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कहानी लेखन पुरस्कार आयोजन -113- उपासना सियाग की कहानी : ढलती साँझ में उगा सूरज

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लगभग एक साल पहले वाली  और आज सामने बैठी गोदावरी में कितना फर्क था आज कितने आत्मविश्वास से अपनी गतिविधियाँ का बयान  किये जा रही थी। अपनी डायरी मुझे देते हुए बोली, "लो सुलभा , ये मेरी डायरी तुम पढ़ो और फिर जैसा ठीक समझो ,वैसे कर लेना......!" वैसे मैं उनको , उनकी डायरी से ज्यादा जानती हूँ। यह तो मैंने उनको ,उनके अवसाद -ग्रस्त जीवन से बाहर निकलने देने की प्रक्रिया  मात्र ही थी। मैंने ही कहा था आप डायरी लिखो और लिख डालो अपनी व्यथा ताकि दूसरी कोई औरत इसे पड़े और एक और गोदावरी ना बन पाए.

गोदावरी,सूरज भैया की पत्नी  ,मेरे दूर के रिश्ते की भाभी थी। मैंने उनको हमेशा कम ही बोलते सुना और कभी बोलते सुना तो भी बहुत धीमे और आहिस्ता। दुबली-पतली ,छोटे से कद की महिला थी वह। कोई ज्यादा पढ़ी लिखी भी नहीं थी। शायद आठ-दस ही। ना ही ज्यादा धार्मिक ना ही नास्तिक , हां ,नवरात्रि के व्रत जरुर करती थी। तब वो रात को दो बजे ही उठ जाती थी। रात को ही कपड़े  जो पहनने होते थे, बाहर  बरामदे में तौलिये में लपेट कर रख देती थी। फिर चुपके से उठ जाती थी दरवाजे को बिना आवाज़ करवाए हुए। वह  जल्दी जागने के चक्कर में ढंग से सो भी नहीं पाती थी , (यह मुझे उनकी डायरी से पता चला था)। सूरज भैया को पूजा- पाठ से सख्त चिढ़ थी। उनको पीने -पिलाने वाली पार्टियाँ , जो रात देर तक चलती थी, उन्हीं का शौक था।

मैं तो सूरज भैया से बहुत छोटी थी , इतनी के उनके  बड़े बेटे से छः महीने ही बड़ी थी बस। पर वो हम बहनों को तो बहुत प्यार करते थे और  गोदावरी भाभी को भी बहुत शान से रखते थे। तब मैं  अच्छे- अच्छे कपड़ों , गहनों  और  घूमने -घुमाने  को ही प्यार समझती थी। यह तो बाद में पता चला के पत्नी को पति से ,इन सब के अलावा मान -सम्मान भी चाहिए होता है। क्यूँ कि  मैंने भैया को अक्सर सब के सामने डांटते हुए कभी उनके मायके वालों को गालियाँ  निकालते  भी देखा  था। और वो बस निर्विकार सी सुनती रहती थी।

मुझे कभी- कभी हैरानी होती थी , उनके ऐसे चुप रहने पर और कभी एक आंसू भी नहीं निकलता था। घर की बड़ी बहू थी तो सर पर बहुत सारे  फ़र्ज़ थे। दो देवर थे ,एक ननद थी। संयुक्त परिवार था ,साथ में चाचा ससुर और उनका परिवार ,उनके छह बच्चे ,एक चाचा ससुर जो गाँव में थे उनके भी तीन बच्चे और बुआ सास के भी दो बेटे,  बस। ये इतने हो लोग थे वहां पर। हमारा घर थोड़ा सा दूर था उनके घर से। मेरा ज्यादा समय वही पर निकलता था। क्यूँ कि वहां सदा समारोह का सा माहौल ही लगता था। छोटी भाभी हंस कर कहा करती थी उनके यहाँ तो हर रोज़ ही शादी के घर का सा माहौल रहता है।

पर गोदावरी भाभी तो बस वैसे ही रहती थी  एक -दम चुप ,शांत सी और धीरे से अपनी बात कह देने वाली। उनको उनकी चचेरी ननदें  कभी  छेड़ती  कभी शरारतें करती तो भी कोई जवाब नहीं देती।

सूरज भैया की पूरे  परिवार में खूब चलती थी या मैं यह कह सकती हूँ के उनकी ही चलती थी घर में।

