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नाटक लेखन पुरस्कार आयोजन 2020 - प्रविष्टि क्र. 20 - मेरी फसल - विशाल श्रीवास्तव

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प्रविष्टि क्र. 20 - मेरी फसल

विशाल श्रीवास्तव

एकांकी

-मेरी फसल


पात्र: --

गरीब किसान,

किसान की पत्नी,

किसान का बेटा,

साहूकार


स्थान: --एक छोटा गाँव

समय: --नवम्बर से मार्च


( साहूकार चौपाल में अपनी खाट पर बैठा है)

गरीब किसान: (पहुँच कर साहूकार के पैर छूकर) महाराज! मैं आपसे कुछ धन उधार लेने आया हूँ।

साहूकार: (हँसते हुए)क्यों इसमें क्या बात है मेरे पास तो सभी गाँव वाले ॠण लेने ही आते हैं।

गरीब किसान: (हिचकिचाते हुए) तो आप मुझे ॠण दे देंगे।

साहूकार: कितना चाहिए ले जाओ लेकिन तुम दोगे कहाँ से

गरीब किसान: महाराज ! मैं अपनी फसल कटने के बाद आपका ॠण चुका दूँगा।


साहूकार: ( एक कागज और पैड लेकर आया और उस पर किसान का अंगूठा लगवा कर) इस कागज पर लिखा है कि मैं अपनी फसल कटने के बाद आपका ॠण चुका दूँगा और यदि मैं आपका ॠण चुका न सका तो मैं और मेरा परिवार आपकी आजीवन गुलामी करेंगे।

गरीब किसान: (रोते हुऐ) मुझको स्वीकार है।

साहूकार: लो ये पैसे और शर्त याद रखना।

( किसान अपने घर पहुँचता है)

गरीब किसान: आइऐ भाग्यवान , मैं साहूकार के घर से थोड़ा ॠण ले आया हूँ जिससे हम अपने बेटे को शहर में पढाँएगे ।

किसान की पत्नी: आपने बाकई में बहुत अच्छा काम किया , लेकिन साहूकार से ॠण लेते समय आपने उससे क्या कहा था।

गरीब किसान: मैंने कहा था कि मैं अपनी फसल कटने के बाद आपका ॠण चुका दूँगा।

किसान की पत्नी: ( सोचते हुए) किंतु आप तो फसल बोओगे ही नहीं।

गरीब किसान: मेरे बेटे की सफलता ही मेरी फसल है।

( तभी किसान का बेटा आता है)

किसान का बेटा: पिताजी अब मुझे थोड़े ही पैसों की आवश्यकता है। कुछ ही दिनों में मैं आपको अफसर बनकर दिखा दूँगा।


गरीब किसान: शाबाश! मेरे बेटे मुझे तुमसे यही उम्मीद है।

किसान की पत्नी: (आशीर्वाद देते हुए) जाओ मेरे बेटे, तुम कामयाब होकर लौटना।

साहूकार: ( सोचते हुए) गाँव के सभी किसानों की फसलें कट गई हैं लेकिन अभी तक उस गरीब किसान की फसल नहीं कटी है।

( गरीब किसान के घर पहुँच कर)

साहूकार-: अरे भाई! घर से बाहर निकलो।

गरीब किसान: ( घर से बाहर निकल कर) अरे महाराज! आप यहाँ ,आपने आने का कष्ट क्यों किया।


साहूकार: कष्ट- नष्ट छोड़ो और यह बताओ कि तुम्हारी फसल कटी है या नहीं।

गरीब किसान-: महाराज मेरी फसल कटने ही वाली है बस एक या दो दिन मैं आपका ॠण चुका दूँगा।

साहूकार-: (अचंभे से) सारे गाँव वालों की फसल कट चुकी है और तुम्हारी फसल कटने के लिए अभी बाकी है।

( तभी गरीब किसान का बेटा आता है)

गरीब किसान: ( खुशी से अपने बेटे को अफसर के रुप में देखकर ) महाराज जी अब मैं आपका ॠण ब्याज सहित चुका दूँगा।


साहूकार: - अभी तुमने कहा था कि तुम्हारी फसल एक या दो दिन में कट जाएगी अब तुम कह रहे हो कि मैं आपका ॠण चुका दे रहा हूँ।

गरीब किसान: नहीं महाराज मेरे बेटे की सफलता ही मेरी फसल है और वो अब अफसर बनकर मेरे सामने खडा है।

साहूकार: - धन्य हो तुम भाई!

( सभी पात्र खुश होते हैं)


परदा गिरता है।

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