पुस्तक-समीक्षा - व्यंग्य-संग्रह: एक दीवार सौ अफ़साने कृतिकार: डॉ. स्नेहलता पाठक

SHARE:

पुस्तक-समीक्षा व्यंग्य-संग्रह: एक दीवार सौ अफ़साने कृतिकार: डॉ. स्नेहलता पाठक प्रकाशक: नीरज बुक सेंटर, दिल्ली-110092 मूल्य: 350.00 रुपये व्यं...

पुस्तक-समीक्षा

व्यंग्य-संग्रह: एक दीवार सौ अफ़साने

कृतिकार: डॉ. स्नेहलता पाठक

प्रकाशक: नीरज बुक सेंटर, दिल्ली-110092

मूल्य: 350.00 रुपये

व्यंग्य की किसी सशक्त पुस्तक पर कुछ लिखने का अवसर मिले तो हार्दिक प्रसन्नता होती है। और यदि यह पुस्तक डॉ. स्नेहलता पाठक जैसी विदुषी की हो जो पिछले 40 वर्षों से अपने व्यंग्य-लेखन को समाज का दर्पण बनाये हुए हैं तो मन आह्लादित हो जाता है। व्यंग्य-सृजन के श्रीमती स्नेहलता जी के योगदान को देखते हुए निःसंदेह वे देश की महिला व्यंग्यकारों में शीर्ष पर स्थापित हैं। कोई भी रचनाकार इस स्थिति को अनायास ही नहीं पा लेता है। इसके पीछे उसके समर्पण, लगन, धैर्य, अध्ययन और श्रमसाध्य सृजन का महत्वपूर्ण योगदान होता है। इस लिहाज से श्रीमती स्नेहलता जी ने न केवल खुद को सिद्ध किया है बल्कि अब वे और उनकी रचनाएं नए व्यंग्य लेखक-लेखिकाओं के लिए एक प्रेरणास्रोत और स्थापित मानदंड हैं। मैं हमेशा व्यंग्य के नैसर्गिक संस्कारों की बात करता हूं। मेरा स्पष्ट मानना है कि जब तक किसी भी विधा के लेखन का नैसर्गिक सॉफ़्टवेयर लेखक के पास नहीं होगा, वह लेखक नहीं बन सकता। व्यंग्य के संदर्भ में ये सॉफरवेयर हैं ईमानदारी, नैतिकता, दायित्वबोध, सूक्ष्म दृष्टि, विसंगतियों पर पकड़, उनकी तथ्यपरक विश्लेषण क्षमता और हास्य-वृत्ति। ये ऐसे गुण हैं जिन्हें हम अभ्यास के द्वारा प्राप्त नहीं कर सकते। अलबत्ता व्यंग्य के टूल्स का प्रयोग, भाषा का कलेवर, लेखन के अन्य कलापक्षों का अभ्यास कर इनमें महारत हासिल की जा सकती है। इन्हें मैं लेखन का हार्डवेयर समझता हूं। श्रीमती स्नेहलता पाठक जी आज इसीलिए इस मुकाम पर पहुंची हैं क्योंकि उन्होंने सतत अध्ययन और अथक प्रयासों के द्वारा अपने नैसर्गिक गुणों एवं लेखन कौशल को समायोजित किया है।

लेखन वास्तव में देश, काल और परिस्थितियों के मद्देनजर व्यक्ति और समाज के अध्ययन से जन्मता है। लेखन का निर्झर तभी आकार लेता है जब व्यक्ति और समाज के लिए इंसानियत के पैमाने पर स्थापित व्यवहार और नैतिक मानदंडों की कसौटी पर व्यक्ति और समाज का आकलन किया जाता है। यहां मैं एक अपना व्यक्तिगत विचार व्यक्त करना चाहूंगा कि यदि व्यक्ति एवं समाज का व्यवहार स्थापित मानदंडों के अनुसार हो तो शायद समाज को दर्पण दिखाने की ज़रूरत ही न पड़े। ऐसे में सिर्फ वैसा ही साहित्य रचा जाय जैसा भक्तिकाल और रीतिकाल में रचा गया था। पर समाज को दर्पण दिखाने की ज़रूरत इसलिए पड़ी क्यों कि व्यक्ति और समाज के आचरण में पतन होने लगा, नैतिकताओं का ह्रास होने लगा। विसंगतियों को उजागर करने ही जरूरत महसूस हुई ताकि इसके प्रति लोगों को सचेत किया जा सके, उनमें चेतना जगाई जा सके। इस तरह विसंगतियां, आडंबर, अंधविश्वास, भ्रष्टाचार, सामाजिक भ्रांतियां और मानव प्रवित्तियां व्यंग्य और व्यंग्य के जागरणकाल का जनक बने।हमारे व्यंग्य पुरोधाओं ने हमें व्यंग्य की एक विरासत सौंपी जिसे आगे बढ़ाने के लिए कई व्यंग्यकारों ने खुद को व्यंग्य-लेखन के प्रति समर्पित कर दिया। श्रीमती स्नेहलता जी उसी पीढ़ी की महत्वपूर्ण महिला लेखिका हैं जिन्होंने अपने रचनात्मक योगदान से व्यंग्य-साहित्य को समृद्ध किया है।

