कोरोना से ज़ंग : महावीर वाणी के संग - डॉ.चन्द्रकुमार जैन

SHARE:

कोरोना से ज़ंग : महावीर वाणी के संग डॉ.चन्द्रकुमार जैन आज कोरोना वायरस ने जीवन और जगत को आत्मावलोकन के लिए विवश कर दिया है। भटकाव की समीक्षा...

कोरोना से ज़ंग : महावीर वाणी के संग

डॉ.चन्द्रकुमार जैन
आज कोरोना वायरस ने जीवन और जगत को आत्मावलोकन के लिए विवश कर दिया है। भटकाव की समीक्षा के लिए ठहराव का यह समय है। सामाजिक दूरी से अपने आप के करीब आने का यह वक्त है। बुद्ध की देशना से अपने ही दीपक को जलाने की यह बेला है। महावीर की वाणी के अलोक से स्वयं को पाने का यह स्वर्णिम काल है। यह जीवन को सहने और समझने का नया मोड़ है। ऐसे में महावीर के संयम और समता की साधना को बूझना समय की बड़ी मांग है। अगर महावीर जीवन में उतर सकें तो कोरोना की बात तो छोड़ें कोई बीमारी ज़िंदगी पर भारी नहीं पड़ सकती। कोरोना के हारने में कोई संशय नहीं है, मानवता का जीतना तय है। महावीर की साधना विश्व शान्ति की प्रयोगभूमि है। महावीर ने कहा था - स्वयं सत्य को खोजें। महावीर ने कहा जियो और जीने दो। महावीर के संदेशों की आज भी उतनी ही आवश्यकता है, जितनी उस समय थी। ज़रुरत सिर्फ उन्हें गहराई से समझकर अपनाने की है। उनकी वाणी ने प्राणी मात्र के जीवन में मंगल प्रभात का उदय किया। अब यह हम सबकी जिम्मेदारी है कि उस वाणी के तेज और आलोक को हम सर्वव्यापी, सर्वहितकारी, सर्वमंगलकारी बनाएं।


जैनधर्म के इस युग के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ ऋषभदेव के पौत्र मारीचि से लेकर अन्तिम तीर्थंकर भगवान महावीर के भव तक की जीवन यात्रा किसी आत्मा के संसार परिभ्रमण की तथा उससे मुक्ति की अनोखी कथा है। अन्तिम भव में वैशाली गणतन्त्र के कुण्डग्राम में राजा सिद्धार्थ और महारानी त्रिशला के घर में चैत्र शुक्ल त्रयोदशी के दिन बालक वर्धमान के रूप में उस पवित्र आत्मा ने जन्म लिया। जैसा कि सभी तीर्थंकरों के जीवन में होता है उनके भी गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान और मोक्ष कल्याणक, देवों व मानवों के द्वारा अति उत्साह व भक्ति से मनाये गये।
सभी जानते हैं कि 30 वर्ष की आयु में वर्धमान महावीर ने राजपाट त्याग कर श्रमण साधना का मार्ग अपना लिया। 12 वर्ष तक मौन तपस्या के बाद 42 वर्ष की आयु में उन्हें केवलज्ञान की प्राप्ति हुई और इस प्रकार वे अपने सम्पूर्ण विकारों से मुक्त हो कर कर अर्हन्त परमात्मा बन गये। उनके उपदेशों का क्रम उसके बाद अनवरत 30 वर्ष तक चलता रहा और कार्तिक कृष्ण अमावस्या के दिन की प्रात: बेला में उन्होंने संसार चक्र से मुक्ति प्राप्त की और सिद्ध हो गये।


