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हौसलों के पर - नरेंद्र भाकुनी

हौसलों के पर


खिल उठे इस धरा पर
ये पूरा आसमान दे दो।
अपने मन को ऐसी दिशा दे दो
इन पंखों में भी अग्नि उड़ान दे दो।

बाधाएं कब  तक रोकेगी तुम्हें
अपने कदम बढ़ाओ।
अंधकार कब रोकेगी तुम्हें
दिल में उजाला लाओ।
तलवार की धार सहित
एक ऐसा ढाल दे दो।
इस दुनिया में छा जाओ
एक ऐसी मिसाल दे दो।

उस रात्रि की बेला में
कभी अंधकार तो मिलता है।
पर  किरणों का उपहार बांटने
सूरज रोज निकलता है।
उस राही का पंछी बनकर
खुला आकाश दे दो।
अंधकार को मिटाकर
सूर्य का प्रकाश दे दो।

मुश्किलें तो आती है
जो अपना सबक सिखाती है।
पर जो संभल जाए उस राह में
यहीं सब कुछ बताती है।
जीवन में जो पाया है
उसका जवाब दे दो।
कांटे ही कांटे अगर पाए हैं तो
उसमें गुलाब दे दो।

दूसरों को भी स्वर से जोड़ दें
वो कोयल की तान  लगती है।
तिनका _तिनका जोड़कर
अपनी पहचान बनती है।
सभी सुरों को दिल में जगा कर
ऐसी साज दे दो।
चितचोर बन जाए दुनिया
ऐसी आवाज दे दो।

नरेंद्र भाकुनी

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अपनी यादें.....।

आज देख लो दुनिया में
कितने वक्त के पहरे हैं।
उन लम्हों से बनी कहानी
कुछ उथले कुछ गहरे है।

अपनी सीमा से जुड़ा हूं
पार करने की हदें हैं।
क्या करें जज़्बात सारा
सरहदें है, सरहदें है।

अपने गावों की जो डोली
उस जुबां में मीठी बोली।
याद आती हैं हमें है
गावों_गावों में जो टोली।
पर कहीं आ गया जो
झेल ली दुश्मन की गोली।

आज कहता पर्वतों से
उन हवाओं को बता दो।
मैं जुदा हूं, मैं अलग हूं
आज वादा तुम निभा दो।
याद आती है जमी की
उनको सारा ये जता दो।

कोई मुझको ये बता दो
सरहदों में भाई_चारा।
मैं भी खुश हूं, तुम भी खुश हो
लगता हैं खुश है मुल्क प्यारा।
इस वतन का मैं भी हूं, उस वतन तू कहीं है
रक्षा करूंगा मैं तो इसका
लगता कहीं हैं, ये सही है।

नरेंद्र भाकुनी

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मार दो प्यारे इसको बाण


मान लो कहना मेरा मान
मार दो प्यारे इसको बाण।
चूके ना चुके चौहान
मार दो प्यारे इसको बाण।


रूद्र रूप जो बनकर देखो
बन जाओ महाकाल।
अभिलाषी हो, मान है तेरा
मां धरती के लाल।
पहुंचा दो तुम इसे शमशान
मार दो प्यारे इसको बाण।
ना चूके, चुके चौहान
मार दो प्यारे इसको बाण।

तुम वीरपुरूष, हे महापुरुष
तुम वीर अमर बलिदानी हो।
तुम वीर श्रेष्ठ, हे महाबली
तुम युद्ध जीत महा ज्ञानी हो।
ठान लो प्यारे दिल में ठान
मार लो प्यारे इसको बाण।
चूके ना चुके चौहान
मार लो प्यारे इसको बाण।

दूसरे देश के सारे दुश्मन
जहां_ तहां से झांके।
इसी दृश्य का साक्षी बनकर
बन जाऊं तुम्हारी आंखें।
छिपा हुआ गौरव अभिमान
मार दो प्यारे इसको बाण।
ना चूके, चुके चौहान
मार दो प्यारे इसको बाण।

मान लिया मैंने तेरा कहना
तुम हो मेरे दिल का गहना।
साथ _साथ से युद्ध लड़ेंगे
एक दूजे के दिल में रहना।
मारा मैंने  इसको बान
निकल गए जो इसके प्राण।
निकल गए जो इसके प्राण
पहुंच गया जो ये शमशान।

नरेंद्र भाकुनी
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याद रहेगा सरयू का पानी

तेरी जुबानी, मेरी जुबानी
कुछ भी सुना है नई पुरानी।
बागनाथ के सुंदर तट पर
याद रहेगा सरयू का पानी।