सूरज भैया की राजनितिक पहुँच भी बहुत थी। आये दिन बड़े -बड़े नेताओं से मुलाकातें तो फिर वैसा ही रहन -सहन था उनका। किसी छोटे इन्सान को तो अपने पैरों की जूती समझते थे वे। और अपने ससुराल वालों को बहुत ही हीन समझते थे। जितना बस चलता वे ना  तो गोदावरी भाभी को उनके मायके   और ना ही खुद कभी अपने ससुराल गए। और अपने ननिहाल जाना भी अपनी शान के खिलाफ समझते थे। नारी जाति के प्रति कोई मान नहीं था पर उनको अपनी तरफ आकर्षित करने का तो बहुत शौक था उनको ,या यूँ कहिये की नारी उनके लिए सिर्फ भोग्य ही थी।

मुझे कभी - कभी बहुत आश्चर्य भी होता  के उनको प्रभु ने उनको बेटी क्यूँ नहीं दी ,जिससे उनको भी एक नारी का दर्द समझ तो आता।

थोड़ी बड़ी हुई तो भाभी का दर्द अपना सा लगने लगा उनकी चुप मुस्कान में कितना दर्द छुपाये घूमती  थी इसका मुझे अंदाज़ा तो नहीं था पर वो मुझे दिल से अपनी लगने लगी थी। वह सारा दिन बस अपने कमरे में सोयी ही रहती। कहने को तो तीन बेटों की माँ बन गयी थी पर मैंने कभी भी उनको बच्चों से बात करते या उनके लिए कुछ करते हुए नहीं  देखा था। जो उनकी चाची  सास थी  या घर में नौकर रखा था वही उनकी जरूरतें पूरी कर देता था। भैया कब आ रहे हैं या जा रहे हैं उनको कोई भी सरोकार नहीं था। वह तो बस एक खोल में ही सिमटती जा रही थी। शायद उनके अवसाद की शुरुआत हो चुकी थी। पर औरत का दर्द कौन समझता है जब तक वह मुहं से ना बोले। कहने को औरतें तो बहुत थी घर में पर वो सूरज की बहू  थी तो सूरज का बदला इसी से ले कर सुकून महसूस करती। कोई भी नहीं चाहती थी के वो खुश रहे या कोई उनको समझना ही नहीं चाहता था।

क दिन मैं ,अपनी माँ से कह बैठी ," माँ ये गोदावरी भाभी कितनी दुखी है ,आखिर क्या देख कर उनके पिता ने ऐसा घर देखा ..? क्या सोचा के बहुत बड़ा खानदानी घर है ,बड़ी बहू  बनेगी तो राज करेगी...!"

माँ भी एक दम से फट पड़ी , " अरी बिटिया ...! तू क्या जाने , सूरज ने कितनी कोशिश की इसको अपने बराबर करने को पर यह तो मिट्टी की माधो कुछ समझती ही नहीं थी। जब सूरज इसे ब्याह के लाया तो इसकी सूरत देखने वाली थी , गहरा सांवला रंग उपर से चेचक के दाग तिस पर आगे के दांत भी बेढब से ...! शादी की अगली सुबह सूरज का चेहरा देखने लायक था,  वो किसी से कुछ कह भी नहीं पा रहा था।"

"पर माँ , अगर वो ऐसी थी किसी ने शादी से पहले उनको क्यूँ नहीं देखा...?" मैंने माँ को बीच में ही टोका।

" तब पुरोहित ही शादी तय कर देते थे , और मुझे जहाँ तक पता चला है सूरज की मंझली चाची की साजिश भी थी इसमें ,क्यूँ की उसको लगा के सूरज की तो चलती ही है कहीं उसकी बीवी भी  आकर उनके ऊपर हुक्म ना चलाने लग जाये।"

मैं सोच में पड़ गयी , सूरज भैया के साथ हुई तो ना इंसाफी ही है , वो कितने सुन्दर ,सलीके से रहने वाले और उनकी पत्नी तो कहीं भी उनके पासंग नहीं है।

मैंने फिर माँ से पूछा , " माँ भाभी के दांत और चेहरा तो ठीक है ...?"

" वह तो बाद में सूरज ,गोदावरी को दिल्ली ले कर गया था , उसके दांत ठीक करवाए ,चेहरे की प्लास्टिक सर्जरी करवा  कर लाया। तब जा कर उसके साथ बाहर जाने लायक हुई , जितना सूरज ने गोदावरी के लिए किया ,अगर उसका आधा भी तेरे बाबूजी मेरे लिए करते तो मैं तो  आसमान में ही पंख ही फैला देती, "माँ ने बड़े ही भोले पन  से आंखों में पानी लाते  हुए बोली।

मैंने भी माँ के गले में बाहें डाल   कर दुलारते हुए कहा, "क्या माँ ...! बाबूजी कितना प्यार और ख्याल रहते है आपका पर आपको तो सदा शिकायत ही रहेगी उनसे ...!"

