बुधवार, 6 जून 2012

डॉ. हीरालाल प्रजापति की 10 ग़ज़लें

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            ग़ज़ल -1
आख़िरी क्या  सोचकर पहला  लिखा ।।
उनका इक्का  किसलिए दहला लिखा ।।

जिसको जग कहता थका न वाटिका ,
तुमने खाली उसको इक गमला लिखा ।।

पाक था उजला था इकदम साफ था ,
फिर भी तुमने उसको धुर मैला लिखा ।।

वाँ सभी लोगों के सिर बिन बाल थे ,
तुमने कुछ को ही मगर टकला लिखा ।।

अपना घर हरिद्वार काशी द्वारका ,
ग़ैर का मंदिर तलक चकला लिखा ।।

तुमने रिश्वत के लिए तारीख़ में ,
झूठे को हरिचंद का पुतला लिखा ।।

झूठ है या आधा सच है सूर को ,
तुमने काना गूंगे को हकला लिखा ।।

घर से भागा वो तुम्हारे जुल्म से ,
तुमने मर्ज़ी से उसे निकला लिखा ।।

मुंसिफाना और मुनासिब अपने सब ,
दूसरों का हर कदम घपला लिखा ।।

जब समझ न आई उसकी बात तो ,
तुमने दानिशमंद को पगला लिखा ।।

  

           ग़ज़ल -२
वो सीमोज़र वो जवाहर वो पाक लगते हैं ।।
हम उनके आगे लोह संग ख़ाक लगते हैं ।। 

वो अमलतास वो कचनार वो बरगद पीपल ,
हम तो महुआ, बबूल, बेर, ढाक लगते  हैं ।।

वो बहुत बढ़िया, बहुत अच्छे, बहुत  ख़ास दिखें ,
हम बुरे तो नहीं बस ठीक-ठाक लगते हैं ।।

वो महकते हुए संदल गुलाब के पौडर ,
हम उड़ती धुल ओ' कंडे की राख लगते हैं ।।

वो लिरा-पौंड वो दीनार वो डालर गिन्नी ,
हम तो फूटी हुई कौड़ी की आँख लगते हैं ।।

हम नहीं एक टन से एक मासा कम लेकिन ,
उनके  आगे तो तोला या छटाँक लगते हैं ।।

इक वही हमको समझते हैं पोला सरकंडा ,
बाक़ी दुनिया को हम भरी सलाख लगते हैं ।।

कृष्ण छिगुनी पे उठा लेते हैं गोवर्धन को ,
राम के आगे कहाँ पर पिनाक लगते हैं ।।

इतना उजला है उनका रंग इतना उजला है ,
हंस बगुले भी उनके आगे काक लगते हैं ।।

जितने लगते हैं हसीं भोले ख़ुशी के दम में ,
उससे खफगी में बहुत खौफनाक लगते हैं ।।
        

 
                ग़ज़ल -3
तेरे होते निर्जन भी कब निर्जन होता है ।।
सन्नाटों में भी भौंरों सा गुंजन होता है ।।

तू न दिखे तो सच आँखें औचित्यहीन  लगतीं ।।
तो जो मिले मन मरुथल वृन्दावन होता है ।।

तेरे सँग ही अपना जी भर लंच-डिनर होता ,
बिन तेरे केवल पीना या अनशन होता है ।।

तू राँझे को हीर सरीखा कैस को लैला सा ।।
मैं अंधे के हाथ में जैसे दर्पन होता है ।।

तू संतान नहीं मानव की कहीं से लगती है ,
तुझसी रचना का पितु अलख निरंजन होता है ।।

छूना भी तुझको यथार्थ में दिवा स्वप्न अपना ,
किन्तु स्वप्न में नित्यालिंगन चुम्बन होता है ।।

यों खग जी सकता है बिन पंखों के पर कब तक,
उड़ने वाले को चलना कब शोभन होता है ।।
                    

              ग़ज़ल -4
पहले थे नर्मोनर्म गुल अब केक्टस हुए ।।
आँखों का जो अंजन थे लाल मिर्च जस हुए ।।

