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मोबाइल बिना चैन कहां रे - प्रभात गोस्वामी

 

मोबाइल बिना चैन कहां रे

      प्रभात गोस्वामी

सूचना क्रांति ने दुनिया को एक गाँव बना दिया है। टेलीफोन से आगे अब मोबाइल के शेषनाग ने हमारे जीवन को जकड़ लिया है। आज हमारी मुट्ठी में तकदीर नहीं मोबाइल है। एक जमाना था जब काले चोगे वाला टेलीफोन विरले लोगों के घरों और दफ्तरों में ही हुआ करते था। जब भी फोन की घंटी घिनघिनाती थी तब घर में एक अजीव सी बैचेनी पसर जाती थी। पता नहीं किस का फोन है, क्या समाचार आने वाला है ? घर के बुजुर्ग तब हिम्मत कर फोन उठाते और घबराए हुए ऊँची आवाज में पूछते थे - कौन ? जब सामने से किसी प्रियजन की आवाज सुनाई पड़ती थी तब दिल को तसल्ली होती थी। तब वो फोन मोहल्ले का टेलीफोन बूथ भी बन जाया करता था। हर कोई आकर फोन भी कर जाया करता था।

उस काले फोन पर आवाज भी धीरे से आती थी इसलिए ऊँची आवाज में बोलना पड़ता था। हाँ में बोल रहा हूँ मुन्नू का दादा जी.......... अरे मैं दादाजी........ क्या सुनाई पड़ रहा है ? फिर बीच में टेलीफोन आफिस से आपरेटर कूद पड़ता था जैसे तेज गति से रेल के आगे कोई बेरोजगार या दुःखी इंसान खुदकुशी करने कूद पड़ता है।

वक्त के साथ बंदर से आदमी बनने की विकास यात्रा की तरह फोन का विकास भी हुआ और मोबाइल ने विविध रुपों में काले फोन को धक्के मार कर लगभग पीछे धकेल दिया जैसे बूढ़े माता-पिता पिछले कमरे में धकेल दिए जाते हैं। घर से निकल कर फोन अब मोबाइल का रुप धर कर किसी आवारा मनचले की तरह हो गया है। नए-नए मॉडल्स के साथ मोबाइल ने हमारा काम तो आसान कर दिया पर जीवन दुश्वार भी कर दिया। किसी प्रेमी-प्रेमिका की तरह दिन का चैन और रातों की नींद छीन ली है।

घर से बाथरुम और फिर आफिस तक, सड़क से स्कूल व कॉलेज तक, बस अड्डे से एअरपोर्ट तक, जमींन से आसमान तक मोबाइल हमारा आज के चेन लुटेरों की तरह लूट रहा है। हर कोई फोन से चिपका हुआ संदेशों का आदान-प्रदान करता नजर आता है। आज लगता है सचमुच ही विकास पागल हो गया है। अब वो दिन भी दूर नहीं जब मोबाइल के नशे से छुटकारा दिलाने के लिए सरकार को “मोबाइल नशा मुक्ति केंद्र” खोलने पड़ें ?

अब इस मुए मोबाइल पर सोशल मीडिया के आक्रमण ने तो जीना और भी दुश्वार कर दिया है। संदेशे आते हैं... हमें तड़पाते हैं, इसी गीत की तर्ज पर जीवन फेसबुक, ट्वीटर, वीबर, व्हाट्सएप के घने जंगल में भटक रहा है जिससे बाहर निकलने का रास्ता अभी तो दिखाई नहीं पड़ रहा और सच कहें तो कोई ढूंढना भी नहीं चाहता। दुनियाभर की जानकारी के साथ अब कुछ मनचले अफवाहों के बम भी फोड़ रहे हैं। प्रेमालाप, सामाजिक और राजनीतिक संदेशों के साथ नफरत भी परोसी जा रही है। आम आदमी गाना गा रहा है फोन बिना चैन कहाँ रे... फोन बिना चैन कहाँ रे .....खाना नहीं, पीना नहीं फोन चाहिए, बस फोन चाहिए। मोबाइल दुनिया से कनेक्शन जोड़ रहा है पर घरों से कनेक्शन तोड़ रहा है। सोशल मीडिया भी आम आदमी को अनसोशल बना रहा है।

पहले हम सुबह उठकर भगवान की तस्वीर देखकर माता-पिता, बुजुर्गों के पैर छूते थे। आज सबसे पहले तकिये के नीचे से मोबाइल निकाल कर उसके दर्शन करते है, उसी का चरणस्पर्श करते हैं। माता-पिता और घर के बुजुर्ग आउट डेटेड माल की तरह स्टोर में धर दिए गए हैं। आज के दौर में जो व्यक्ति एक ही समय में बीवी, नौकरी और स्मार्ट फोन के बीच तालमेल बैठा ले वही बन्दा स्मार्ट माना जाता है। आजकल माता-पिता को दो ही चिंताएं घेरे रहतीं हैं कि उनका बेटा इन्टरनेट से क्या डाउनलोड कर रहा है ? और, बेटी क्या अपलोड कर रही है ?

