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लघुकथा "मेरा अस्तित्व" - डॉ. शैल चन्द्रा

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लघुकथा

            "मेरा अस्तित्व"

             "मम्मी, कल सब सहेलियां पिकनिक पर जा रही हैं। मुझे भी जाना है।"

         सीमा ने खुशी से  चहकते हुए कहा।

         "अरे!  नहीं, तुम कोई पिकनिक -विकनिक नहीं जाओगी।  तुम्हारे पापा तुम्हें शायद ही जाने देंगे क्यों कि देखती नहीं जमाना बड़ा खराब है। "मम्मी ने चिंतित स्वर से कहा।

      यह सुनकर सीमा   का खुशियों से भरा चेहरा बुझ सा गया।

     "मम्मी देखो,इस ड्रेस में मैं कैसी लग रही हूं?"

     "ओह!इतना टाइट जींस और यह बाँहों से खुला हुआ टॉप? तुम्हारे पापा तुम्हें इस ड्रेस में देखकर  गुस्सा होंगे।। उन्हें लड़कियों का इस तरह का ड्रेस पहनना बिल्कुल पसंद नहीं है?" मम्मी ने घबराए स्वर से कहा।

        यह सुनकर  सीमा आक्रोश में आ गई। उसने कहा,-"मम्मी, मैं बचपन से  यह सुनती आ रही हूं। यह मत करो। वह मत करो। यह पापा को पसन्द नहीं है। पापा के पसन्द का काम आखिर मुझे कब तक करना  पड़ेगा? अब तो पापा के पसन्द के लड़के से मुझे शादी भी करनी है। क्या मेरी खुद की कोई पसन्द नहीं? कोई मेरी इच्छा-अनिच्छा नहीं?" "

       यह कहते हुए वह रो पड़ी। मम्मी ने बेटी के आँसू पोंछते हुए कहा,-"हां बेटी, हम नारियों की कोई इच्छा-अनिच्छा नहीं होती। मुझे देखो। पहले मैं अपने पिता की इच्छाओं के अनुसार जी। अब  तुम्हारे पिता की इच्छानुसार  जी रही हूं। मेरी स्वयं की पसन्द क्या है। यह  मैं अब पूरी तरह भूल चुकी हूं। तुम्हें भी अब ऐसे ही जीना पड़ेगा।"

           यह सुनकर सीमा ने कहा,"नहीं मम्मी, यह अब  नहीं होगा। हमारा भी कोई अस्तित्व है। हमारी भी इच्छायें हैं। हम भी कुछ करना चाहते हैं। हम भी कुछ  बनना चाहते हैं। बस मम्मी, यह मुझसे नहीं होगा। मुझे थोड़ी स्वतंत्रता चाहिए,अपने हक का, अपने अधिकार का, अपने अस्तित्व का बस-- और मैं हर हालत में इसे लेकर रहूंगी। "

       यह कहते हुए उसके चेहरे पर दृढ़ आत्मविश्वास झलकने लगा।

           डॉ. शैल चन्द्रा

           रावण  भाठा, नगरी

           जिला-धमतरी

            छत्तीसगढ़

 


सम्प्रति

प्राचार्य

शासकीय हाई स्कूल टांगापानी,

तहसील-नगरी

जिला-धमतरी

छत्तीसग

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