पहले थे सुलभ सस्ते बीड़ी जर्दा तम्बाकु ,
अब कीमती सिगारो अफ़ीमो चरस हुए ।।

पहले थे उनके दूध में हम जाफ़रान से,
आज इक क़रीह भिनभिनाती सी मगस हुए ।।

सब कुछ था हममें खूबसूरती के सिवाय ,
हम नींव में गड़े वो चमकते कलस हुए ।।

जब से मिली है उनको इक हसीं की मोहब्बत ,
सूखे थे सुपाड़ी से वो गन्ना सरस हुए ।।

जीते जी पड़ोसी भी जिन्हें जान न सके ,
मरने के बाद उनके ज़माने में जस हुए ।।

करने को उनकी धूप को कुछ और चमकदार ,
पूनम के सब चराग़ अमा के तमस हुए ।।

चुभवा लीं सुइयाँ हँसके जगह से हिले बगैर ,
इक गुदगुदी के नाम से झट टस  से मस हुए ।।

                       
करीह=घिनौनी ,मगस =मक्खी 

 


                     ग़ज़ल -5
मुझको बँगले न हवेली न किसी घर की तलाश ।।
सर छुपाने को फ़क़त फूस के छप्पर की तलाश ।।

जिसके हर घर में बगीचा हो एक हो आँगन ,
गाँव जैसा हो मुझे वैसे इक शहर की तलाश ।।

न मिठाई न मेवे फल न दवाई-दारू ,
पेट की भूख जो मारे है उस ज़हर की तलाश ।।

न तेंदुआ न चीता; बाघ न कोई बिल्ली,
मुझको गब्बर ओ' ज़बर शेर-ए-बब्बर की तलाश ।।

न सुबह शाम का सूरज न सितारे ढूँढूँ ,
मुझको हर रात को चौदहवीं के क़मर की तलाश ।।

जिसने तकलीफ़ो ग़म न झेले न रोया हो कभी,
सारी दुनिया में मुझे ऐसे इक बशर की तलाश ।।

जिनको हममें ख़राबियाँ और ऐब दिखते हैं ,
हमको उनमें है इक अच्छाई इक हुनर की तलाश ।।

अब गुनाहों के खात्मे को मुझको लगता है,
इस ज़माने को है पुरताब पयम्बर की तलाश ।।

                     
[ क़मर=चाँद; बशर=आदमी; पयम्बर=अवतार ]
     
                   ग़ज़ल-6  
सर को उठा न ऐसे नुमूदार होइए ।।
करके गुनाह कुछ तो शर्मसार होइए ।।

बेकार सी न बनके क़ब्र घेरिये जगह ,
होना  है तो फिर ताज सी मजार होइए ।।

हालात ज़रुरत के मुताबिक़ कभी-कभी ,
रखकर कलम को जेब में तलवार होइए ।।

अड़ जाए एन वक़्त पे या फिर पटक ही दे ,
घोड़े पर इस तरह से मत सवार होइए ।।

दो के अगर न चार बनाने का हुनर हो ,
मरियेगा भूख से न कर्ज़दार होइए ।।

कब तक नदी के सूखने की राह तकेंगे,
न पुल न नाव तैरकर ही पार होइए ।।
                   
[ नुमुदार=आविर्भूत/प्रकट/व्यक्त ]

               ग़ज़ल-7
जो पाले नेवले उसको न काले साँप दो भाई ।।
हो जिसके हाथ में पत्थर उसे मत काँच दो भाई ।।

न ऐसे नाक भौं अपनी सिकोड़ो आँख न मींचो,
जो  दिखता हो कोई नंगा उसे बस ढाँप दो भाई ।।

जिन्हें नज्ला-ओ-सर्दी है ये उनको ही मुफ़ीद होगी,
जो गर्मी में सुलगते हैं उन्हें मत आँच दो भाई ।।

अगर करना हो सदक़ा तो वसीयत में दमे आख़िर ,
किसी को अपने गुर्दे और किसी को आँख दो भाई ।।

जला है दूध से इतना कि अब तो एहतियातन वो,
न पिता फूँके बिन चाहे बरफ सा छाँछ   दो भाई ।।

जो करते हैं ज़बरदस्ती हैं दहशतगर्द दंगाई ,
कलम कर उनके सर खम्भों पे लट्टू टाँग दो भाई ।।

न शाए' हो सका जो वो मेरा इस आख़िरी दम में,
क़ुरासा  मत पढ़ो दीवान लाकर बाँच दो भाई ।।

                 
[शाए'=प्रकाशित ;क़ुरासा=पवित्र ग्रन्थ/कुरान ;दीवान=ग़ज़ल संग्रह ] 

               ग़ज़ल-8
पानी में रह के बैर मगरमच्छ से लिया ।।
जीना था कई साल मगर सिर्फ़ कुछ जिया ।।

