कहानी लेखन पुरस्कार आयोजन (1) : प्रकाश गोविन्द की कहानी - दास्ताने-ए-आशूदा

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दास्तान-ए-आशूदा प्रकाश गोविन्द ================== लोग चाहे कुछ भी कहते फिरें, लेकिन आशू दद्दा पर कोई असर नहीं। वह हमेशा की तरह वैसे...

दास्तान-ए-आशूदा

प्रकाश गोविन्द

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लोग चाहे कुछ भी कहते फिरें, लेकिन आशू दद्दा पर कोई असर नहीं। वह हमेशा की तरह वैसे के वैसे ही रहे। आशूदा सच में पागल हैं। हो सकता है ऐसा न हो, लेकिन हम घर वालों की राय उनके प्रति यही मानी जाती रही कि आशूदा का पेंच ढीला है। पिताजी ने तो अपने शक को पुख्ता करने के लिए मनोचिकित्सक को घर बुलाकर बहाने से आशूदा को भी सामने बैठाया था। मनोविज्ञान का डाक्टर देर तक बातचीत करता रहा, बीच-बीच में कई तरह के सवाल पूछकर आशूदा का मुआयना करता रहा। मनोचिकित्सक का मानना था कि आशूदा बिलकुल ठीक हैं। बस जरा सामान्य लोगों से अलग हैं। इस पर पिताजी की प्रतिक्रिया थी कि पागलपन का मतलब भी तो यही है, जो सामान्य लोगों जैसा व्यवहार न करे, वो पागल है। सभी असहमति प्रकट करते डाक्टर के निष्कर्ष से।

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क्सर जब परिवार के लोग एक साथ बैठते तो चर्चा का विषय एक ही होता - आशू दद्दा। समय गुजरता गया, लेकिन कुल जमा जोड़ यही रहा कि आशू दा ने अपने को बदलने का तनिक भी प्रयास नहीं किया। वो वैसे ही रहे अलमस्त।

दुनियादारी का सम्बन्ध स्कूल या कालेज की डिग्री से थोड़े ही होता है। कहने को तो आशूदा एम.एस.सी फर्स्ट क्लास हैं। पर फायदा ? हर जगह मिसफिट। चार नौकरियां तो खुद छोड़ीं आशुदा ने और पांचवी से निकाल दिए गए। तीन नौकरियां तो सरकारी थीं। पोस्ट भी ऐसी कि रोज जेब तर रहे। आज की भीषण बेरोजगारी वाले युग में लोग एक अदद नौकरी का दिन-रात सपना देखते हैं। सरकारी नौकरी तो समझो ईश्वर का वरदान। लेकिन ये आशूदा भी एकदम बकलोल अव्वल दर्जे के।  जितने दिन भी नौकरी करते रहे, मानो दुनिया पर अहसान करते रहे। घर पर, सड़क पर, पता नहीं क्या-क्या बडबडाते रहते - ......."सरकारी कुर्सी मिल गई गई है तो जैसे हरामखोरी का लाईसेंस ही मिल गया है। किसी की दुःख तकलीफ मजबूरी नहीं समझते। दो मिनट का काम हो तो भी दो-दो .. तीन-तीन महीना दौडाते हैं। मजाल है कि बिना पैसा लिए किसी फाईल को हाथ भी लगा दें ... कफनचोर।"

से में पिताजी आशूदा को समझाने की कोशिश करते - "यू कांट डू एनिथिंग, एनिबडी कांट बीट इंडीजुवल दिस सिस्टम। सरकारी डिपार्टमेंट में काम ऐसे ही होता है। तुम्हारे पेट में दर्द काहे हो रहा है। तुमको तो महीने के आखिर में सेलरी मिल जाता है न।  तुम्हे इन सब बातों से क्या वास्ता।"

शूदा की बातें सुनकर हमें कोफ़्त होने लगती। मंझले दद्दा झल्लाहट में कह उठते - "इतने बड़े होकर भी कैसी बचकानी बात करते हैं ? राजा हरीशचंद्र की एजेंसी लेकर दुनिया को सुधारने का ठेका लिए हैं क्या आशूदा ?" हम सब देर तक मजाक बनाते उनका।

धीरे-धीरे हमारी अपनी अलग दुनिया होती गई। पहले मंझले दद्दा और फिर मेरी शादी विधिवत धूमधाम से संपन्न हुयी। आशूदा को तो कुंवारे ही रहना था सो वो कुंवारे ही बने रहे। वैसे भी कौन भलामानुष अपनी लड़की ऐसे आदमी को सौंप देगा, जिसकी सारी हरकतें पागल जैसी हों।  

