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सुरक्षा घेरा - ज्योत्सना सिंह

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सुरक्षा घेरा

सुमि उदास सी खिड़की के बाहर सूनी सड़कों को देख रही थी कि मम्मा ने आवाज़ दी।

“सुमि बेटा नाश्ता तैयार है। आपकी पसंद की इडली और नारियल की चटनी बनाई है आ जाओ जल्दी से।”

सुमि की उदासी खिड़की के रास्ते ही भाग गई वह वह दौड़ते हुए आई और नाश्ते की प्लेट की तरफ़ हाथ बढ़ाया ही था कि मम्मा की झिड़की भरी आवाज़ सुनाई दी।

“सुमि आप ने अपने हाथ धोए?”

सुमि न में सिर हिलाते हुए हाथ धोने के लिए चली गई और वापस आ बड़े स्वाद ले,ले कर मम्मा का बनाया नाश्ता करने लगी।तभी उसने एक प्लान बनाया और कहा।

“मम्मा मैंने एक प्लान बनाया है?”

पापा मम्मा दोनो ने उस से पूछा।

“क्या प्लान है आप का हम भी तो सुने?”

“मम्मा पापा जब हम सब की छुट्टियाँ चल रहीं हैं तो क्यूँ न हम दादी के पास गाँव चलें? आप कहते हो गाँव बहुत अच्छा होता है मैं भी गाँव देखना चाहती हूँ ख़ूब मस्ती करेंगे हम वहाँ और मैं बोर भी नहीं होऊँग़ी अभी तो कोई खेलने भी नहीं आता है मैं अकेली क्या करूँ?”

पापा ने अपना नाश्ता ख़त्म किया और सुमि को बात की गंभीरता के बारे में बताया।

“बेटा ये छुट्टी नहीं है ये बचाव है हमारा उस महामारी से जो हमारी जान के साथ ही हमसे जुड़े कई लोग़ो की जान का ख़तरा बन सकती है। आप बेशक बोर हो जाओगे पर हम कहीं और नहीं जा सकते। कहते हुए पापा अपने ऑफ़िस का काम करने के लिए अपना लैप टॉप ऑन करने लगे।

नाश्ता ख़त्म कर चुकी सुमि को मम्मा ने हाथ धुलाते हुए कहा।

“पापा सही कह रहें हैं बेटा ये छुट्टियाँ नहीं हैं। हमें अपना और पूरे समाज का ख़्याल रखना है।”

सुमि ने मम्मा से पूछा।

“अच्छा! मम्मा ये गाँव कैसा होता है?”

मम्मा ने कहा।

“चलो आज मैं तुम्हें गाँव दिखाती हूँ।”

उसने अपना लैप टॉप लॉग आउट किया और घर बाहर के कामों के बीच कहीं बहुत पीछे छूट गया अपने पेंटिंग के शौक़ को आज उसने अपने अनुभवी हाथों में ले अपने गाँव कीरतपुरा का सुंदर सा चित्र उकेर दिया और बहुत प्यार से सुमि को घर बैठे ही गाँव की सैर कराने लगी।

“सुमि ये देखो ये कुंए का जो ऊपर का हिस्सा होता है न उसे जगत कहते हैं,ये जो है न इसको चरखा कहते हैं और ये है न आप की बेड की तरह इसे चारपाई कहते हैं।”

सुमि बहुत ध्यान से सब कुछ देख रही थी और वह भी पूरे मनोयोग से अपनी पेंटिंग को अंजाम दे रही थी।

पेंटिंग पूरी होते होते ही पापा मिनी के लिए जूस और उसकी और अपनी काफ़ी ले कर आ गए काफ़ी पीते हुए वह बोली।

“आज न जाने कितने दिनों के बाद हम सिर्फ़ अपने परिवार को वक्त दे रहें है बिना बाहर की भाग दौड़ वाली ज़िंदगी जिए हुए बिना बाहर का कुछ भी खाए हुए।”

उसने प्यार से अपने पूरे परिवार को अपनी बाँहों के सुरक्षा घेरे में घेर लिया।”


ज्योत्सना सिंह

लखनऊ

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