" प्यार और ख्याल ....! हुहं ..." कहते हुए माँ खड़ी हो कर चल दी।

बाहर अँधेरा होने लगा था तो मुझे भी ख्यालों से बाहर  आना पड़ा। घर की लाईट जलाते हुए सोच रही थी रात को गोदावरी भाभी की डायरी पढूंगी।

मेरा मायका और ससुराल यहीं शाम नगर में ही था। मायके से कोई पांच किलोमीटर ही दूर था। पढ़ाई करते -करते ना जाने कब शेखर के प्यार का पाठ पढ़ बैठी पता ही नहीं चला। सौभाग्य से शेखर सजातीय और अच्छे  खानदान से थे तो शादी में भी दिक्कत नहीं आई। सब ठीक ही चल रहा था।

मेरी शादी के दो साल बाद सूरज भैया के बड़े बेटे विपुल की शादी में उनके घर जाना हुआ। तब तक मैं एक बेटी की माँ बन चुकी थी।

माँ से पता चला लड़की पसंद करने से ले कर ,उसके कपड़े ,जेवर खरीदने तक भाभी की कोई राय नहीं ली गई थी। मुझे सुन कर बहुत अफ़सोस हुआ ,एक माँ जो कि बेटा होते ही बेटे के सर सेहरा सजाने के ख्वाब देखने लगती है  , उसकी इतनी बेकद्री.....!

शादी में सब खुश थे ।भाभी भी लग रही थी के वो खुश है , मुझे हैरानी हमेशा से होती थी के ये भाभी किस मिट्टी की बनी है। कभी कोई शिकायत या क्रोध या विरोध भी , क्यूँ नहीं दर्शाती ,क्यूँ सहन किये जा रही है मैंने कभी उनको रोते हुए भी नहीं देखा।

खैर,  विवाह कार्य अच्छी तरह से  संपन्न हो गया। मैं भी अपने घर आ गयी।

जब भी मायके जाती तो भाभी की खैर खबर भी लेने जाती। तब तक उसके परिवार वाले भी सब अपने-अपने अलग घरों में सेट हो गए थे।

विपुल की पत्नी अच्छी और संस्कारी थी। थोड़ा ख्याल तो रखा करती थी भाभी का , पर भाभी अब अवसाद ग्रस्त कुछ अधिक ही रहने लगी थी। उनको अपने पति का बहू के साथ खुला व्यवहार पसंद नहीं था। हालाँकि आधुनिकता का दावा करने वाले भैया का अपनी बहू के प्रति रवैया गलत नहीं था। पर भाभी को यह पसंद नहीं था। फिर दूसरे  बेटे  रोहित का विवाह भी रखा गया तो मेरा जाना तो स्वाभाविक ही था। यहाँ विपुल की पत्नी रोमा बहुत अच्छे से जिम्मेदारी संभाल रही थी। पर वह भी अब भाभी के व्यवहार से तंग आयी हुयी थी। मेरे पूछने  पर उसने बताया, देखो बुआ जी , माँ का सूट माँ के सामने दर्जी को दिया , अब माँ खुद ही मुकरने लगी है के वो सूट उनका नहीं है। अब शादी का घर है सहारा किसी का है नहीं और उपर से इनके नखरे...! हुहं ...! अब उनकी पुरानी  साड़ी को निकाल  कर प्रेस होने को दिया है ,वही पहनेगी वो ...!"

रोमा भी सही थी अपनी जगह , उसे भी तो सब कुछ नहीं पता था, अपनी सास के बारे में। जो कुछ पता था वह तो उसकी दादी सास यानी सूरज भैया की चाची  ने से ही पता चला था।

रोहित की पत्नी शालू  सुन्दर होने के साथ -साथ व्यवहार कुशल भी थी बल्कि मैं तो कहूँगी के कुछ ज्यादा ही चतुर थी। आते ही उसने सारी परिस्थितियाँ समझ ली। और देखा उसके ससुर जी का पलड़ा भारी है तो उनकी ज्यादा से तरफदारी करती और अधिक  से अधिक काम भी उनका वही करने को करती। भाभी को यह बात पसंद नहीं थी। भैया तो शायद अपनी बहुओं में बेटियों  की ही छवि देखते थे पर भाभी मन ही मन कुढ़ती रहती। शालू  भी औरत हो कर एक औरत की मन की बात कहा समझ पा रही थी। उसको तो उनमें एक बुरी सास ही दिख रही थी।

