मेरी कुछ चुनिंदा कविताएँ - धर्मेन्द्र तिजोरी वाले "आजाद"

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मेरी कुछ चुनिंदा कविताएँ - ओ चाँद ! किसी भूखे को दिखती है तुम में रोटी किसी प्रेमी को दिखती है तुम में प्रेमिका कुछ वैज्ञानिक बसाना चा...

मेरी कुछ चुनिंदा कविताएँ -

ओ चाँद !

किसी भूखे को
दिखती है तुम में रोटी
किसी प्रेमी को
दिखती है तुम में प्रेमिका
कुछ वैज्ञानिक बसाना चाहते हैं
तुम पर बस्ती
कोई माँ अपने बच्चे को
बताती है तुम्हें मामा

ओ चाँद !
जब तुम इन पर मुस्कुराते हो
तो लगते हो सच्चे नेता !

- धर्मेन्द्र तिजोरी वाले "आजाद"


ओ कान्हा !

कब से तेरे दीदार को
तरसती हैं मेरी आँखें
सूखे पड़े हैं होंठ
जूठे माखन के लिये
और कानों में है सन्नाटा
मीठी मुरली के लिये

ओ कान्हा !
इनकी तसल्ली के लिये कुछ कर
या ये कल्पुर्जे भी अपने ही पास रख !!

- धर्मेन्द्र तिजोरी वाले "आजाद"


ओ राधे !

ले लो आलू प्याज टमाटर...!
चिल्लाते हुये
जब गुजरता है सब्जीवाला
तो उसकी आवाज़ से ज्यादा फैलती है
हरी धनिया की खुशबू

इस हरी धनिया को कितना ही मसलो
कितना ही कुचलो
ये और और महकती है
और चटनी में मिलाये जाने वाले
आम लहसुन प्याज टमाटर तो छोडिये
कुचलने वाले शिल पट्टे को भी
अपने रंग में रंग लेती है

ओ राधे !
क्या ऐसा ही था तेरा प्रेम ...!!

@धर्मेन्द्र तिजोरी वाले "आजाद"


लड़की के सपने

लड़की सुन नहीं पाती
"मैसेज आया मैसेज आया" की टोन
क्योंकि उसका मोबाइल
घर में रहता है सायलेंट

लड़की के भाई होते हैं दिमाग के तेज
इसलिये वो नहीं रख पाती वायब्रेट भी
माँ भी स्क्रीन की लाइट से भाँप जाती है
सबसे खास सहेली के नाम से
आनेवाली कॉल किसी और की है
इसलिये वो अपना सेल्फोन
तकिये के नीचे भी रखती है स्विच ऑफ
और सुबह भेजी गई गुड मॉर्निंग
रात के एक बजे
स्क्रीन्ड बाक्स में पहुँचकर
डिलीवरी रिपोर्ट देती है
जब सबके सो जाने पर
बाथरूम के बहाने उठती है लड़की
और सायलेंट मोबाइल का करती है स्विच ऑन
लेकिन तब तक
गुड मॉर्निंग भेजने वाला खो जाता है
गहरी नींद के सपनों में
और इधर टूटने लगते हैं
लड़की के सपने !

@धर्मेन्द्र तिजोरी वाले "आजाद"


आखिरकार

एक मूर्ति गिराकर
वे अपने मकसद में कामयाब होने को हैं
लोग भूल गये कि लल्लू को तीन का पहाड़ा नहीं आता
लोग भूल गये कि ये पूँजीपतियों का मैनेजर है
लोग भूल गये कि भागे हुये चोर
इसी खानदान से हैं
लोग भूल गये कि लड़ाकू विमान में भी घपला हुआ है!

वे अभी और मूर्तियाँ तोड़ेंगे
लेनिन को भूलने के लिये नहीं
गाँधी को मिटाने के लिये नहीं
सिर्फ अच्छे दिनों से ध्यान हटाने के लिये !

इसलिये अब किसी काले धन की चर्चा मत करो
ना बाबाओं पे ऊँगली उठाओ
सच्चे देश भक्त की तरह सारे जुमले भूलकर
मान जाओ कि पूरा देश स्वच्छ शौचालय बन चुका है
घर से भागा हुआ पागल विकास लौट आया है !

मान जाओ मूर्खो ...
नहीं तो ये ऐसे ही तोड़ फोड़ करते रहेंगे
और तो और
ये केशव कुटी में रखी हुई
अपने बाप गोडसे की मूर्ती को भी तोड़ देंगे
जिसके लिये गाँधी पे दोष मढ़ देंगे
और सजा के तौर पे राष्ट्रपिता का सम्मान छीनकर
नोटों से भी गोल कर देंगे !

