शुक्रवार, 25 अक्तूबर 2013

कामिनी कामायनी की पाँच मैथिली कविताएं, हिंदी अनुवाद सहित ।

पाँच मैथिली कविताएं ,अनुवाद सहित ।

1,शहरी सभ्यता

नित ऊपर उठै छै मचान ,

नै आँगन बांचल नै दलान ।

घर स गरबहिया दैत घर ,

ऊपर स नीचा ,घरे घर ।

नै कत्तों कनिओ त जमीन ,

पातर देवार जंगला महीन ।

जौ सोर करै किओ ज़ोर ज़ोर ,

मन भ जायत अछि अति घोर ।

मन भ जायत अछि देखि विकल ,

सभ्यता के ई नव नागफास ।

केहन जुग अब आबी बसल ।

नहीं छै कनिओ उल्लास आब ।

धरती स ऊपर उठैत स्वप्न ,

नीचा पैरक बस परिताप ।

नै मर्यादा के बोल रहल ,

नै मधुर ,मीठ कल्लोल रहल ।

सब दिशा मे तीव्र स तीव्र सोर ,

बहिरा के गाम मे बसल लोक ।

नै आंखि मे पानी एक बूंद ,

नै धरती पर हहराति जल ।

सबटा परिभाषा बदली गेल ,

जुग ठाढ़ एतय ठीठीयाय रहल ।

ई नव नुकूत इतिहास गढ़त ,

शहरी सभ्यता के माया जाल ।।

हिन्दी अनुवाद

नित ऊपर उठता है मचान ,

नहीं आँगन बचा ,नहीं दालान ।

घर से गलबहिया देती घर ।

ऊपर से नीचे घर ही घर ।

यदि आवाज करे कोई ज़ोर ज़ोर ,

मन हो जाता है कटु अति ।

मन हो जाता है देख विकल ,

आधुनिकता का नव नागफास ।

धरती से ऊपर उठते स्वप्न ,

नीचे पाव के बस परिताप ।

ना मर्यादा का बोल रहा ,

न मधुर ,मधुर कल्लोल रहा ,।

सब दिशा मे तीव्र से तीव्र स्वर ,

बहरों के गाव मे बसे लोग ।

ना आँख मे पानी एक बूंद ,

ना धरती पर हहराती जल ।

सब परिभाषा बदल गए

युग खड़ा यहाँ ठहाका लगा रहा ।

यह नयी नवेली इतिहास गढ़ेगा ,

शहरी सभ्यता का माया जाल ।

2 लिखत के प्रेम गीत ?

कदंबक गाछ त कटि /

चुकल छल आब ,

कृशकाय /

एकसरि ठाढ़ राधा /

हेरे छली एखनहु कृष्णक बाट/

सखी सब पहिनहि संग छोड़ लेन्ह,

आब मुरारी सेहो निपता,

केहन घोर कलिकाल ,/

प्रेमक शाश्वत कुसुम कोना मुरुझा गेलै/

नहि रहलै आब ओ राग अनुराग /

पोखरिक घाट /गाछी /ईनार /

सब जेना वीरान ,उजाड़ भ गेलै /

चिड़े चुनमुन चुप्प /

चारहु कात अनहार घुप्प /

हिय के कर्पूर कोना उड़ी गेल /

कत्त ताकू ? कोन कुंज ? कोन बोन ?

