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लघुकथा - स्टुपिड - डॉ.विनीता रघुवंशी

स्टुपिड

एक संस्था के मास्टर जी कलेक्टर के सामने हाथ जोडे़ खडे़ थे। कलेक्टर अपने अधिकारी व्यक्तित्व के चोले में बंधा शिक्षक पर अपना गुस्सा निकाल रहा था।

तुम स्टुपिड हो। तुम्हें मास्टर किसने बनाया। तुम पढे़ लिखे हो तुम्हें प्रोटोकॉल समझ नहीं आया?

शिक्षक ने शान्त मन सब सुना।

जब जिलाधीश महोदय का गुस्सा शान्त हुआ तो शिक्षक ने विनम्रतापूर्वक कहा -सर में क्षमा के साथ तीन बार स्टुपिड बोलना चाहता हूँ मुझे अनुमति दें -पहला स्टुपिड उस प्रोफेसर के लिए जिसने आपको इस पद तक पहुँचाया लेकिन शिक्षक का सम्मान करना नहीं सिखाया

दूसरा स्टुपिड आपके माता -पिता के लिए जिन्होंने पढाया लिखाया लेकिन शिक्षक का सम्मान करने के संस्कार नहीं दिये।

तीसरा स्टुपिड आपके लिए आप खुद योग्य बने किन्तु अपने संस्कार नहीं बदल पाये।

डा.विनीता रघुवंशी

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