होली विशेष रचना - होली का आध्यात्मिक एवं ऐतिहासिक स्वरूप और वर्तमान विकृतियां - पंकज कुमार शर्मा ‘प्रखर’

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रंगोत्सव - होली के पावन पर्व पर विशेष आलेख - होली का आध्यात्मिक एवं ऐतिहासिक स्वरूप और वर्तमान विकृतियां पंकज कुमार शर्मा ‘प्रखर’ लेखक एवं व...

रंगोत्सव - होली के पावन पर्व पर विशेष आलेख -

होली का आध्यात्मिक एवं ऐतिहासिक स्वरूप और वर्तमान विकृतियां

पंकज कुमार शर्मा ‘प्रखर’

लेखक एवं वरिष्ठ स्तंभकार

सुंदर नगर, कोटा,राजस्थान

होली एक ऐसा त्योहार जिसका स्मरण होते ही रंग-बिरंगे चेहरे और उन पर सजी शरारत से भरी मुस्कान यकायक हमारी स्मृति-पटल पर ताज़ा हो जाती है। मस्ती, मुस्कान और माधुर्य से भरा ये त्योहार सभी को आकर्षित करता है। इस त्योहार में क्या बूढ़े क्या बच्चे सभी रंगों से सराबोर नज़र आते हैं। युवाओं का हृदय उत्साह ओर उमंग से छलक रहा होता है और बासंती बयार की छुअन मन को तरोताजा कर जाती है। ब्रज के गीत राधा कृष्ण के प्रेम और ढोलक की थाप ब्रजभूमि की याद दिलाती है । इस त्योहार के पीछे अनेक ऐतिहासिक तथ्य छुपे हुए हैं जो हमें इस त्योहार के जड़मूल के विषय में ज्ञान उपलब्ध कराते हैं। आज का ये लेख होली के पवित्र त्योहार से संबंधित आध्यात्मिक और ऐतिहासिक जानकारी को केंद्र में रखकर लिखा गया है। पुराणों में इस त्योहार के अलग-अलग नाम मिलते है जैसे-वराह पुराण में इसे पटवास-विलासिनी कहा है। वैदिक काल में इस पर्व को ‘नवान्नेष्टि’ कहा गया है। इस दिन खेत के अधपके अन्न का हवन कर प्रसाद बांटने का विधान है। इस अन्न को होला कहा जाता है इसलिए इसे होलिकोत्सव के रूप में मनाया जाता था। मनु का जन्म भी इसी दिन का माना जाता है अत: इसे मन्वादि तिथि भी कहा जाता है।

इस त्योहार के आध्यात्मिक पक्ष की बात करें तो पुराणों में एक बहुत पुरानी सर्वविदित कथा आती है कहा जाता है कि एक शक्तिशाली राजा हिरण्यकश्यप था, वह खुद को भगवान मनाता था उसकी एक बहन होलिका के विषय में भी पर्याप्त जानकारी मिलती है उसी होलिका के नाम पर इस त्योहार को होली कहा गया है। हिरण्यकश्यप चाहता था कि हर कोई भगवान की तरह उसकी पूजा करे। क्योंकि हिरण्यकश्यप को ब्रह्मा जी से यह वरदान मिला था कि उसे न कोई दिन में मार सकता है ना ही रात में, उसे ना कोई मनुष्य मार सकता है ना ही कोई जानवर, उसकी मृत्यु न तो घर में होगी और न ही बाहर होगी, वो ना ही ज़मीन पर मरेगा ना ही आसमान में। इस वरदान के कारण हिरण्यकश्यप को अत्यधिक अभिमान हो गया और उसने घोषणा कर दी कि सभी लोग मेरी पूजा करेंगे भगवान की पूजा नहीं होगी।

परंतु भक्त प्रहलाद ने अपने पिता के वचनों का पालन नहीं किया और भगवान विष्णु की भक्ति में लगा रहा । जिससे हिरण्यकश्यप को क्रोध आ गया। हिरण्यकश्यप ने यह आदेश दिया कि प्रहलाद को पहाड से फ़ेंक दिया जाए परंतु प्रहलाद को कोई चोट नहीं लगी। राक्षस हिरण्यकश्यप ने प्रहलाद को कुंए में फ़िंकवाया परंतु उसे खरोच तक नहीं आई, बाद में हिरण्यकश्यप ने प्रहलाद को जहर दिया परंतु वो ज़हर शहद में बदल गया। विशालकाय हाथीयों को प्रहलाद के पीछे छोडा गया पर प्रहलाद को कोई हानि नहीं हुई।

अगली बार प्रहलाद के पिता ने उसे सांपों के कमरे में बंद कर दिया पर प्रहलाद जीवित वापस आ गया। अंत में हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका को बुलाया और उसे कहा कि तुम प्रहलाद को लेकर आग में बैठ जाओ क्योंकि होलिका को ब्रह्मा से एक विशेष वरदान स्वरूप वस्त्र (शॉल) मिला हुआ था, जिस पर अग्नि का प्रभाव निष्फल हो जाता था, अत: भाई की आज्ञा से होलिका प्रह्लाद को अग्नि में जलाने के उद्देश्य से उसे लेकर अग्नि कुंड में प्रवेश करती है परंतु कथा कहती है कि हवा के झोंके से वह शॉल प्रहलाद पर आ गिरता है और होलिका का शॉल हट जाता है। जिसके कारण प्रहलाद बच गया और होलिका जल गई।