सोचे छथी राधा भरल आंखि स /

की जखन ,प्रियतम नहि अनुरागी ,त

लिखत के प्रेम गीत /

के लिखत जौवन के मधुर मधुर प्रीत /

तकेत छथी व्याकुल भ ,धरती ,अकास के /

गाछ बिरिक्ष/लता ,कुंज ,लग पास के ,

बिलखैत पुछेत छथि/लिखत के प्रेम गीत /

लिखत के प्रेम गीत /

विद्यापति जबाव दौथ ।।

अनुवाद

कदंब का पेड़ /

तो कट चुका था अब /

अकेले खड़ी /

कृशकाय राधा /

निहार रही थी अभी भी कृष्ण की राह ।

सखियो ने पहले ही

तज दिया था साथ /

अब मुरारी भी लापता /

कैसा घोर कलिकाल /

प्रेम की शाश्वत कुसुम कैसे मुरझा गई /

नहीं बचा हृदय मे उद्वेग /

नहीं रहा अब वो राग अनुराग ।

पोखर का घाट ,बगीचा ,कुवां,/

सब जैसे वीरान हो गया /

पक्षिगण चुप्प/

चारो तरफ अंधकार घोर ।

प्रेम कहाँ उड़ गया कर्पूर जैसे /किधर ढूंढें / किस कुंज मे ,किस वन मे ।

सोचती है राधा भरी हुई आंखो से /

कि जब प्रियतम ही नहीं अपना /

तो लिखेगा कौन प्रेमगीत /

कौन लिखेगा यौवन का मधुर मधुर संगीत /

देखती है व्याकुल हो /धरती और आकास को /

पेड़ ,पौधे ,लता कुंज ,आस पास के /

पूछती है व्याकुल हो /लिखेगा कौन प्रेम गीत /

लिखेगा कौन प्रेम गीत /

विद्यापति जवाब दें ।

3 आतंकी गाम ।

हाथ पएर मोड़ने /

ओ सुतल सुतल सन गाम /

जतय एखनो किओ किओ /

गाबैत छल /पराती/झुमरि/आ कजरी /

जतय अखनों पीबैत छल /

विभेदक वावजूद /संग संग / पानि/एके घाट प

बाघ आ बकरी ।

खरिहान मे दूर दूर धरि पसरल धान /

हसैत –ठिठियाति लोक के / छलै भरि मुंह पान ।

नव नुकूत प्रेमक होईत छल चर्च /

नीक बेजाय मे /होईत छल बुद्धि खर्च ।

जतय एखनहु बांचल छल /

आंचरक लाज /

मन जांति क /जन्निजाति/

करैत छल अपन अपन काज ।

जतय एखनो भोर स साँझ धरि /

बनैत छल किसिम किसिम के भानस/

जीवन स तृप्त /सुखासन प बैस

ज्ञानी ध्यानी पढे छलाह मानस ।

जतय एखनों ठाढ़ छल पुआरक /

बड़का टाल/

आ किल्लोल करैत धिया पूता /

होय छल निहाल ।

ओहि सुतल /ओंघायल सन गाम मे /

पैसि गेल छल एक दिन /

किछू अंनचिन्हार /अजगुत /

जेकर बग्गे बानी सेहो कहने दन /

हाथ मे कड़गर/ हरियर हरियर नोट आ बंदूक ।

ओ सब बैसाहे आयल छल /शांति /पसारि क एक गोट भ्रांति /

खेत खरिहान मे उपजाबय लेल /

बारूद /आरडिएक्स।

छीटैत रहल पाय पर पाय /

आ देखैत देखैत /

भ गेलै विषाक्त /

गामक पोखरि/

बन्न भ गेले अजान ,कीर्तन आ पराती/

डेरा गेल बिहुसैत समाज /

ओतय आब काबिज अछि /

भयोंन /गरजैत/

लाल लाल आंखि/मुंह स बोकरेत/

आगि सन /

आतंकक घिनौन साम्राज्य ॥

॥ अनुवाद ॥

हाथ पाव मोड़े /

सोया सोया सा गाँव /

जहां अभी भी कोई कोई गाता था /

प्रभाती /भूमर /नचारी /

जहां अभी भी पीते थे /

विभेद के वावजूद /

पानि / एक ही घाट पर /

बाघ और बकरी ।

खेत /खरिहान मे /दूर दूर तक /फैला हुआ था धान /

हसते /खिलखिलाते लोग/

सबके मुंह मे भरे थे पान ।

नए प्रेम प्रसंगों की होती थी चर्चा /

अच्छी बुरी बातों मे/बुद्धि होती थी खर्च ।

जहां अभी भी बचा था आँचल का लाज /

स्त्रीगण मन मार कर भी /करती थी अपना काम ।

जहां अभी भी सुबह से शाम तक /

बनते थे किस्म किस्म के व्यंजन /

जीवन से संतुष्ट /सुखासन पर बैठ /

ज्ञानी /ध्यानी /बाँचते थे मानस ।

जहां अभी भी खड़ा था /पुआलों का टाल/

शोर मचाते बच्चे /होते रहते थे निहाल ।

उसी सोए सोए /उँघाते जैसे गाँव मे/

घुस गए थे एक दिन /

कुछ अपरचित /

जिनकी वेश भूषा /वाणी भी विचित्र ।

