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संजय शांडिल्य की लंबी कविता

संजय शांडिल्य की लंबी कविता

रोहिंग्या युवती का भावानुवाद

1.
मैं पहले भी इस जंगल से गुजरना चाहती थी
इसकी खूबसूरती धार लेना चाहती थी आत्मा में
रंग-बिरंगे पंछियों की बोलियाँ सुनना और सीखना चाहती थी
झरने के पास रुककर देखना चाहती थी जीवन-प्रवाह
जीवन को झरने-सा महसूसना चाहती थी
नदी-किनारे बैठकर
इत्मीनान से सँवरना चाहती थी जलदर्पण में
पर करूँ क्या
इस जंगल का खयाल जितना सुंदर था
उससे ज्यादा भयावह है इसका यथार्थ
झरने आज भी जीवनगीत गा रहे होंगे 
पर वे मृत्युगीत हैं मेरे लिए
नदी
पानी से ज्यादा
रक्त और शवों से लदी हुई
धीरे-धीरे बह रही है
मुझे जल्द भागना होगा यहाँ से
अविलंब निकलना होगा इस मोहवन से
इस ओर बढ़ती संगीनों से
और उनके पीछे की असंख्य देहों से
बहुत दूर बहुत जल्द मैं निकल जाना चाहती हूँ...

2.
सबसे ज्यादा गुमान
मुझे खूबसूरती पर था
सबसे बड़ा धोखा
मुझे इसी ने दिया

सबसे ज्यादा नफरत
अब इसी से करती हूँ

3.
मुझे संख्या में
यकीन नहीं रहा

मेरी अम्मी
मेरे अब्बू
भाई-बहन
सब गोलियों से छलनी हो चुके हैं
उनके बदन पर
शून्य-जैसे
असंख्य सूराख हो गए थे

मेरा
शून्य में भी
अब यकीन नहीं रहा

4.
मुझे पहाड़
हिफाजत की दीवार लगते थे
लगता था
मेरे और दुश्मनों के बीच
ये बैठे हुए हाथी हैं

मुझे
जिंदगी-सा दीखता था जंगल
घना-उलझा-हरा
अनंत पुकारों से भरा
मैं बार-बार इसमें घुसकर
उस पार निकल जाती थी जिंदगी के

मुझे समुद्र
आनंद की
असीमता तक ले जाता था
यहाँ घंटों रहकर
मैं असीम हो जाया करती थी

अब ये पहाड़, जंगल और समुद्र
सब खौफ पैदा करते हैं मुझमें
जिस्म के सौदागर
बड़ी आसानी से
यहाँ छिप सकते हैं
हत्यारों के
बेहद महफूज ठिकाने
मेरे ख्वाब हो सकते हैं...

5.
हरा-पीला-गुलाबी
लाल-सफेद-नीला
और काला–
अब कोई रंग मुझे नहीं भाता

मैं जानती हूँ
जिस दिन मेरे जिस्म को
अपनी भट्ठी में वे राख करेंगे
उस दिन भी
उनके बदन पर
ऐसा ही कोई रंग होगा जरूर

6.
अब कोई खयाल मुझे नहीं आता
सोचना तो कबका बंद कर दिया
अब गम ही न रहा
किसी के खोने का
या सुख अपने होने का

मैं तो
खुद को भी भूल चुकी
बहुत पहले

7.
कभी-कभी लगता है
अच्छा हुआ
अम्मी गोलियों का शिकार हो गईं
बहनें
धुएँ के गुब्बारों में खो गईं

अपने जिस्म का
उन्हें कोई डर नहीं रहा
उनके जिस्म का
मुझे कोई डर नहीं रहा...

8.
मैं हूँ भी
और नहीं भी

कुछ दफ्न हूँ
ख्वाबों के साथ
कुछ दरिंदों के वास्ते
बची हूँ

बहुत जल्द
यह भी न रह जाऊँगी
जेहन में जो है
सब खाक हो जाएगा
आगे
कुछ न कह पाऊँगी...

9.
कभी अब्बू ने कहा था—
चलना
दरिया होना है

गिरना
आबशार[1] होना

झड़ना
आँसू होना है

उठना
पहाड़ होना

मैंने दरिया, आबशार और आँसू
सब बनकर देख लिया
अब धीरे...धीरे उठूँगी
और जल्द
पहाड़-सी
खड़ी हो जाऊँगी।

10.
अब्बू
अब यातना नहीं सहेंगे
भाई
जलालत में नहीं जिएगा

अकेली बची हुई मैं
धीरे-धीरे फौलाद हो रही हूँ

देखना–
एक दिन
तुम्हें खत्म कर दूँगी!
●●●



(1.    झरना, जल-प्रपात)

परिचय

जन्म : 15 अगस्त, 1970 |
स्थान : जढ़ुआ बाजार, हाजीपुर |
शिक्षा : स्नातकोत्तर (प्राणिशास्त्र) |
वृत्ति : अध्यापन | रंगकर्म से गहरा जुड़ाव | बचपन और किशोरावस्था में कई नाटकों में अभिनय |

प्रकाशन : कविताएँ हिंदी की प्रायः सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित एवं अँधेरे में ध्वनियों के बुलबुले  (सारांश प्रकाशन, दिल्ली) तथा जनपद : विशिष्ट कवि (प्रकाशन संस्थान, दिल्ली) में संकलित | कविता-संकलन उदय-वेला  के सह-कवि | दो कविता-संग्रह समय का पुल  और नदी मुस्कुराई  शीघ्र प्रकाश्य |

संपादन : संधि-वेला (वाणी प्रकाशन, दिल्ली), पदचिह्न  (दानिश बुक्स, दिल्ली), जनपद : विशिष्ट कवि (प्रकाशन संस्थान, दिल्ली), प्रस्तुत प्रश्न  (दानिश बुक्स, दिल्ली), चाँद यह सोने नहीं देता कसौटी  (विशेष संपादन सहयोगी के रूप में ), जनपद  (हिंदी कविता का अर्धवार्षिक बुलेटिन),  रंग-वर्ष  एवं रंग-पर्व  (रंगकर्म पर आधारित स्मारिकाएँ) | फिलहाल उन्मेष  का संपादन |

संपर्क : साकेतपुरी, आर. एन. कॉलेज फील्ड से पूरब, हाजीपुर (वैशाली), पिन : 844101 (बिहार) |

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