भगवान महावीर का यह जीवन और उनकी शिक्षाएं अत्यन्त प्रेरणादायक और सर्व कल्याण कारी हैं, सर्वोदयी हैं। उनके अनुपालन से न केवल जीवों का मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है वरन् सामान्य लोक जीवन भी सुन्दर हो जाता है। उनके उपदेशों में अहिंसा,अनेकान्त और अपरिग्रह की विशेष चर्चा की जाती है। परन्तु उनके उपदेशों का जो सबसे सघन पक्ष है वह है प्रत्येक आत्मा में परमात्मा बनने की शक्ति व सामर्थ्य की घोषणा। प्रत्येक आत्मा की स्वतंत्रता की उद्घोषणा और इस विश्वास की स्थापना कि मनुष्य जन्म से नहीं, कर्म से महान बनता है।
आचार में अहिंसा, विचारों में अनेकांत, वाणी में स्याद्वाद और जीवन में अपरिग्रह महावीर के मूल सन्देश हैं। सामान्यतः कहा जाता है हिंसा का न होना अहिंसा है। परन्तु जैन दर्शन में अहिंसा रूप बहुत विस्तृत है। निश्चय से आत्मा में राग-द्वेष की उत्पत्ति न होना ही अहिंसा है। और व्यवहार से मन-वचन-काय से अनुमोदना किसी भी रूप में किसी भी जीव को पीड़ा या दुख न पहुँचाना अहिंसा है। वहाँ केवल पंचेन्द्रिय जीवों की हिंसा की बात नहीं कही वरन् सूक्ष्म से सूक्ष्म जीव की रक्षा का भी उपदेश दिया।


सुबह से शाम तक होने वाली क्रियाओं में हिंसा, अभक्ष्य भक्षण में हिंसा, अनछने जल के उपयोग में हिंसा - यदि आज हम इन हिंसाओं से बचे हैं तो वो अहिंसा का सिद्धांत ही है जिसने जीव मात्र के प्रति दया का भाव सिखाया। भगवान महावीर ने न केवल आचार में अहिंसा की बात कही बल्कि भावों में भी अहिंसा का प्रतिपादन किया। आचार में और भावों में अहिंसा का प्रवर्तन होने से मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है।
प्रत्येक वस्तु अनेक धर्मात्मक है। एक ही वस्तु में परस्पर विरोधी दो धर्मों या शक्तियों का प्रकाशित होना अनेकांत है। अर्थात् जो वस्तु एक है वही अनेक भी है, जो नित्य है वही अनित्य भी है, जो सत् है वही असत् भी है।अनेकांत के बिना वस्तु की सिद्धि नहीं हो सकती। जब हम वस्तु के एक धर्म को स्वीकार करते है, तो विवाद खड़ा होता है। कैसे ? यदि हम वस्तु को हमेशा सत् रूप से मानेगें तो उसका कभी विनाश नहीं होगा, और असत् रूप में मानेगें तो उसका कभी जन्म नहीं होगा। जैसे दीपक बुझने के बाद भी नष्ट नहीं होता बल्कि अंधकार रूप पर्याय को धारण करते हुये अपना अस्तित्व रखता है। यदि नष्ट हो जाता तो पुनः प्रकाश कैसे होता ? ऐसे ही परस्पर विरुद्ध दोनों धर्मों का कथन करना ही अनेकांत है। यदि हमारे विचारों में अनेकांत होगा तो वस्तु का सत्य स्वरूप समझने में आसानी होगी।


अनेकांतमयी वस्तु को कथन करने की पद्धति का नाम स्याद्वाद है। किसी भी एक शब्द या वाक्य के द्वारा वस्तु का समग्र कथन करना संभव नहीं है, प्रयोजन की मुख्यता से अन्य धर्मों को गौण करते हुये एक धर्म का कथन करना स्याद्वाद है। वस्तु के अन्य धर्मों का निषेध न हो जाये इसलिये अनेकांत वादी स्यात् यानि कथंचित् शब्द का प्रयोग करते हैं। जैसे वस्तु कथंचित् सत् और कथंचित् असत्, कथंचित् नित्य है और कथंचित् अनित्य है। जैसे द्रव्य रूप से वस्तु नित्य है और पर्याय रूप से अनित्य । वाणी में स्याद्वाद होने से कभी कोई विवाद खड़ा नहीं होगा।
ये मेरा है, ऐसा भाव परिग्रह है, और ऐसा भाव न होना ही अपरिग्रह है। परिग्रह 24 प्रकार के हैं। चौदह अंतरंग और दस बहिरंग परिग्रह बताये गए हैं। जैन दर्शन में अंतरंग परिग्रह के त्याग को ही श्रेष्ठ माना गया है। अंतरंग परिग्रह के त्याग बिना बाह्य परिग्रह के त्याग का कोई मूल्य नहीं है। जीवन में अपरिग्रह का होना बहुत जरूरी है। क्यों कि व्यक्ति की इच्छायें असीम व अनंत है, उन पर नियंत्रण रखने के लिये और शांति पूर्वक जीवन जीने के लिये अपरिग्रह का होना अति आवश्यक है।


