यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी का आलेख - नारी वेदना

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नारी वेदना:आस्था-अनास्था की पगडंडियों पर श्रद्धेय होने की [यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी] समाज व्यक्तियों और परिवारों का समूह है। समाज की व्यवस्थ...

नारी वेदना:आस्था-अनास्था की पगडंडियों पर श्रद्धेय होने की

[यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी]

समाज व्यक्तियों और परिवारों का समूह है। समाज की व्यवस्था में परिवर्तन का वस्तुतः व्यक्तियों और परिवारों पर प्रभाव न्यूनाधिक पड़ता ही है। व्यक्तियों का घटक परिवार होता है और परिवार स्वयं में स्त्री-पुरुष संबंधों का ऐसा केंद्र होता है, जिसका दर्पण समाज होता है। साम्यवाद और इसके विवेचक कार्ल मार्क्स हों या पूँजीवाद और इसके चिन्तक, वर्तमान वैश्विक मनीषी हों या धर्मदूत हों अथवा अध्यात्म के देदिप्य केंद्र हों। स्त्री-पुरुष की पारिवारिक, सामाजिक अन्योन्याश्रयिता को नकारने की स्तिथि में अभी तक नहीं है


हाँ, कुछ परिवार पिता के वंश के होते है, तो कुछ कुल माता के वंश से चलते है स्त्री का महत्व नेपोलियन बोनापार्ट के शब्दों में ‘मुझे तुम दस सच्चरित्र माताएं दे दो, बदले में मैं तुम्हे एक महान और सबल राष्ट्र दे दूंगा।’ उसने तो दस से कम नहीं सच्चरित्र माताएं मांगी थी, पर भारत में केवल और केवल एक सच्चरित्र माता जीजा बाई थीं, जिन्होंने एक शिवाजी ही मात्र नहीं, एक “महाराष्ट्र” भी इतिहास को प्रदान कर दिखाया था।


यह कितना विचित्र है कि ‘रामलीला’ का सामाजिक समारंभ ‘ताड़का वध’ और ‘कृष्णलीला’ का श्रीगणेश ‘पूतना वध’ से होता है। महर्षि वाल्मीकि और महर्षि कृष्णद्वैपायन हमारे व्यास कहना क्या चाहते है? इनके चिंतन का सारतत्व यही है कि सारे राष्ट्र के सभी पुरुष कुमार्गी हो जाएँ, पर एक भी स्त्री सच्चरित्र बची रहे तो एक नया ओजस्वी राष्ट्र हम पुनः बना लेंगे, पर एक भी स्त्री पूतना या ताड़का बनी और उसका उन्मूलन नहीं हुवा तो श्रेष्ठताओं का राष्ट्र भी धूल में जा मिल सकता है। प्राचीन की एक हेलन तत्कालीन दो राष्ट्रों की श्रेष्ठ सभ्यताओं और संस्कृतियों के पतन का कालजयी उदाहरण है। विनोबा जी कहते ही हैं-’एक पुत्र को पढ़ाना केवल पुत्र को पढ़ाना है,पर एक पुत्री को पढ़ाना पूरे परिवार को पढ़ाना है।’


औद्योगिक विश्व जब पैदा हुवा और मशीनों कि सहभागिता बढी तो श्रम की भूमिका घटी और स्त्रियाँ पुरुषों के बराबर कामों में आने लगी। ‘कृषिप्रधान’ युगों की नारी पर पुरुष प्रधानता के स्थान ने स्त्रियों को पुरुषों के बराबर ला खड़ा कर दिया। औद्योगिक विकास यूरोप में तीव्रतम रहा, अतः स्त्री-पुरुष बराबरी का मनोविज्ञान वहाँ तेजी का वातावरण बन गया। सामाजिक राजनीतिक अधिकारों पर बराबरी का बिगुल बजने लगा। अब स्त्री पुरुष की दासी नहीं, जीवन सहचरी बनने जीवन के क्षेत्र में चल पड़ी! पर, वेदों से पौराणिक तक फ़ैली बस्तियां जानती है कन्या का अपने पर स्वत्व होता है , वह स्वयम जिसे आत्म-समर्पण करती है वही उसका पति होता है, जिसे वह परमेश्वर का सिंघासन देती है। मनु नारी का राष्ट्रीय मानचित्र प्रस्तुत करते हुवे कहते है, जो विधिक दर्शन का प्रथम उपोद्घात है और सदियों को भेद कर आज भी गुंजायमान है-


यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः।।
-मनुस्मृति 3/56


नारी माँ के रूप में प्रथम-वन्दनीय और मार्ग-दर्शक भारत की सदियों ने देखा है। पत्नी रूप में सुख दुःख की दिन-रात रही है नारी भारत में। दोनों के बीच प्रेम के ह्रदय दीप जगमगाते रहे है-जीवन के अंधियारों में जब-जब सूर्य के प्रकाश साथ नहीं खड़े होते रहे। यह भारतीय नारी शेक्सपीयर के शब्दों में ‘विमेन आर ब्लंडर मिस्टेक ऑफ़ गॉड’ या ‘ईश्वर की भयानक भूल नहीं थी’।


