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साम्प्रदायिकता:राष्ट्रीय एकता में बाधक। - डॉ एस एन वर्मा

डॉ एस एन वर्मा

वाराणसी

भारत की राष्ट्रीय एकता के मार्ग में साम्प्रदायिकता बहुत बड़ी बाधा पैदा करती रही है। हाल में राजधानी दिल्ली के उत्तर पूर्वी भाग में घटित दंगों ने साम्प्रदायिकता के दंश को हरा कर दिया है। भारत में अनेक विदेशी आये लेकिन उनका मेल मिलाप भारतीय संस्कृति से हो गया। कुछ ऐसे भी रहे जिनका सामाजिक एवं धार्मिक अलगाव बना रहा। इन समूहों के साथ अनेक कारणों से तनाव बना रहा । जिससे साम्प्रदायिकता की भावना का विकास होना स्वाभाविक था। अतः एकता का आवरण समय समय पर विदीर्ण होता दिखा। इस लेख में साम्प्रदायिकता के विभिन्न पहलुओं पर इतिहास व समाज सम्मत विमर्श किया गया है।

'सामाजिक विघटन और भारत' नामक पुस्तक में प्रोफेसर के डी भट्ट ने सम्प्रदाय को परिभाषित करते हुए लिखा है कि'मेरा सम्प्रदाय,मेरा पंथ,मेरा मत ही सबसे अच्छा है। उसी का महत्त्व सर्वोपरि होना चाहिए। मेरे सम्प्रदाय की ही तूती बोलनी चाहिए। उसी की सत्ता मानी जानी चाहिए। अन्य सम्प्रदाय हेय हैं। उन्हें या तो समाप्त कर दिया जाना चाहिए,या यदि वे रहे भी तो मेरे मातहत होकर रहें। मेरे आदेशों का सतत पालन करें। मेरी मर्जी पर आश्रित रहें। 'वे आगे लिखते हैं कि 'अपने धार्मिक। सम्प्रदाय से भिन्न अन्य सम्प्रदाय अथवा सम्प्रदायों के प्रति उदासीनता ,उपेक्षा,दयादृष्टि,घृणा,विरोध और आक्रमण की भावना ही साम्प्रदायिकता है। इसका आधार वह वास्तविकता या काल्पनिक भय की आशंका है कि उक्त सम्प्रदाय हमारे अपने सम्प्रदाय और संस्कृति को नष्ट कर देने या हमारे जान माल की क्षति पहुंचाने के लिए कटिबद्ध है। जबकि 'द रैंडम हाउस डिक्शनरी ऑफ इंग्लिश लैंग्वेज' के अनुसार साम्प्रदायिकता अपने ही जातीय समूह के प्रति न कि समग्र समाज के प्रति तीव्र निष्ठा की भावना है। 'समाजशास्त्री स्मिथ कहते हैं कि साम्प्रदायिक व्यक्ति या समूह वह है जो अपने धार्मिक या भाषा भाषी समूह को एक ऐसी राजनीतिक तथा सामाजिक इकाई के रूप में देखता है जिसके हित अन्य समूहों से पृथक होते हैं और जो अक्सर उनके विरोधी भी हो सकते हैं। इन सभी परिभाषाओं से यह स्पष्ट होता है कि साम्प्रदायिकता का संबंध धार्मिक समूहों से है। सम्प्रदाय अपने श्रेष्ठ होने का भाव रखते हैं। साम्प्रदायिकता दूसरे धर्म ,भाषा ,संस्कृति के प्रति विरोध भाव रखती है। एक सम्प्रदाय के लोगों में दूसरे के प्रति वास्तविक या काल्पनिक भय होता है। इन सभी के समाहार से संकीर्ण मनोवृत्ति का जन्म होता है जब यह राजनीतिक संरक्षण पाने लगती है तो इसका रूप भयावह हो जाता है।