जिस प्रकार खान से निकले हुए कोयले से आवृत्त हीरे में बाहर से काला दिखने पर भी आन्तरिक सौंदर्य एवं चमक पूरी की पूरी विद्यमान होती है। जरूरत केवल बाहृय कालिमा को हटाने की है। सर्वांगसुन्दर हीरा अपने दैदीप्यमान रूप में स्वत: ही प्रगट हो जाता है। खान से निकली पत्थर की शिला में प्रतिमा छिपी होती है जिसे पारखी व कुशल कारीगर पहचान लेता है और बाहरी आवरण -अतिरिक्त पत्थर हटा देने पर वह सर्वांगसुन्दर प्रतिमा प्रगट हो जाती है जो प्रतिष्ठित होने पर जगत पूज्य बन जाती है। भगवान महावीर कहते हैं कि इसी प्रकार हीरे के पत्थर में हीरा तथा पत्थर की शिला में देव प्रतिमा स्वाभाविक रूप से ही विद्यमान है, उसी प्रकार इस आत्मा में भी परमात्मा विद्यमान रहते हैं। विकारों को हटाकर परमात्म स्वरूप का दर्शन किया जा सकता है।


हमारी अभी के दौर में आर्थिक शब्दावली कुछ ज्यादा ही चलन में है, लिहाजा जीवन मूल्यों को भी आयात-निर्यात की नजर से देखा जाने लगा है। लेकिन भारत ने अपने मूल्य न तो अभी तक किसी पर थोपे हैं, न ही उनका निर्यात किया है। इनमें से जो भी दुनिया को अपने काम का लगता है, उसे वह ग्रहण करती है, ठीक वैसे ही, जैसे अन्य समाजों से हम ग्रहण करते हैं। जिस दौर में दुनिया अहिंसा को एक भारतीय मूल्य के रूप में अनुकरणीय मानती थी, भारत की धरती पर उस दौर में संसार का सबसे बड़ा साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलन अहिंसा के सिद्धांत पर ही संचालित हो रहा था।


दूसरों को दुख देना या दूसरों के अधिकार छीनना ही हिंसा है, यह कौन समझेगा। दूसरों के अधिकार छीनना हमें ही दुख पहुंचाएगा, जब तक हम यह नहीं समझेंगे तब तक न्याय नहीं कर सकते। महात्मा गांधी ने हिंद स्वराज में ग्राम स्वतंत्रता की बात की थी और कहा था कि बगैर उसके समानता नहीं आ सकती। आज दुनिया के अनेक देशों में स्वायत्तता निचली इकाइयों तक पहुंची हुई है, लेकिन हमारे देश में जब तक हम इस बारे में मूल रूप से सोचना शुरू नहीं करेंगे, तब तक देश में हिंसा होती रहेगी। हमें दूसरों के दुख के बारे में सोचना होगा। श्री दलाई लामा ने ठीक ही कहा है कि हमारे पास आयात करने के लिए तो बहुत कुछ है, लेकिन निर्यात करने के लिए अहिंसा के अलावा कुछ नहीं। लेकिन सबसे बड़ी शर्त यह हो कि जो निर्यात करते हैं, उसे अपने लिए भी तो उपयोगी मानें। महावीर की अहिंसा को जीवन की मूलधारा से जोड़ें। सर्वपल्ली डॉ.राधाकृष्णन ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि यदि संसार को तबाही से बचाना है और कल्याण के मार्ग पर चलाना है तो भगवान महावीर के अहिंसा के महान सन्देश और उनके बताये हुए रास्ते को ग्रहण किये बिना और कोई रास्ता नहीं है।