शूदा पहले की तरह ही उन्मुक्त भाव से हँसते। बेफिक्र हो मंद-मंद मुस्कुराते रहते। कभी बांसुरी बजाते, कभी ढपली बजाकर लोकगीत गाते। घंटे-घंटे भर उनका सतरंगी कार्यक्रम चलता रहता। मैं और मंझले दा भीतर बैठे कुढ़ते रहते कि कैसे वह इतने आनंदमग्न रह सकते हैं, जबकि उनके पास कायदे के कपडे तक नहीं हैं। चार साल से एक ही चप्पल घिस रहे हैं। थोड़ा बहुत जो ट्यूशन से कमाते भी हैं तो उस पैसे से पता नहीं कैसी अगड़म-बगड़म सी किताबें खरीद लाते हैं।  

शूदा की वजह से हम भिन्नाये रहते। उन्ही के कारण घर कबाडखाना बना रहता है। हर जगह किताबें ......वेद, उपनिषद, गीता, कबीर, गांधी, टैगोर, सुकरात, लाओत्से, प्लूटो, हीगेल, रसेल, सात्रे, मार्क ट्वेन, गोर्की, बर्नाड शा, मार्क्स, नीत्से, खलील जिब्रान, ओशो ............... सैकड़ों किताबों का ढेर लगा हुआ है घर में। म्यूजिक सिस्टम को उठाकर बक्से की ऊपर रखना पड़ा। टीवी और फ्रिज के ऊपर भी आये दिन किताबें दिखाई देतीं। आशूदा भी अजीब सनकी। देर रात तक पता नहीं क्या-क्या आलतू-फालतू चीजें पढ़ते रहते हैं।  

शाम को आशूदा बाहर लान में आकर जब बैठते तो निठल्लों का जमघट लग जाता। घंटों वह दददा के साथ बहस करते। पता नहीं आशूदा में कैसा प्रभाव था कि जब वे गंभीर स्वर में अपनी बात कहते तो सब निःशब्द बैठे सुनते रहते।  सामजिक न्याय, आर्थिक विषमता, शोषण, मार्क्स और सात्र जैसे शब्द हवा के साथ उड़ते हुए हमारे कानों में ड्राईंगरूम तक आ पहुँचते, जहाँ हम घर के लोग बैठे टीवी पर किसी मनमोहक कार्यक्रम का आनंद ले रहे होते।

हस को बीच में ही आधी-अधूरी छोड़कर आशूदा सबको लेकर चल देते नुक्कड़ की चाय की दूकान पर।  काफी अर्से से दद्दा ने अपने मित्रों को घर पर चाय नहीं पिलाई। शायद तभी से, जिस दिन पिताजी आदतन बड़बडाये थे - "काम के ना काज के, दुश्मन अनाज के ...घर को होटल बना रखा है"।

धर हम और मंझले दा अपनी-अपनी सरकारी नौकरी में जम गए और रंग भी गए। एक-एक बच्चे के बाप भी बन गए। पर आशूदा रहे, जस के तस यानी सिर्री के सिर्री। इधर फिजिक्स और कैमेस्ट्री का ट्यूशन पढने के लिए तमाम स्कूली लड़की-लड़के आशूदा को घेरे रहते। जब-तब हमारे कानों को भी सुनने को मिल जाता है लोगों से - "शूदा कितना अच्छा पढ़ाते हैं, कितना दिल लगाकर मन से पढ़ाते हैं आशूदा"।

ह सब जानकर पिताजी के भीतर नई उम्मीद जगी। कुछ-कुछ आशा बंधने लगी कि कुछ नहीं से,  यह भी कुछ बुरा नहीं है। हम घर वालों के दिमाग के अंदर गुणा-भाग चलने लगा ..... बीस-पच्चीस से कम स्टुडेंट नहीं आते आशूदा के पास। अगर एक स्टुडेंट का कम से कम पांच-छह सौ रुपया भी मान कर चलें तो आशूदा बारह-पंद्रह हजार से कम नहीं कमाते। लेकिन अम्मा के हाथ में डेढ़-दो हजार रखकर छुट्टी पा जाते हैं।

क दिन सुबह चाय-नाश्ते के समय पिताजी ने बुलाया आशूदा को। हम लोग भी मौजूद हैं दद्दा की पेशी के वक़्त। पिताजी पूछते हैं - "का हो बड़के, केतना इनकम हो जाता है ट्यूशन से ?" 

