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लाहौर का भूगोल - पतरस बुख़ारी

अनुवादक : डॉ. आफ़ताब अहमद

व्याख्याता, हिंदी-उर्दू, कोलंबिया विश्वविद्यालय, न्यूयॉर्क


लाहौर का भूगोल

पतरस बुख़ारी

(यह लाहौर शहर का एक व्यंग्यात्मक रेखा-चित्र है, जो बच्चों के पाठ्यक्रम में शामिल एक निबंध के रूप में है। इसमें लाहौर शहर की भौगोलिक स्थिति, फैलते क्षेत्रफल, प्रदूषित जलवायु व गन्दगी, सड़कों की दुर्दशा, विज्ञापनों से ढंकी इमारतों, पत्रिका-बाज़ी, संघों की अधिकता और लाहौर के छात्रों के प्रकार के बारे में रोचक वर्णन हैं। हालाँकि यह रेखा-चित्र उस समय लिखा गया जब सड़कों पर तांगे चला करते थे, लेकिन इसकी विशेषता यह है कि यह आज भी दक्षिण एशिया के किसी भी फैलते महानगर का उतना ही सजीव चित्रण है जितना अर्ध-शताब्दी पूर्व के लाहौर का। बस तांगों और इक्कों को टैक्सियों और बसों से बदल दीजिये।–अनुवादक)

प्रस्तावना

प्रस्तावना के तौर पर केवल इतना निवेदन करना चाहता हूँ कि लाहौर की खोज हुए अब बहुत समय बीत चुका है। इसलिए दलीलों व तर्कों से इसके अस्तित्व को सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं। यह कहने की भी अब आवश्यकता नहीं कि पृथ्वी के गोले को दाएँ से बाएँ घुमाइए, यहाँ तक कि भारत देश आपके सामने आकर ठहर जाए। फिर अमुक देशांतर रेखाओं और अक्षांश रेखाओं के मिलन बिन्दुओं पर लाहौर का नाम तलाश कीजिए। जहाँ यह नाम पृथ्वी के गोले पर लिखा हो वही लाहौर की भौगोलिक स्थिति है। इस सारे शोध को संक्षिप्त मगर सम्यक शब्दों में बुज़ुर्ग यूँ बयान करते हैं कि लाहौर, लाहौर ही है। अगर इस पते से आप को लाहौर नहीं मिल सकता तो आप की शिक्षा अपूर्ण और आपकी बुद्धिमत्ता दोषपूर्ण है।

भौगोलिक स्थिति

एक दो ग़लतफ़हमियाँ अलबत्ता ज़रूर दूर करना चाहता हूँ। लाहौर पंजाब में स्थित है। लेकिन पंजाब अब पंजाब नहीं रहा। इस पाँच नदियों की भूमि में अब सिर्फ़ साढ़े चार नदियाँ बहती हैं और जो अर्ध-नदी है, वह तो अब बहने के योग्य भी नहीं रही। इसी अबला बेचारी को रावी कहते हैं। मिलने का पता यह है कि शहर के निकट दो पुल बने हैं। उनके नीचे रेत में यह नदी लेटी रहती है। बहने का काम काफ़ी समय से बंद है। इसलिए यह बताना भी मुश्किल है कि शहर नदी के दाएँ किनारे पर स्थित है या बाएँ किनारे पर।

लाहौर तक पहुँचने के कई रास्ते हैं, लेकिन दो इनमें से बहुत मशहूर हैं। एक पेशावर से आता है और दूसरा दिल्ली से। मध्य-एशिया के आक्रमणकारी पेशावर के रास्ते और यू.पी. के हमलावर दिल्ली के रास्ते अवतरित होते हैं। प्रथमोल्लिखित अहले-ए-सैफ़ (खड्गधारी) कहलाते हैं और ग़ज़नवी या ग़ौरी तख़ल्लुस (उपाधि) करते हैं। उत्तरोल्लिखित अहल-ए-ज़बान (मातृभाषी) कहलाते हैं। यह भी तख़ल्लुस करते हैं और इस कला में उनके हाथ काफ़ी लम्बे हैं।

