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व्यंग्य - कुत्ते की मौत - हनुमान मुक्त

कुत्ते की मौत

वर्मा जी का कुत्ता मर गया। कुत्ते की मरने की घटना आग की तरह सारे शहर में फैल गई। टीवी चैनलों और अखबारों पर ब्रेकिंग न्यूज़ में दिखाया जाने लगा।

यूं तो रोजाना हजारों कुत्ते मरते हैं। कुत्तों का मरना और जीना ज्यादा मायने नहीं रखता लेकिन इस चुनावी वातावरण में कब क्या चीज महत्वपूर्ण हो जाए पता नहीं चलता। वह भी वर्मा जी से जुड़ी हुई।

लोग अटकलें लगाने लगे कि वह कुत्ता मरा नहीं बल्कि मारा गया है। इतना हष्ट पुष्ट, गबरु जवान वैसे ही कैसे मर सकता है।

कल शाम को तो वह शर्मा जी की कुतिया के साथ देखा गया था। कहीं ऐसा तो नहीं। शर्मा जी को उस कुत्ते और कुतिया का साथ अच्छा नहीं लगा हो और उन्होंने उसे मरवा दिया हो।

उनके पड़ोसी कह रहे थे कि एक-दो दिन से वह वर्मा जी पर कुछ ज्यादा ही भौंकने लगा था। वर्मा जी को कुत्ते का भौंकना अच्छा नहीं लगा हो।

वैसे भी अपने कुत्ते का भौंकना (मेरी बिल्ली मुझसे म्याऊं) किसे अच्छा लगता है और उन्होंने उसे मरवा दिया हो।

अटकलों का बाजार गर्म था। जो भी कुत्ते के मरने की घटना सुनता। अपनी ओर से कुछ ना कुछ इन्वेस्टिगेट कर बता ही देता।

मीडिया इस बात को काफी हवा दे रहा था।

मैं वर्मा जी का शुभचिंतक हूं। मैं सुनी सुनाई बातों पर ज्यादा विश्वास नहीं करता। मैंने उनसे पूछा," वर्मा जी आपका कुत्ता मर गया इस बारे में आपका क्या कहना है।"

वह बोले "कहना क्या है ?कुत्ता मर गया! मतलब मर गया !रोजाना जाने कितने कुत्ते मरते हैं! इतना बवेला कभी नहीं मचता। कोई मेरा ही कुत्ता थोड़े ही मरा है।"

"कुत्तों की जिंदगी होती है ऐसी है कुछ दिन वफादारी करो और जब वफादारी से पेट भर जाए तो रास्ते जाओ।"

आप क्या कह रहे हो ?मेरे कुछ समझ नहीं आ रहा?

वफादारी से पेट भर जाए तो रास्ते जाओ।

वर्मा जी बोले ,"इसमें समझने की क्या बात है ?अभी कुछ दिन पहले मेरे घर की अलमारी में बंद बरसों पुरानी एक सीक्रेट पोटली को वह खा गया। सभी सीक्रेट्स उसके पेट में पहुंच गए। वे उसे पच नहीं पा रहे थे। पेट में कुछ ज्यादा ही आफरा आ गया था। भौंकने भी ज्यादा लगा था। मेरी नींद तो खराब कर ही रहा था। पड़ोसियों को भी नहीं सोने दे रहा था। पेट में आफरे की वजह से वह मर गया। लोगों ने तिल का ताड़ बना दिया। ‌मेरा कुत्ता मरा है। सबसे ज्यादा दुख मुझे है।

मैं जाने कैसे इतना दुख सहन करने की कोशिश कर रहा हूं। लेकिन लोग हैं कि मुझे शांति से दुख सहने तक नहीं दे रहे हैं। यह कहते हुए वर्मा जी चुप हो गए।

वर्मा जी की मनो स्थिति भांपकर मैं भी चुपचाप वहां से लौट आया।

लोगों को बिल्कुल तसल्ली नहीं थी। वर्मा जी का कुत्ता उनके लिए अपने घर के किसी इष्ट मित्र से भी ज्यादा अजीज था। उनके घर का इष्ट मित्र मर जाता तो शायद 10 _12 बार दिन शोक मना कर वे चुप हो जाते लेकिन वर्मा जी के कुत्ते के मरने का दुख उनसे सहन नहीं हो रहा था।

उनके कुत्ते के शुभचिंतक कह रहे थे कि कितना प्यारा कुत्ता था। जब भी कोई मोहल्ले का व्यक्ति वर्मा जी के यहां जाता तो वह बड़े प्यार से जीभ निकालते हुए आगंतुक के पैरों को चाटते हुए पूंछ हिलाने लग जाता। कभी उसने किसी को नहीं काटा। वर्मा जी के इशारे के बगैर वह कभी भौंकता तक नहीं था।

बेचारा! पता नहीं कैसे मर गया? अफवाहों और अटकलों का बाजार गर्म था। वर्मा जी के विरोधी कुत्ते के मरने से सबसे ज्यादा खफा थे। उन्होंने कुत्ते के मरने की सीबीआई से जांच कराने की मांग कर डाली।