मेरा मानना है की कोई भी इंसान बुरा नहीं होता उसे हालत ही बुरा बनाते हैं या सामने वाले का नजरिया।  रोहित की शादी के बाद तो भाभी और भी अवसाद ग्रस्त होती गयी। सुनने में आया के अब वो अपने कमरे से भी बाहर  नहीं निकलती। टीवी भी नहीं देखती ,किसी के पूछने पर कहती थी कि उनको टीवी से डर  लगता है , कोई बाहर  निकल कर उसे मार ही ना दे। अपनी चाय -खाना खुद ही बनाती  है। कपड़ों के भी हाथ नहीं लगाने देती। हर पल उनको लगता था कोई उनको मार ना दे। इसी डर से वो एक दिन भाग कर मेरी माँ के पास चली गयी थी। माँ उसे समझा कर घर तो छोड़ आयी पर उसकी सलामती की ही दुआ करती रही कई दिनों तक। भाभी नहीं चाहती थी कि  उनके कमरे में कोई आये या उनका हाल-चाल पूछे। पर मजाल है कभी रोई हो या कभी भैया की शिकायत की हो किसी से भी या अपनी बहुओं की भी।

मेरी माँ को दया आ जाती और उनके हाल पूछने जाती तो पीठ फिर कर सो जाती। हार कर माँ भी थोड़ी देर बहुओं से बात करके या उनसे भाभी की बुराइयां सुन कर आ जाती , और करती भी क्या माँ ,आखिर ये उनके घर का मामला जो था। पर मेरी माँ का अब सूरज भैया के प्रति नजरिया बदल गया था जो उनकी तारीफ़ किया करती थी वही अब कोसती थी।

कहा करती ," सूरज को तो देखना  स्त्री श्राप लगेगा ,कितनी आत्मा जलाई है इसने एक निरीह की।"

कुछ सालों बाद  उनके तीसरे बेटे समीर की भी शादी हो गयी। वह अपनी बहू को ले कर दिल्ली चला गया। वह छोटा था और सबका लाड़ला भी ,हो सकता है उसे माँ पर तरस आया हो और वह भाभी को कुछ दिन के लिए अपने साथ  ले गया पर वह वहां नहीं रह सकी, महीने बाद ही वापस चली आयी।

धीरे -धीरे भाभी का घर तो पोते-पोतियों से भरने लगा पर वो अपने कमरे तक ही सिमटने लगी। जब कभी खाना  बनाने की हिम्मत नहीं हुई  तो आटा  घोल कर ही पी लेती। पर किसी और के हाथ का खाना मंज़ूर ही नहीं था।

मुझे हमेशा से ही हैरानी होती रही है , क्या इंसानियत इतनी भी गिर सकती है...! तीन-तीन बेटे थे उनके किसी को भी दया नहीं आयी अपनी माँ पर , उनकी अपनी माँ जो घर का मुख्य स्तम्भ थी उसकी दुर्गति होती रही और वो देखते रहे ,जो सुनता वही उन पर लानत देता , माना बहुएं तो पराई थी पर बेटे तो उनके ही थे ...छि   लानत है ऐसे बेटों पर। मुझे बहुत ही हिकारत सी होती उन तीनों पर। माँ आटा  घोल कर पीती रही ,बेटे माल उड़ाते रहे।

दिन-दिन उनकी हालत और भी खराब होती गयी। अब  तो वो भैया को भी कमरे में आने नहीं देती थी तो भैया को तो पहले ही उनसे लगाव नहीं था,  दूसरे कमरे  में सोने लगे वो।

एक दिन खबर मिली की भाभी लगभग मरणासन्न पड़ी थी अपने बिस्तर पर मल -मूत्र से भरी। फिर तो डॉक्टर के पास ले जाया गया ,इलाज़ भी हुआ। पर उनके मन की कोई भी सुनने वाला नहीं था।

मुझ से रहा नहीं गया और उनको देखने हॉस्पिटल पहुँच गयी। वहां जा कर पता चला ,अब वो ठीक थी। पास में मंझली बहू थी जो सभी को बड़े ही व्यवहार कुशलता से या मैं कहूँगी बेशर्मी से ...! , जवाब दिए जा रही थी सभी मिलने आने वालों को। पर मुझसे नज़र नहीं मिला पा रही थी। 

मैंने कुछ ना कहते हुए सीधे भाभी के कमरे में ही पहुँच गयी। और उन्होंने भी आदतन पीठ घुमानी चाही लेकिन बहुत कमजोरी होने जी वजह से करवट ना ले पाई तो मुंह घुमा लिया। मैं द्रवित सी होकर आगे बढ़ कर उनका हाथ अपने हाथ में ले लिया। इस पर विरोध करते हुए अपना हाथ खींचना चाहा। पर मैंने भी उनका हाथ नहीं छोड़ा। वो निर्विकार सी थी। ना जाने मन में क्या था। मैंने धीरे -धीरे उनके हाथ को अपने दूसरे  हाथ से थपथपाना शुरू किया।