मानवीय सभ्यता और संस्कृति का उच्चतम बिंदु है अहिंसा। हिंसा जीवन यात्रा के साथ जुड़ी हुई है पर वह जीवन के विकास का अंग नहीं है। मनुष्य चिंतनशील प्राणी है, इसलिए वह हर क्षेत्र में विकास की यात्रा करता है। सामाजिक स्तर पर भी अहिंसा एक विचार है। अध्यात्म के स्तर पर वह सर्वोच्च विकास है। समाज की आचार-संहिता अहिंसा के बिना पल्लवित नहीं हो सकती। अध्यात्म की आचार-संहिता उसके बिना बन नहीं सकती। अध्यात्म का पहला बिंदु अहिंसा है और चरम बिंदु भी अहिंसा है। वर्तमान युग में हिंसा बढ़ रही है। अपरिमित आण्विक अस्त्रों से भय का वातावरण निर्मित हो रहा है। हिंसक प्रशिक्षण के कारण आतंकवाद, उग्रवाद और नक्सलवाद के साये में अशांति पनप रही है। इस स्थिति में महावीर की अहिंसा, अभय, अनेकांत के विषय में चिंतन करना, सही और स्थायी समाधान खोजना समय की सबसे बड़ी मांग है।


आज हाईटेक युग में व्यक्ति लोभ, हिंसा, परिग्रह, तनाव, विषमता, भ्रष्टाचार, दहेज, कन्या भू्रण हत्या आदि शारीरिक पीड़ाओं और सामाजिक समस्याओं से ग्रस्त और त्रस्त है। इन तमाम समस्याओं के समाधान में भगवान महावीर के अनेकान्त दर्शन की महती भूमिका है। जहाँ अनेक अंत अर्थात् धर्म, विशेष, गुण और पर्याय पाये जाते हैं, उसे अनेकांत कहते हैं।


जन साधारण को जीव हिंसा से बचाने के लिए महावीर ने अहिंसा का उपदेश दिया और वैचारिक मतभेदों, उलझानों, झगड़ों आदि से बचने के लिए, शांति की स्थापना के लिए अनेकान्तवाद का सिद्धान्त दिया। अनेकांत भारत की अहिंसा का चरम उत्कर्ष है। इसे संसार जितना अधिक अपनाएगा , विश्व शान्ति उतनी ही जल्दी संभव है। वस्तु के यथार्थ स्वरूप को जानने की सही दृष्टि ही अनेकान्त है। चिंतन की अहिंसामयी प्रक्रिया का नाम अनेकांत है और चिंतन की अभिव्यक्ति की शैली या कथन स्याद्वाद है। अनेकांत एक वस्तु में परस्पर विरोधी और अविरोधी धर्मों का विधाता है। अनेकान्तवाद हमारी बुद्धि को वस्तु के समस्त आयामों की ओर समग्र रूप से खींचता है।
अनेकांत दृष्टि का अर्थ है - प्रत्येक वस्तु में सामान्य रूप से, विशेष रूप से, प्रिय और अप्रिय की दृष्टि से, नित्यत्व की अपेक्षा से, अनित्य की अपेक्षा से सद्रूप से और असद्रूप से अनंत धर्म होते हैं। समाज में विभिन्नता एवं साम्प्रदायिकता का विवाद भी अनेकांत से मिटाया जा सकता है। जब एकांगी दृष्टिकोण विवाद और आग्रह से मुक्त होंगे तभी भिन्नता में समन्वय के सूत्र परिलक्षित हो सकेगें। महावीर का अनेकांत हमें अनेकता में एकता के विधान का सम्मान करने की सीख देता है।