'जी पिछले महीने तीन हजार आये थे'  आशूदा शांति भाव से जवाब देते हैं। चौंक पड़ते हैं पिताजी - "इतना कम ? आखिर कितना फीस तय किये हो उन सबसे ?" 

"जी कुछ भी तय नहीं किया है। वो लोग मुझसे पढना चाहते हैं, इसलिए पढ़ा देता हूँ। जोर जबरदस्ती से जितना रख जाते हैं, उतना ही रख लेता हूँ।"  आशूदा ने निर्विकार भाव से जवाब दिया।

पिताजी का पारा हाई हो जाता है। क्रोध के मारे मुंह से शब्द नहीं फूटते। बीच में मंझले दा मोर्चा संभालते हुए बोल उठते हैं - "दददा सुना है आप बहुत अच्छा पढ़ाते हैं। अपने हुनर का फायदा काहे नहीं उठाते। आप चाहो तो एक स्टुडेंट से हजार-बारह सौ रुपया फीस मिल सकता है। हजारों रुपया कम सकते हैं, लेकिन आप तो कुछ समझते ही नहीं।"  

"आई जस्ट कांट डू दैट ...सॉरी, मुझसे यह सब नहीं होगा।" आशूदा अपना वही पुराना दो टूक जवाब देकर बिना किसी की ओर देखे कमरे से बाहर निकल जाते हैं।  

पिताजी का बड़बड़ाना जारी रहता है - "अपने ही भाग्य में लिखा था ऐसा नमूना। लानत है ऐसी औलाद का बाप होना।" अंदर से अम्मा का रोना-सिसकना शुरू हो जाता है। जब भी आशू दददा के ऊपर कोप बरसता है तो अम्मा को लगता है कि अप्रत्यक्ष रूप से बात उनको सुनाई जा रही है। तीन-तीन पुत्रों के होते हुए भी घर के अंदर पिताजी, आस-पड़ोस वाले और नाते-रिश्तेदार सभी आशू की माँ कहकर ही बुलाते हैं। इतने बरसों में अम्मा अपना नाम ही भूल चुकी हैं। पिताजी को कोई काम होता तो यही कहते हैं - "सुनती हो आशू की माँ।" यही हाल आस-पड़ोस का है। सामने वाली मिश्राइन हों या बगल वाली चौधराइन, सबके कहने का अंदाज वही होता - "का हो आशू की अम्मा का हो रहा है।"

जकल आशूदा से मिलने कितने ही सारे लोग आते हैं। छात्रों के अभिभावक किसी न किसी बहाने से  मिठाई और फल इत्यादि ले आते हैं तो दद्दा नाराज होकर यह सब लाने को मना करते हैं। छात्रों के अभिभावक उदास हो उठते हैं। अब तो सामाजिक कार्यकर्ता, अध्यात्म के जिज्ञासु और कुछ साहित्यकार जैसे लोग भी आये दिन दिखाई दे जाते हैं। कई एक सभ्रांत लोग गाडी लेकर आते हैं और सम्मान के साथ आशूदा को अपने साथ ले जाते हैं।

सी अनहोनी देखकर मंझले दा और मैं घुटन महसूस करते। ताज्जुब होता है कि ऐसा भला क्या है आशूदा में ? नौकरी तक तो कहीं कर नहीं पाए। मिसफिट रहे हर जगह। कायदे से रहना तक तो उनको मालूम नहीं। बदरंग कुर्ते-पैजामे और आधा दर्जन जोड़ लगी पुरानी चप्पल चटकाते घुमते हैं। घर की इज्जत में बट्टा लगाते आये हैं आशूदा। लोग भी जाने क्या-क्या सोचते होंगे कि दो भाई गजटेड आफिसर और एक भाई इस कदर फटीचर।

दिन पर दिन आशूदा के पागलपन में इजाफा ही होता जा रहा है। पहले ही आसार क्या कम बिगड़े थे, अब तो वे कवितायें भी लिखते हैं। उनके लेख भी पत्र-पत्रिकाओं में छपने लगे हैं। विद्यार्थी अब ज्यादा तादाद में उन्हें घेरे रहते हैं। लोग आशूदा की चर्चा करते हैं। सब के सब ही क्या बौराए हुए हैं .... आखिर दददा का स्टेटस क्या है ? तीन में न तेरह में। न कोई पोजीशन, न कोई बैंक बैलेंस ... और तो और अपने लिए एक अदद स्कूटर तक न जुटा सके आशूदा।  लोगों कि मति खराब हो गई है या फिर सबकी आँखों में मोतियाबिंद उतर आया है ?  