कुछ बातें जो बोल कर नहीं कही जाती वह स्पर्श से बता दी जाती है। अक्सर कहते हैं बच्चा बीमार  पड़ता है तो जल्दी ठीक होता है बनिस्पत एक बूढ़े इंसान के। बच्चे को उसकी माँ कितनी बार प्यार से सहलाती है ,अपने सीने से लगाती है ,और बूढ़ा इंसान एक प्यार भरे बोल या स्पर्श को ही तरस जाता है।

कुछ दिन बाद भाभी को घर ले आया गया। मैंने भी मिलने के लिए उनके घर जाना शुरू कर दिया। मैं जब भी उनके बारे में सोचती तो मुझे लगता , कहीं ना कहीं मैं भी दोषी हूँ। और मैं ही क्यूँ , सभी वो लोग भी जो उनके कुछ ना कुछ लगते है। क्या यह हमारे समाज का अमानवीय पक्ष नहीं है , जिसमे  एक भली -चंगी औरत अपना मानसिक संतुलन खो दे। अगर कहीं गलत हो रहा हो तो परिवार - समाज  को टोकना तो चाहिए ही , तभी एक स्वस्थ समाज बनेगा ताकि   गलत करने वाले को सजा और बाकी लोगों को सबक मिल सके।

भाभी का  रवैया मेरे  प्रति भी नहीं बदला। मुझे देख कर कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखती थी। पर अब मुंह भी नहीं फिराती  थी। सूरज भैया को मेरा जाना पसंद नहीं आ रहा था। और बाकी घर वाले भी नहीं चाहते  थे कि मैं ,भाभी से मिलूं। उनको लगता था शायद मैं उनके घर की बात बाहर फैला रही हूँ ...!

एक दिन मैं भाभी के पास बैठ कर उनका  हाथ थाम कर बोल पड़ी , " भाभी , कुछ तो बोलो , मुझ से तो बात करो , मैं वही सुलभा हूँ , तुम्हारी गोद में ही तो खेल कर बड़ी हुई  हूँ , तुम्हारी बेटी जैसी हूँ मैं...!"

कुछ देर भाभी मेरी आँखों में देखती रही और फिर हाथ छुड़ा कर , दोनों हाथों से अपना मुंह छुपा कर फफक कर  फिर जोर से रो पड़ी। उनकी कमजोर ,  कृश काया जोर-जोर से हिल रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे कई जन्मों के दुखों की जमी हुई पीड़ा सारी बाहर ही निकल  जाएगी आज। कई देर रो लेने के बाद मैंने उनके सर पर हाथ रखते हुए कहा , " शांत हो जाओ भाभी ..."

फिर धीरे से उनको बैठा कर आंसू  पोंछते हुए ,पास ही पड़े गिलास में जग से पानी ले कर थमाया। चुप चाप पानी पीते हुए भी आंसू रुक ही नहीं पा रहे थे। शायद प्यार के बोल और स्पर्श ने उनके अंतर्मन को पिघला दिया हो और सारा जमा हुआ दुःख आँखों के रास्ते से बाहर निकल रहा हो।

फिर बाहर जा कर बहू से चाय  का बोल कर आयी और साथ में कुछ खाने को भी लाने को कहा। थोड़ी देर में वह बहुत संयत लग रही थी। हालाँकि बोल तो नहीं रही थी। मैंने भी दूसरे दिन आने को कह , अपने घर को चली। सूरज भैया को अच्छा तो नहीं लग रहा था मेरा वहां जाना पर मैंने परवाह नहीं की किसी की भी। और जाती भी रही , भाभी भी अब धीरे -धीरे मुझ से खुलने लगी थी। मुझे देख कर खुश होती। और कई बार देर हो जाती तो फोन भी कर  देती कि  मैं पहुंची क्यूँ नहीं।

उस दिन मुझे सच मुच देर हो गयी थी। मैं बाज़ार से कुछ मन्त्रों की सी डी  ले कर आयी थी। घर जाते ही , मुझे देखते ही बहुओं की भोएं तन सी जाती थी। पर मैं किसी की भी परवाह करनी छोड़ दी थी , मुझे लगता था मैं औरत हूँ तो मुझे दूसरी औरत जो की मजबूर है और उसे मेरी जरूरत है तो यह मेरा फ़र्ज़ था के मैं उसके लिए कुछ करूँ।

मैंने छोटी बहू से म्यूजिक -प्लेयर लाने को कहा और उसमे गायत्री -मन्त्र की सी डी लगा दी। सारा कमरा पवित्र मन्त्र से गुनगुना उठा। भाभी ने मेरा  हाथ पकड लिया ,बोलना चाह  रही थी लेकिन आँखे और गला भर आया था शायद उनका ,कुछ कह ना पाई।