हालांकि वे जानते हैं
गाँधी न मरा है न मर सकता है ऐसे
और लेनिन या मार्क्स भी मूर्तियों में नहीं
फिर भी वे ये सब करते रहेंगे
क्योंकि वे अपने पितामह की तरह जानते हैं
हर क्रिया की होती है एक प्रतिक्रिया

आखिरकार
वे अपने मकसद में कामयाब होंगे !!!

@धर्मेन्द्र तिजोरी वाले "आजाद "


किराये का घर

उन्होंने बनवाया है जो आलीशान बँगला
उसमें वो बहुत गहरी नींद सोते हैं
जबकि बँगले की हर एक ईंट के नीचे
रेत में दबे हैं सपने
और सीमेंट से जुड़े हैं दर्द
इसलिये बच्चे चौंक पड़ते हैं रात में
जब डरा जाता है किराये का घर

हालांकि
बिलकुल भी स्थाई नहीं थी मेरी नौकरी
इसलिये वो किराये का घर
अब मेरा अस्थाई पता भी नहीं

कुछ-कुछ अहसास तो था मुझे
कच्ची माटी से बने
मेरे किराये के घर को तोड़कर
बनाया जायेगा एक आलीशान बँगला
या कोई सुपर मार्केट
फिर भी
अपने ही घर की तरह रहा
किराये के घर में

फिलहाल
वो किराये का घर
किसी और का निज निवास है
जिसके बिजली का मीटर
अभी तक मेरे नाम पर है

@धर्मेन्द्र तिजोरी वाले "आजाद"


ईश्वर के पास

ईश्वर के पास नहीं होती
लेकिन दुश्मन के पास होती है देह
जो कई हथियारों से होती है लैश
यौन आकांक्षाओं से भरपूर देह में
नाखूनों से भी खतरनाक होते हैं आँसू
जिन्हें पोंछने के लिये बहाते हैं पसीना
वही खून चूसकर हो जाते हैं रंगीन
जो गालों पर निशान छोड़ते हुये
धरती पर नहीं गिरते
सीधा गले के रास्ते
कपड़ों को जलाते हुये
नंगा कर जाते हैं
इसके बाद की हँसी सुनाई तो नहीं देती
लेकिन सिखा जाती है बहुत कुछ !

@धर्मेन्द्र तिजोरी वाले "आजाद"


साक्षात्कार


किसी साक्षात्कार में
एक औरत से
दनादन सवाल पूछे गये
नौकरी करना क्यों चाहती हो ?
आपके पतिदेव क्या करते हैं?
धर्म राजनीति शिक्षा साहित्य
न्याय और इतिहास के अलावा
दुनिया के बारे में क्या जानती हो ?
जवाब में उसने बटनें खोलीं
नाड़ा खोला
और अचानक नंगी हो गई !

@धर्मेन्द्र तिजोरी वाले "आजाद"


आहट

उनके आने की
आहट नहीं होती
क्योंकि
सर्पों के पैर नहीं होते

उनके आने की आहट
सुनाई देती है
जब वो काट चुके होते हैं

उनके आने की
आहट कहाँ से हो
कहाँ हैं वो ! कहाँ नहीं !!

@धर्मेन्द्र तिजोरी वाले "आजाद"


लोकतंत्र में हनुमान

बंदरों में एक हनुमान था
या हनुमान एक बन्दर ?

कोई भी बन्दर
यूँ ही नहीं बन जाता हनुमान
अपनी छाती में रखना होते हैं राम-सीता
भले ही उनकी छाती में हों लव-कुश

गिलहरियाँ भी समझने लगी हैं
पुचकारों के निहितार्थ
इसलिए अब वो भी हनुमान बनना चाहती हैं
जबकि हनुमानों को भी
बन्दर बनाये रखना चाहते हैं वे

और अब तो वे
विभीषण को भी
राष्ट्रपति देखना चाहते हैं
क्योंकि प्रधानमंत्री तो रहेगा
उनका अपना हनुमान
लव- कुश के बालिग़ होने तक !