साम्प्रदायिक तनाव अनायास उत्पन्न नहीं होते हैं लेकिन कभी कारण से भी परिपोषित नहीं होते। कभी गाय की हत्या की घटना या केवल खबर कि गाय की हत्या हो गयी है ,तनाव को जन्म दे देती है। मस्जिद के आगे गाने और बैंड बजाने की घटना हो या,मुस्लिम को रंग लगाने के प्रयास से भी लोग समूह में हिंसा के लिए निकल पड़ते हैं। ताजिये के रास्ते या फिर प्रतिमा विसर्जन के मार्ग पर पथराव के कारण स्थिति बिगड़ जाती है। किसी समूह के देश विरोधी होने या फिर किसी देश विशेष के क्रिकेट मैच जीतने की खुशियां मनाने को लेकर भी तनाव फैल जाता है। अधिक संतान,आर्थिक संसाधन का दोहन, चोरी, देश के ऊपर बोझ जैसे कारण भी अनायास ही बना दिये जाते है। संकीर्णसोच,जातिवाद,भाषावाद,क्षेत्रवाद, पक्षपात पूर्ण व्यवहार भी अनेक बार कारण बन जाते हैं। ध्यान से सोचकर सोचने से ज्ञात होता है कि ये सभी कारण बहुत महत्त्वपूर्ण नहीं है। दंगों के सामाजिक और ऐतिहासिक अध्ययन अलग ही तस्वीरें दिखाते हैं। गलत खबरें, घृणा फैलाने वाले भाषण, प्रशासन की लापरवाही ,समाचार पत्रों द्वारा उत्तेजना का प्रसार, राजनीतिक रंग आदि ही दंगे के लिए जिम्मेदार होते हैं। इनमें किसी सम्प्रदाय की निर्णायक विजय जैसा भी कुछ नहीं होता। अतः क्षणिक स्वार्थ की पूर्ति के लिए खूनी तांडव के अतिरिक्त भी हासिल नहीं होता है।

2)

जब भी साम्प्रदायिकता की जड़ों को इतिहास में खोजा जाता है तो यह कहा जाता है कि भारत मे साम्प्रदायिकता के उदय के कारण मुस्लिम आगमन से जुड़े हैं। पहले आने वाले सभी विदेशियों ने यहां की संस्कृति को अपना लिया लेकिन मुस्लिम नहीं अपना सके । उन्होंने जबरन शासन किया ,धर्म परिवर्तन कराया। औरंगजेब आदि ने कठोर व्यवहार किया। अब अपना शासन आया है इसलिए हमें उनसे बदला लेना चाहिए। यह बात आम जनता को अपील करती है। लेकिन क्या यह बात इतनी सरल है कि सब हिन्दू उस समय हार गए थे। मुस्लिम कितनी संख्या में आये थे और कितने लोग यहां के थे जिन्होंने इस्लाम स्वीकार कर लिया था। क्या उस समय कथित हिन्दू संगठित थे या कोई संयुक्त प्रयास कर मुस्लिम आक्रमण रोक सकते थे। दिल्ली के सुल्तानों, व मुग़ल शासकों की लगभग 700 वर्ष की राज्य गाथा कितनी निरापद रही। किसी सामूहिक प्रतिरोध की बात अब तक ज्ञात नहीं हो सकी है। साम्प्रदायिकता की तनिक भावना रही होती तो राजपूत जिन्हें पारम्परिक रूप से सामाजिक शासक माना जाता था,वे मुस्लिम शासकों की तरफ से लड़ने न जाते। राणा प्रताप और शिवाजी जैसे हिन्दू प्रतीक मुस्लिम सेनापति न रखते। इनकी सेनाएं किसी मुस्लिम सैनिक को जगह न देतीं। मुस्लिम सत्ताएं आपस में ही संघर्ष न करती। इस वास्तविकता से परिचित हुए बिना इतिहास में हुए अन्याय का बदला लेने वाली मानसिकता का गुण दोष विवेचन नहीं किया जा सकता है।