अब तक तो ये कहा जाता रहा है कि जुबान से निकला शब्द और कमान से निकला तीर कभी वापस नहीं आते। पर अब ये कहा जाने लगा है कि मोबाइल पर बात करता दूर चला गया आदमी और ब्यूटी पार्लर गई महिला जल्दी से वापस नहीं आते। मोबाइल के बिना घर सूना-सूना लगता है और मोबाईल के आगे घर, रिश्ते-नाते सब शून्य लगते है। हाल ही में हमारे ब्रजभूमि से आकर बसे पड़ोसी की बेटी रात के अँधेरे में अपने प्रेमी संग घर से निकल ली। घर में तूफान बरपा गया जोर-जोर से लड़की को कोसते हुए परिवार के लोग एक दूजे पर दोषारोपण कर रहे थे। कोई भी पूरी रात सोया नहीं।

अल सुबह दरवाजे पर लगी घंटी बजी। बाप ने भनभनाते हुए दरवाजा खोला तो सामने बेटी बड़ी बेशर्मी के साथ खड़ी हुई थी। बाप ने गुस्से से पूछा - हमारी इज्जत का फलूदा बना कर अब का लेवे आई हो ? लड़की ने बड़ी निडरता से जवाब दिया- पतली पिन वालो चार्जर ! पूरा परिवार डिस्चार्ज हो गया इससे ज्यादा चिंता मोबाइल की हो रही है। आज हम मोबाइल पर सुबह की गुड मोर्निंग, दोपहर की राम-राम से ले कर शुभ रात्रि करने के बीच पूरी दुनिया की हत्थई करते हैं। इसे नहीं रोका गया तो ये हमारे जिस्म में कैंसर की तरह घुस जायेगा और फिर जो हालात होंगे वो सँभालने वाले नहीं होंगे।

मोबाइल की दुनिया में खोए लोगों के लिए भी अब अखबारों, टीवी चैनल्स पर खोया-पाया वाले विज्ञापन दिए जाने लगेंगे। अगर मोबाइल से दूरी न हुई तो एक दिन ऐसा भी होगा जैसा मैंने कल रात सपने में देखा........

हमारे ही जानकार शर्मा जी के वयोवृद्ध पिताजी दुनिया छोड़ गए। बुजुर्ग को जमींन पर लेटाने की तैयारी के बीच छोटे चाचा अपने बेटे से बोले - अरे, मुन्नू बेटा ये सब होता रहेगा तू पहले फेसबुक और व्हाट्सएप ग्रुप में ये खबर डाल दे कि दादाजी नहीं रहे। हाँ, श्मशान को अंतिम संस्कार करने का मेसेज भी कर दो। थोड़ी देर बाद रोने की आवाजों के बीच दूसरी आवाज आई - अरे देखो तो सही कितने लाइक्स आये, कितने शोक सन्देश आये, नेताजी का मेसेज आया कि नहीं ?

सारी तैयारियों के बाद दादाजी की अंतिम यात्रा शुरु हुई तो दरवाजे पर रुक गई। पीछ से शर्मा जी बोले - क्या हो गया, आगे क्यों नहीं बढ़ रहे, सूर्यास्त होने से पहले अंतिम संस्कार करना है, जल्दी करो ? तभी भैया जी बोले - अरे भैया, घर के बच्चे दादाजी की अर्थी के आगे सेल्फी ले रहे हैं। अब उनके दद्दा जी लौट के थोड़े आयेंगे। बच्चों जल्दी करो, हाँ सोशल मीडिया पर अपडेट दे देना बेटा।

दादा जी की शव यात्रा के आगे - पीछे घर के युवा वीडियो बना रहे थे और वहीं से हाथों-हाथ फेसबुक में अपलोड भी हो रहे थे। तभी पीछे से कोई बोला - भैया आजकल तो फेसबुक में लाइव का सिस्टम भी है, करो न दादा जी की शवयात्रा का लाइव प्रसारण ! शवयात्रा के रास्ते कोई भी राम नाम सत्य है, सत्य बोले गत्य है नहीं बोल रहा था। इस बीच किसी ने विधायक जी को मोबाइल पर बताया कि दादा जी नहीं रहे। विधायक जी श्मशान पहुंचे, इस श्मशान स्थल का जीर्णोद्धार विधायक कोष से जो हुआ था।

श्मशान में शर्मा जी के बड़े पुत्र चिता पर अग्नि प्रज्वलित करने ही वाले थे कि पंडित जी ने - विधायक महोदय को बुलाया और कहा कि माननीय, आपके कर कमलों से चिता को अग्नि दे कर जीर्णोद्धार के बाद पहला उद्घाटन कीजिए। विधायक महोदय ने गर्व से जलती हुई लकड़ी शर्मा जी के हाथों से छीन कर एक हाथ से दादाजी की चिता को अग्नि दी और दूसरे हाथ से मोबाइल पर एक पत्रकार मित्र को इस पुनीत (?) कार्य की जानकारी दी।

इसी बीच नेताजी के कार्यकर्ता भी आ गए थे जो मोबाइल से धड़ा-धड़ फोटो खींच रहे थे। सारा श्मशान गृह विधायक जी के जयकारे से गूँज रहा था और घर के सारे लोग विधायक जी के साथ सामूहिक, एकल फोटो, सेल्फी लेने के लिए लाइन में लगे हुए थे। बेचारे दादा जी इस दृश्य को देखते तो यही कहते - हाय मोबाइल, हाय-हाय मोबाइल, तू कहाँ से आई, तुझे क्यों मौत न आई। जब सपना टूटा तो आँखें किसी गरीब की पेन्ट की तरह फटी की फटी रह गई। और, मैंने कमरे से बाहर निकल कर बालकोनी से देखा तो दादाजी सकुशल मोबाइल पर सुबह की आरती सुन रहे थे।

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प्रभात गोस्वामी, व्यंग्यकार

15/27, मालवीय नगर, जयपुर

राजस्थान ।

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