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व्यंग्य - जातीय गंध - हनुमान मुक्त

जातीय गंध

जाति न पूछो साधु की,

पूछ लीजिए ज्ञान।

मोल करो तलवार का,

पड़ी रहने दो म्यान ।।

मैं शुरू से ही कबीर जी का प्रशंसक रहा हूं ।उनके इस ज्ञान की बदौलत ही मैंने कभी किसी साधु की जाति पर ध्यान नहीं दिया और ना ही तलवार  की म्यान पर।

मेरी निगाह हमेशा मछली की आंख पर ही रही। आस-पास क्या हो रहा है ,मैंने उसे जानने का प्रयास तक नहीं किया ।

अब तक मैं सोचता था कि सभी मनुष्य समान है। सभी ईश्वर की संतान है ।किसी में किसी प्रकार का कोई भेद नहीं है लेकिन भारतीय लोकतंत्र की संजीवनी  चुनावों ने मेरे इस अल्प ज्ञान की सारी कलई खोल दी।

अब मैं समझने लगा हूं कि सभी मनुष्य समान नहीं है ।सभी के ईश्वर भी समान नहीं है । सभी अलग-अलग ईश्वर की संतान हैं। इसी कारण सभी में आपस में किसी न किसी प्रकार का कोई भेद अवश्य है ।

प्रत्येक मनुष्य का  जन्म किसी जाति विशेष में होता है। उसके जन्म लेते ही उससे उस जाति विशेष की विशेष प्रकार की गंध निकलनी शुरू हो जाती है ।उसकी गंध सूंघते ही उसकी जाति के लोग उसके इर्द-गिर्द मंडराना शुरू कर देते हैं ।उस गंध विशेष के लोगों को अपनी गंध में ही सर्वाधिक मिठास मिलती है। वे सिर्फ अपनी गंध को ही चाहते हैं। उसे पहचानते हैं ।उसे ही अपना लीडर बनाना चाहते हैं।

चुनावों के मौसम में मनुष्य जाति की  इस घ्राणशक्ति को पहचान कर ही राजनीति के धुरंधरों ने जितने भी साधु महात्मा अपनी जाति छिपाकर  इधर उधर घूम कर अलग अलग प्रकार की गंध फैला रहे थे । उनको कैप्चर करना शुरू कर दिया।

बिना किसी गंध के, लेवल के, गंध फैला कर वे लोगों को भ्रमित कर रहे थे। अलग-अलग गंध वाले लोग अलग-अलग गंध का आस्वादन कर रहे थे। हर कोई उसे अपनी गंध वाला मानकर अपना मान रहा था। वे लोगों को दिग्भ्रमित कर रहे थे ।

जबकि वास्तविकता यह थी कि उनके द्वारा जातीय लेवल नहीं लगा होने के कारण वे गंध हीन  थे ‌जो भी उनके पास बैठता । उसे अपनी ही गंध का एहसास होता। किसी को उनसे किसी प्रकार का कोई विशेष लगाव या दुराव नहीं था ।सभी उन्हें अपना मान रहे थे।

राजनीति के धुरंधरों को यह बात हजम नहीं हो रही थी। वे नहीं चाहते थे कि वे बिना किसी लेवल के घूम कर इस प्रकार से लोगों को भ्रमित करें। जबकि उस क्षेत्र विशेष में उनकी जाति के लोगों की बहुतायत है ।

उनकी जाति के लोग उनसे अभी ज्यादा प्रभावित नहीं है। प्रभावित वे हो रहे हैं जो उनकी जाति के नहीं है। उनकी विशेष योग्यता गंधहीन होना ,उन्हें रास नहीं आ रहा थी।

वे चाहते थे कि वे अपनी जाति की गंध बिखेर कर अपनी जाति के लोगों को अपनी ओर आकर्षित करें।

*जातीय गंध में जितनी आकर्षण* *क्षमता होती है ।वह कस्तूरी की गंध तक  में नहीं होती। अपनी जाति का व्यक्ति* सात समंदर पार भी कोई पराक्रम कर लेता है तो दूर बैठे जातीय बंधुओं का सीना गर्व से फूल कर कुप्पा हो जाता

  है । वे वहीं बैठे बैठे उसके शौर्य पर  सीना तान कर चलना शुरू कर देते हैं । जातीय गंध से उनकी नाक फूल जाती है ।

यह  गंध बहुत शक्तिशाली होती है ।यह इतनी प्रभावी होती है कि अपने पड़ोस में रहने वाले रात दिन काम करने वाले विजातीय बंधु से उन्हें दुर्गंध आने लगती है। वे उसे एक झटके में अलग कर देते हैं ।

