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मिन्नी शर्मा की ललित रचनाएँ

बातचीत कम मिट्टीपलीत

एक दिन हमें रास्ते में एक कुत्ता मिला। मैंने देखा वो जगह जगह मिट्टी में गड्ढे खोद रहा था। मैंने उससे पूछा कि तुम मिट्टी में इतने गड्ढे क्यों खोद रहे हो। मेरी इस बात का उस पर कोई असर नहीं हुआ। उसने मुझे नज़रअंदाज़ कर दिया। मैंने फिर ज़रा हिम्मत करके थोड़ी इज्ज़त से दुबारा उससे पूछा “भई कुत्ता साहब बताइए तो कि आप यहां इतने गड्ढे क्यों खोद रहे हैं? क्या कुछ ढूंढ रहे हैं? इस पर कुत्ते जी ने बड़ी अजनबीयत से मेरी और आते हुए कहा “ तुम्हें इससे क्या? तुम इंसान तो इससे भी बड़े बड़े गड्ढे यहां वहां खोदते फिरते हो हमने तुमसे कभी कुछ पूछा”। तो मैंने कहा कि वो तो किसी काम से ही गड्ढे खोदते हैं न।

“ न......, नहीं ! कोई काम नहीं होता इसीलिए खोदते हैं । हम जानवर हैं, बेवकूफ नहीं । हमें सब पता है , तुम इंसानों के बारे में।”

बैठे- बैठे क्या करें

करना था कुछ काम ।

१०० फीट का गड्ढा खोद दिया,

कोई गिर गया उसमें आके धड़ाम।

सारा देश न्यूज़ के सामने बैठ के

लेता है राम का नाम ।

.......आए बड़े करने वाले काम ; हमने बहुत देखे हैं तुम्हारे ऐसे काम । अब तुम निकलो यहां से और हमें करने दो अपना काम।

कुत्ते जी से एसी फटकार सुनकर हमारा तो बड़ा जी खराब हुआ। सोचा भई ये कुत्ते जी मिट्टी में गड्ढे खोद रहे थे या हमें !

मिन्नी शर्मा ।

Sminni151@gmail.com

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बातचीत गिलहरी जी से

चिड़िया जी की तरफ से मायूस होके हम घर की तरफ चले जा ही रहे थे कि तभी हमने एक फुदकती हुई गिलहरी देखी। उसे फुदकता देख हमारी बैठी हुई तबीयत भी जरा उछल पड़ी । हम उसके पीछे- पीछे हो लिए हालांकि यह काम ज़रा मुश्किल है ; तो क्या हम भी कुछ आसान नहीं हम ने उसका पीछा करते-करते ही उससे पूछा," गिलहरी जी कितना खाना इकट्ठा करेंगी आप?"

इस पर गिलहरी जी ने भड़क यूं तीखी कटाक्ष भरी नज़र से हमारी और देखा कि हमें लगा कि उनकी नज़रें हमें काट ही ना डालें। हमने ज़रा संभलते हुए उनसे कहा," अरे गिलहरी जी आपकी नज़रें तो आपके दांतो से भी ज़्यादा तीखी हैं।" यह सुनकर गिलहरी जी ने हंस के हमें अपने दो दांत दिखा दिए। हमें लगा शायद अब हमारी इनसे बातचीत अच्छी तरह से हो पाएगी। कि तभी गिलहरी जी ने बड़ी तीखी आवाज में कहा," हम तीखे ही सही हैं। तुम इंसानों की तरह ज़ुबान मीठी करके किसी को फुसलाते तो नहीं और हमारे खाने पर नज़र मत लगाओ अपनी मेहनत से इकट्ठा करते हैं जो करते हैं। तुम लोगों की तरह किसी के मुंह से निवाले नहीं छीनते।"

"यहां भी वही राग।" हमने मन ही मन कहा ।

राग तो तुम लोग अलापते हो। ये-वो, ये-वो, वो-ये। लगता है खाली मनोरंजन करने आए हो दुनिया में।

" मनोरंजन के लिए अच्छा होता है ना।"

"दूसरों की सेहत बिगाड़ कर अपनी सेहत बनाना भी कोई मनोरंजन है लगता।"