एक दिन मैंने उनके घर जाते ही कहा , " भाभी , चलो आज पास के पार्क में चलते हैं। " वो थोड़ा सा हैरान तो हुई  पर मना भी नहीं किया। इन बातों अब तक छह महीने हो चुके थे। पार्क में उनको बहुत अच्छा लग रहा था। हर चीज़ को , पेड़  पौधों को बहुत ध्यान पूर्वक और खुश हो कर देख रही थी। बहुत दिन बाद दुनिया की रौनक देख रही थी वो।

मैं कहा ,"भाभी .. हर किसी को अपना एक राजदार रखना चाहिए  ,जिसके आगे आप अपने मन की कह सको , देखो दुनिया कितनी बदल गयी और आप कहाँ है , किसलिए यूँ ही किसी और की सजा अपने आप को देती रही ...! किस लिए विरोध  नहीं किया , आप जोर से बोलती ,शोर ही मचाती के आपके साथ अन्याय हो रहा है।"

" मुझे विरोध करना आया ही नहीं , और कब अपने आप को खोल में समेट  लिया ,पता ही नहीं चला , सुलभा ...!" भाभी खोयी हुई  सी बोली।

"चलो कोई बात नहीं भाभी ,अब ऐसा करो ,आप  एक डायरी में अपनी सारी  व्यथा लिख डालो। जिससे क्या होगा ,आपके मन का सारा बोझ हल्का हो जायेगा ", मैं उनके कंधे थपथपाते हुए कहा।

एक डायरी ले कर भी दी और उनके मन पसंद  लाल रंग का पेन भी दिया।

अब भाभी बहुत सामान्य हो गई थी। पर घर वालों से ज्यादा बात नहीं करती थी ,अपने कमरे से भी नहीं निकलती थी। खुश तो दिखने लगी थी। एक दिन मैंने उनसे कहा , "जल्दी से तैयार हो जाओ आपको एक जगह ले चलती हूँ।"

और वो बिन पूछे ही ख़ुशी -ख़ुशी तैयार भी हो गयी। मैं उनको एक वृद्धाश्रम में ले कर गयी ,वहां देख वह कुछ हैरान हुई और पूछा ,"यह  लोग यहाँ क्यूँ है ...! इनके घर वाले कहाँ है। "

मैंने कहा , " भाभी इनको .इनके बच्चे ही छोड़ कर गए हैं ...कोई रखना नहीं चाहता ,किसी की मजबूरी है , आपके तो भरा पूरा परिवार है , पोते हैं ,पोतियाँ है ...!आप उनको  बतलाओ , उनसे खेलो और ये जो आपकी बहुएं हैं वो भी बुरी नहीं है ,वो तो बाहर से आयी थी उनको क्या मालूम की आपने क्या -क्या झेला है , उनको तो सास का ही रूप दिखा है आपमें ,अपनी बहुओं को  माफ़ कर दो और अपने पोते -पोतियों में मन लगाओ। "

वह चुप चाप चल पड़ी और जा कर गाड़ी में बैठ गयी। पूरे राह वह कुछ ना बोली और मैंने बतलाया भी नहीं। घर में घुसते ही हमने देखा ,उनके छोटे बेटे का नन्हा सा बेटा घुटनों के बल चलता हुआ खेल रहा था। अचानक हुमक कर भाभी की तरफ लपका तो दौड़ कर उन्होंने उसे गोद में उठा लिया और सीने में भींच लिया। उनके चेहरे से सुकून और आँखों से आंसू बह निकले। बहुएं भी हैरान थी की आज ढलती शाम को सूरज कैसे निकल गया। मैंने उनको चुप रहने का इशारा किया। फिर सारी बात समझा कर उनको कहा कि अब उन लोगों को ही स्थिति संभालनी होगी , इनकी जगह अगर उनकी अपनी माँ होती तो क्या ऐसी दुर्गति होने देती भला ...!वो भी शर्मिंदा सी थी और आगे से उनका पूरा ख्याल रखेंगी ,वादा भी किया।

एक नई शुरुआत की आस लिए मैं वह से चल पड़ी ,इस सब में मुझे मेरे बच्चों और पति दोनों ने बहुत सहयोग दिया...........