उत्तराखंड की सुंदर वाणी
ऋषि मुनि जो रमाते धूनी।
जन्म यहीं पर भरत का भारत
दुनिया यह कहती देवों की भूमि।
इतिहास भी मुझसे कहता है
क्या राजा ,क्या रानी।
बागनाथ के सुंदर तट पर
याद रहेगा सरयू का पानी।

अलग _अलग के यात्री आते
अलग _अलग से लोग बताते।
कहीं कत्यूर, कहीं चंद थे
अलग-अलग के किस्से सुनाते।
कुछ भी कहो पर सुंदर है जो
इन लोगों की जुबानी।
बागनाथ के सुंदर तट पर।
याद रहेगा सरयू का पानी।

अलग_ अलग से वाद्ययंत्र है
अलग_ अलग की बेला।
जो सुंदर अद्भुत यहीं पर
उत्तरायणी का मेला।
आज किसी ने जाना है
हमने भी पहचानी।
बागनाथ के सुंदर तट पर
याद रहेगा सरयू का पानी।

जनश्रुतियां है ,कहानियां है
ताम्रपत्र _अभिलेख बताते।
महाकाल के भव्य_मंदिर में
बागनाथ की महिमा गाते।
मैंने सुना है तुम भी सुनाओ
कोई किस्सा या कहानी।
बागनाथ के सुंदर तट पर
याद रहेगा सरयू का पानी।

नरेंद्र भाकुनी

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तुम और मैं।

तुम वो नदी की धार हो
मैं उस नदी का हूं किनारा।
लगता कहीं मझधार में
मिल गया कोई सहारा।

जीवन कहीं अंधकार था
आर था या पार था।
डर_डर के चमकी बिजलियां
जो मरने को तैयार था।
  पतझड़ में बहार बनकर
जाने कैसे मिल गए।
बाग में मुस्कान बनकर
फूल सारे खिल गए।

झरनों का  उम्मीद बनकर
मन भी मेरा  खो गया।
खुद नहीं था मन भी मेरा
वो मेरा जो हो गया।
इन वादियों में गा रही जो
तुम हो प्रकृति श्रृंगार हो।
झंकृत किसी ने यूं किया
तुम हो मेरी झंकार हो।

मैं उस खुदा से पूछता
तुम दूर हो, फिर पास हो।
मेरी धड़कनों में  जो आ  गए
तुम  श्वास हो ,एहसास हो।
और कहां  से जाने ढूंढता
तुम हो सदृश्य साक्षात हो।
जो जग गई थी उस धरा की
तुम प्रेम की बरसात हो।

मेरा मन गया, जो खो गया
कैसे कर दूं आज तर्पण।
जीवन भी मुझसे आज कहता
कर दूं मैं सारा तेरे अर्पण।
तुम हो मेरे प्रेरणा के स्वर
ये स्वर तुम्हारे नाम है।
तेरे नाम का अमृत पियूं
तुम हो मेरे सुबह _शाम हो।

नरेंद्र भाकुनी

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इतने ऊंचे तुम बन जाओ .....।


इतने ऊंचे तुम बन जाओ
  पर्वत शीश झुकाए।
ऐसा सागर तुम बन जाओ
नदी जो मिलने आए।

दीप की रोशनी दिल में जगा दो
कर दो यह उजियारा।
अखिल लोक के अखिल सूर्य से
भागेगा अंधियारा।
भव्य मशाल तुम बन जाओ
अंधेरा कोसों मील तक भागे।
ऐसी किरण जो तुम बन जाओ
सुंदर कामना जगे।

कायर मत बन, जाग उठो तुम
हार ना मानों प्यारे।
गुलाब कहीं से खिलता है
कांटों के तो सहारे।
फूल भी कहते, खुशियां बिखेरों
ऐसा तुम बन जाओ।
सागर भी जो कहता है
मुझसे मिलने आओ।

उसी सूर्य से चमक उठो तुम
जैसा चमके तारा।
शांति की धारा ऐसी बहा दो
अमन हुआ जग सारा।
ऐसा अजातशत्रु बन जाओ
बस मित्र ही मित्र कहलाए।
बैर _भाव को छोड़ यहीं पर
शत्रु भी भागा जाए।

नरेंद्र भाकुनी

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मेरा रत्न तेरा नाम

मेरी जान हैं,  मेरी शान है
अरमान है, फरमान है।
लिखता रहूं मै तेरे लिए
मेरे कलम को भी गुरूर और अभिमान हैं।

मैं जानता, मैं मानता
तू है मेरा, मैं हूं तेरा।
पर क्या करें अब हूं जुदा
तू मुल्क है मेरा खुदा।

महसूस हूं, महफूज हूं
तेरी मान का सम्मान  हूं।
तू है धरा की जननी है
मैं हूं गगन, आसमान हूं।