इस घटना से भगवान विष्णु इतने आहत हुए कि उन्होंने एक ऐसा अवतार लिया जो ना तो इंसान था और ना ही जानवर वह अवतार आधा मनुष्य था और आधा शेर था इस नरसिंह अवतार ने हिरण्यकश्यप को संध्या काल के समय उसके घर की दहलीज पर मार गिराया और अपने भक्त कि रक्षा की हिरण्यकश्यप की मृत्यु से पूरा संसार आनंद से भर गया इसलिए हर वर्ष होलिका दहन होता है जो दर्शाता है कि बुराई हमेशा हारती है। होली को होलिका दहन के अगले दिन मनाया जाता है। होली मनाने का एक कारण यह भी है कि यह वसंत की शुरूआत का संदेश देती है। यह त्योहार नई ऊर्जा और नए जीवन महत्ता बताता है।

होलिका दहन के दिन एक पवित्र अग्नि जलाई जाती जिसमें सभी तरह की बुराई, अंहकार और नकारात्मकता को जलाया जाता है। अगले दिन हम अपने प्रियजनों को रंग लगाकर त्योहार की शुभकामनाएं देते हैं साथ ही नाच, गाने और स्वादिष्ट व्यंजनों के साथ इस पर्व का आनंद लेते हैं। सड़कों पर गुलाबी, पीला, हरा और लाल रंग बिखरा दिखाई देता है और लोग अपने दोस्तों और परिवारजनों को त्योहार की बधाई देते हैं।

ऐतिहासिक पक्ष - भारत के अनेक मुस्लिम कवियों ने अपनी रचनाओं में इस बात का उल्लेख किया है कि होलिकोत्सव केवल हिंदू ही नहीं मुसलमान भी मनाते हैं। बताया जाता है कि मुगलकाल में होली, ईद की तरह ही खुशी से मनाई जाती थी। मुगलकाल में होली खेले जाने के कई प्रमाण मिलते हैं।

अकबर का जोधाबाई के साथ और जहांगीर का नूरजहां के साथ होली खेलने का वर्णन मिलता है। कई चित्रों में इन्हें होली खेलते हुए दिखाया गया है।

वहीं शाहजहां के समय तक होली खेलने का मुगलिया अंदाज बदल गया था। बताया जाता है कि शाहजहां के समय में होली को ईद-ए-गुलाबी या आब-ए-पाशी (रंगों की बौछार) कहा जाता थ। जबकि अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर के बारे में प्रसिद्ध है कि होली पर उनके मंत्री उन्हें रंग लगाने जाया करते थे। मुगलकाल में फूलों से रंग तैयार किए जाते थे और गुलाबजल, केवड़ा जैसे इत्रों की सुगंध वाले फव्वारे निरंतर चलते रहते थे।

तुजुक-ए-जहांगीर में जहांगीर (1569-1627) ने लिखा है:

हिंदुओं का जो होली का दिन है, उसे वे साल का आखिरी दिन मानते हैं। इसके एक दिन पहले शाम को हर गली-कूचे में होली जलाई जाती है। दिन में वे एक दूसरे के सिर और चेहरे पर अबीर लगाते हैं और खूब हंगामा करते हैं। इसके बाद वे नहाते हैं, नए कपड़े पहनते हैं और खेतों और बाग-बगीचों में जाते हैं। हिंदुओं में मृतकों को जलाने की परंपरा है, तो साल के आखिरी दिन आग जलाना पुराने साल को आखिरी विदा देने का प्रतीक है।

बहादुर शाह जफर (1775-1862) की भी होली के जश्न में उत्साह के साथ भागीदारी होती थी। बादशाह का आम जनता के साथ इस मौके पर खूब मिलना-जुलना होता। औरंगजेब के अपवाद को छोड़कर मुगल काल में होलिकोत्सव के प्रमाण मिलते हैं।

जहां होलिकोत्सव का इतना पवित्र और महत्वपूर्ण इतिहास रहा है वहीं आज कुछ लोगों ने इसे फूहड़ता और ओछेपन का प्रतीक बना दिया है। इस त्योहार के नाम पर इतनी गंदगी फैलाई जा रही है कि जिससे इसका महत्व धूमिल होता चला जा रहा है आज लोग होली के त्योहार के नाम पर शराब पीकर इस सुंदर पर्व कि छवि खराब करते हैं। कुछ लोग बदतमीजी से व्यवहार करते हैं तथा नशा ओर जुआ जैसी विकृतियाँ इस पर्व का हिस्सा बन गई हैं । इस पर्व पर हानिकारक रंगो का प्रयोग किया जा रहा है जो त्वचा संबंधी रोगों को बढ़ावा मिल रहा है। इसके अलावा कई लोग जश्न के नाम पर लोगों को परेशान करते हैं। ऐसे में हमें इस प्रकार के लोगों से दूर रहना चाहिए।

अंत में बस इतना ही कि हमें अपनी सेहत और त्वचा का ध्यान रख कर होली खेलनी चाहिए। अपनी आँखों का ध्यान रखना चाहिए। इस त्योहार की सादगी और शालीनता का ध्यान रखते हुए इस खुशनुमा त्योहार को बेहद प्यार से मनाएँ और मिठाइयाँ बांटकर खुशियाँ फैलाएं।

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रचनाकार: होली विशेष रचना - होली का आध्यात्मिक एवं ऐतिहासिक स्वरूप और वर्तमान विकृतियां - पंकज कुमार शर्मा ‘प्रखर’
होली विशेष रचना - होली का आध्यात्मिक एवं ऐतिहासिक स्वरूप और वर्तमान विकृतियां - पंकज कुमार शर्मा ‘प्रखर’
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