@धर्मेन्द्र तिजोरी वाले "आजाद"


इन्हें कर दूँगा दान

बहुत से ख्वाब हैं मेरी आँखों में
माँ की असीमित अभिलाषाएँ
पापा को कुछ कर दिखाने का सपना
कहीं भाई बहनों का स्नेह
अपनों का लगाव
तो कहीं तुम्हें पाने की चाह
तुम्हें खोने का दर्द भी
और कुछ अधखिंची सी तस्वीरें
लेकिन
जाने से पहले इन्हें कर दूँगा दान
फिर नहीं गुजरूँगा कभी
तुम्हारी गली से
इसके बावजूद भी
मैं रहूँगा पास
रोज देखूँगा तुम्हें
किसी और छत से
सुबह होने के बाद भी जिंदा रहेंगे
मेरी मम्मी मेरे पापा के अधूरे सपने
ये रहेंगीं जिसके पास वो भी सदा
मिलना चाहेगा मुझसे ख़्वाबों के ज़रिये
और इस तरह हर समय
इनमें बसूँगा मैं ,जिनमें बसी हो तुम .....!

@धर्मेन्द्र तिजोरीवाले ''आज़ाद''


साहस


पर्वत की महानता
बड़े से बड़े ऊँट को
बौना कर देती है
लेकिन
एक छोटी सी चिड़िया
साहस के बूते पर
उसे पार कर लेती है

@धर्मेन्द्र तिजोरीवाले "आज़ाद"


गीता कहती है


गीता कहती है कि आत्मा जल नहीं सकती
लेकिन आत्मा जलती है
भूखे बच्चे देखकर

गीता कहती है कि आत्मा भींगती नहीं
लेकिन वो भींगती भी है
खेतों में

गीता कहती है कि आत्मा बहती नहीं
वो क्या जाने कि आत्मा बहती भी है
दंगों में हताहत वृद्ध आँखों से

गीता कहती है कि आत्मा अमर है
जबकि सच तो ये है कि वो मर चुकी है !

@धर्मेन्द्र तिजोरीवाले "आज़ाद"


रोशनी


दीप तले अंधेरा
नहीं है दरअसल
अंधेरे के ऊपर
जल रही रोशनी

@धर्मेन्द्र तिजोरीवाले "आज़ाद"


ऊँचा


मैं तुलसी
तुम सागौन
लेकिन सोचो
ऊँचा कौन

@धर्मेन्द्र तिजोरीवाले "आज़ाद"


प्यार में पड़कर

लहरें बार-बार उठती हैं
सूरज को चूमने के लिये
प्यार में पड़कर
वो वाष्प बन जाती हैं
मगर सूरज तक नहीं पहुँचतीं

भटकते हुये बादल
कब तक भटकते
फिर पड़ जाते हैं
जंगल के प्यार में
यहाँ भी वो
पहाड़ी रास्तों की
तमाम ठोकरें खाते हुये
अन्ततः
हो जाते हैं खारे!

@धर्मेन्द्र तिजोरी वाले "आजाद"



गंदगी

गंदगी बढ़ती है
आसमान की ओर थूको
चाहे ज़मीन पर
फ़र्क इतना है
आसमान हँसता है
और ज़मीन रोती है !

@धर्मेन्द्र तिजोरी वाले "आजाद"


यादों की देह


देह की होती हैं यादें
और यादों की होती है देह
तभी तो
सर्दियों में धूप लेने और देने
गर्मियों में ठंडी हवा
और बारिश में भीगने-भिगोने
चली आती हैं यादें !

@धर्मेन्द्र तिजोरी वाले "आजाद"


कूलर


आम से लेकर खास तक
सब के सब महसूसते
आवश्यकता कूलर की

कूलर कि जैसे मीठी जुबां
कूलर कि जैसे उठता धुआँ
कूलर कि जैसे प्रियतम का प्रेम
कूलर कि जैसे लोहे का फ्रेम

पहले ये जरुरत सीमित थी
गर्मी के दिनों तक
मगर आजकल कुछ ठिकाना नहीं
मात्रा का भी पैमाना नहीं
ऑफ़िस हो या घर
दिन हो या रात
इसकी ज़रूरत व्यापक हुई है
क्योंकि बढ़ता रहा है दुनिया का ताप

जैसे कि कूलर
बारिश और ठण्ड में ज़रूरी हुआ है
क्योंकि पैदा किये हमने रक्तजीवी मच्छर
अपने समाज और मकानों के अंदर
और ऐसे में कूलर बचाता है हमको
मच्छर के डंक से

जैसे कि नारी बचाती है नर को
राक्षस होने से
सौंदर्यबोध से मुहब्बत के पहले
समर्पण से अपने मुहब्बत के बाद
बचाती है उसको आवारगी से
अपनी ममता में बाँध