उन दिनों के ब्रह्मा,वशिष्ठ,अत्रि,अंगीरा,भृगु,बृहस्पति,शुक्र आदि आज के बुद्धिजीवियों से कहीं अधिक मेधावी मनीषी और चिन्तक थे। ब्रह्मा की सरस्वती, विष्णु की लक्ष्मी, शिव की पार्वती, राम की सीता, कृष्ण की राधा, वर्तमान नारियों की प्रेरणाश्रोत शाश्वत बन गए समय पर स्थापित हैं। स्त्रियाँ रणक्षेत्रों में युद्धरत भी उन दिनों के रणक्षेत्रों में मिलती हैं। ‘महाकाली’ ‘मधुकैटभ’ के विरुद्ध एक सफल अभियान रही है! ‘महालक्ष्मी’ ‘महिषासुर’ के युद्ध-तंत्र को विध्वंस कर डालती है! ‘महासरस्वती’ ‘शुम्भ-निशुम्भ’ के आतंकवादी संगठन को समाप्त कर शांति और समृद्धि के युग का आरम्भ कराती मिलती है। ‘गौरी शंकर’ एक समय ‘अर्द्धनारीश्वर’ बन जाते है उन दिनों के भारत ने देखा है। आज का भारत भी ऐसे महान दृश्य देखने को प्राचीन द्वारा आमंत्रित है।
न जाने कब कहाँ, कैसे नारी को अबला कह दिया गया! दो-दो नवरात्रों के इस देश को, इसके नारी सम्मान के मनोविज्ञान को, कहते-सुनते पढ़ते पाया जाता है -


यो माँ जयति संग्रामे यो मे दर्प व्यपोहति,
यो मे प्रति बलों लोके स मे भरता भविष्यति|
-दुर्गा सप्तशती 5/120


नारी शक्ति है। शक्ति के बिना शिवो-शिव का शैवागम -उद्घोष इस देश के कर्णरंध्र सुनते आ रहे है। पिता से माता सहस्र गुणा पूज्या है-
सहस्त्रं तु पितृन्माता गौरवेणातिरिच्ते।।
मनु .2/145
वेदों की नीति मेंन स्वैरी स्वैरणी कुतः ||
छान्दोग्योपनिषद 5/11/5


सच्चरित्रता दमकती स्त्री-पुरुष की सहगामिनी है। वेद वाणी गृहसूक्त बन कर नारी का उद्बोधन करती है –
सम्राज्ञी श्वशुरे भव, सम्राज्ञी श्वश्रुवां भव।
ननान्दरि सम्राज्ञी भव, सम्राज्ञी अधि देवृषु।।
-ऋग्वेद 10.85.46.


वेदों में स्त्री ससुर, पति, पुत्रादि की कमाई की मालकिन थी। आज उसे पुरुष के बराबर लाने की कवायद उसे उसके उच्चासन से पदावनत करना जैसा है। सावित्री यमराज पर भरी पड़ती है| शाण्डिली सूर्य के उदय को रोकने की शक्ति से संम्पन्न मिलती है। गार्गी,लोपामुद्रा ऋचाओं की सर्जनात्मक क्षमता से समृद्ध है। कैकेई युद्धभूमि में मूर्छित हुवे दशरथ का स्थान लेकर रणंजई कौशल प्रस्तुत करती मिलती है। ब्राह्मण युग की संक्रांति में यशोधरा, सुजाता, आम्बपाली, जैसी नारियाँ साधकों का उद्धरण बनी है। इसीतरह वेदों और पौराणिक युग में पारिवारिक,सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक, आध्यात्मिक, दार्शनिक सभी क्षेत्रों में नारियाँ अग्रिम पंक्ति में सम्मानित रहीं है। यहाँ तक की राम रावण युद्ध में सुपर्णखा की भूमिका का अपना सैन्य विज्ञानी महत्व है।

इन युगों में नारियाँ शांति सेवा समृद्धि की प्रौद्योगिकी और प्रायोगिकी दोनों भूमिकाओं में मिलती हैं। वैदिक और पौराणिक नारी दिन और रात के मध्य की वह संध्या (वंदना बेला) जहां दिन थक कर उनके आँचल में सिर रख कर विश्राम यामिनी की निद्रा पाता है और एक नयी स्फूर्ति के साथ ऊषा की प्रभात फेरी में पुनः सक्रीयता के औद्योगिक दाग भरने लगता है।[यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी]

YATINDRA NATH CHATURVEDI

पर्यावरण एवं सामाजिक कार्यकर्त्ता_Author / Environmentalist / Political and Social Activist /

Dynamic Youth Leader of Two National Movement

Student Revolution:1997, A Movement Campaign of Ganga Renaissance:2012

 

E : meyatindranathchaturvedi@ gmail.com

नाम

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फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर 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जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi 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रचनाकार: यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी का आलेख - नारी वेदना
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