चाहे जातीय बंधु आप से कोई अपील करें या नहीं करें। लेकिन उनके मन की बात को, उनके अच्छे बुरे को ये बहुत अच्छी तरह समझ लेते हैं। पहचान लेते हैं।

भारतवर्ष में जातीय गंध को जितनी खाद, पानी, हवा दी जाती है उतनी अन्यत्र नहीं दी जाती। इसी का परिणाम है कि यहां जातीय गंध की खेती प्रभावशाली ढंग से बढ़ती जा रही है। इसकी खेती जिस गति से बढ़ रही है। इससे यह अंदाजा लगाया जा रहा है कि अन्य देशों से भी लोग इसकी फसल बढ़ाने के तरीके सीखने के लिए निकट भविष्य में यहां आने लगेगें।

जिन जिन तकनीको  का  इस्तेमाल यहां की उर्वरा शक्ति बढ़ाने में हो रहा है ।उसका पेटेंट कराने पर भी विचार किया जा रहा है। निकट भविष्य में विदेशी मुद्रा प्राप्त करने में यह पेटेंट उपयोगी साबित होगा। ऐसा  लोगों का अनुमान है। दूरदृष्टाओं ने गंधहीन लोगों से यह स्पष्ट कह दिया है कि वे अपनी गंध का अर्थात जाति का स्पष्ट उल्लेख करें ।जिससे लोगों को उनकी गंध पहचानने में आसानी हो ।

कबीर दास जी के इस दोहे

जाति न पूछो साधु की,

पूछ लीजिए ज्ञान.....।

पर भी पाबंदी लगाने पर विचार किया जा रहा है ।वर्तमान परिपेक्ष में यह दोहा लोगों को जातीय गंध से दूर रहने का उपदेश देकर समाज के जातीय ताने-बाने को चोट पहुंचा रहा है ।

कबीर दास जी के समय भारत में लोकतंत्र नहीं था। लोकतंत्र में जाति का कितना महत्व होता है उसका उन्हें कोई अंदाजा नहीं था। कुछ लोग जो उनकी उस समय कही गई बातों को आज भी सही मानते हुए उन पर चलने का प्रयास कर रहे हैं ।वे एक तरह से भारतीय लोकतंत्र को चोट पहुंचाने जैसा असंवैधानिक कार्य कर रहे हैं। इसलिए ऐसे लोगों से पुरजोर अपील है कि वे भारतीय लोकतंत्र को चोट नहीं पहुंचाऐं।

अपील का असर काफी कुछ हो रहा है। प्रत्येक चुनाव में कबीर के प्रशंसक उन्हें छोड़कर जातीय गंध अपना रहे हैं।

लोगों का जातीय ज्ञान बढ़ता जा रहा है। कौन सा गोत्र किस जाति का है। यह किस जाति की पैदाइश है। उनकी पत्नी किस जाति की है ।लड़के ने किस जाति की लड़की से विवाह किया है। लड़की किस जाति के लड़के से ब्याही है।

सब कुछ अखबारों में खुलेआम छप रहा  है। पहले जिन बातों को बताने में शर्म महसूस करते थे। आज उन्हें बताने में गर्व महसूस हो रहा है। उन्हें  खुलेआम डंके की चोट पर बताया जा रहा है। जातीय  गंध  कोरोना वायरस की तरह बढ़ती ही जा रही है यह गंध , सुगंध  है या दुर्गंध इसका पता नहीं चल पा रहा है। लोगों ने हाथों में रुमाल लिए हुए हैं। जातीय बंधु मिलते ही लोग खुश होते हुए खुशबू का आनंद लेते नजर आ रहे हैं। वहीं विजातीय बंधु मिलते ही उन का रुमाल नाक पर पहुंच जाता है।

मैंने भी प्रत्येक व्यक्ति की जाति पर ध्यान देना शुरू कर दिया है। ज्ञान को पूछना बिल्कुल बंद कर दिया है। अपनी जाति के लोग कैसे भी हो ज्ञानी अज्ञानी। अपने अपने ही होते हैं ।उन से निकलने वाली गंध अपनी ही होती है।

कबीर दास जी के दोहे को मैंने बदल लिया है ।

"जाति पूछो तुम साधु की ,

पूछ  ना तुम ज्ञान।

रहने दो तलवार को,

मोल करो तुम म्यान।।


#हनुमान मुक्त

93 कांति नगर

गंगापुर सिटी

जिला ( सवाई माधोपुर) राजस्थान

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