चुनावी अधिसूचना जारी हो चुकी थी। सरकार किसकी बनेगी। भविष्य के गर्त में था। कब वर्मा जी को समर्थकों की जरूरत पड़ जाए। कोई पता नहीं था। सीबीआई से जांच कराने का आश्वासन ही कहीं सरकार बनाने में बाधा बन जाए। कोई पता नहीं था।

हर कोई फूंक-फूंक कर कदम रख रहा था। विपक्षियों ने धरने प्रदर्शन शुरू कर दिए। उनका कहना था कि इस सारे घटनाक्रम की जांच होनी चाहिए। कुत्ते का ऐसे समय मरना ,जब कुत्तों की सबसे ज्यादा आवश्यकता रहती है। वह भी ऐसे वफादार कुत्ते का।

अपने आप में जांच का विषय है। कुत्ते तो रोज ही पैदा होते हैं और मरते रहते हैं लेकिन इतना बरसों से साथ दे रहा भोला भाला, समझदार कुत्ता और वह भी वर्मा जी का !

उसका मरना सामान्य घटना कैसे हो सकती है ?हम कहते हैं वह कुत्ता मरा नहीं है बल्कि उसे मारा गया है। उसको मरवाने में वर्मा जी का हाथ है। ऐसे हत्यारे वर्मा जी को तुरंत अरेस्ट किया जाना चाहिए। जांच की मांग करते करते विपक्षी वर्मा जी को ही हत्यारा घोषित कर उन्हें ही अरेस्ट करने की मांग करने लगे।

भूख हड़ताल शुरू कर दी गई। प्रशासनिक अधिकारियों के कार्यालयों के सामने मजमा लगा दिया गया। तख्तियां टांग दी गई। वे कहने लगे," कुत्ते के पेट में जितने भी राज दफा है। कुत्ते का पोस्टमार्टम कर बाहर निकाले जाए। जब तक सारे राज कुत्ते के पेट से बाहर नहीं निकाले जाएंगे। तब तक जांच ठीक ढंग से हो ही नहीं सकती।"

प्रशासन परेशान हो गया। कुत्ते के मरने की घटना ने सारे शहर की फिजा ही बदल दी थी। कुत्ते बिरादरी के लोगों में उत्साह था। उन्हें अपने कुत्ते होने पर गर्व हो रहा था। विपक्षियों की आवाज के साथ आवाज मिला कर वे भी साथ देने लगे थे।

कुत्ते के मरने की घटना से वर्मा जी का भविष्य धूमिल होने जा रहा था। उन्होंने कभी कल्पना तक नहीं की थी उनका पालतू कुत्ता ही उनके भविष्य को इस प्रकार चौपट कर जाएगा। यदि उन्हें थोड़ा भी अंदेशा होता तो वे राज की इस पोटली को जमीन में ही दफन कर देते। जिस तक कभी कोई कुत्ता पहुंच ही नहीं पाता।

अब जो होना था सो हो गया। वर्माजी के खिलाफ देश में लहर फैल गई। उन्होंने ही कुत्ते को मारा है। इस प्रकार का वातावरण तैयार हो गया।

वर्मा जी की पार्टी के लोग खूब समझाने की कोशिश करते कि उस कुत्ते से वर्मा जी बहुत प्यार करते थे। जिस दिन कुत्ते की मौत हुई। उस दिन वे घर पर तक नहीं थे। कुत्ता अपनी स्वाभाविक मौत मरा है।

इतिहास गवाह है कुत्तों की मौत हमेशा ऐसे ही होती है।

पूर्व में मरे कुत्तों के रिकॉर्ड को चैनलों पर दिखाए जाने लगा। अखबारों में वर्मा जी दोषी नहीं है यह सिद्ध करने के लिए बहुत सी बातें समझाई जाने लगी। वर्मा जी के कुत्ते की पुरानी फोटोज को एडिट कर उस पर वृत्तचित्र बना दिया गया। वर्मा जी को कुत्ते से लिपटते हुए ,प्यार करते हुए ,खाना खिलाते हुए दिखाया जाने लगा।

चुनावी माहौल था। विपक्ष ने भी कमर कसी हुई थी। किसी भी कीमत पर वह इस मुद्दे को अपने हाथ से निकलने नहीं देना चाहते थे। उन्होंने कुत्ते के पेट के अंदर दफन "राज की पोटली "नाम से टेली फिल्म बनवा दी।

कुत्ता अपने पेट में कौन-कौन से राज रख सकता है और उस दिवंगत कुत्ते के पेट में कौन-कौन से राज दफन हुए होंगे। उनको वे अपने अनुसार दिखा रहे थे।

कुत्तों को इस जाति में जन्म लेने पर गर्व की अनुभूति हो रही थी।

वातावरण पूरी तरह कुत्ता मय हो रहा था। जगह-जगह कुत्ते की दिवंगत आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना हो रही थी।

मैं भी ऐसी प्रार्थना में शामिल होने जा रहा था।

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#हनुमान मुक्त

93, कांति नगर ,गंगापुर सिटी सवाई माधोपुर राजस्थान

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