रहा है
मुँह जुबानी है।

पहाड़ों पर क्यों
दर्रे फूटते हैं।
अलगाव से ही
रिश्ते टूटते हैं।।

लोकशाही हुई
यहाँ पानी-
पानी है।

मधुऋतु है तो
पतझर भी आएगा।
स्वच्छ आसमान पर
धुआँ छाएगा।।

आज शहर
की सभ्यता
कुबड़ी कानी है।

स्वार्थ मानो हो
गया है कोरोना।
लालसा थोड़े की
हुआ सब खोना।।

ताड़ सी
बुराईयों का
कौन सानी है।

अविनाश ब्यौहार
रायल एस्टेट कटंगी रोड
माढ़ोताल जबलपुर.
--
//-हिंदी ग़ज़ल-//

बोलें  हरदम  मीठी  बानी।
मुझको मधुऋतु लगे सुहानी।।

कुर्ती  लाल  लाल  टेसू  सी,
उस  पर  मानो  चूनर धानी।

यूँ  तो  बहुत लोग मिलते हैं,
कौन  बनेगा  दुश्मन  जानी।

पल  आए  बाराती  बनकर,
आखिर  में  रह  गए घरानी।

जीवन उजड़ा उजड़ा लगता,
होगी  वो  निश्चित  दीवानी।

अविनाश ब्यौहार
रायल एस्टेट कटंगी रोड
जबलपुर.

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