क्षेत्रफल

कहते हैं कि किसी ज़माने में लाहौर का क्षेत्रफल भी हुआ करता था, लेकिन छात्रों की सुविधा के लिए म्युनिसिपैलिटी ने इसको मंसूख़ (रद्द) कर दिया है। अब लाहौर के चारों ओर भी लाहौर ही स्थित है और दिन-प्रतिदिन और अधिक स्थित हो रहा है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि दस-बीस साल के अंदर लाहौर एक सूबे का नाम होगा जिसकी राजधानी पंजाब होगी। यूँ समझिए कि लाहौर एक शरीर है जिसके हर अंग पर सूजन प्रकट हो रही है, लेकिन हर सूजन पीप से भरी है। अर्थात यह विस्तार एक बीमारी है, जो इसके शरीर को हो गई है।

जलवायु

लाहौर की जलवायु के सम्बन्ध में भांति-भांति की किवदंतियाँ मशहूर हैं जो लगभग सबकी सब ग़लत हैं। हक़ीक़त यह है कि लाहौर-वासियों ने हाल ही में यह इच्छा व्यक्त की है कि और शहरों की तरह हमें भी जलवायु दी जाए। म्युनिस्पैलिटी बड़े विचार-विमर्श के बाद इस निष्कर्ष पर पहुँची कि इस विकास के दौर में जब कि दुनिया में कई देशों को होम-रूल मिल रहा है और लोगों में जागरूकता के आसार पैदा हो रहे हैं, लाहौर-वासियों की यह इच्छा अनुचित नहीं, बल्कि सहानुभूतिपूर्ण सोचा-विचार की हक़दार है।

लेकिन दुर्भाग्य से कमेटी के पास हवा का अभाव था इसलिए लोगों को निर्देश दिया गया कि जनकल्याण के मद्देनज़र नगरवासी हवा का अनुचित इस्तेमाल न करें, बल्कि जहाँ तक हो सके किफ़ायत से काम लें। अतः अब लाहौर में सामान्य आवश्यकताओं के लिए हवा के बजाए गर्द और बहुत विशेष परिस्थितियों धुआँ प्रयोग किया जाता है। कमेटी ने जगह-जगह पर धुएँ और गर्द को उपलब्ध करने के लिए केंद्र खोल दिए हैं जहाँ ये मिश्रण मुफ़्त वितरित किए जाते हैं। आशा की जाती है कि इससे अत्यंत संतोषजनक परिणाम प्रकट होंगे।

जल आपूर्ति की व्यवस्था बहुत समय से कमेटी के विचाराधीन है। यह स्कीम निज़ाम सक़्क़े के समय से चली आ रही है , लेकिन मुसीबत यह है कि निज़ाम सक़्क़े के अपने हाथ की लिखी हुई महत्वपूर्ण पांडुलिपियाँ कुछ तो नष्ट हो चुकी हैं और जो बाक़ी हैं उनके पढ़ने में बहुत दिक़्क़त पेश आ रही है। इसलिए संभव है कि शोध व गहन अध्ययन में कुछ वर्ष और लग जाएँ । अस्थाई तौर पर पानी का यह इंतज़ाम किया गया है कि फ़िलहाल बारिश के पानी को जहाँ तक संभव है, शहर से बाहर निकलने नहीं देते। इसमें कमेटी को बहुत सफलता प्राप्त हुई है। आशा की जाती है कि थोड़े ही समय में हर मुहल्ले की अपनी एक नदी होगी जिसमें धीरे-धीरे मछलियाँ पैदा होंगी और हर मछली के पेट में कमेटी की एक अंगूठी होगी जो मतदान के मौक़े पर हर मतदाता पहनकर आएगा।

