गुरुवार, 13 जून 2013

सतीश कसेरा का व्यंग्य - भगवान के नाम पर...

    ‘भगवान के नाम पर...’

अभी मैं ऑफिस की ओर आ ही रहा था कि रास्ते में अचानक एक भिखारी मेरे करीब आया और अपना कटोरा मेरे मुंह के सामने करते हुए दीन-हीन स्वर में बोला- ‘भगवान के नाम पर कुछ दे दो बाबा!’ मैने विसे उपर से नीचे तक देखा और बोला ‘न...देने को तो मैं तेरे को दस का नोट भी दे दूंगा पापिया....पण पहले मेरे को ये तो पता चले कि तूं कौन से भगवान के नाम पर मांग रिया है!’

भिखारी ने बौखलाकर मेरी तरफ देखा और  हैरानी से पूछा-मैं आपकी बात समझा नहीं बाबा!’

मैंने हवा में हाथ हिलाते हुए कहा-अबे बैगर चंद भिखारी दास...मेरा मतलब यह था कि जो भीख मैं तुझको दूंगा उसके बारे में मेरे को भी तो पता होना चाहिये कि वह कौन से भगवान के खाते में जायेगी। हैं जी! तूं मांग रहा हो राम के नाम पर और मैं दे रहा हूं अल्लाह के नाम पर...... तो अब सोचने वाली बात यह है पापिया कि चित्रगुप्त के पास मेरा एकाऊंट कैसे मेंनटेन होगा! कल को जब चित्रगुप्त मेरा एकाऊंट खोल कर देख रहे होंगे तो चमक कर बोलेंगे कि....ओ जी महाराज..इसने तो जिदंगी में कभी दान-पुण्य किया ही नहीं , इसने तो कभी किसी को चवन्नी की भीख तक भी नहीं दी, तब मेरी गवाही देने के लिये तूं वहां पर मौजूद होगा क्या पापिया।’

मेरी बात सुनकर भिखारी ने मुझे अजीब सी नजरों के साथ यूं देखा मानो मैं पागलखाने से निकलकर आया कोई पहुंचा हुआ पागल होऊं। मैंने नाराजगी भरे स्वर में कहा-मेरी बात समझ में नहीं आई न बाबू?’ उसने अपनी मुंडी ऊपर से नीचे हिलाई तो मैं हंसकर बोला-बाबू.....तेरे मांगने का इस्टाईल ही गलत हैगा...भगवान के नाम पर कुछ मिल जाये बाबा....यह भी सामने वाली पार्टी के सामने कोई प्रेजेंटेशन हुई भला? सामने वाली पार्टी को ही जब पता नहीं होगा कि किस भगवान के नाम पर मांग रहे हो  तो कोई कैसे भीख देगा..हैं जी...! आज जमाना बदल गया है बाबू, सिस्टम बदल गया है, बिजनेस करने के तौर-तरीके बदल गए हैं, मार्किटिंग का तरीका बदल गया है....अरे...अब लोग कहीं से पांच रुपये की मैगी भी खरीदते हैं तो विसके पैकेट पर छपी पूरी डिटेल देखते हैं कि इसमें कित्ता कार्बोहाईड्रेट हैगा..... कित्ता प्रोटीन हैगा...कित्ता कैल्शियम हैगा....कित्ता साल्ट हैगा..मतलब सामने वाली पार्टी को पता होना चाहिये कि वह जिस चीज के लिये पैसा दे रहा है तो उसके बदले में विसको मिल क्या-क्या रिया है।  आई बात समझ में?’

भिखारी ने बौखलाए हुए अंदाज में अपनी मुंडी इस बार दायें से बायें घुमा दी

 
    मैं माथा पीटकर बोला-बस.... येइच्च पिराब्लम हैं तुम लोगों के साथ...वही रोती हुई आवाज...वहीं गंदे मैले कपड़े...वही तुड़ा-मुचा कटोरा...चेंज बाबू चेंज....चेंज योर इस्टाईल...यह तुम्हारा धंधा है तो इसमें कुछ नये-नये आईड्यिाज लाने का....किस भगवान के नाम पर मांग रहे हो उसकी डिटेल क्लियर करो..क्योंकि करोड़ों भगवान हैंगे, सामने वाली पार्टी को ऐसा इम्प्रेस करो बाबू कि व न केवल पहले ही झटके में पूरा पर्स निकालकर तुम्हारे कटोरे में डाल दे बल्कि साथ ही यह कहने तक को मजबूर हो जाये कि कल फिर यहीं पर मिलना ‘डूड’.....कल इससे भी ज्यादा  भीख दूंगा....आई बात समझ में !’

मैं चुप हुआ तो भिखारी ने किसी प्रकार गले में अटका थूक गटक कर गहरी सांस ली और बोला-‘इतने सालों से भीख मांग रहा हूं बाबा....पर आज तक आप जैसा  कोई नहीं मिला!’

मैंने हंसते हुए कहा ‘होता है...होता है...यह पहले से ही तय होता है बाबू कि किसे..कब....कहां..किससे मिलना हैगा...आते-जाते खूबसूरत आवारा सड़कों पे..कितने अंजान लोग मिल जाते हैं, उनमें से कुछ लोग भूल जाते हैं.....कुछ याद रह जाते हैं...!’ इस पर भिखारी बोला-एक बात पूछूं बाबा...आप करते क्या हो ?’

मैंने अपने हाथ नचाते  हुए कहा-कोई ऐसा-वैसा आदमी मत समझ लीजो बाबू.......लेखक हूं.... लेखक!’

मेरी बात सुनते ही भिखारी अपना सिर पीटते हुए बोला-मेरे से ही गलती हो गई बाबा...मैंने ही गलत पार्टी के सामने हाथ फैलाया...मैं भी कहूं कुछ गड़बड़ है...वरना हम जिसके आगे हाथ फैलाते हैं...उनमें से जिसने देना होता है...वह दे देता है..जिसने नहीं देना होता...वह आगे बढ़ने का ईशारा कर देता है.! वैसे एक बात बताऊं बाबा... मुझ पर भी एक बार जवानी में लेखक बनने का भूत सवार हुआ था....जिसे मेरे बाप ने अपनी जूतियों से उतारा था...बोला था...ससुरे....भीख मांगने के पुस्तैनी काम को छोड़कर भूखे मरने का काम करने जा रहा है....? बेटा.... लक्ष्मी और सरस्वती का आपस में कोई मेल नहीं....तूं अपने बाप दादाओं के दिखाए नक्श-ए-कदम पर चल...भीख मांग और अपना जीवन सफल कर....! उस दिन मैंने अपने बाप की बात न मानी होती  और लेखक बन गया होता तो बाबा...आपके जैसा हाल आज मेरा हो गया होता। भगवान आपकी आत्मा को शांति दे बाबा...!’

कहकर भिखारी वहां से चल दिया।

यह... मुझ पर तरस खाकर गया था कि दुआ देकर गया था...? बात कुछ समझ में आई नहीं...! शायद आपकी समझ में आ गई हो।


-सतीश कसेरा

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  1. akhileshchandra srivastava9:43 am

    Satish ji ki rachana rochak bhi hai aur sargarbhit bhi ek lekhak ki tulan me bikhari ka apne dhande ko achcha kahna lekhak aur lekhan ki samajik sthiti ka bayan karta hai
    Achche lekhan ke liye Satish ji ko badhaiee

    उत्तर देंहटाएं

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