रात हो चुकी थी पर नींद भी नहीं आ रही थी। मेरा ध्यान उनकी डायरी में ही था के उन्होंने क्या लिखा होगा ,वैसे तो मैंने उनकी जिन्दगी का हर पन्ना बहुत करीब से ही पढ़ा है पर डायरी में भी कुछ अन देखे और अनपढ़े पन्ने भी थे।

उन्होंने अपनी शादी वाली रात का ही जिक्र लिखा था सबसे पहले। वह  नए जीवन के ना जाने कितने सपने संजोये सुहाग सेज पर बैठी थी और कैसे उनके सुहाग ने उनके सपने रौंदे। उनकी सूरत  देख कर जो उनके पति  के जो हाव -भाव थे , उनको वे शब्दों में ना तो बयान कर सकती है , ना ही भूल सकती है और ना ही उनको माफ़ कर सकती है। और हैरान हो कर लिखा ,अगर वह   पसंद नहीं थी तो उनके शरीर को हाथ लगाने का मन कैसे हुआ उनका। यानी सिर्फ भोग्या  ही थी या वंश चलाने का साधन मात्र ही।। लोगों ने कहा चेहरा सुन्दर बना दिया पर गोदावरी का मन किसने टटोला , उसके मन की तो सुनने वाला कोई भी नहीं।

उन्होंने लिखा उनको अपने बच्चों से दूर नहीं होना चाहिए था। अगर बच्चों में मन लगाती तो शायद उनकी दुर्गति ना होती। और बच्चे भी उनकी सुनते। पर यहाँ शायद उनकी चाची  सास की राजनीति भी थी शायद। जिसने बच्चों और शायद पति से भी , रिश्तों की खाई को पाटने ही नहीं दिया।

आगे लिखा था कि वो शक्की नहीं थी ,लेकिन पार्टियों में उनको ले जा कर अन्य महिलाओं में घिर कर बैठना उन्हें  नागवार गुजरता और उपेक्षा भी महसूस होता। इसलिए उन्होंने जाना ही छोड़ दिया। फिर बहुओं के आने के बाद उनको लगा अब तो उनकी कीमत ही नहीं रही। एक तो उनके पति उनको पूछते  ही नहीं थे तिस पर बहुओं का बढ़ता वर्चस्व , उनको एक गहरी उदासी में ले जाता गया। बहुत सारी  बातें थी पर यहाँ भी हैरानी थी मुझे , भाभी ने यहाँ भी किसी को दोष नहीं दिया। बस अपनी किस्मत को ही दोष दिया।

लेकिन मुझे नहीं लगता ये सिर्फ किस्मत थी। सबसे बड़ा दोष उसके पति और बेटों का था . पति जो सारी उम्र का साथ निभाने का वादा करके लाता है उसका ऐसा बे-रुखापन अक्षम्य है . और बेटे जो उनकी कोख से जन्म लेकर भी उनको समझ नहीं पाए , अपमी माँ को तिल-तिल कर मरते देखते रहे उनका अपराध भी अक्षम्य ही था. यह एक अनदेखापन  ही था एक महिला के प्रति समाज का , सबसे पहले तो उसके मायके वालों का उसकी माँ का जो उनको ,उनके दर्द को समझ ही नहीं पायी। हर उस औरत का भी दोष था जो उससे सम्बन्धित थी उनके परिवार की ,उनकी बहुएं भी और मैं भी। हर सिक्के के दो पहलू होते है तो हर इंसान के व्यक्तित्व के भी तो विभिन्न पहलू हो सकते हैं। फिर हम क्यूँ किसी इंसान को अपने ही नजरिये से तौलते हैं।

मैं भी  दोषी  थी पर उनके लिए मैंने जो कुछ किया , यह मेरा प्रायश्चित भी था। भाभी के जीवन में 60 साल की ढलती उम्र की साँझ में जो सूरज उगा था, उसकी रौशनी भी उनके लिए जीवनदायिनी साबित हुई .

उपासना सियाग 

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औरत ही औरत की दुश्मन होती है और हैरानी की बात है की औरत ही औरत को जन्म देती है ....एक अकेली औरत को इतनी औरतें सँभाल के न रख सकी ...कोई एक ही उसका दर्द समझ पाई .

क्यूँ की कई बार औरते अपने ईर्ष्यालु स्वभाव के कारण दूसरी औरत का दर्द नहीं समझती और उस पर होने वाले जुल्मों की सहायक ही बनती है .....यही बहुत हद तक सच्चाई है .....
आभार

Bahut khoob likha upasana ............shabd hi nhi hain mere pass ..........

bahut khoob surat dhang se aaj ke paripeksh mai likha uper sahi kaha gaya hai

औरत ही औरत की दुश्मन होती है और हैरानी की बात है की औरत ही औरत को जन्म देती है ....एक अकेली औरत को इतनी औरतें सँभाल के न रख सकी ...कोई एक ही उसका दर्द समझ पाई .

bahut hi khoob surat tarike se likha aaj ke paripeksh mai badhai aise jwalant sawaal uthate rahe ............avinash ramdev