निज़ाम सक़्क़े की पांडुलिपियों से इतना ज़रूर साबित हुआ है कि पानी पहुँचाने के लिए नल ज़रूरी हैं। अतः कमेटी ने करोड़ों रूपये ख़र्च करके जगह-जगह नल लगवा दिए हैं। फ़िलहाल इनमें हाइड्रोजन और आक्सीजन भरी है, लेकिन विशेषज्ञों की राय है कि एक न एक दिन ये गैसें ज़रूर मिलकर पानी बन जाएँगी। अतः कुछ-कुछ नलों में अब भी चंद बूँदें रोज़ाना टपकती हैं। नगर वासियों को हिदायत की गयी है कि अपने-अपने घड़े नलों के नीचे रख छोड़ें ताकि ठीक समय पर विलम्ब के कारण किसी का दिल न टूटे। शहर के लोग इस पर बहुत ख़ुशियाँ मना रहे हैं।

यातायात के साधन

जो पर्यटक लाहौर तशरीफ़ लाने का इरादा रखते हों उनको यहाँ के यातायात के साधनों के समबन्ध में कुछ आवश्यक बातें मस्तिष्क में बिठा लेनी चाहिए ताकि वे यहाँ के पर्यटन से उचित रूप से लाभान्वित हो सकें। जो सड़क बल खाती हुई लाहौर के बाज़ारों में से गुज़रती है, ऐतिहासिक रूप से बहुत अहम है। यह वही सड़क है जिसे शेरशाह सूरी ने बनवाया था। यह पुरातात्विक स्मारकों में शुमार होती है और अत्यंत सम्मान की दृष्टि से देखी जाती है। अतः इसमें किसी प्रकार का परिवर्तन गवारा नहीं किया जाता। वो प्राचीन ऐतिहासिक गड्ढे और खाइयाँ ज्यों-की-त्यों मौजूद हैं, जिन्होंने कई साम्राज्यों के तख़्ते उलट दिए थे। आजकल भी कई लोगों के तख़्ते यहाँ उलटते हैं और अतीत के वैभव की याद दिलाकर इंसान को सबक़ सिखाते हैं।

कुछ लोग ज़्यादा सबक सीखने के लिए उन तख़्तों के नीचे कहीं-कहीं दो-एक पहिए लगा लेते हैं और सामने दो हुक लगाकर उनमें एक घोड़ा टांक देते हैं। पारिभाषिक शब्दावली में इसको ताँगा कहते हैं। शौक़ीन लोग इस तख़्ते पर मोमजामा मंढ लेते हैं ताकि फिसलने में सुविधा हो और बहुत ज़्यादा सबक़ हासिल किया जाए।

असली और शुद्ध घोड़े लाहौर में खाने के काम आते हैं। क़साइयों की दुकानों पर उन्हीं का गोश्त बिकता है और काठी कसकर खाया जाता है। तांगों में उनके बजाए बनास्पती घोड़े इस्तेमाल किए जाते हैं। बनास्पती घोड़ा शक्ल-सूरत में पुच्छल तारे से मिलता है, क्योंकि उस घोड़े की बनावट में पूँछ ज़्यादा और घोड़ा कम पाया जाता है। चलते समय अपनी दुम को दबा लेता है और इस आत्मसंयम से अपनी गति में एक गंभीर संतुलन पैदा करता है ताकि सड़क का हर ऐतिहासिक गड्ढा और तांगे का हर हिचकोला अपनी छाप आप पर छोड़ता जाए और आपका रोम-रोम पुलकित हो उठे।