दुनिया में सबकी बात अदब से सुनी मगर,
जो दिल को ठीक-ठाक लगा बस वही किया ।।

अपना समझ के जब भी आँख मूंदकर यकीं,
जिसपे  किया उसी ने बराबर दग़ा किया ।।

नाक़ामयाब हो गए कितने ही रफ़ूगर ,
चिथड़ों को मेरे उनके सिए न गया सिया ।।

टिंडों का काम हमने घिया से भी चलाया,
ग़र नीम न मिली तो करेला ही खा लिया ।।

गंदा है फिर भी पानी है पीले यूँ थार में,
प्यासों ने वक़्त-वक़्त पे पेशाब तक पिया ।।
                
[ घिया=लौकी ;थार =एक मरुस्थल ]
 
            ग़ज़ल-9
अपनी मेहनत का उचित फल जब नहीं मिलता ।।
बीज शोषित में तभी विद्रोह का पड़ता ।।

या तो पक जाता है या फिर रोग से वरना,
शाख  से पत्ता हरा यूँ ही नहीं झड़ता ।।

कुछ न कुछ टकराव के हालात होते हैं ,
हर किसी से कोई यों ही तो नहीं लड़ता ।।

भीम के भी हाथ से दीवार में कीला,
बिन हथौड़े के गड़ाए से नहीं गड़ता ।।

जो खरा होता है लोहा भी तो बरसों तक,
रात दिन पानी में रहकर भी नहीं सड़ता ।।

एक सुर पर्वत को नाटा कहते रहने से ,
बौने टीलों का कभी भी क़द नहीं बढता ।।
                

              ग़ज़ल-10
बहरे को ज्यों सितार की झंकार व्यर्थ है ।।
अंधे पिया के सामने श्रृंगार व्यर्थ है ।।

यौवन में ब्रह्मचर्य बड़ी बात है माना ,
शादी का ढलती उम्र में विचार व्यर्थ है ।।

जपता जो ब्रह्म सत्य,ब्रह्म सत्य की माला ,
उसके लिए घर बार क्या संसार व्यर्थ है ।।

जो पक चुका हो आँच में उस घट को गलाने,
पानी में डुबो रखना लगातार व्यर्थ है ।।

जब तक न पिटेगी रहेगी चुप्पचाप ही ,
ढोलक पे उँगलियों की फेर-फार व्यर्थ है ।।

औलाद के लिए या किसी भी लिहाज से ,
कुंती के साथ पान्डु का अभिसार व्यर्थ है ।।
             

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                    [  डॉ. हीरालाल प्रजापति ]

drhiralalprajapati@gmail.com
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  2. sabhi ghazlein meaningful hain. bahut dino baad achhi istariya ghazlein padhne ko mili. aagey bhi aisi hi ghazlein prakshit ho...

    उत्तर देंहटाएं
  3. बेनामी12:57 pm

    Acchi gazalen.badhaai. kya Bina wale Heeralal ho? [Shrivastava uncle]
    Prabhudayal Shrivastava
    Chhindwara

    उत्तर देंहटाएं
  4. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  5. बेनामी10:43 pm

    prajapati ji ki sabhi ghazalein bahut pasand aayi.inmain dum hai jaan hai shaandaar hai.main inki anya ghazalein bhi padhne ka ichchchhuk hun.sampadak ji prakashit karein .inka parichai bhi de....Dhanyawad........ATUL MALVIYA

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. PRIY ATUL G ,AAPKI PRASHANSA SE ME ATI PRASANN HUA .KRIPYA AGE BHI APNI TIPPNI BHEJTE RAHEN . DHANYWAAAAAAAAAAD................
      SHUKRIYAAAAAAAAAAAAAAAAA.............
      THANK U ............................................AAPKA

      हटाएं
  6. PRIY ATUL G ,PRATIKRIYA KA KOTISHAH DHANYWAAD .
    AAPKI TARIF SE MAIN GAD-GAD HUA.IS TAREEF ME BAHUT DUM HAI , JEEWNI SHAKTI HAI .THANK U VERY MUCH .

    उत्तर देंहटाएं
  7. shishirkumar2:50 pm

    Aapki Gazalen hain khushbu bikherte sandal,
    Bhalehin daman se lipte Nag fufkar chhodte rahen.

    उत्तर देंहटाएं
  8. shishirkumar2:54 pm

    Aapki Gazlen hain khusbu bikherte sandal,
    Daman se lipte Nag bhale fufkar chhodte rahen.

    उत्तर देंहटाएं

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