" नहीं ऐसा तो नहीं है।"

" जैसा भी है ; यह तुम हम जैसे भोले जीव-जंतुओं को तंग करना बंद करो और जो कुछ पूछना है खुद से पूछो और मुझे अपना खाना खाने दो ।"

"अजीब है ; यह जानवर कब से इतने समझदार हो गए।" सोचते हुए आखिर बुझे मन से हमें घर पहुंचना ही पड़ा जहां पहुंचकर हमें रात भर अपने दिमाग के चिराग जलाने पड़े ताकि अगली बार किसी से बातचीत हो तो यूं मिट्टी पलीत ना होने पाए।

-मिन्नी शर्मा

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बातचीत चिड़िया जी से

हमें चिड़ियों की बातचीत बहुत पसंद है। बड़ा कमाल का नज़ारा होता है अगर आपने कहीं देखा हो तो। सब की सब चिड़ियां एक सुर होके बोलतीं हैं। सारे वातावरण में उनकी एकता का स्वर होता है। इंसानों की तरह नहीं कि एक सुर कहीं तो दूसरा सुर कहीं।

अब कल की ही बात है जब हम पार्क में घूमने के लिए गए। हमारे पहुंचने से पहले ही उनकी गोष्ठी चालू हो चुकी थी। शोर इतना कि लगता था जैसे कोई उत्सव चल रहा हो। हम भी इस उत्सव में शामिल होने की आशा लिए चिड़ियों की गोष्ठी वाली जगह पर पहुंच गए और मुंह उठाकर ऊपर पेड़ों पर बैठी चिड़ियों को देखने लगे।हमने सबसे पास दिखती चिड़िया जी से बड़ी विनम्रता से निवेदन करते हैं वह पूछा "सुनिए चिड़िया जी, क्या हम भी आपकी बातचीत में शामिल हो सकते हैं।" इस पर उस चिड़िया जी ने हमारी और ना देखते हुए अपनी पूछ जरा हिलाई और उड़कर पहले से थोड़ी ऊंची डाल पर जा बैठी। हमने सोचा थोड़ा सुर में गा कर पूछते हैं, "ओ पंछी प्यारे सांझ सखा रे बोले तू कौन सी बोली ओ...ओ....बोले...."

' एक ही बोली ' हमारे गीत को बीच में काटते हुए वह चिड़िया जी बड़े गर्व से बोली। ”हम पंछी तो एक ही बोली बोलती हैं। तुम इंसानों की तरह दासियों-बीसीयों बोलियां हमारे पास नहीं है वेस्ट करने को।"

"लगता है आप बुरा मान गई चिड़िया जी वैसे बोलियां तो बस अलग-अलग क्षेत्रों का कल्चर है यहां।"

"हम अच्छा जानती है तुम्हारा कल्चर हम चिड़ियां तो जाने कहां-कहां के तिनके जोड़ जोड़ कर अपना घोंसला बनाती हैं और तुम्हारे यहां एक कल्चर का इंसान दूसरे कल्चर वाले क्षेत्र में अपना घोंसला बना ले तो देखो कैसे-कैसे तिनके के उस पर बरसते हैं"।

"नहीं-नहीं चिड़िया जी यह सब भेदभाव तो अब लगभग बंद हो गया है।"

"ऊं!...ऊपर से उड़ती हुई सब देख लेती है हम। पता है भगवान ने तुम्हें पंख क्यों नहीं दिए?"

"क्या , क्यों?"

" जिस तरह की छीना झपटी, नोंचा - खसौटी करने कि तुम्हारी आदत है पंख दिए होते तो कब के नुच गए होते फिर फायदा क्या। और सुनो आज तो बात कर ली आइंदा हमसे ऐसे बातचीत करने की कोशिश मत करना, वह क्या है ना हमें भी अपनी इज्जत का ख्याल रखना पड़ता है। तुम जैसों से बात करके हमें अपनी वैल्यू नहीं घटानी। अब जाओ यहां से। बड़े आए हमारी बोले बोली बोलने। पहले अपनी 'बोली' तो बोल लें।" कहते हुए चिड़िया जी और ऊंची डाल पर पहुंच गई और हमें और नीचा कर गईं।

-मिन्नी शर्मा

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