पूर्णकालिक रूप से व्यंग-लेखन को समर्पित होने से पहले स्नेहलता जी ने गहन अध्ययन और मनन कर अपनी बौद्धिक चेतना को सम्पन्न किया है। आप शिक्षण कार्य से सम्बद्ध रही हैं और अपने सजसकीय महाविद्यालय, रायपुर में हिंदी के प्रोफेसर से लेकर विभागाध्यक्ष तक की गुरुतर ज़िम्मेदारी का निर्वहन किया है। गुरु होने की गरिमा व्यक्ति को अपने  सामाजिक सरोकारों के प्रति चेतना-सम्पन्न बनाती है। साथ ही साथ उसकी चिंतनशीलता और वैचारिक प्रतिबद्धता को भी प्रौढ़ता प्रदान करती है। स्नेहलता जी की जिम्मेदारियों के कई आयाम थे। घर-परिवार की जिम्मेदारियां, बच्चों की परवरिश, रिश्तेदारी के चक्रव्यूह, शिक्षण-संस्थान का  समयबद्ध कार्य निष्पादन, अध्ययन, चिंतन-मनन इत्यादि। उनकी ज़िम्मेदारियाँ जीवन के कई मोर्चों पर तैनात थीं। अपने समाज में एक सामान्य गृहणी का जीवन ही बहुत चुनौती भरा होता है। ऊपर से यदि नौकरी का आयाम जुड़ जाय तो चुनौतियां कई गुना बढ़ जाती हैं। अपने बहुआयामी व्यक्तित्व और प्रतिभा के बल पर श्रीमती स्नेहलता जी ने हर मोर्चे पर सफलता प्राप्त की। अपने साहस और सूझ-बूझ के बल पर उन्होंने चुनौतियों को अपने ऊपर कभी हावी नहीं होने दिया। और संभवतः यह उनका जोखिमों से जूझने का साहस और सरोकारों के प्रति प्रतिबद्धता ही थी जिसके कारण उन्होंने व्यंग्य-विधा को लेखन का माध्यम बनाया।

व्यंग्य-लेखन के अपने जोखिम हैं और समझौतों की कहीं कोई गुंजाइश नहीं होती है। सफल डॉक्टर बीमारियों से समझौता नहीं करता और आवश्यकतानुसार चीड़-फाड़ से नहीं कतराता है। व्यंग्यकार भी समाज का डॉक्टर होता है और यदि वह सामाजिक बुराइयों को उजागर करता है तो खतरा मोल लेता है। स्नेहलता जी कविता-विधा को चुन सकती थीं जिसमें आधुनिक एब्स्ट्रैक्टनेस की सरलता है या कथासाहित्य को सृजन का माध्यम बना सकती थीं जिसमें पर्याप्त स्वायत्तता है। सरल मार्ग छोड़कर उन्होंने तलवार की धार पर चलकर मुकम्मल होने वाले व्यंग्य-लेखन की चुनौती भारी विधा चुनी, इसके लिए में व्यक्तिगत रूप से उनका प्रशंसक हूँ। स्नेहलता जी के अब तक सात व्यंग्य-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। इनमें से "सच बोले कौआ काटे" और "व्यंग्यकार का वसीयतनामा" संग्रह की रचनाएं मैंने पढ़ी हैं। प्रस्तुत संग्रह "एक दीवार सौ अफ़साने" इनका आठवां व्यंग्य-संग्रह है। इसमें इनकी 31 रचनाएं शामिल हैं। बहुत सतर्कतापूर्वक किये गए विषयों का चुनाव और अनुशासनात्मक भाषा इनके लेखन की मुख्य विशेषताएं होती हैं। लेखनशैली में स्नेहलता जी प्रयोगधर्मिता की पक्षधर हैं पर अनावश्यक चमत्कारिक प्रतीकों से अपनी रचनाओं को बोझिल नहीं बनाती हैं। कुल मिलाकर इनकी रचनाएं सहज, सरल होकर भी विसंगतियों पर गहन प्रहार करती हैं।

