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वो थका हारा लगता है बहुत। क्या बड़ा लम्बा सफ़र किया है? - नाथ गोरखपुरी की कविताएँ

01-वक्त वक्त की बात है


ये जो हालात है , वक्त वक्त की बात है
पाँव जो हवा में था, आज नीचे खाट है

मस्जिदों औ मंदिरों,की गली गुलजार थी
सुनसान है वो गली,वीरान अब वो बाट है

भूख है भयभीत आज,देख लो इंसान की
है घरों में क़ैद वो , तख़्त है या टाट है

ढूंढता आदर्श आज ,क्या भला यथार्थ में
आज ये फिर मौन है,विज्ञान ही अब काट है

या चरम पे जा चुकी , सृष्टि ये यथार्थ की
आदर्श आज दे रहा, प्रकृति रूपी डाँट है

नाथ अनुभव है नया, वक्त से ये सिख लो
वक्त के गिरफ्त में ही , हाट बाट खाट है


02- करोना संकट

चाल चली है चीन ने , निर्मित किया विषाणु।
पर ये चाल नाकाम है , स्वस्थ रहें रोगाणु।।
स्वस्थ रहें रोगाणु सन्यासी संयोग।
खान - पान उत्तम रखो दूर रहे सब रोग।।
सावधान ग़र 'नाथ' तुम ,होइ न बांका बाल।
रहो हृदय से दृढ़ , तुम भी चल दो चाल।।

खतरा है हर देश में , कहुँ जादा कहुँ थोर।
कहीं होत है शाम तो, होत कहीं है भोर।।
होत जहाँ है भोर संकट बढ़त है जात।
सोच सोच सब देश है मुश्किल में पड़ जात।।
निकलो जो घर द्वार से रहो भीड़ से अतरा।
नाथ रहो बच के जरा मिटि जइहौ ई खतरा।।

कोई कहे कबीर कहे, सूरदास कहे कोय।
सम्वत बीसे आई तो, पल में परलय होय।।
पल में परलय होय बाची नाहि जन धन।
केतनो खोजी औसधि पागल इ तन मन।।
नाथ कहे समझाई इ बात ह समझत बोइ।
लालच जब बढ़ जात त होत गलती कोइ।।

दिन हीन जग होत है, पावै नाही उपाय।
प्रकृति कै प्रकोप जब, हद से ह बढ़ जाय।।
हद से ह बढ़ जाय जब मानव कै लोभ।
अंत बइठि रुदन करे होत हृदय विक्षोभ।।
मानव कै दिन चार है, गये बीत दिन तीन।
अन्त आई कउनो विधि जब पुरे होइ दिन।।

नदिया सागर चिरके , खुब करे उतपात।
खग पशु के है वास जो,छिनत मानव जात।।
छीनत मानव जात है धरती कै श्रृंगार।
कूड़ो करकट कै लगे ,जगह जगह अंबार।।
काट दियो सगरो तरु, लियो छीन ह बगिया।
नाथ करो विचार तुम, प्रकृति ने का न दिया।।

03-हौसला रखिये

दुनिया में दुर्दिन छाया
आया जब से कोरोना
दहशत है फैलाया
है चारो तरफ ही रोना

है खतरा बड़ा भयंकर
सृष्टि पर ये छाया
पल में देखो ये जग में
है अपना पाँव जमाया

चार से होते चालीस
चालीस से हुए हजारा
संक्रमित व्यक्ति जब घूमें
बन बाजारों में बंजारा

सारी दुनिया ही ढूढ़े
इसके लिए दवाई
इसका नही है कोई
रोकथाम अभी भाई

तो खुद की करो सुरक्षा
लोगों से रख्खो दुरी
घर से दुर तभी जाओ
जब हो कोई मजबूरी

कुछ दिन की बात है लोगों
गम्भीर जरा बन जाओ
खुद को करो नियंत्रित
नाथ दुनिया को बचाओ

04-हाइकू

पथिक मैं हूँ
जन्म से जारी है
आगे बढ़ना...,

कितना चलें?
सफ़र कहाँ पूरा ?
अनिश्चित है...

पथिकों सुनो!
यह यात्रा थमेगी
मृत्यु के साथ...।

05- आस्था आत्मबल है...