भारत मे अंग्रेजी राज्य तब स्थापित हुआ जब मुस्लिम सत्ता बिखराव पर थी। इस समय भी कोई ऐसा प्रयास नहीं दिखता कि भारत की प्राचीन संस्कृति के ध्वज वाहक अपना राज्य स्थापित कर सकें। अंग्रेज ,मुस्लिमों को हराकर सत्ता में आये इसलिये उन्हें प्रतिद्वंद्वी नम्बर एक मानते रहे। लगभग सौ वर्ष वाद अंग्रेजी सत्ता का विरोध भारत की जनता ने किया। इसमें कोई साम्प्रदायिक विभेद नहीं था। उस समय तक कोई सम्प्रदायिक दंगा जैसा प्रत्यय भी नहीं दिखता। मुस्लिम अपनी बदहाली को दूर करने की कोशिश कर रहे थे। अल्ताफ हुसैन की 'मुसद्दस ए हाली ' इस पश्चाताप और पनुरुद्धार की अपील का प्रमाण है। हिन्दू जनता प्राचीन गौरव का गान 'हम कौन थे क्या हो गए 'कहकर कर रही थी। राष्ट्रीय भावना की उर्वर पृष्ठभूमि में साम्प्रदायिक बीज को लगा देना आसान था। अंग्रेजों ने यही किया। 1906 में बनी मुस्लिम लीग और 1947 तक विभाजन की कहानी कैसे वास्तविक हो गयी। विभाजन को रोकने का प्रयास क्या सफ़ल हो सकता था। सत्ता में बैठे लोग या आजाद देश के लोग कितना इस दिशा में आगे बढ़ सके। गांधी के अतिरिक्त और कोई क्यों नहीं दिखता। उनमें ही यह साहस था कि भारत में मुस्लिम और पाकिस्तान में हिन्दू की बात कर सकते थे। कुल मिलाकर बात यह कि इतिहास में साम्प्रदायिक तनाव की खोज और उसपर अमल की बात अनैतिक और अनैतिहासिक है।

इसी तरह सांस्कृतिक भिन्नता को भी साम्प्रदायिकता का गलत तरीके से कारण बता दिया जाता है। दोनों समूहों में रहन -सहन ,खान- पान,रीति रिवाज,पहनावा आदि के आधार पर भी विभेद का गान किया जाता है। मुस्लिम नहाते नहीं, खाना में मांस खाने को पसंद करते हैं, बात बात पर तलाक दे देते हैं,अधिक संतान पैदा करते है,देवी देवताओं को नहीं मानते हैं आदि आदि। इन सभी से मनोवैज्ञानिक अलगाव होना स्वाभाविक है। यह भी कहा जाता है कि मुस्लिम मनोवैज्ञानिक रूप से भारतीय नहीं है उनमें राष्ट्र प्रेम नहीं होता है वे पाकिस्तान के क्रिकेट जीतने पर खुशी मनाते हैं। ऊपर से देखने पर बात सही दिखती है लेकिन थोड़ा विचार करें तो ज्ञात होता है कि यह तर्क भी अनुचित है। जब हम यह बात सुनते हैं कि मुस्लिम अलग संस्कृति का पालन करते हैं तो यह बात ध्यान में लानी चाहिये कि क्या हिन्दू समुदाय रहन सहन,खानपान ,रीति रिवाज पहनावा आदि के आधार पर एक समान संस्कृति का पालन करता है। शायद इसका उत्तर नकारात्मक ही होता है। भारतीय संस्कृति के पहचान वाक्य में ही विविधता में एकता की बात की जाती है। उत्तर से लेकर दक्षिण तक और पूर्व से पश्चिम तक अनेक रीति रिवाज ,वेष भूषा और परमपरायें है। अनेक धार्मिक विश्वास है। अनेक हिन्दू समुदाय मांस भक्षण भी करते है। हां संतान उत्पत्ति के मामले में भी अनेक कारण है। दो संतान पर कोई राष्ट्रीय नीति नहीं है जिसे हिन्दू समुदाय मानता हो और मुस्लिम समुदाय नहीं। पुत्र मोह में अनेक संतान,अधिक संतान बुढ़ापे में आराम का सिद्धांत क्या बहुसंख्यक हिन्दू समुदाय में प्रचलित नहीं है। रही बात राष्ट्र प्रेम की तो राष्ट्र प्रेम की परिभाषा के तहत बलिदान सबसे बड़ी कसौटी है। 1857 से1947 तक शहीदों की संख्या में मुस्लिम भागीदारी इसका सबसे बड़ा सुबूत है। पाकिस्तान के जीतने पर खुशी की बात भी अर्धसत्य इसलिये है कि सभी मुस्लिम इस तरह का आचरण करते नहीं दिखते हैं। दूसरी बात कि पाकिस्तान और भारत कभी एक थे। अनेक मुस्लिम परिवार अभी भी वैवाहिक संबंधों से पाक से जुड़े हैं। अनेक हिन्दू समुदाय यह राजनीतिक विचारधारा रखते हैं कि आजादी के पूर्व वाला भारत बनाने का प्रयास किया जाना चाहिए। फिर भी कोई पाकिस्तान की जय बोले तो यह कानून व्यवस्था का मामला है। खेल प्रेमी क्या इंग्लैंड न्यूजीलैंड के मैच को क्या साधु बनकर देखते है। किसी न किसी देश के साथ मनोवैज्ञानिक रूप से जुड़ते और जय बोलते ही हैं। सच बात कि मुस्लिम समुदाय किसी और मुस्लिम देश की विजय पर हर्ष नहीं प्रकट करता। यह बात सभी स्वीकार भी करते हैं। हिन्दू जनता किसी अन्य देश के साथ होने वाले क्रिकेट मैच में हार जीत को इतने गहरे से नहीं लेती। यह मनोविज्ञान कहाँ से जन्म लेता है। इस पर भी विचार की जरूरत है।