हाथ मे /हरे हरे /कड़े कड़े रुपए और बंदूक /

आए थे वे लोग खरीदने शांति /फैला कर भ्रांति /

उपजाने के लिए /

खेत खरिहान मे /

बारूद /आर डी एक्स /

फेंक रहे थे शब्दों के पिघलते हुए लावे /

और देखते देखते /गाँव का पोखर /हो गया विषाक्त /

बंद हो गए प्रभाती /झूमर /और अजान /

डर गया था समाज /

काबिज है अब वहाँ /

भयानक अट्ठास करता /

लाल लाल आँखें /और मुंह से आग उगलने वाला /

आतंक का /

घिनौना साम्राज्य ॥

4 अहिल्या ।

भेंट फेर भेल छल गौतम के /

अहिल्या स/वएह काया /वएह रूप /

आईयो धरि तरासल /

वएह जौवन /

नदी के धार सन सनसनाइत/

मुदा आंखिक भाखा एकदम भिन्न /

नहि कोनो लोच /नहिं कत्तों संकोच /

एक गोट नब ऊर्जा /नब तेज स भरल अवस्स /

चौंधिया गेला /ओ ओहि तेज स /

जुग कतय स कतय/चलि आयल /

आत्म दर्शन मे ओझरायल /

कोना अनभिज्ञ रहि गेला ओ /

अही भेद स ।धखाइत /घबड़ाइत /

कहुना अपन परिचय ल बढला /

मोंन पाड़ू/गौतम हम /परमेश्वर अहांक पहिला /

वाक जेना मुंह मे अटकि गेल/

आ जुबती आगा बढि क लपकि लेल /

फेर /सभरैत बजली /बड़ मृदु बोल/

हमरो /छल ई अभिलाषा अनमोल /

की कोनो जुग मे आहाँ के देखितौ /

आ आहाँ के कद स अपन काया नपितौ /

सरापक दुनिया मे कत्तेक बुलब टहलब /

की एखनि धरि अहाँ के किओ नहि बुझौलक /

हम त कहब ज्ञानी बनब त बनू/

अहंकार के परंच पचेनेओ सीखू /

जानू देह गेह के निर्धारित सीमा /

आ निर्दोख के माफ केना भी सीखू /

तखन जाके अहांक तप सब सफल हैत/

कएक जनमक उपरांत फेर हमरा स मिलन हैत /

आब हम वृथा कोनो जोड़ स नै बनहेब/

पाथरि बनि अपन जीबन नहिं गमायब /

बड़ पढेलहू धरम अधरमक पोथी /

जेकर थाह आय धरि नै किओ पायल /

फटकार सुनि हुनक ज्ञान जागल /

कएक जुगक अनहार भागल /

धड़ खसौने ऋषि जायत रहला /

पड़ल मों न केलहा सबटा पिछुलका ।

कलिजुग मे होबैत छै सबहक इंसाफ /

दोषी के दंड आ निर्दोख के खून माफ ।

॥ अनुवाद –॥

भेंट फिर से हुआ था /

गौतम का /अहिल्यासे /

वही काया /वही रूप /आज भी /तराशा हुआ वही यौवन /

नदी के धार सी हनहनाती हुई /

लेकिन आँखों की भाषा /एकदम भिन्न /

नहीं कोई शर्म /न हया /

एक नवीन ऊर्जा /

नए ओज से ओतप्रोत अवश्य/

चौंधिया गए वे उस तेज से /

युग कहाँ से कहाँ चला आया /

कैसे अनभिज्ञ रह गए वे इस भेद से /

शर्माते /घबड़ाते /अपना परिचय लिए बढ़े /

मैं गौतम /परमेश्वर तेरा प्रथम ।

शब्द जैसे मुंह मे ही रह गया /युवती आगे बढ़ कर लपकी/फिर बोली मृदु बोल /

मेरी भी थी परम अभिलाषा अनमोल /

कि किसी युग मे आप को देख सकती /

आप के कद से अपना काया नापती /

श्राप की दुनिया मे घूमेंगे कितना /

क्या अभी तक किसी ने आपको नहीं समझाया /

मैं तो कहूँगी की ज्ञानी बनना है तो बनिए /

अहंकार को जब्त करना भी सीखें /

जानिए देह गेह की निर्धारित सीमा /

और बेकसूर को क्षमा करना भी सीखें /

बहुत पढ़ाया धरम अधरम का पोथा /

जिसका थाह अबतक भी किसी ने न पाया ।

फटकार सुन कर उनका ज्ञान जागा /

कितने युगों का अंधकार भागा /

शरीर झुकाए ऋषि जा रहे थे /

याद आ रहा था सब कर्म पिछला /

कलियुग मे होता है सबका इंसाफ /

दोषी को दंड और मासूम को खून माफ ।

5

प्रलाप कंसक ।

कतेक रातिक जागल /

लाल टरेस आंखि/

जेना फटि क बाहरि निकसि आओत।

केहन भूख /के हन पियास/

खेनाय खाय छी/

मुदा क्षुधा त जेना बिला गेल होय /

ई सिंहासन /ई वस्त्राभूषन /ई रनिवास /

किछू सुख नहिं द रहल अछि उद्विग्न मोंन के /