देखने योग्य स्थल

लाहौर में देखने योग्य स्थल मुश्किल से मिलते हैं। इसकी वजह यह है कि लाहौर में हर इमारत की बाहरी दीवारें दोहरी बनाई जाती हैं। पहले ईंटों और चूने से दीवार खड़ी करते हैं और फिर उस पर विज्ञापनों का पलस्तर कर दिया जाता है जो मोटाई में धीरे-धीरे बढ़ता जाता है। शुरू-शुरू में छोटे साइज़ के अमूर्त और अज्ञात विज्ञापन चिपकाए जाते हैं। मसलन "लाहौर वासियों को ख़ुशख़बरी" या "अच्छा और सस्ता माल।" इसके बाद उन विज्ञापनों की बारी आती है जिनके संबोध्य विद्वान और काव्य-मर्मज्ञ लोग होते हैं। मसलन "ग्रेजुएट दर्ज़ी हाउस" या "स्टूडेन्टों के लिए उत्तम अवसर" या "कहती है हमको जनता-जनार्दन पीठ-पीछे क्या।" धीरे-धीरे घर की चारदीवारी एक मुकम्मल डायरेक्ट्री का रूप धारण कर लेती है। दरवाज़े के ऊपर बूट पालिश का विज्ञापन है। दाईं तरफ़ ताज़ा मक्खन मिलने का पता लिखा है। बाईं तरफ़ स्मृति-वर्धक गोलियों का वर्णन है। इस खिड़की के ऊपर राष्ट्रय सेवक संघ के सम्मलेन का प्रोग्राम चस्पाँ है। उस खिड़की पर किसी मशहूर लीडर के घरेलू हालात खुल्लम-खुल्ला बयान कर दिए गए हैं। पिछली दीवार पर सर्कस के तमाम जानवरों की सूची है और अस्तबल के दरवाज़े पर मिस नग़मा जान की तस्वीर और उनकी फ़िल्म की ख़ूबियाँ गिनवा रखी हैं। यह विज्ञापन बड़ी तेज़ी से बदलते रहते हैं और हर नई ख़ुशख़बरी, और हर नई खोज या आविष्कार या बड़े आन्दोलन का प्रलोभन आँख झपकते में हर अचल चीज़ पर लीप दिया जाता है। इसलिए इमारतों का प्रकट रूप हर पल परिवर्तित होता रहता है और उनके पहचानने में ख़ुद शहर के लोगों को बहुत दिक़्क़त पेश आती है।

लेकिन जब से लाहौर में परंपरा शुरू हुई है कि कुछ-कुछ विज्ञापनी वाक्य पक्की स्याही से ख़ुद दीवार पर लिख दिए जाते हैं, यह दिक़्क़त बहुत हद तक दूर हो गयी है। इन स्थाई विज्ञापनों की बदौलत अब यह आशंका नहीं रही कि कोई व्यक्ति अपना या अपने किसी दोस्त का मकान सिर्फ़ इसलिए भूल जाए कि पिछली बार वहाँ चारपाईयों का विज्ञापन लगा हुआ था और लौटते समय तक वहाँ लाहौर-वासियों को ताज़ा और सस्ते जूतों की ख़ुशख़बरी सुनाई जा रही है। इसलिए अब विश्वास से कहा जा सकता है कि जहाँ मोटे अक्षरों में "मुहम्मद अली कृत्रिम दन्त-निर्माता" लिखा है वह “इन्क़लाब” अख़बार का दफ़्तर है। जहाँ "बिजली पानी भाप का बड़ा अस्पताल" लिखा है वहाँ डाक्टर इक़बाल रहते हैं। "शुद्ध घी की मिठाई" इम्तियाज़ अली ‘ताज’ साहब का मकान है। "कृष्णा ब्यूटी क्रीम" शालामार बाग़ को और "खांसी का अनुभूत नुस्ख़ा" जहाँगीर के मक़बरे को जाता है।

उद्योग धंधे

विज्ञापनों के अतिरिक्त लाहौर का सबसे बड़ा उद्योग ‘पत्रिका-बाज़ी’ और सबसे बड़ा धंधा ‘संघ की स्थापना’ करना है। हर पत्रिका का हर अंक सामान्य रूप से विशेषांक होता है और सामान्य अंक विशेष विशेष अवसरों पर प्रकाशित किए जाते हैं। सामान्य अंक में सिर्फ़ संपादक की तस्वीर और विशेषांकों में मिस सुलोचना और मिस कज्जन की तस्वीरें भी दी जाती हैं। इससे साहित्य का बहुत विकास होता है और आलोचना-शास्त्र उन्नति करता है।

