सोमवार, 24 अक्तूबर 2011

कैस जौनपुरी का धारावाहिक - आओ कहें दिल की बात : किश्त 5 - सूरज

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आओ कहें...दिल की बात

कैस जौनपुरी

सूरज

पिताजी,

मैं आपका पुत्र सूरज, आपसे यह कहना चाहता हूँ कि, “काश...! आप हमें अगर गम्भीरता से लेते तो शायद मैं आज किसी अच्छी जगह जॉब पर होता. शायद मैं भी अपने जीवन में एक सफल इन्सान होता. शायद मैं भी एक अच्छी कम्पनी का एम्प्लोई होता या शायद एक अच्छा व्यापारी होता. अगर आपने हमारा सही मार्गदर्शन किया होता... अगर आपने हमें सीरियसली लिया होता... अगर आपने हम पर थोड़ा सा ध्यान दिया होता... अगर आपने हमारी थोड़ी सी फिकर की होती... तो शायद मैं भी आज आपने नाम की तरह चमकता...”

पिताजी, “आपने हमें अपना पुत्र तो समझा परन्तु खुद को पिता नहीं समझा...” आप सदैव अपनी जिम्मेदारियों से भागते रहे...

हम बिन माँ के बच्चे थे... इसलिए हमें थोड़े से स्नेह, प्यार और ममता की जरुरत थी जिसकी उम्मीद हम आपसे करते थे... करते हैं... और करते रहेंगे... और क्यूँ न करें...? और किससे करें...? क्यूंकि आप ही हमारे पालनहार हैं. परन्तु आपने हमें कभी गम्भीरता से लिया ही नहीं.... ना तो आप स्वयं कभी गम्भीर हुए... सदैव आपने दूसरों के ही कहने पर और दूसरों के ही मार्गदर्शन से काम किया... न तो आपने कभी हमारी सुनी और न तो कभी मानी...

मुझे मेरे जीवन भर सदैव यह मलाल रह जाएगा कि मैं आपने जीवन में एक सफल इन्सान, एक सफल व्यापारी न बन सका.

परन्तु मेरी यह कोशिश रहेगी कि मैं अपने बच्चों को यह कभी आभास भी न होने दूँ कि मैं अपने जीवन में किस कारण से असफल हूँ...? मेरी यह पूरी कोशिश रहेगी कि आने वाले समय में मैं अपने आप को पूरी तरह एक सफल इन्सान बना सकूँ.

मैं व्यर्थ का किसी को क्यों दोष दूँ...? क्योंकि होना वही है जो राम जी की मरजी है...!

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कैस जौनपुरी

 

qaisjaunpuri@gmail.com

www.qaisjaunpuri.com

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