जैसे कि कूलर देता है हमको
गर्मी में ठण्डक
जैसे कि प्रेमिका देती है चुंबन
जैसे कि बीवी सबेरे की चाय
जैसे कि दीदी राखी पे लड्डू
जैसे कि मौसी आने पे पैसे
जैसे कि मम्मी प्रतिपल दुआ
देता है सबकुछ पुराना सा कूलर

पुराना कि जैसे माटी का घर
पुराना कि जैसे भूतों का डर
पुराना कि जैसे बचपन का प्यार
पुराना कि जैसे पीपल का झाड़
पुराना कि जैसे दादी की लोरी
पुराना कि जैसे दा'जी का लाड़

बचाता है कूलर बाहर की लू से-
बाहर कि जैसे मुम्बई का सट्टा
बाहर कि जैसे दिल्ली का कट्टा
बाहर कि जैसे भोपाल की गैस
बाहर कि जैसे पटना की भैंस
बाहर कि जैसे चम्बल के डाकू
बाहर कि जैसे जबलपुर का चाकू
बाहर कि जैसे अयोध्या का मंदिर
इनसे बचाता है छोटा-सा कूलर

दिन हो या रात चलता रहे
जैसे कि औरत करती है चौका
करती है कपड़े बर्तन भी साफ
आँगन में झाड़ू बच्चों को प्यार
सरकारी नल से पानी को ढोकर
चूल्हे की आंच में भोजन तैयार

जैसे कि कूलर देता है हमको
घर में सुकूं और ऑफ़िस में याद
ठण्डी हवा चाहे दिन हो या रात

लेकिन सभी अपनी मस्ती में मस्त
देता नहीं कोई कूलर में तेल
ना ही किसी को है पानी की फिक्र
खोलता नहीं कोई खसखस के छेद
जो भर गये हैं हवा देते-देते

ऐसे में गर गोल हो जाये लाईट
या कि बिगड़ जाये छोटा-सा कूलर
फिर चाहे जितनी करें देखभाल
बढ़ता रहेगा दुनिया का ताप
क्योंकि ज़रूरत है इन्सां की कूलर
जितना कि कूलर को बिजली और तेल

@धर्मेन्द्र तिजोरी वाले "आजाद"



ईश्वर के पक्ष में


यदि ईश्वर कहीं होता
दिखाई भी देता
बीमार आँखों से नहीं तो कम से कम
बिना किसी चश्मे के
यदि नहीं भी होता
भटकाव से बचाने के लिये
अहसास ज़रूर कराता
अपने न होने का

ईश्वर सुख नहीं दे सकता
अगर दे सकता तो मुझे ही क्या
सभी को देता
अब जब वो सुख नहीं दे सकता
तो दुख क्या देगा
और दे भी सकता अगर
तो किसी को न देता

कण कण में नहीं है ईश्वर
अगर होता तो
टट्टी पेशाब में भी होता
और न भी होता अगर
मंदिर मस्जिद गुरुद्वारा चर्च
जैसी जगहों में तो नहीं ही होता
आखिर नब्बे फीसदी दुनिया को
फुटपाथ पर छोड़कर
वह आलीशान इमारतों में
कैसे रह सकता है
रह भी सकता अगर वो
बराबर की जगह देता
अपने गर्भगृह में ही
ब्राह्मण देवता के साथ
अछूत लोगों के लिये भी

समझ से परे है
मेरा हर एक विचार
कठोर नास्तिकता के बावजूद
ईश्वर के पक्ष में क्यों है !

@धर्मेन्द्र तिजोरी वाले "आजाद"


जड़ें

बहुत गहरी होती हैं
पीपल की जड़ें
तभी वो रहता है
बिल्कुल स्थिर अचल
तो गहरी ज़ड़ों वाले रिश्ते चलेंगे कैसे !

@धर्मेन्द्र तिजोरीवाले 'आज़ाद '


लड़की के बारे में ....


लड़की जब होती है गर्भवती
उसकी आँखों में होते हैं सपने
और सपनों में नहीं होती लड़की !

फीकी -सी मुस्कानें ओढ़े
मन भर वजनी मटमैला गुड़
आटा नमक के अनुपात में
हल्दी खसखस सोंठ चिरोंजी
इतने ही बादाम मखाने
रत्ती भर काजू किसमिस पिस्ता
नाम मात्र के घी में मिलकर
रचते हैं जो नाटक जैसा
उसकी प्रमुख पात्र है लड़की !