तीसरा प्रमुख पक्ष राजनीतिक दलों स्वार्थ है जो बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक विभाजन के आधार पर सत्ता पर अधिकार चाहता है। धर्मनिरपेक्ष कानून का दुरुपयोग, निहित स्वार्थ,असामाजिक तत्त्वों को संरक्षण,तुष्टीकरण की नीति आदि अनेक तत्त्व है जो विभेद को बढ़ाते है। हमारे देश के सांप्रदायिक संगठनों और मंदिर मस्जिद विवाद ने आग में घी का काम किया है। भारत में अंग्रेज़ी सत्ता ने जिस विभाजन की नीति पर चलकर अपने शासन की बनाये रखने की कोशिश की थी

और जाते जाते विभाजन कर दिया था, उसी आधार पर बाद के राजनीतिक दलों ने अपनी सत्ता स्थापित करनी चाही। अल्पसंख्यक साम्प्रदायिकता बनाम बहुसंख्यक साम्प्रदायिकता का दंश देश अभी भी झेल रहा है। मुस्लिमों के आर्थिक पिछड़ेपन अशिक्षा आदि से साम्प्रदायिकता को मजबूती मिली। न्यायमूर्ति सच्चर समिति के अध्ययन से यह बात साफ थी कि मुस्लिम समुदाय की प्रगति के लिये विशेष उपाय किया जाना चाहिए। लेकिन यह रिपोर्ट आते ही बहुसंख्यक जनता की राजनीति को अलग मोड़ मिल गया। जिसका एक पहलू बहुसंख्यक समुदाय के निम्न समूहों से जुड़ा था तो दूसरा मुस्लिम समूह को दोयम दर्जे से ऊपर उठाने से जुड़ा। इस घोषित लक्ष्य से सत्ता की चाबी मध्य मार्ग से निकल दक्षिण पंथी खेमे में आ गयी। तात्पर्य यह कि साम्प्रदायिकता का आवरण ऊपर से जितना एक रेखीय है भीतर से उतना नहीं है।

3)

