व्यंग्य - मेरी आत्म व्यथा - वीरेन्द्र सरल

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व्यंग्य मेरी आत्म व्यथा वीरेन्द्र सरल समीक्षा लिखने की कला तो मुझे आती ही नहीं है पर आजकल पाठकीय प्रतिक्रिया देने को अभिशप्त हो गया हूँ। किस...

वीरेन्द्र सरल

व्यंग्य

मेरी आत्म व्यथा

वीरेन्द्र सरल

समीक्षा लिखने की कला तो मुझे आती ही नहीं है पर आजकल पाठकीय प्रतिक्रिया देने को अभिशप्त हो गया हूँ। किसी की किताब पढ़ी नहीं कि मन प्रतिक्रिया देने को ललचाने लगता है। विचार आता है क्या पता इसी चक्कर में कुछ अच्छा लिख जाऊं और अंधे के हाथ बटेर लगने का मेरा स्वप्न साकार हो जाये। मेरी लिखी प्रतिक्रियाओं को पाठक पुस्तक समीक्षा समझते हैं। उनकी खुशी में ही  मेरी खुशी है । जोश में होश खोकर अब मैं भी अपनी प्रतिक्रियाओं  को समीक्षा समझने लगा हूँ। मैंने जिसकी भी किताब की समीक्षा एक बार लिखी, उनकी हिम्मत मुझे दोबारा किताब भेजने की नहीं हुई। यही मेरी समीक्षा लेखन का प्रतिफल और प्रसाद है। पर मैं उन लेखकों का क्या कहूँ, जिनका पाला आज तक एक बार भी मुझसे नहीं पड़ा है। वे तो मुझे कुख्यात समीक्षक ही समझते हैं। उनको लगता है कि मैं दिन दहाड़े किसी भी किताब की समीक्षा लिख सकता हूँ। लिख सकता हूँ ये तो सही है पर दिन दहाड़े लिखने की मेरी हिम्मत नहीं है। लुक छिपकर किताब की भूमिका और अपनी बात से कुछ वाक्यों को उठाकर, उसे तोड़ मरोड़ कर और उसी में प्रशंसा के अपने दो चार वाक्य मिलाकर समीक्षा लिख लेना अलग बात है लेकिन पूरी किताब पढ़ कर समीक्षा लिखने से तो नानी याद आने लगती है। नानी यादों में आकर कहती है कि बस कर पगले, बड़ा समीक्षक बना फिरता है। पहले अपनी ही किताब की  किसी बड़े लेखक से ढंग की समीक्षा लिखा के तो दिखा। जब ढंग से समीक्षा होगी तो तुझे नानी के साथ नाना जी भी याद आने लगेंगे, समझा? यादों में ही सही पर नानी मेरी दुखती रग पर हाथ रख देती है।

जो भी हो समीक्षक के रूप में मेरा विज्ञापन तो हो ही चुका है और आत्ममुग्ध होकर मैं धड़ल्ले से समीक्षा लिखे जा रहा हूँ । पता नहीं क्यों किसी परिचित और महिला लेखकों के किताबों पर लिखते समय मेरे मन में  बहुत अच्छे -अच्छे विचार सूझते हैं और प्रशंसा में कसीदे गढ़ने की मेरी बुद्धि एकदम सक्रिय हो जाती है। मेरी कलम बिना थके बिना रुके नॉनस्टॉप चलकर लम्बी चौड़ी समीक्षा लिख मारती है। मगर जैसे ही किसी अपरिचित पुरुष लेखक की किताब हाथ लगती है तो सारा मजा किरकिरा हो जाता  है, एक लाइन लिखने में भी पसीना निकलने लगता है और समीक्षा लिखना घाटे का सौदा लगने लगता है। जो भी हो पर जमे जमाये धंधे पर लात मारना मूर्खता ही कही जाएगी सो अपना धंधा तो चल ही रहा है। ये अलग बात है कि जिन लेखकों  की कृति की मैंने प्रशंसा की वे तो मेरे मुरीद हो गए पर जिसकी कमियां गिना दी वे लठ्ठ लेकर पीछे पड़ गए। इन दो पहलूओं के अतिरिक्त एक तीसरा पहलू भी है यह  मुझे  अभी दो चार दिन पहले पता  चला ।


 हुआ कुछ यूं कि मैं अपने शहर के चौक से पैदल गुजर रहा था कि पीछे से किसी की आवाज आई-" ओऐ! समीक्षक जी, एक लेखक को पीछे लगे देख क्यों सरपट भागे जा रहे हो? मैं लौटकर देखा, कोई अपरचित था। वह नजदीक आकर बोला- अभी के अभी फटाफट हमारे लिए  एक समीक्षा लिख मारिए।

 मैंने पूछा - पर आपकी किताब कहाँ है? 