कुछ ना करी करोना हंता ।
दिल में बसे अगर हनुमंता।।
घर में वास करे रघुराई।
सकल अमंगल दूर हो जाई।।

कोउ नाहि सिखावहिं मानी।
मानव मन होत अभिमानी।।
सबका आपन अलग विचारा।
एकहि सृष्टि बटा हजारा।।

अन्तस् जागी जोत तिहिं पाई।
बाह्य जगत में जाई बिलाई।।
जैसो तिमिर होत अँधियारा।
चमकत दिखे गगन में तारा।।

दिवस जोत में दृष्टि ना आवे।
मानव मन अइसे भरमावै।।
चकाचौंध मानव मन मूढ़ा।
हृदय विचार करै नहि गुढ़ा।।

हृदय लागि द्वेष कै आगी।
चित्त में कपट बने अनुरागी।।
जिहिं छल कपट होत पियारा।
उन्हहि लगहि गलत संसार।।

जैसो पुहुप रंग पहिचाना।
का उका तुहूँ गन्ध है जाना।।
गंध तो अंध हो हृदय समाई।
रंग देखहि जो करि बरिआई।।

भाव हृदय मा तौ ऊ फूला।
नहि तो घासि लगे समूला।
कोई काउ को का समझाई।
नैन मूदि उका का दिखलाई।।

तर्क कुतर्क करि बरिआई।
आपन सिद्ध मनहि मनाई।।
जग में सत्ता परम् विराजै।
तबहि सृष्टि सकल है साजै।।

जस राधे को श्याम पियारा।
बजरंगी को राम पियारा।।
मंगल काज सकल हो जाई।
जौ प्रभु आगे सीस नवाई।।


सृष्टि वृष्टि सगरी सत्ता ।
दृष्टि बिनहि हिले ना पत्ता।।
सकल चराचर कै ही स्वामी।
नाथ वही है अन्तर्यामी।।

हिन्द बचा इक नाम आधारा।
सुमिरि सुमिरि सब उतरहि पारा।।
कोउ मन से कोउ तनहि मनावे।
कोउ श्रद्धा आपन दिखलावे।।

सब सत्ता संसार में माने।
कोउ मुरति बेमुरति जाने।।
आत्म करहिं कोउ विचारा।
कोउ पाथर पर पाँव पसारा।।

मन से तनिक न होय अधीरा।
दारुण दुःख सह लीन्ही शरीरा।।
नाथ सकल धन बल कै दाता।
सुमिरन करौ झुकावहिं माथा ।।

06-अनुशासन में रहना है

सदियों से सभ्यताएं चीख रही थीं
संस्कृति पुकार रही थी
आचरण आइना दिखा रहा था
पर आदमी उन्नति की लताओं में बंधा था

संवेदनाएं सो गई थीं
अपवित्रता हदें पार कर गई थी
तन का मन का धन का हवस हावी था
रिश्ते दम तोड़ रहे थे
पर लोग मुनाफ़े के लिए लड़ रहे थे

आह् हृदय का तप चूका था
मानवता कराह उठी थी
इंसानियत चिल्ला उठी थी
वेदना तड़प रही थी

तब प्रकृति ने कहा
मानव मन की करो'ना
अनुशासन में रहो ना...।

07-क़ैद कर लो मुझे

बड़े दिन बाद तूने बसर किया है।
मकान था जो उसे घर किया है।।

ओह् थका हारा लगता है बहुत।
क्या बड़ा लम्बा सफ़र किया है?

वो मेरा नहीं हो सकता है अब।
ये ग़ैरों ने आके ख़बर किया है।।

चेहरे की चमक बढ़ गई अचानक।
लगता है इधर तूने नज़र किया है।।

'नाथ' कुछ अंदर से बाहर गया।
तभी तो तन ने क़बर किया है।।


08-आहिस्ता आहिस्ता

चाँदनी ढल गई आहिस्ता आहिस्ता
ये दुनियाँ बदल गई आहिस्ता आहिस्ता

अंधेरों ने कत्ल करना चाहा था जिसे
वो रौशनी सम्भल गई आहिस्ता आहिस्ता

जिसे हमने संभाला था बड़े ही प्यार से
जान निकल गई वो आहिस्ता आहिस्ता

मिलने को बेताब थी साग़र से नदी
मिलके सिमट गई आहिस्ता आहिस्ता


   -  नाथ गोरखपुरी

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