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क्या सोच रहे हो बापू - डॉ हंसा कमलेश

क्या सोच रहे हो बापू

क्या सोच रहे हो बापू देश के कोने कोने में पसरे उस ईमान के बारे में जो आज बेईमान हो गया है, या देश की फिजाओं में बसे उस सत्य के बारे में जो आज असत्य की पाठशाला बन गया है । बापू तुमने कैसा रामराज्य का सपना देखा था, ऐसा जो आज दिखाई दे रहा है, जहां लोकतंत्र भीड़तंत्र बन गया है, जहां आस्था और विश्वास कहीं दूर चल गये हैं, भाई-चारे का भाव कहीं गुम गया है । राजनीति, अर्थनीति सब नीति हीन हो गई है । यह कैसा रामराज्य है बापू, जहां कानून ने काली पट्टी बांध रखी है, जहां न्यायपालिका कार्यपालिका मजाक बनी हुई है। क्या यही देश है बापू, जिसे आजाद कराने के लिए तुम्हारे साथ साथ न जाने कितने स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने बलिदान दिया था बापू । यहां तो दिनदहाड़े चोरी, लूट, डकैती और दंगों का इतिहास बन रहा है बापू।

यहां कोने- कोने से, जय श्री राम की आवाज तो आती है, पर बापू क्या यह वही राम है, जिसका नाम तुम याद किया करते थे । तुम्हारा राम तो अंधेरे में जीत का साहस देता है बापू, तुम्हारा राम सत्य और संघर्ष की राह दिखाता है । क्या सोच रहे हो बापू आज तुम्हारा चश्मा, तुम्हारी लाठी, तुम्हारा चरखा, तुम्हारी तकली और तो और तुम्हारी खादी बाजार बन गई है, और हां बापू तुम अपने 150 वी जयंती के वर्ष में राजनीति के हथियार बन गए हो । देख रहे हो देश के कोने कोने में इस समय मैं हूं गांधी, मैं हूं गांधी की आवाज आ रही है। बापू हैरानी तो तब होती है जब तुम्हारी वेशभूषा फैंसी ड्रेस प्रतियोगिता का हिस्सा बन जाती है। पता है बापू तुम्हारी 150वीं जयंती के उपलक्ष में देश के कोने कोने से न जाने कितने तुम्हारी वेशभूषा पहने बापू निकल आए इस धरती पर, तुम्हारा संदेश लेकर। सबके हाथों में स्वच्छता का नारा है, प्रेम, सद्भाव, भाई-चारे की तख्ती है ओर हां सत्य अहिंसा की वाणी चारों ओर गूंज रही है। हैरानी की बात तो यह है कि बापू तुम्हारी धरती हिंसा के रक्त से सन गई है ।

क्या यही तुम्हारे सपनों का भारत है बापू तुमने तो कभी नहीं सोचा था कि तुम्हारे देश की नन्हीं-नन्हीं बच्ची और बच्चियों के जिस्म पर डाला वस्त्र तार तार हो जाए। आज हर कमरा, हर आंगन, हर चौराहा साक्षी है बापू, उसका जहां दिल पर हाथ रख कर यह सोचने को मजबूर करता है कि क्या सचमुच देश आजाद है । किसके माथे से गुलामी की स्याही मिटी है । भूख से बिलखते लोग, सूखती धरती, रक्त से सनी आबो हवा, संप्रदाय की आग में झुलसता आसमां, क्या यही है तुम्हारी सपनों का भारत । क्या सोच रहे हो बापू, कहां खो गए तुम्हारे वे सैनिक जो देते थे संदेश प्रेम, भाईचारे और विश्वास का, जो सत्य अहिंसा के साथ चलना सिखाते थे। न जाने कहां खो गए बापू तुम्हारे वह सावधान और जागरूक प्रहरी जो तुम सदैव साथ लेकर चलते थे । कहां चला गया सत्याग्रह जो देश को आजादी दिला कर तुम्हारे साथ ही चला गया । तुमने तो एक देश से इस देश को आजादी दिलाई थी पर बापू आज तो तुम्हारा देश मल्टीनेशनल कंपनी की आरामगाह बन गया है।

एक ओर चमत्कार देखो बापू, तुम्हारे देश में मूर्तियों को तो स्वर्ण से लादा जा रहा है, मंदिरों के मूल शिखर को स्वर्णिम आभा से चमकाया जा रहा है और तुम जिस बुनियादी शिक्षा की बात करते थे उसके लिए विश्व बैंक से कर्जा लिया जा रहा है। और हां बापू देखो ना तुम्हारी सादगी का भव्य आयोजन किया जा रहा है। जिन सत्य अहिंसा के अस्त्र और शस्त्र से लैस होकर निकले थे देश को आजाद कराने आज वे भी न जाने कहां खो गए हैं देखो ना बापू आज देश का समय हिंसक हो गया है। हैरानी तो इस बात की है कि अहिंसा का पुजारी हिंसा का शिकार हो गया और जमाना कह रहा है यह बापू की हत्या या आत्महत्या । सच है बापू अस्त्र और शस्त्र के सामने निहत्थे होकर जाना आत्महत्या ही तो है फिर क्या गलत किया गुजरात की एक परीक्षा में बच्चों से यह पूछ कर कि बापू ने आत्महत्या कब की थी। बापू हैरानी तो तब होती है जब तुम्हारी वेशभूषा फैंसी ड्रेस प्रतियोगिता का हिस्सा बन जाती हे।

छोड़ो, बापू इन सब बातों को चलो, अब हम विश्राम ही कर ले। तुम्हारी जयंती और तुम्हारी पुण्यतिथि पर जमाना तो तुम्हें याद करेगा ही करेगा।

डॉ हंसा कमलेश

सदर बाजार

होशंगाबाद

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