सदिखन ,उठैत/बैसेत/चलैत/बुलईत/

ओकरे चिंतन /ओकरे धियान /

केवल ओ /ओ / ओ ।

लोक कहैत अछि/मक्खन सन /हमर गौर वर्ण /

अही आंच मे झरकि/

एकदम स्याह पड़ि गेल /कारी कचोर /

ओकरे सन एनमेन ।

आकास /पाताल /

दसो दिसा गवाह अछि /हमर व्यथा के /

ई हो लोकेक कहबी छै/

बड़ बेसी नृशंस भेल जा रहल छी हम /

परंच /हमरा त कनिओ अपन शरीरक नहि भान /

नहिं/मोने के /

बबूरक काँट/शरीरक रॉम रोंम बनि गेल /

कारी घुरमल घुरमल /माथक केस /

बरछी जका ठा ढ़ /जिबैत हम मौतक पुतरा/

मुदा कनिओ सुध हमरा कत्त/

हम त मातल चारो पहरि आठो याम /

ओकरे सोच मे ऊब डूब होईत/

भयग्रस्त भ मृत्यु स /

हदस पैसि गेल अछि /

/जेकर स्नेह मे /

कोचवान बनल /बिसरि गेल रहि अपन राजसी ठाट /

ओहि देवकी के आठम संतान /

राति दिन हमर डेरा रहल अछि /

हां /कंस हम /

कोना तड़पि तड़पि क जीबी रहल छी/नहि बूझल किओ हमर पीर /

ने जड़ि/नहिं चेतन /

नहि जानि/कहिया धरि/भटकैत रहब /

जीवन के अंत के पश्चातों //विराम करब वा नहिं / की/किओ / कहि सकैत अछि?

अनुवाद –

कितने रातों का जागा /

लाल सुर्ख आँखें /

फट कर जैसे /बाहर निकल जाएंगी /

कैसी भूख ? कैसी प्यास ?

खाता तो हूँ /

लेकिन भूख तो जैसे विलीन हो गई हो /

यह सिंहासन /ये वस्त्राभूषण /यह रनिवास /

कुछ भी सुख नहीं दे रहा है मन को /

हर पल /उठते /बैठते /

चलते /

फिरते /उसी का ध्यान /

बस वह /वह /केवल वह ।

लोग कहते हैं मक्खन जैसा मेरा गौर वर्ण /

इस आंच से झुलस कर /

एकदम स्याह पड़ गया हूँ /

काली स्याह /उसी के तरह /

अकास /पाताल /दसो दिशा /गवाह हैं /

मेरी व्यथा के ।

ये भी लोग ही कहते हैं कि/

बहुत ज्यादा नृशंस होता जा रहा हूँ मै/

लेकिन मुझे इसका तनिक भी भान नहीं /

बबुल के कांटे /मेरे शरीर का /रॉम रॉम बन गया /

काले /औठिया केश माथे के /

बर्छी कि तरह खड़े हो गए हैं /

मैं जीवित मौत का पुतला /

लेकिन मुझे जरा भी होश नहीं /

मै तो नशा मे मत्त /

रात दिन आठो पहर /

उसी के विषय मे/

गुपचुप पड़ा /

भयग्रस्त हो कर मृत्यु से /

आतंक प्रवेश हो गया है हृदय मे /

जिसके स्नेह मे कोचवान बना /

भूल गया अपना राजसी ठाठ /

उसी देवकी का आठवा संतान /

डरा रहा है मुझे रात दिन /

भोग से नहीं /भय से ग्रस्त /मैं कंस /

कैसे तड़प तड़प कर जी रहा हूँ /

नहीं समझ पाया कोई भी मेरा दर्द /

न ही जड़ /और न चेतन /

न जाने कब तक भटकता रहूँगा /

जीवन के अंत के बाद भी विराम कर सकूँगा ?

क्या इसका जवाब दे सकता है कोई ?

0 0 0 000 000 कामिनी कामायनी ॥

5 blogger-facebook:

  1. बेनामी11:38 am

    kavitaen bahut marmsparshi hai
    bahut bahut dhanyavad

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत अच्छी कविताएं और बहुत ही अच्छा अनुवाद
    आज के आज की सचाई-


    ना मर्यादा का बोल रहा ,

    न मधुर ,मधुर कल्लोल रहा ,।

    सब दिशा मे तीव्र से तीव्र स्वर ,

    बहरों के गाव मे बसे लोग ।

    ना आँख मे पानी एक बूंद ,


    वाह
    बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  3. कविताएं काफी अच्छी हैं, कहीं कहीं पर कुछ शब्द, कुछ संकल्पनाएं समाज नहीं आयीं, पर कोई बात नहीं। ८० % भी समझ आ गया तो बहुत है. रोज रोज कहां यह पढने को मिलता है? इसे ही लिखती रहिये. धन्यवाद.

    उत्तर देंहटाएं

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------