यदि गहराई में जा कर देखें तो भगवान् महावीर का सबसे महत्वपूर्ण सिद्धान्त अनेकान्तवाद और स्यादवाद है। महावीर ने कहा है कि सभी मत और सिद्धान्त पूर्ण सत्य या पूर्ण असत्य नहीं हैं। सापेक्ष दृष्टि से विचार करने पर सभी दृष्टिकोण सत्य ही प्रतीत होते हैं। इसलिए, अपने-अपने मत या सिद्धान्त पर अड़े रहने से संघर्ष बढ़ता है। आज जो वर्ग-संघर्ष, अशान्ति और शस्त्रों का अन्धानुकरण बढ़ रहा है, उसे रोकने में अनेकान्त की दृष्टि, सहअस्तित्व की भावना महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकती है।


समाज में एक ही प्रकार की जीवन प्रणाली, एक ही प्रकार के आचार-विचार की साधना न तो व्यवहार्य है और न संभव ही। वैचारिक सहिष्णुता के लिए अनेकान्तवाद के अवलम्बन की आवश्यकता है। सच्चा अनेकांतवादी किसी भी समाज या व्यक्ति के द्वेष नहीं करता। मानव की यह विचित्र मनोवृति हैं कि वह समझता है कि जो वह कहता है वही सत्य है और जो वह जानता है वही ज्ञान है क्योंकि इसके भीतर अहंकार छिपा हुआ है। अनेकान्तवाद से यही संकेत किया जाता है कि आचार के लिए और विचार के लिए सद्विचार, सहिष्णुता एवं सत्प्रवृति का सहयोग आवश्यक है। पर-पक्ष को सुनो उसकी बातों में भी सत्य समाया हुआ है। अनेकान्तवाद सिर्फ विचार नहीं है आचार-व्यवहार भी है जो अहिंसा, अपरिग्रह के रूप में विकसित हुआ है। इस प्रकार अनेकान्तवाद जीवन की जटिल समस्याओं के समाधान का मूल मंत्र है। यह सह अस्तित्व, वसुधैव कुटुम्बकम, जीओ और जीने दो की भावना का विकास करता है जिससे मानवीय गुणों की वृद्धि होती है. जीवन का सम्पूर्ण विकास इसी से संभव है।


अगर गौर करें तो अनेकता और एकता का सामंजस्य किये बिना लोकतंत्र की प्रतिमा प्रतिष्ठित नहीं हो सकती। इस सामंजस्य की प्रणाली का दार्शनिक आधार है अनेकांत। अनेकांत की चार प्रमुख दृष्टियाँ हैं - द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव। किसी भी वास्तु का मूल्यांकन द्रव्य सापेक्ष, क्षेत्र सापेक्ष, काल सापेक्ष और भाव सापेक्ष होना चाहिए। निरपेक्ष मूल्यांकन उलझनें पैदा करता है। आर्थिक विकास के लिए शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक शान्ति, भावनात्मक संतुलन पर्यावरण संरक्षण गौण हो जाएँ तो इसे अर्थनीति की विडम्बना ही कहा जाएगा। इसका समाधान भी महावीर के अनेकांत में निहित है।
भगवान महावीर का संदेश प्राणी मात्र के कल्‍याण के लिए है।

राजनांदगांव,छत्तीसगढ़

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: कोरोना से ज़ंग : महावीर वाणी के संग - डॉ.चन्द्रकुमार जैन
कोरोना से ज़ंग : महावीर वाणी के संग - डॉ.चन्द्रकुमार जैन
http://lh3.googleusercontent.com/-g1s_mPbdzP4/VlLtem7fRQI/AAAAAAAAoq4/MWIdt3Po6W0/image%25255B9%25255D.png?imgmax=200
http://lh3.googleusercontent.com/-g1s_mPbdzP4/VlLtem7fRQI/AAAAAAAAoq4/MWIdt3Po6W0/s72-c/image%25255B9%25255D.png?imgmax=200
रचनाकार
https://www.rachanakar.org/2020/04/blog-post_0.html
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/2020/04/blog-post_0.html
true
15182217
UTF-8
Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS PREMIUM CONTENT IS LOCKED STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy Table of Content