वह चुप चाप चल पड़ी और जा कर गाड़ी में बैठ गयी। पूरे राह वह कुछ ना बोली और मैंने बतलाया भी नहीं। घर में घुसते ही हमने देखा ,उनके छोटे बेटे का नन्हा सा बेटा घुटनों के बल चलता हुआ खेल रहा था। अचानक हुमक कर भाभी की तरफ लपका तो दौड़ कर उन्होंने उसे गोद में उठा लिया और सीने में भींच लिया। उनके चेहरे से सुकून और आँखों से आंसू बह निकले। बहुएं भी हैरान थी की आज ढलती शाम को सूरज कैसे निकल गया। मैंने उनको चुप रहने का इशारा किया। फिर सारी बात समझा कर उनको कहा कि अब उन लोगों को ही स्थिति संभालनी होगी , इनकी जगह अगर उनकी अपनी माँ होती तो क्या ऐसी दुर्गति होने देती भला ...!वो भी शर्मिंदा सी थी और आगे से उनका पूरा ख्याल रखेंगी ,वादा भी किया।
------------SACH YAHEE HAI HIA KI GALTEE DONO TARAF SE HAI ----BAHUT SUNDAR KAHAANEE UPASNA

वह चुप चाप चल पड़ी और जा कर गाड़ी में बैठ गयी। पूरे राह वह कुछ ना बोली और मैंने बतलाया भी नहीं। घर में घुसते ही हमने देखा ,उनके छोटे बेटे का नन्हा सा बेटा घुटनों के बल चलता हुआ खेल रहा था। अचानक हुमक कर भाभी की तरफ लपका तो दौड़ कर उन्होंने उसे गोद में उठा लिया और सीने में भींच लिया। उनके चेहरे से सुकून और आँखों से आंसू बह निकले। बहुएं भी हैरान थी की आज ढलती शाम को सूरज कैसे निकल गया। मैंने उनको चुप रहने का इशारा किया। फिर सारी बात समझा कर उनको कहा कि अब उन लोगों को ही स्थिति संभालनी होगी , इनकी जगह अगर उनकी अपनी माँ होती तो क्या ऐसी दुर्गति होने देती भला ...!वो भी शर्मिंदा सी थी और आगे से उनका पूरा ख्याल रखेंगी ,वादा भी किया------------------GALTEE DONO TARAF SE HAI------BAHUT SUNDAR KAHAANEE UPASNAA

अच्छी रचना,बधाई.
एक अवसादग्रस्त महिला की कहानी,जो जिन्दगी में अपनी हक और अधिकार के लिए जगह बनाने की जगह अपनी खोल में सिमटना ज्यादा पसंद किया.ऐसी महिलाएं हमारे आस-पास कई हैं,जरूरत है उन्हें समझने की,जैसा की सुलभा ने किया .

अच्छी रचना,बधाई.
एक अवसादग्रस्त महिला की कहानी,जो जिन्दगी में अपनी हक और अधिकार के लिए जगह बनाने की जगह अपनी खोल में सिमटना ज्यादा पसंद किया.ऐसी महिलाएं हमारे आस-पास कई हैं,जरूरत है उन्हें समझने की,जैसा की सुलभा ने किया .

दिल को छू लिया उपासना सखी ...आँखें भर आई ...बहते हुए आंसूं में पड़ा ....न जाने कितनी औरतो की यही व्यथा है .....प्रेमचंद का एक नोवेल भी याद आ गया ....ये कहानी नहीं व्यथा है ...जिसे हम वाह नहीं कर सकते ...तुम्हारे लेखनी की तारीफ़ जरुर कर सकती हूँ ...

कुछ महिलाये जो बुरा भोग होता है वो आने वाली पीढ़ी को देती है ....और कुछ समझदार होती है वो जो बुरा भोग होता है उसे अपने तक सीमित कर आगे नहीं जाने देती ...और खुशनुमा और समये के साथ ढलने वाला माहोल बनाती है

सुन्दर ...बधाई :)))

सुन्दर उपासना ! बधाई :))

मार्मिक कहानी ....

एक बेहद मार्मिक कहानी. ऐसी ही है शांति की कहानी भी जो आज मैंने पढ़ी कन्या भ्रूण हत्या के विषय पर लिखी यह कहानी भी बेहद मार्मिक और हृद्यस्पर्शी है http://socialissues.jagranjunction.com/2012/10/25/girl-child-abortion-%E0%A4%AD%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%82%E0%A4%A3-%E0%A4%B9%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE/

एक बेहद मार्मिक कहानी ऐसी ही एक कहानी शांति की भी है आपसे अनुरोध है कि शांति की कहानी जो कन्या भ्रूण हत्या पर आधारित है. अपनी राय अवश्य दें http://socialissues.jagranjunction.com/2012/10/25/girl-child-abortion-%E0%A4%AD%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%82%E0%A4%A3-%E0%A4%B9%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE/

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