लाहौर के प्रति वर्ग इंच में एक संघ मौजूद है। प्रैज़ीडेंट अलबत्ता थोड़े हैं, इसलिए फ़िलहाल सिर्फ़ दो तीन सज्जन ही यह महत्वपूर्ण दायित्व निभा रहे हैं। चूँकि इन संघों के उद्देश्य व प्रयोजन भिन्न हैं इसलिए अक्सर समय एक ही अध्यक्ष सुबह किसी धार्मिक कान्फ़्रेंस का उद्घाटन करता है, तीसरे पहर को किसी सिनेमा-संघ में मिस नग़मा जान का परिचय कराता है और शाम को किसी क्रिकेट टीम के डिनर में शामिल होता है। इससे उनका उद्देश्य व्यापक रहता है। भाषण आम तौर पर ऐसा होता है जो तीनों मौक़ों पर काम आ सकता है। इसलिए दर्शकगण को बहुत सुविधा रहती है।

उत्पादन

लाहौर का सबसे प्रसिद्ध उत्पादन यहाँ के विद्यार्थी हैं जो बहुत बहुलता से पाए जाते हैं और हज़ारों की संख्या में दिसावर (विदेशी बाज़ार) को भेजे जाते हैं। फ़सल सर्दियों के आरम्भ में बोई जाती है और आम तौर पर वसंत के अंत में पक कर तैयार होती है।

विद्यार्थियों की कई श्रेणियाँ हैं जिनमें से कुछ मशहूर हैं। पहली श्रेणी “जमाली”(सुन्दर) कहलाती है। ये विद्यार्थी आम तौर पर पहले दर्ज़ियों के यहाँ तैयार होते हैं, तत्पश्चात धोबी और फिर नाई के पास भेजे जाते हैं और इस प्रक्रिया के पश्चात किसी रेस्तोराँ में उनकी नुमाइश की जाती है। सूर्यास्त के बाद किसी सिनेमा या सिनेमा के आस-पास में:

रुख़-ए-रौशन के आगे शम्मा रखकर वो यह कहते हैं

उधर जाता है देखें या इधर परवाना आता है

शमएँ कई होती हैं, लेकिन सबके चित्र एक एलबम में जमा करके अपने पास रख छोड़ते हैं और छुट्टियों में एक-एक को पत्र लिखते रहते हैं। दूसरी श्रेणी “जलाली” (प्रतापी) विद्यार्थियों की है। इनकी वंशावली जलालुउद्दीन अकबर तक पहुँचती है। इसलिए हिंदुस्तान का तख़्त व ताज उनकी मिल्कियत समझा जाता है। शाम के समय कुछ मुसाहिबों (चाटुकार दोस्तों) को साथ लिए निकलते हैं और उदारता और दरियादिली के रेले बहाते फिरते हैं। कॉलेज का भोजन उन्हें रास नहीं आता इसलिए हॉस्टल में नहीं ठहरते। तीसरी श्रेणी “ख़याली” विद्यार्थियों की है। ये अक्सर रूप और नैतिकता और आवागमन और जम्हूरियत पर बुलंद आवाज़ में विचार-विनिमय करते पाए जाते हैं और सृष्टि और यौन-मनोविज्ञान के सम्बन्ध में नए-नए सिद्धांत पेश करते रहते हैं। शारीरिक स्वास्थ्य को मानव विकास के लिए आवश्यक समझते हैं। इसलिए सुबह-सवेरे पाँच छह डंड पेलते हैं और शाम को हॉस्टल की छत पर गहरी साँस लेते हैं। गाते ज़रूर हैं लेकिन अक्सर बेसुरे होते हैं। चौथी श्रेणी “ख़ाली” विद्यार्थियों की है। यह विद्यार्थी की शुद्धतम श्रेणी है। इनका दामन किसी क़िस्म के कचरे से भीगने नहीं पाता। किताबें, परीक्षाएँ, अध्ययन और इस प्रकार की चिंताएँ कभी इनके जीवन में विघ्न नहीं डालतीं। जिस मासूमियत को साथ लेकर कॉलेज में पहुँचते हैं, उसे अंत तक कलंकित होने नहीं देते और शिक्षा और पाठ्यक्रम और कक्षा के हंगामों में इस तरह जीवन व्यतीत करते हैं जिस तरह बत्तीस दाँतों में ज़बान रहती है।