म दोनों भाईयों के पास चमचमाती कारे हैं, लेटेस्ट मोबाईल है, लायंस और रोटरी क्लब की मेम्बरशिप है। हमने पॉश लोकेलिटी में प्लाट खरीद रखे हैं। बच्चे पब्लिक स्कूल में पढ़ते हैं। हमारा उठाना-बैठना हाई सोसाईटी में है। रिटायरमेंट के बाद पिताजी अब प्रदेश की राजनीति में सक्रिय रहते हैं। सुबह-शाम बड़े-बड़े ठेकेदार हमारी कोठी के चक्कर लगाते हैं। लोगों के अटके हुए काम हमारे एक फोन भर से पूरे हो जाते हैं। हमारा परिवार अब शहर के जाने-माने परिवारों में गिना जाता है। मंझले दा को तो पार्टियों, प्रोग्रामों में चीफ गेस्ट की हैसियत से बुलाया जाने लगा है।

रिश्तों को नकारा तो नहीं जा सकता। परिवार में एक आशूदा का होना ही मखमल में टाट का पैबंद लगना है। आशूदा आखिर क्यों नहीं समझते पैसे की कीमत ? क्या कभी जान पायेंगे इज्जतदार होने का मतलब ? स्टेटस भी कोई चीज होती है, यह बात कब बूझेंगे ? "सॉरी आई जस्ट कांट डू दैट" कहने भर से ही दुनिया थोड़ी बदल जाती है। क्या आशूदा जिंदगी भर यूँ ही पढ़ते रहेंगे मोटी-मोटी उल-जुलूल किताबें ? सामाजिक न्याय और शोषण पर करते रहेंगे बहस ....पढ़ाते रहेंगे बेगारी में ट्यूशन। क्या सारी जिंदगी उनकी यूँ ही बेकार गुजर जायेगी ? क्या कभी कुछ भी नहीं बन पायेंगे आशूदा ? हम सब घर वाले चिंतित और परेशान हैं उनको लेकर लेकिन वो तो बिलकुल बेफिक्र व निर्द्वंद हैं।

ड़े-बड़े लोग घर में आते हैं। ऐसे में उनके समक्ष आशूदा सामने पड़ जाते हैं तो हम लोग परिचय कराने से भी कतराते हैं। परिचय देने लायक कुछ हो तो ही न बताया जाए। सच तो यह है कि हमें यह बतलाते भी शर्मिंदगी महसूस होती है कि आशूदा हमारे बड़े भाई हैं। लेकिन जो लोग पहले से हमारे रिश्तों को जानते हैं, उनके सामने गर्दन शर्म से झुक जाती है। अब हो भी क्या सकता है। खून का रिश्ता काटकर अलग तो नहीं किया जा सकता। रिश्तों का साथ तो उम्र भर निभाना पड़ता है। हम कुछ भी हो जाएँ वो हमें मंझले और छोटे ही कहते रहेंगे। हमें तो उनको दददा या आशूदा ही कहना होगा।

मंझले दा और मैं अपने-अपने खूबसूरत बंगलों में रहते हैं। पिताजी की राजनैतिक सक्रियता ने रंग दिखाया और वो एम.एल.सी. हो गए हैं। पिताजी अभी भी पुरानी कोठी में ही अम्मा और आशूदा के साथ रहते हैं। छोटे-बड़े नेताओं का आना-जाना लगा रहता है। लाल बत्ती की गाड़ियाँ खड़ी रहती हैं। हम लोगों का रुतबा अब और भी बढ़ गया है। बस एक आशूदा ही हैं सफेद संगमरमर की चमचमाती फर्श पर पान की पीक जैसे। अपनी अनचाही उपस्थिति दर्ज कराते हैं।

स दिन आशूदा सवेरे के गए शाम तक नहीं लौटे। देर रात लौटे भी तो पुलिस और कुछ लोगों के साथ । जो उठाकर लाये थे निर्जीव हो चुके आशूदा को। मृत हो चुकी थी उनकी देह। दो-चार प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि रास्ते में चलते-चलते ही आशूदा को दिल का दौरा पड़ा था। जब तक पुलिस और लोगों ने अस्पताल पहुंचाया, तब तक दददा संसार से नाता तोड़ चुके थे।