अपनी पहली ही रचना 'आओ झाँसेबाजी खेलें' में यह बात बहुत रुचिकर ढंग से स्थापित होती है कि झाँसेबाजी जैसी विसंगति को कैसे हमने कला के स्तर तक पहुंचा दिया है। 'अजी सुनते हो' में पति-पत्नी के बीच अहमियत का वर्ग संघर्ष है तो 'अथ गंगू बाई व्रत-कथा-महात्म्य' द्वारा यह बात स्थापित होती है कि समाज मे अंध-विश्वास की जड़ें गहरी हैं। रचना 'बोलना ज़रा संभल के' पढ़कर बहुत करुणा उभरती है कि कैसे गरीब के द्वारा सार्वजनिक रूप से पानी मांगने को उसका अपराध समझ लिया जाता है। स्नेहलता जी छोटे-छोटे महत्वपूर्ण सामाजिक विषयों को उठाती हैं चाहे वह इस हाथ ले उस हाथ दे की अवांछित परंपरा हो, स्वार्थ-सिद्धि हेतु चरण पूजन के माध्यम से व्यक्ति पूजा की चापलूसी हो, सत्ता-पक्ष की जनकल्याण योजनाओं के कार्यान्वयन का विश्लेषण हो या संग्रह की प्रतिनिधि रचना 'एक दीवार सौ अफसाने' में एक दीवार के असंख्य आयामों में दखल की विवेचना हो। 'एक मुलाकत शूर्पणखा से' में शूर्पणखा के माध्यम से पौराणिक पात्रों का आज के संदर्भ में मानकीकरण किया गया है और नए तथ्यों को उजागर किया गया है। साहित्यकार को साहित्य के प्रसाद की ललक और पुरस्कार के बनते-विगड़ते समीकरण, होली के माध्यम से पत्नी और प्रेमिका की लालित्यपूर्ण समीक्षा, बसंत का प्रतीक लेकर मध्यमवर्गीय की व्यथा का निरूपण भी अन्य कुछ रचनाओं में प्रभावी ढंग से उभरता है।

डॉ. स्नेहलता पाठक जी की रचनाओं में शैलीगत पारंपरिक विशेषताएं दिखती हैं। निबंध-शैली का व्यावहारिक समदर्शी विश्लेषण का निर्वाह भी दिखता है और कथा-शैली में पौराणिक मिथकीय प्रतीकों और पात्रों का समावेश भी। पौराणिक संदर्भों को आज के परिवेश में सहजता से पिरो देना इनके लेखन की विशेषता है। हमारी सभ्यता और संस्कृति से खिलवाड़ करती हमारी ढुलमुल शिक्षा प्रणाली, कौमी एकता के नाम पर आयोजनों की आडम्बरयुक्त खानापूरी, देश में परिवर्तन की हवा में नैतिकताओं का विघटन और आहत होती देश-काल-परिस्थितियां, इंसानियत के ब्रांड को धराशायी करती जूतों की ब्रांड-कांशशनेन्स और राजनैतिक जूतमपैजार, सफ़ेद बालों का सहारा लेकर सफ़ेदपोश बूढ़ों का आखेटक चरित्र इत्यादि पर बड़ी सशक्त रचनाएं हैं इस संग्रह में। 'पांचाली भू लोक में' रचना जहां समाज में नारी की अस्मिता का जायज़ा लेती है वहीं 'रिसर्च ऑन गोबर' विश्वविद्यालयों में हो रहे शोध-प्रबंधों से जुड़ी विसंगतियों की बड़ी बारीकी से छिद्रान्वेषण करती है। 'सारंगा तेरी याद में...' नौकरानी बिना सब सून और जीवन की निस्सारता का लेखा-जोखा है तो 'सितंबर की रानी हिंदी' में हिंदी को समृद्ध करने के बहाने खुद को समृद्ध करने की होड़ और हिंदी की नाटक-नौटंकी का सफल चित्रण है।