पिछले चंद सालों से विद्यार्थियों की एक और श्रेणी भी दिखाई देने लगी है, लेकिन उनको अच्छी तरह से देखने के लिए आवर्धक लेंस का इस्तेमाल आवश्यक है। ये वो लोग हैं जिन्हें रेल का टिकट आधी क़ीमत पर मिलता है और अगर चाहें तो अपनी दाई के साथ ज़नाने डिब्बे में भी सफ़र कर सकते हैं। इनके कारण अब यूनिवर्सिटी ने कॉलेजों पर शर्त लगा दी है कि आईन्दा केवल वही लोग प्रोफ़ेसर नियुक्त किए जाएँ जो दूध पिलाने वाले जानवरों में से हों।

प्राकृतिक परिस्थितियाँ:

लाहौर के लोग बहुत प्रसन्न प्रकृति के हैं।

प्रश्न

1-लाहौर तुम्हें क्यों पसंद है? विस्तारपूर्वक लिखो।

2-लाहौर की किसने खोज की और क्यों? उसके लिए दंड का सुझाव भी प्रस्तुत करो ।

3- म्युनिसिपल-कमेटी की शान में एक प्रशंसापूर्ण प्रशस्ति लिखो।

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अहमद शाह पतरस बुख़ारी

(1 अक्टूबर 1898- 5 दिसंबर 1958)

असली नाम सैयद अहमद शाह बुख़ारी था। पतरस बुख़ारी के नाम से प्रशिद्ध हैं। जन्म पेशावर में हुआ। उर्दू अंग्रेज़ी, फ़ारसी और पंजाबी भाषाओं के माहिर थे। प्रारम्भिक शिक्षा से इंटरमीडिएट तक की शिक्षा पेशावर में हासिल की। लाहौर गवर्नमेंट कॉलेज से बी.ए. (1917) और अंग्रेज़ी साहित्य में एम. ए. (1919) किया। इसी दौरान गवर्नमेंट कॉलेज लाहौर की पत्रिका “रावी” के सम्पादक रहे।

1925-1926 में इंगलिस्तान में इमानुएल कॉलेज कैम्ब्रिज से अंग्रेज़ी साहित्य में Tripos की सनद प्राप्त की। वापस आकर पहले सेंट्रल ट्रेनिंग कॉलेज और फिर गवर्नमेंट कॉलेज लाहौर में प्रोफ़ेसर रहे। 1940 में गवर्नमेंट कॉलेज लाहौर के प्रिंसिपल हुए। 1940 ही में ऑल इंडिया रेडियो में कंट्रोलर जनरल हुए। 1952 में संयुक्त राष्ट्र संघ में पाकिस्तान के स्थाई प्रतिनिधि हुए। 1954 में संयुक्त राष्ट्र संघ में सूचना विभाग के डिप्टी सेक्रेटरी जनरल चुने गए। दिल का दौरा पड़ने से 1958 में न्यू यार्क में देहांत हुआ।

पतरस ने बहुत कम लिखा। “पतरस के मज़ामीन” के नाम से उनके हास्य निबंधों का संग्रह 1934 में प्रकाशित हुआ जो 11 निबंधों और एक प्रस्तावना पर आधारित है। इस छोटे से संग्रह ने उर्दू पाठकों में हलचल मचा दी और उर्दू हास्य-साहित्य के इतिहास में पतरस का नाम अमर कर दिया। उर्दू के व्यंग्यकार प्रोफ़ेसर रशीद अहमद सिद्दिक़ी लिखते हैं “रावी” में पतरस का निबंध “कुत्ते” पढ़ा तो ऐसा महसूस हुआ जैसे लिखने वाले ने इस निबंध से जो प्रतिष्ठा प्राप्त करली है वह बहुतों को तमाम उम्र नसीब न होगी।....... हंस-हंस के मार डालने का गुर बुख़ारी को ख़ूब आता है। हास्य और हास्य लेखन की यह पराकाष्ठा है....... पतरस मज़े की बातें मज़े से कहते हैं और जल्द कह देते हैं। इंतज़ार करने और सोच में पड़ने की ज़हमत में किसी को नहीं डालते। यही वजह है कि वे पढ़ने वाले का विश्वास बहुत जल्द हासिल कर लेते हैं।” पतरस की विशेषता यह है कि वे चुटकले नहीं सुनाते, हास्यजनक घटनाओं का निर्माण करते और मामूली से मामूली बात में हास्य के पहलू देख लेते हैं। इस छोटे से संग्रह द्वारा उन्होंने भविष्य के हास्य व व्यंग्य लेखकों के लिए नई राहें खोल दी हैं । उर्दू के महानतम हास्य लेखक मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी एक साक्षात्कार में कहते हैं “….पतरस आज भी ऐसा है कि कभी गाड़ी अटक जाती है तो उसका एक पन्ना खोलते हैं तो ज़ेहन की बहुत सी गाँठें खुल जाती हैं और क़लम रवाँ हो जाती है।”