 

जवाब मिला- अभी हमने अपनी किताब लिखी ही कहाँ है। सोचा पहले समीक्षा ही लिखवा लें ताकि बाद में कोई झमेला न रहे।

मैंने कहा- अच्छा! तो भूमिका कहो न। भूमिका मिल गई है क्या?


भूमिका का नाम सुनते ही उसके चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगी। वह थर थर कांपने लगा। फिर वह मुझे भयभीत आंखों से देखते हुए पूछा -" आप भूमिका के क्या लगते हैं जी ? भूमिका तो अब तक नहीं मिली पर उसके चक्कर में मेरी जमकर धुनाई हुई थी जी। आज भी मेरी हड्डी पसली में जब दर्द होता है तो बड़ी शिद्दत से मुझे केवल भूमिका के बाप और उसकी तेल पी हुई लाठी की याद आती है। क्या भूमिका के चक्कर लगाए बिना सीधे समीक्षा की ओर कदम नहीं बढ़ाया जा सकता जी?

मैंने समझाया-इसमें और ज्यादा खतरा है। इसमें धुनाई के साथ ही कुटाई- पिसाई की भी सम्भावना बनी रहती है। यह सुनते ही उसे चक्कर आ गया। उसे सम्हालकर मुझे ही उसको पास के होटल में ले जाना पड़ा।


 कई बार उसके चेहरे पर पानी के छीटें डालने पर उसे होश आया। होश आते ही उसने इधर-उधर देखते हुए पूछा- आप क्या लेते हैं जी?

उसके आशय से अनभिज्ञ मैंने कहा- क्या आजकल समीक्षा लिखने के भी पैसे लिए जाते हैं। ये तो मुझे भी पता नहीं है। आपको किसने बताया?

उन्होंने कहा- नहीं, नहीं मेरा यह मतलब नहीं बल्कि ठंडा या गरम से है।

 मैंने कहा- भाई!  आपने तो मेरा दिमाग गरम कर ही दिया है तो हम दोनों के लिए ठंडा मैं ही आर्डर कर देता हूँ। शीतल पेय आते ही हम उसे गटकते हुए बातचीत करने लगे फिर मैंने कहा-अब मैं चलूं?

 

उन्होंने कसकर मेरा हाथ जकड़ते हुए कहा- मगर आपने तो अब तक मेरी समीक्षा लिखी ही नहीं जी।  ऐसे कैसे चले जायेंगे आप? जब तक आप समीक्षा नहीं लिखेंगे तब तक मैं आपको छोड़ने वाला नहीं हूँ। मैंने कह तो दिया कि  मैं अपनी किताब बाद में लिख ही लूंगा पर आपको उसकी समीक्षा अभी ही लिखनी होगी।

उसकी बातों से मैं बाज के पंजे में फँसे चूजे की तरह छटपटा रहा था मगर अपने आप को छुड़ा नहीं पा रहा था। जी चाह रहा था कि कह दूं, पहले आप ही अपनी किताब की समीक्षा लिख लीजिए। आपकी किताब दो चार दिन में मैं ही लिख देता हूँ श्रीमान जी पर उसके आक्रामक पकड़ से मैं असहाय था। मुझ जैसे अघोषित समीक्षक तो सोच भी नहीं पाया था कि समीक्षा लिखने के चक्कर में ऐसे भी दुर्दिन देखने पड़ते हैं। सरे राह ऐसी भी दुर्गति होती है।


बहुत मुश्किल से उसे समझा बुझाकर मैं उससे अपना हाथ छुड़ाने में सफल हो पाया। वह खा जाने वाली नजरों से मुझे एक बार ऊपर से नीचे तक देखा जैसे कहना चाहता हो कि मेरी किताब की समीक्षा न लिखी तो देखना तुम्हारा क्या हाल करता हूँ। वह मुझे घूरते हुए आगे बढ़ गया और मैं बड़ी मुश्किल से उससे अपना पिंड छुड़ाकर हांफते हुए अपना घर लौटा।

 

वीरेन्द्र सरल

बोडरा, मगरलोड

पोष्ट  भोथीडीह

व्हाया मगरलोड

जिला धमतरी, छत्तीसगढ़

पिन 493662।

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. 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व्यंग्य - मेरी आत्म व्यथा - वीरेन्द्र सरल
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