डॉ. स्नेहलता पाठक व्यंग्य की उर्वरा भूमि छतीसगढ़ से हैं जहां स्व. लतीफ़ घोंघी और स्व. विनोद शंकर शुक्ल जैसे व्यंग्यकारों का वर्चस्व रहा है। इन्होंने अपने वरिष्ठों और समकालीनों से बहुत कुछ सीखा है। इन्होंने अपनी व्यस्तताओं के बावजूद आत्मानुशासन और बेहतर समय प्रबंधन के द्वारा बहुत लिखा है, गुणवत्ता से कम्प्रोमाइज किये बिना। इनकी लालित्यपूर्ण भाषा में परंपरागत सौंदर्य और अनुशासन है तो लेखन शैली के स्तर पर इनकी रचनाओं में पर्याप्त प्रयोगवाद नज़र आता है। आप पारंपरिक विषयों के साथ-साथ सामयिक विषयों पर भी बराबर कलम चलाती हैं। संग्रह की कुछ रचनाएं हैं 'सुनते थे बहुत शोर कुत्ते की वफ़ादारी का', 'थूकिये मगर संभल के', 'त्रासदी व्यंग्य लेखिका के पति की' और 'उमड़ता प्यार' इत्यादि जो पारंपरिक विषय हैं जिनपर विभिन्न विसंगतियों के संदर्भ में लगभग हर व्यंग्यकार ने लिखा है या लिखना चाहता है। दूसरी ओर 'तहलका-ए-'मी-टू'', 'ठेले पर वैलेंटाइन डे' या 'तलाश आत्म मोक्ष की' जैसी रचनाएं ज्वलंत सामाजिक समस्यायों की ओर इंगित करती हैं और इन पर स्नेहलता जी ने बड़े दायित्व के साथ लिखा है। खासकर ' तलाश आत्म मोक्ष की' बहुत हृदयस्पर्शी रचना बन पड़ी है।

संग्रह की तीन रचनाएं विशिष्ट हैं और इन्हें क्रम में पहले रखा जा सकता था। इनमें 'तुम सूरज, हम सूरजमुखी', रचना में हमारे देश की समग्र राजनैतिक विरासत का यथास्थिति उल्लेख किया गया है और यह बात स्थापित होती है कि इस देश मे राजनीति के कुचक्र ने व्यक्ति और समाज की सोच को भी भ्रष्ट कर दिया है। 'वह अब न झुकेगी' रचना में हमारे समाज में नारी की पराधीन स्थिति करुणा उत्पन्न करती है। ऐसे में वह अपने अस्तित्व, अपने अधिकारों के प्रति सजग होती है तो पुरुष प्रधान समाज को और चुभने लगती है। इसी तरह 'ये कहाँ आ गए हम' में आदर्श पारिवारिक संस्कारों  और अवधारणाओं के पतन का अध्ययन करते हुए विकासवाद और बाज़ारवाद की भूमिका को सामूहिक पारिवारिक परंपरा के लिए घातक निरूपित किया गया है। कुल मिलाकर प्रस्तुत संग्रह की रचनाएं समाज को आइना दिखाने में समर्थ हैं। इन रचनाओं की सम्प्रेषणीयता आश्वस्त करती है कि ये रचनाएं पाठकों से जुड़कर उनकी चेतना को झकझोरेंगी। आज व्यंग्य में इस बात की भी जरूरत है कि विसंगतियों के सुधार और समस्याओं के निराकरण की भी बात की जाए क्योंकि आज के व्यंग्यकार का दायित्व बहुत बड़ा है। आशा है डॉ. स्नेहलता पाठक जी अपनी आगामी रचनाओं में इस बात का ख्याल रखेंगी। एक बात और कहना चाहूंगा। रचनाओं के शीर्षक पर विशेष ध्यान देना चाहिए। मैं खुद अपनी रचनाओं में इस बात का खास ख्याल रखता हूँ।

आशा है डॉ. स्नेहलता पाठक जी का प्रस्तुत व्यंग्य-संग्रह पाठक-वर्ग का स्नेह पायेगा। शुभकामनाओं सहित-

श्रवण कुमार उर्मलिया

19/207 शिवम खंड, वसुंधरा,

गाज़ियाबाद-201012

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: पुस्तक-समीक्षा - व्यंग्य-संग्रह: एक दीवार सौ अफ़साने कृतिकार: डॉ. स्नेहलता पाठक
पुस्तक-समीक्षा - व्यंग्य-संग्रह: एक दीवार सौ अफ़साने कृतिकार: डॉ. स्नेहलता पाठक
http://4.bp.blogspot.com/-PxuhnQI9BVQ/XpLnbm9RNiI/AAAAAAABSEU/VXxR1_ah4fslvEUOWQTF3j93kK_FAgn8wCK4BGAYYCw/s320/dlbkliajejemcahn-703931.png
http://4.bp.blogspot.com/-PxuhnQI9BVQ/XpLnbm9RNiI/AAAAAAABSEU/VXxR1_ah4fslvEUOWQTF3j93kK_FAgn8wCK4BGAYYCw/s72-c/dlbkliajejemcahn-703931.png
रचनाकार
https://www.rachanakar.org/2020/04/blog-post_42.html
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/2020/04/blog-post_42.html
true
15182217
UTF-8
Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS PREMIUM CONTENT IS LOCKED STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy Table of Content