रमा शंकर शुक्ल की कविताएँ

वक्त सुनामी

रक्तबीज-से बढे दरिन्दे
कैसे-कैसे रिश्तों के फंदे
रिश्तों में भी कालनेमि है
क्या करेंगे हनुमान परिंदे।

कही पे भाई कही पिता हैं
विश्वासों का आधार मिटा है
किनको-किनको फांसी दे दूं
रिश्तों की गरमाहट में धंधे।

कहाँ सुरक्षित अस्मत मेरी
जातियां मेरी हों या तेरी
खूनी आँखे घूर रही हैं
शैतानों से मठ के बन्दे।

हक्का-बक्का हर चेहरा है
साए पर भी खुद का पहरा है
वक्त सुनामी बनकर आया
रोने को न बचे हैं कंधे।

---

ग़ज़ल


माई की आँख में न हो आंसुओं का सैलाब
दूध के साथ बेटी में खंजर भी उतारिये।

वर्जनाओं की चादर उढ़ाकर न घेरिये उसे
पूरी कायनात में उड़ने का तरीका भी बताइये।

ये हालात तो हमने-आपने ही पैदा किये हैं
हो सके तो बेटियों से लाज का पहरा हटाइये।

घोसलों में रात दिन दुबकाए ही रह गए हम
वक्त है अब तो उड़ानों में तूफ़ान ले आइये।

बहुत हो चुका बेटी-बेटी पुकारते हुए हमें
फासले हटाकर जरा बेटा भी बुलाइये

--

पुलिस अस्पताल के पीछे,
तरकापुर रोड, मिर्ज़ापुर उत्तर प्रदेश,

-----------

-----------

2 टिप्पणियाँ "रमा शंकर शुक्ल की कविताएँ"

  1. हमारे समाज की समस्या है दोहरापन . अपनी और पराई बेटी के लिए सब का नजरिया अलग है। पुरुषों को अपने को सुधारना होगा ..पुरुषों के वैचारिक बदलाव के साथ उनके व्यावहारिक परिवर्तन समय की मांग है ..इस रचना के द्वारा क्रांति का आह्वान करने के लिए साधुवाद ..

    उत्तर देंहटाएं
  2. shukriya manjula saxena ji.
    ramashankar shukla

    उत्तर देंहटाएं

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.