साप्रदायिक राजनीति के दुष्प्रभाव का जितना आकलन अध्येताओं ने किया है उन सभी में महाविनाश को ही रेखांकित किया गया है। असगर अली, वी एन राय आदि की पुस्तकें साम्प्रदायिकता के जमीनी सरोकार के साथ मारे गये लोंगो की संख्या तक बयां करती है। 'कोई भी दंगा 24 घंटे से अधिक तक फैला नहीं रह सकता यदि इसे सरकारी समर्थन नहीं होता"। ''दंगे स्वतः स्फूर्त नहीं होते । ' जैसे कथन इन्हीं अध्ययनों के निष्कर्ष है। साम्प्रदायिकता हमेशा से राष्ट्रीय एकता के ताने बाने को कमजोर करती है। विभाजन, घृणा, अविश्वास, तनाव ,संघर्ष आदि से आपसी सहयोग की भावना का ह्रास होता है। इससे अन्ततः सम्पूर्ण देश का राष्ट्रीय चरित्र नहीं बन पाया।

साम्प्रदायिकता ने समय समय पर राजनीतिक अस्थिरता को जन्म दिया है। लोगों ने अपनी ही सरकार के प्रति अविश्वास प्रकट किया है। अलगाव की भावनाओं से प्रशासन भी अछूता नहीं रह सका। वर्षों बाद आये मेरठ दंगे के फैसले में पुलिस को ही नरसंहार के लिये उत्तरदायी ठहराया गया है। कार्यपालिका और न्यायपालिका के प्रति अविश्वास बढ़ने से लोगों के जीवन खतरे में आना स्वाभाविक है। संवैधानिक संस्थाओं के प्रति अवमानना भाव से जंगल राज जैसा वातावरण तैयार हो जाना भी शुभ संकेत नहीं है। ऐसे में असामाजिक तत्त्वों को बढ़ावा मिलता है प्रशासन की लापरवाही का वे लाभ उठाते है। व्यक्तिगत दुश्मन को प्रताड़ित करते है। लूटमार करने वालों को उचित व अनुकूल अवसर मिल जाता है।

दंगों का आर्थिक पहलू सबसे ज्यादा प्रभाव डालता है। मकान ,दुकान, सरकारी कार्यालय, स्कूल, रेल,डाकतार ,बस आदि को अबतक सबसे अधिक टारगेट किया गया जिससे अरबों का नुकसान हुआ। इससे आर्थिक विकास अवरुद्ध हुआ है। कारखानों और उद्योगों पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। पूंजी के विनाश के साथ उत्पादन भी अवरुद्ध हो जाता है। निवेशक ऐसी जगह पर पूंजी निवेश के तैयार नहीं होते। लिहाजा गरीबी का दुष्चक्र चलने लगता है जिसका शिकार आम आदमी होता है। रोजगार की कमी से रोजमर्रा का जीवन कठिन हो जाता है। परिणामस्वरूप दूसरी तरह की सामाजिक विघटनात्मक गतिविधियां आरम्भ हो जाती हैं। अतीत के सामाजिक और सांस्कृतिक एकता के प्रयास मिट्टी में मिल जाते हैं। समाज में पुनः शंका,भय और घृणा का वातावरण तैयार हो जाता है। कोई एक भी बिंदु नहीं दिखता जिसे अच्छा कहा जा सके। न तो किसी की जीत दिखती है और न किसी की हार। एक करुण टीस भर बचती है जिसे हर कोई जल्द भूल जाना चाहता है।

एक स्थान के साम्प्रदायिक तनाव दूसरे स्थानों और देशों को भी विपरीत ढंग से प्रभावित करते हैं। भारत के साम्प्रदायिक तनाव पड़ोसी देशों के सामाजिक ताने बाने को छिन्न भिन्न करने लगते हैं। वहाँ भी अल्पसंख्यक लोग प्रताड़ित किये जाने लगते हैं। उन्हें जन धन की हानि उठानी पड़ती है। पड़ोसी देशों का सामुदायिक जीवन दूषित हो जाता है।