दूसरे दिन घर पर जाने-माने लोगों की भीड़ थी। लेकिन उस भीड़ से भी बड़ी एक और भीड़ भी उमड़ पडी थी घर के बाहर। आशूदा से अन्तरंग जुड़े लोगों, बेशुमार अनजान चेहरे। दददा की एक अलग दुनिया को इकठ्ठा एक साथ देखकर मैं और मंझले दा हतप्रभ थे। स्कूली लड़के-लड़कियां ऐसे सुबक रहे थे मानो उनके परिवार के किसी सगे की मृत्यु हो गई हो। बड़े बुजुर्गों की आँखों से आंसू यूँ बह रहे थे जैसे वो अपने पुत्र को अंतिम विदा दे रहे हों। यहाँ तक कि पानवाले, खोमचे वाले, चाय की गुमटी वाले तक बाहर कोने में ग़मगीन खड़े थे। हम हमेशा की तरह हैरान थे कि आखिर आशू दा में ऐसा भला क्या था जो सैकड़ों की आँखों को नम कर गए।

शूदा अब नहीं हैं। हालांकि न होने जैसे पहले भी थे। लेकिन शायद वो कुछ न होते हुए भी कुछ थे जरूर। उनकी छाप पूरे घर पर दिखाई पड़ती है। ढेर सारी किताबें अलमारी पर अभी भी सजी हुयी हैं, जो बाट जोहती हैं उन अभ्यस्त उँगलियों की जो उनके पन्नों को उलटती थीं। दर्जनों फाईलों में दबी पड़ी हैं आधी-अधूरी कवितायें और लेख, जिन्हें अपने पूरे होने का इन्तजार है।  

म्मा को तो लगता है कि वो अब अकेलेपन के साथ ही बेनाम भी हो गई हैं। अम्मा की बूढी आँखें प्रतीक्षारत हैं अभी भी बदरंग कुर्ते-पैजामे में दबे पाँव घर में प्रवेश करती एक मानव छाया की। पिताजी तलाशते रहते हैं किसी के पागलपन को, जिस पर अपनी झल्लाहट उतार सकें। हम दोनों भाई तमाम दौलत और शोहरत के बीच फैल चुके अबूझ सन्नाटे को को साफ तौर पर महसूस कर रहे थे।

कोई एक था जो बेफिक्र मंद-मंद मुस्कुराता था। कोई एक था जो गंभीर स्वर में "सॉरी आई जस्ट कांट डू दैट" कहकर, कमरे से तेजी से निकल जाता था। क्या वाकई इतने गहरे तक पैठी होती हैं,  'नगण्य' से व्यक्ति की जड़ें ? क्या इस हद तक होता है 'असाधारण', किसी का साधारण होना ? समझ में नहीं आता कि यह कैसी शून्यता है, उस शख्स के बगैर जो कि महज मखमल में टाट का पैबंद था।

ज जब मंझले दा, मैं और अम्मा-पिताजी के पास सब कुछ है तो किस बात की कमी महसूस करते हैं। घर की हवाओं में अब फलसफे की गंध नहीं आती। अब निठल्ले दिखाई नहीं देंगे, कोई बहस नहीं होगी। छात्रों का जमघट अब न दिखेगा। जमाने भर के दुःख-दर्द की बातें अब नहीं होंगी। कविता के छंद नहीं, लोकगीतों की बहार नहीं, प्यार नहीं, पीड़ा नहीं, अहसास नहीं, चिन्तन नहीं, मनन नहीं, आंसू नहीं, आह नहीं ................ नहीं .... नहीं ... , अब कुछ भी नहीं। आशूदा की चिता जाने के साथ ही सब स्वाहा हो गया।

नके जाने के बाद बस मुंह चिढाने और घूरने को रह गई हैं पोर्च में खड़ी निर्जीव कारें, हाथों में मिनमिनाते मोबाईल,  खिड़की से चिपके एयर कंडीशनर, ठेकेदारों के साथ होते निर्मम सौदे, फाईव स्टार का डिनर, पब्लिक स्कूल में जाते बच्चे।  आशूदा के साथ ही विदा हो गया है जीवन का स्पर्श। वही आशूदा जो बदरंग कुर्ता-पैजामा और टूटी चप्पल पहले खटकते रहते थे आँखों को, सफेद संगमरमर के साफ सुथरे फर्श पर पान की पीक जैसे।

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रचनाकार: कहानी लेखन पुरस्कार आयोजन (1) : प्रकाश गोविन्द की कहानी - दास्ताने-ए-आशूदा
कहानी लेखन पुरस्कार आयोजन (1) : प्रकाश गोविन्द की कहानी - दास्ताने-ए-आशूदा
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