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खुदडा नाई - सुनीता यादव

खुदडा नाई

सुबह जैसे ही घर के मुख्य दरवाजे की कुन्दी खटकी, तैसे ही हम छत पर जाकर दुबक गये। मां की आवाज तेजी से गूंजी, कहां है नीचे आकर बाल कटा ले। बडे मियां आये हैं।

बात उस समय की है जब उम्र लगभग 5 वर्ष रही होगी। तब घर के लगे बंधे नाई हुआ करते थे। इतवार का दिन लगा होता था । नाई हफ्ता या 15 दिन में आते थे। हम बच्चे बच्चे उन्हें खुदडा नाई बोलते थे। दरअसल उनके पूरे चेहरे पर मोटे मोटे मस्से उभरे हुऐ थे। मोटा चेहरा लटका हुआ मोटा होंठ देखकर डर लगता था। सामने आते ही आखं में आसूं आ जाते थे। पर बख्शीश का तो काम ही नहीं था। इतवार को बाल कटवाना अनिवार्य था। ऊपर से बाल काटने की वो दर्द भरी प्रक्रिया। कैंची ऐसी कि आधे बाल काटती थी, आधे उखाडती थी। दर्द में सर हिलाओ तो नाई और कस के पकड़ लेता था। कभी-कभी तो सर दोनों घुटनों में दबा लेता था। फिर शुरू होती थी कनौती बनाने की प्रक्रिया। पहले चमडे के टुकडे पर उस्तरा तीन बार इधर तीन बार उधर फिराया जाता था, फिर धार देखी जाती थी। फिर कान के पास जब उस्तरा चलता था बहुत दर्द करता था। पानी लगाकर बाल यूं ही खुरच दिये जाते थे। सर हिलाया तो नाई डांटता था।

बाल कटते ही जब छूटते थे, बडा सकून मिलता था। दूसरा इतवार आते ही फिकर चढ जाता था। मां ने अगर कह दिया, चल अगले इतवार को कटवा लेना। उस इतवार का तो आनन्द ही कुछ और होता था।

पर आज इतना समय बीत जाने के बाद भी खुदडा नाई याद आता है, मन में ना कोई छल कपट, सादगी भरा जीवन, हाथ में कैंची उस्तरा आदि औजारों की छोटी सी सन्दूकची। एक छोटी तौलिया। यही पूरी दुकान हुआ करती थी। प्यार अनमोल था, ना हिन्दू मुसलमान का कोई भेद। बस सबके घर जाकर पूछना, बाल काटना और जो दे दिया वही रख लेना। आज की तरह मोल भाव नहीं था।

खुदडा नाई आज के चिकने चेहरों के दोगलेपन से कहीं अधिक साफ नीयत वाला था।

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