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भारत में साम्प्रदायिकता की समस्याओं की सुलझाने के लिये समय समय पर प्रयास किये जाते रहे हैं। सबसे पहले प्रयास के रूप में राष्ट्रीय एकता परिषद का गठन किया गया। 16 अक्टूबर 1969 को दिल्ली में हुई इस संगठन की बैठक सभी राजनीतिक दलों ने जन साधारण में साम्प्रदायिक सद्भाव जागृत करने का संकल्प व्यक्त किया। शिक्षा के व्यापक प्रसार पर बल दिया। इस बैठक में प्रसासनिक इकाईयों को कठोर कदम उठाने का निर्देश दिया गया। साथ ही अल्पसंख्यक जनता की समस्याओं के निराकरण पर विशेष ध्यान देने की बात कही गयी। एक वर्ष पूर्व हुए मुख्यमंत्री सम्मेलन में भी इसी तरह के सुझाव दिए गए थे। सम्प्रदाय की राजनीति ने सरकार को बहुत अधिक सफलता नहीं दिलाई। अतः यह प्रयास दूसरी संस्थाओं द्वारा किया जाना आरम्भ हुआ। साम्प्रदायिकता की समस्या को हल करने के लिये निम्नलिखित सुझाव दिये जा सकते हैं।

1-प्रजातांत्रिक मूल्यों के आधार पर प्रत्येक व्यक्ति के महत्व को मान्यता दी जाय। विज्ञान और प्रौद्योगिकी के मूल्यों को पूर्णतया स्वीकार किया जाय।

2-देश की सम्पूर्ण जनसंख्या के लिये सामाजिक सुरक्षा की व्यवस्था की जाय।

3-राष्ट्रीय आय और साधनों को इस प्रकार वितरित किया जाय जिससे अधिक से अधिक लोगों की अधिक से अधिक आवश्यकताओं को पूर्ण किया जा सके।

4-किसी भी दल या संगठन को धार्मिक आधार पर घृणा और वैमनस्य फैलाने से कठोरता पूर्वक रोका जाय।

5-ऐसे शैक्षिक पाठ्यक्रम तैयार किए जाएं जो आपसी सद्भाव,मेलजोल और एकता की भावना को बढ़ावा दें।

6-प्रशासनिक शिथिलता को समाप्त कर साम्प्रदायिकता फैलाने वालों को कठोर से कठोर सजा दी जाय। संभव हो तो प्रशासन और न्यायपालिका को राजनीतिक हस्तक्षेप से दूर रखा जाय।

7-सहिष्णुता को केंद्रीय भाव मानकर राष्ट्रीय आयोजन किया जाय। विभिन्न समूहों के त्योहारों और उत्सवों को ओपन पार्टिसिपेसन के साथ आयोजित किया जाय ताकि लोग एक दूसरे को समझ सकें।

8-रेडियो, टेलीविजन, पत्र पत्रिकाओं आदि के माध्यम से साम्प्रदायिक एकता और सदभाव का प्रचार किया जाय।

9-स्त्रियां अधिक संवेदनशील होती है अतः उन्हें इस महान दायित्व के लिये आगे किया जाय।

10-अल्पसंख्यक जनता को मुख्य धारा में लाने के लिये शिक्षा और रोजगार के अवसर प्रदान किये जायँ। क्रमबद्ध तरीके से समान सामाजिक कानून निर्मित किए जाएं।

11-सार्वजनिक स्थलों पर धर्म विशेष को अधिक महत्त्व न दिया जाय। सहजीवन व्यतीत करने पर जोर दिया जाय ताकि लोग दूसरे की अच्छाईयों को भी आत्मसात कर सकें।

12- शांति सेना का गठन भी एक उपाय हो सकता है। यह शांति काल में एकता और सौहार्द स्थापित करे परन्तु अशांति के समय निवारक शक्ति के रूप में कार्य कर सके।

13-ऐसा नेतृत्त्व का विकास किया जाय जो सही और गलत में स्पष्ट भेद की दृष्टि रख सके। हिंदुओं के बीच मुस्लिम के लिए और मुस्लिमों के बीच हिन्दू के लिए गांधी की तरह अपनी बात दृढ़ता से रख सके।

साम्प्रदायिकता के निवारण हेतु व्यक्तियों का समाजीकरण,समूहों का राष्ट्रीयकरण और दलों का निर्मलीकरण आवश्यक है। देश के नागरिकों में नागरिकता बोध लाए /आए बिना समृद्ध और श्रेष्ठ भारत का सपना पूर्ण होने में संदेह है। अस्तु।

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