पतरस के हास्य निबंध इतने प्रसिद्द हुए कि बहुत कम लोग जानते हैं कि वे एक महान अनुवादक (अंग्रेज़ी से उर्दू), आलोचक, वक्ता और राजनयिक थे। गवर्नमेंट कॉलेज लाहौर में नियुक्ति के दौरान उन्होंने अपने गिर्द शिक्षित, ज़हीन और होनहार नौजवान छात्रों का एक झुरमुट इकठ्ठा कर लिया। उनके शिष्यों में उर्दू के मशहूर शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ शामिल थे।

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Aftab Ahmad-Photo

डॉ. आफ़ताब अहमद

व्याख्याता, हिंदी-उर्दू, कोलंबिया विश्वविद्यालय, न्यूयॉर्क

जन्म- स्थान: ग्राम: ज़ैनुद्दीन पुर, ज़िला: अम्बेडकर नगर, उत्तर प्रदेश, भारत

शिक्षा: जवाहर लाल नेहरु यूनिवर्सिटी, दिल्ली से उर्दू साहित्य में एम. ए. एम.फ़िल और पी.एच.डी. की उपाधि। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, अलीगढ़ से आधुनिक इतिहास में स्नातक ।

कार्यक्षेत्र: पिछले आठ वर्षों से कोलम्बिया यूनिवर्सिटी, न्यूयॉर्क में हिंदी-उर्दू भाषा और साहित्य का प्राध्यापन। सन 2006 से 2010 तक यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफ़ोर्निया, बर्कली में उर्दू भाषा और साहित्य के व्याख्याता । 2001 से 2006 के बीच अमेरिकन इंस्टीट्यूट ऑफ़ इन्डियन स्टडीज़, लखनऊ के उर्दू कार्यक्रम के निर्देशक ।

विशेष रूचि: हास्य व व्यंग्य साहित्य और अनुवाद ।

प्रकाशन: सआदत हसन मंटो की चौदह कहानियों का “बॉम्बे स्टोरीज़” के शीर्षक से अंग्रेज़ी अनुवाद (संयुक्त अनुवादक : आफ़ताब अहमद और मैट रीक)

मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी के उपन्यास “मृगमरीचिका” का अंग्रेज़ी अनुवाद ‘मिराजेज़ ऑफ़ दि माइंड’(संयुक्त अनुवादक : आफ़ताब अहमद और मैट रीक)

पतरस बुख़ारी के उर्दू हास्य-निबंधों और कहानीकार सैयद मुहम्मद अशरफ़ की उर्दू कहानियों के अंग्रेज़ी अनुवाद ( संयुक्त अनुवादक : आफ़ताब अहमद और मैट रीक ) कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित।

सम्प्रति: हिन्दी-उर्दू लैंग्वेज प्रोग्राम, दि डिपॉर्टमेंट ऑफ़ मिडिल ईस्टर्न, साउथ एशियन एंड अफ़्रीकन स्टडीज़, कोलम्बिया यूनिवर्सिटी, न्यूयॉर्क से सम्बद्ध।

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