मैं छा गया, मैं आ गया
कहीं बादलों में खो गया।
कहीं मिल गया, कहीं खिल गया
कहीं जग गया, कहीं सो गया।

मैं राग का अनुराग हूं
जो जल गया वो दीप हूं।
कोई धुंध हैं जो छिप गया
  मैं मिल गया महाद्वीप हूं।

तू मुझसे है, मैं तुझसे हूं।
तू ही मेरा सब काम हैं।
मैं हूं झुका तेरे वास्ते
मेरी जुबां तेरा नाम है।

नरेंद्र भाकुनी

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जाग  उठो......।

कहीं से आता कोई अगर भी
जहां_ कहां से तुमको झांके।
खिली हुई हैं हरियाली से
बन जाओ सब मेरी आंखें।

मेरी मन की वीणा कहती हैं
ये प्रीत सही पर मीत सही।
सजे_ धजे से ख्वाब बनाकर
कहीं गीत सही, संगीत सही।
मेरे मन को जो छू जाता है
मनमीत सही, मनप्रीत सही।


खुली हवा में श्वास भरकर
कहीं पवनदेव का वेग बनूं।
कहीं मस्त गगन का पंछी बनकर
मैं नीलगगन में राज करूं।
मैं साज बनूं, कविराज बनूं
आगाज़ बनूं, आवाज़ बनूं।

कहीं अंबर मुझसे कहता है
मै रजत रश्मि का सूरज हूं।
कहीं बाग भी कहता मै भी तो हूं
रंगीन छवि का नीरज हूं।
झंकार भी हूं, अंगार भी हूं
श्रृंगार भी हूं, हुंकार भी हूं।

नदियों में पतवार देखकर
नाव को देखा चलते हुए।
कहीं कृति की आभा कहती हैं
ज्वाला_ मुखी को जलते हुए।
मैं धार बनूं, तलवार बनूं
आधार बनूं , अधिकार बनूं।

नरेंद्र भाकुनी

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अपनी कविता

कभी जुदा है, कभी सजग है
कभी मिलन है, कभी अलग है।
सुंदर से झरने ऊपर से नीचे
उत्तराखंड की भव्य_ झलक है।

हमारी कविता कहीं अगर है
मिलो कहीं पर अपना सा घर है।
युवा जुबां से मैं आज कह दूं
मेरी धरोहर ,अपना डगर है।

इन्हीं पहाड़ों से हमने सीखा
कल_कल सी कहती  नदियां बही है।
झर _झर से  झरने ऊपर से नीचे
उमंग सारी यही कहीं है।

मेरे युवा है कहीं अगर भी
कहीं से यादें निहारती हैं।
किसी धरा के तुम ही पुत्र हो
धरती माता पुकारती है।

कहीं अगर भी ये रहते हम
यही पलायन रुका नहीं है।
याद तो आती अपनी धरा की
रुला रही है ,रुला रही है।

_"नरेंद्र भाकुनी

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रण_भेरी


सत्रह छिहत्तर ऐसी घटना
रक्त सी लाल हुई थी माटी।
मुगल की सेना, राजपूताने
लड़ उठे हल्दी की घाटी

“आज देख लो मानवता
कैसा रहा था ताप|
राजपूताना महाराणा थे
हल्दीधाटी मेँ प्रताप|

राजस्थान की हल्दी घाटी
कह रही थी बिछड़े आप|
ये सिँहों की टुकड़ी थी
बोल रही थी महा प्रताप|

राजपूताने कहते थे
ये भूमि जो बनी सुहागन|
मेरे रक्त का कतरा
करते है जो पावन|
मैं भी कहता आप भी बोलो
सारे मिलकर एक अलाप|
सिँहराज के एक वीर थे
वो थे राणा महा प्रताप|”

यहीं लड़ाका, राजपूताना
मेवाड़ मुकुट राजस्थानी का।
सिर मुगलों के कार गिराए
दूध पिया का क्षत्रानी का।

यहीं लड़ाका वीर मराठा
अमन हुआ जग सारा।
हाहाकार मचा दी जिसने
मुगलों को ललकारा।

इसकी ताकत सबसे ज्यादा
तलवारों से तोला था।
उस वीर शिवाजी के गौरव को
बच्चा_ बच्चा बोला था।

चाहे बंधन कैसे हो
अपनी दिलों से ही जोड़ेंगे।
पृथ्वीराज चौहान के प्रेमी हैं
तीर दो निशाने पर ही छोड़ेंगे।

नरेंद्र भाकुनी

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1 टिप्पणियाँ

  1. नरेंद्र भाकुनी जी की बहुत अच्छी कवितायेँ पढ़वाने हेतु धन्यवाद!

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