लड़की
जवान होते ही सीख जाती है
दुनिया की नजरों से बचकर
प्रेमी से मिलने की खातिर
पायल का संगीत दबाना

लड़की
औरत होते ही सीख जाती है
बच्चों को मीठी नींद सुलाकर
पतिदेव की सेवा करने
चूड़ी की आवाज दबाना

लड़की
कितना कुछ सीख जाती है
लेकिन
पैरों में पायल
और हाथों में चूड़ियाँ
बंधी ही रहतीं उसके जी से
मरते दम तक !

@धर्मेन्द्र तिजोरी वाले "आजाद"


फूल और काँटे


जो किसी का हो नहीं सकता
जिसे कोई पा नहीं सकता
केवल सन्मोहित कर सकता है
या सूखकर बिखर सकता है
उस खूबसूरत फूल से बेहतर है काँटा
जिसे कुछ नहीं मिला
अंधेरों के सिवाय
जो टहनियों पे जन्मा
शीर्ष की बजाय
जिसके स्वप्न सारे दब गये
अभावों और अशिक्षा में
सारी उम्र गुजर गई जिसकी
पूर्वाग्रहों और उपेक्षा में
मगर सर्वस्व समर्पित कर चुका
किसी फूल की सुरक्षा में

@धर्मेन्द्र तिजोरीवाले "आज़ाद"


धुआँ


इक आग है लड़की
और लड़का है पानी
जब मिलेंगे दोनों
धुआँ तो होगा ही

ऐसे में ध्यान रखना होगा
कई तरह की होती हैं कई चीजें
धुआँ भी एक है उनमें से

एक तरह का धुआँ उठता है
जब होती है पहचान
और आगे चलकर
जब साथ मिलता है
वादियों और बहारों का
बरसने लगता है
रिमझिम रिमझिम
बहने लगता है
कलकल कलकल

दूसरी तरह आग बुझाते समय
आग और पानी के सम्पर्क से
जो चुभता है आँखों में
और काली करता है छत

अब पूछता हूँ तुमसे
पहचान सही कि सम्पर्क ?

@धर्मेन्द्र तिजोरीवाले "आज़ाद"


संघर्ष


संघर्ष कभी व्यर्थ नहीं जाता
न कभी हारता है
कभी खत्म भी नहीं होता
थकता ज़रूर है लड़ते-लड़ते
ठहरता है आराम के लिये
थकान को समझने के लिये
साँसों को नियंत्रित करता है
शक्ति को एकत्रित करता है
और पुनः चल देता है
कामयाबी की ओर

@धर्मेन्द्र तिजोरीवाले "आज़ाद"


ज़िन्दगी क्या है


ज़िन्दगी क्या है मौत का कुआँ
न जीने की खुशी न मरने का गम
बस पेट के लिये ही कुर्बान हम

ज़िन्दगी क्या है अधूरा ख्वाब
सबकुछ रहते भी रहती प्यास
लगी ही रहती किसी की आस

ज़िन्दगी क्या है आँसूओं का सागर
कुछ पाने में आते तो कुछ खोने में आते
यह सब एकत्रित हो इक दरिया बन जाते

ज़िन्दगी क्या है एक कशमकश
कर्तव्य भूलकर अधिकार की जंग
अधिकार न मिले तो मोह भंग

ज़िन्दगी क्या है एक नज़र
मुहब्बत से देखो तो खूबसूरत
नफरत है दिल में तो बदसूरत

@धर्मेन्द्र तिजोरीवाले "आज़ाद"


बेटियाँ नहीं जानतीं


कितना आसान है
उन्हें गर्भ में ही मार देना

और कितना मुश्किल है
उनके साथ
पराये हो जाने का दर्द
साथ-साथ पालना

पापा जानते हैं
बेटा बिगड़ा तो पानी नहीं देगा
और सुधरा तो छुट्टी नहीं मिलेगी
फिर भी वो उसे पहले दिन से सहते हैं
सहने को अपनी आदत बनाने के लिए

पापा ये भी जानते हैं
जिस मैना में उनकी जान है
वो अपने पिंजरे से मोह न कर बैठे
तो उसे जंजीरों का अहसास कराने
उसके हिस्से की टाफी भी
देते हैं हमेशा 'भैया' को

लेकिन बेटियाँ नहीं जानतीं
उनकी ज़िन्दगी में
जो एक नेगेटिव किरदार है
वो इतना भी बुरा आदमी नहीं !

