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अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस विशेष कविताएँ - रचती है नारी - शबनम शर्मा

रचती है नारी

रचती है नारी इक

सुदृढ़ संसार,

बलिष्ठ छाती,

पत्थर से पाषाण दिल,

कीमती तोहफे,

सुन्दर बाज़ार,

नन्हा सा इक विचित्र संसार,

सुन्दर खिलौने,

भीष्मपिता से आदर्श

कृष्ण, राम से देवता,

रावण सा दशानंद

और कई बलिष्ठ हस्तियाँ,

फिर क्यूँ ठुकराई जाती है

क्यूँ बनती है मर्द के हाथ

की कठपुतली।

उठ, बता इन्हें, गर तू न होती,

कर क्या लेता अकेला मर्द

वर्ग संसार में,

दूध से रोटी, कपड़े, मकान

के लिए दास है तेरा,

तुझे ही अपना महत्व समझाना होगा।



लीक से हटकर

आओ लीक से हटकर कुछ किया जाए,

नापाक इरादों से न अब जिया जाए,

जो चमका दे किस्मत मेरे वतन की

उन इरादों को अब बुलन्द किया जाए

दुश्मनों के हौसले पस्त हों यारों,

खंजर कुछ इस तरह तेज़ किया जाए

हवा मुल्क में गरम बहे न कहीं

नापाक इरादों को यूँ खत्म किया जाए

बच्चा-बच्चा खंजर बना घूमे

दिल उनका यूँ मजबूत किया जाए

खून खौले बरफ की पहाड़ियों का भी

मौसम का रुख कुछ यूँ बदल दिया जाए।



प्यारी बिटिया

रिमझिम बरसात में बैठे थे

दो पगले,

कुछ इधर की, कुछ उधर की

हाँक रहे थे, कि ज़िन्दगी के

किसी कोने से चूहे की कुतरन

सी आवाज़ हुई।

देखा तो हैरानी हुई, इक नन्हीं

कली ने अंगड़ाई ली थी,

मिल गया उन पगलों को इक

खिलौना, छीन-छीन कर इक दूसरे

से काट रहे थे अपना वक्त,

प्यार की कोख से लूटा रहे

थे अपने अनमोल हीरे

और उन्हें पता ही न चला

कि कब ये सरक कर

गोद से जमीं पर

और जमीं से शाला जाने

लगी। निहारते, देखते और

मन ही मन कितने पगले

हो जाते ये दोनों और

अट्टहास कर लोट-पोट

हो जाते, जब कभी ये

थोड़ी सयानी बात करती

और कह उठते ये रिशू

से क्या सचमुच आज

रश्मि बन गई है।



आत्मबोध

आज पहली बार दिल से

इक अजीब सी टीस ने

मुझे आ झंझोड़ा है,

मैं व्यर्थ ही इस डोर के

पीछे-पीछे खिंचती चली

गई कि ये मेरा ये तेरा है,

बड़े इत्मीनान से मैंने अपने

इस घरौंदे की नींव रखी

लाखों बाधाएं आने पर भी

मैं तनिक न हिली, परन्तु

मेरी ईमानदारी, कर्मठता का

ये रूखा-रूखा सिला होगा

ये कदापि सोचा न था

बच्चे पंख पसारे हवा में

उड़ने लगे

मतलबी मुस्कराहटों से

करते मेरा अभिनंदन

आज बेसमझ, बेवकूफ

बन गई हूँ मैं

हमारे घर में सबके कमरे

साथ-साथ सटे हैं

परन्तु दिल न जाने कहाँ-कहाँ

बंटे हैं।

समझ नहीं आता क्या करूँ

किधर जाऊँ, किसे अपना कहूँ

आज तो मेरा अपना शरीर ही

मेरा नहीं है, परायों से आस।

- शबनम शर्मा

 माजरा, तह. पांवटा साहिब, जिला सिरमौर, हि.प्र. – १७३०२१

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