@धर्मेन्द्र तिजोरीवाले "आज़ाद"

बेटियाँ जानती हैं


छाती से चिपकी बेटी का
पेट भरने के पहले ही
झटक लेती है निप्पल

बेटियाँ जानती हैं
माँ सिखा रही है लड़ना
दूध से
खून से
और भूख से

भूख से लड़कर ही
दुनिया से लड़ा जा सकता है !

@धर्मेन्द्र तिजोरीवाले "आज़ाद"


कुर्सी के बारे में कुछ आधी-अधूरी बातें


कुर्सियाँ यूँ तो लकड़ी की बनी होती हैं
लेकिन अब लोहे में भी उपलब्ध हैं

इन कुर्सियों पर जो भी बैठ जाता है
वो इनकी तरह ही हो जाता है

पहले कुर्सियों के पैर नहीं होते थे
तभी ये रेत और पानी में भी चल सकती थीं
लेकिन जबसे इन पर
सेवानिवृत्त नौकरशाह बैठने लगे हैं
इनके पैर ऊगते जा रहे हैं

समाज का जिस संस्था से भरोसा उठ जाता है
वो ही इसका मजबूत पैर बन जाता है
मीडिया भी अब इसका मजबूत पैर है
और न्यायपालिका प्रतीक्षा सूची में है

कुर्सियाँ चाय काफी या शर्बत नहीं पीतीं
वो सिर्फ खून पीतीं हैं
और शराब से नहाती हैं

कुर्सियों का एक पेट भी होता है भारी भरकम
जो कभी भरता नहीं है

कुर्सियाँ शाकाहारी नहीं होतीं
उनको लाशों की ज़रूरत पड़ती है
भूख में न तिलक देखा जाता है
और न ही खतना

कुर्सियाँ हमेशा जवान रहती हैं
वो शिलाजीत भी बारूद के साथ लेती हैं

कुर्सियों में दिमाग तो होता है
लेकिन दिल नहीं होता

कुर्सियाँ वक़्त को गुलाम बनाना चाहती हैं
वो चाहती हैं कि सूरज भी उनके हिसाब से चले
उनकी चौखट पर दरबारी करे
और बाकी जगह अंधेरा रहे

कुर्सियाँ जब मुस्कुरातीं हैं
तो काले से काला धन भी
किसी हीरोइन जितना गोरा हो जाता है
और कुर्सियों के हँसने पर
जीडीपी लुढ़क जाती है

कुर्सियाँ जब उदास होती हैं
बारूद की बू आने लगती है
बस्तियाँ जल उठतीं हैं
लेकिन इस आग में
इनका कभी कुछ नहीं बिगड़ता
ये जेड प्लस सुरक्षा में
मालिश करातीं रहतीं हैं

@धर्मेन्द्र तिजोरीवाले "आज़ाद"


यादों का शोर !

मोबाइल खो जाता है तो नंबर खो जाते हैं
नंबर खो जाता है तो कुछ अपने भी खो जाते हैं
तभी तो लोग इंसानों की बजाय नंबर की कद्र करते हैं
नंबर को चाहते हैं और नंबर को ही मिस करते हैं

तुम्हें पता है 7503 !
मैं आज भी तुम्हें उतना ही मिस करता हूँ
जितना कालेज के दिनों में
तभी तो मेरा पासवर्ड हो तुम

और .. तुम्हें पता है 7481!
कितना मिस करता हूँ तुम्हें !

आज जब तुम्हारी य़ादों का शोर सोने नहीं देता
तो मुश्किल से बहल पाता है दिल
जैसे माँ बहला देती थी थाली में चाँद उतारकर
और पानी को थपथपाकर चहक उठता था ऐसे
कि पा ही लिया हो चाँद को
आज वैसे ही तुम्हारे नंबर को कागज पे लिखकर
नींद की गोली की तरह गटक लेता हूँ
तो लगता है तुम समा गये हो मुझमें

@धर्मेन्द्र तिजोरी वाले "आज़ाद "


पता- तेन्दुखेड़ा, जिला- नरसिंहपुर (म प्र)-487337

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद 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पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi 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रचनाकार: मेरी कुछ चुनिंदा कविताएँ - धर्मेन्द्र तिजोरी वाले "आजाद"
मेरी कुछ चुनिंदा कविताएँ - धर्मेन्द्र तिजोरी वाले "आजाद"
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