मंगलवार, 13 जनवरी 2015

मंतव्य 2 - द्वारिका प्रसाद अग्रवाल का संस्मरण : बीकानेर का मजा

(मंतव्य 2 ईबुक के रूप में यहाँ प्रकाशित है, जिसे आप अपने कंप्यूटिंग/मोबाइल उपकरणों में पढ़ सकते हैं. मंतव्य 2 संपादकीय यहाँ तथा राम प्रकाश अनंत का लघु उपन्यास लालटेन यहाँ पढ़ें)

 

 

बीकानेर का मज़ा

द्वारिका प्रसाद अग्रवाल

मेरा नाम है चमेली : सन् 1968 में एक बचकानी फिल्म आयी थी-‘राजा और रंक’ जिसमें लता मंगेशकर जी का गाया एक मधुर गीत था : ‘मेरा नाम है चमेली, मैं हूँ मालन अलबेली, चली आयी मैं अकेली बीकानेर से।’ उस अलबेली मालन की प्रतीक्षा में मेरे बाल सफ़ेद हो गये लेकिन उसके दर्शन नहीं हुए। बीकानेर के श्री अशोक गुप्ता ने जब कला एवं साहित्य उत्सव के आयोजन का निमंत्रण दिया तो मन प्रसन्न हो गया, कल्पना बनी कि देश भर के ‘फेसबुक-मित्रों’ से मुलाक़ात होगी और उस अलबेली मालन से भी। बीकानेर के रसगुल्ले, भुजिया और पापड़ विश्व में प्रसिद्ध हैं। बचपन से हलवाई का धंधा किया है तो ये दुकानें मुझे बरबस आकर्षित करती हैं। बीकानेर जाते समय ट्रेन में एक सहयात्री ने बताया, ‘‘भाई जी, आपने हल्दीराम और बीकाजी का नाम बहुत सुना होगा लेकिन यदि ‘बेस्ट क्वालिटी’ भुजिया, पापड़ लेना हो, तो भुजिया गली में ‘बिसनलाल बाबूलाल’ की दुकान से लेना।’’ समारोह स्थल पर उत्सव चल रहा था, कविता पाठ चल रहा था, मैंने अपने मित्र टी. के. मारवाह को पटाया। हम दोनों चुपचाप वहाँ से खिसके और बीकानेर की गलियों में समा गये, बहुत तलाशे मगर कहीं कोई मालन नहीं मिली। हाँ, रंगीन पत्थरों से बनी नक्कासीदार अटारियों ने हमें मुग्ध कर दिया। कोई परिचय-सूत्र होता, तो अन्दर जाकर भी देखते लेकिन क्या करते, बाहर की छटा देखकर ही मन को मनाना पड़ा। सँकरी-घुमावदार गलियाँ, उन गलियों से गुज़रते नगरवासी, हर मोड़ पर ‘ट्रेफिक जाम’, हँसते-मुस्कुराते लोग- वहाँ की बात ही कुछ अलग लग रही थी। पता करते-करते हम लोग सट्टा बाज़ार पहुँचे जहाँ पराठा-सब्ज़ी की एक मशहूर दुकान थी। उस दुकान को बाहर से देखकर हम दोनों एकबारगी झिझक गये, लेकिन उसकी बहुत तारीफ़ सुनी थी इसलिए हिम्मत करके घुस गये। साढ़े तीन फुट के एक गलियारे में मुँहाने पर एक भट्टी पर रखे तवा पर पराठे सेंके जा रहे थे। किसी प्रकार कढ़ाई की कालिख से बचते हुए जब हम अन्दर घुसे तो गली और सकरी हो गयी, जिसमें एक दीवार से सटी दो बेंच रखी थी जिस पर मनुष्य किसी प्रकार अपना पृष्ठभाग टिकाकर बैठ सके और उसके सामने एक बित्ते की टेबल भी रखी गयी थी ताकि जब अख़बार के टुकड़े में रखकर पराठा परोसा जाये, तो कागज़ टिका रहे। गली में दो फुट की जगह बची थी जिसमें नाली थी और चूँकि वह नाली भरी-पूरी थी इसलिए उसमें से दुर्गन्ध उठ रही थी। उस दुकान में रखा हर सामान ऐतिहासिक टच लिये दिख रहा था। अतएव इतिहास का उपहास न हो, हमने उस घिनौने माहौल में भी मशहूर पराठा खाने का निश्चय किया और आलू तथा मूंगदाल के पराठे मँगवाये और केवल पराठे पर ध्यान केन्द्रित कर उसके स्वाद का आनंद लिया। बेशक, पराठे स्वादिष्ट थे और सस्ते भी। चार पराठे के चालीस रुपये दुकानदार ने अपनी छोटी-सी लकड़ी की संदूक में जब रख लिये, तब मैंने उनसे कहा‘‘आपकी शोहरत सुनकर आपकी दुकान में आये थे, पराठे तो अच्छे थे, लेकिन आपने अपनी दुकान की यह क्या हालत बना रखी है?’’ उत्तर में उन्होंने अपने दांत निपोर दिये। मैंने बात आगे बढ़ायी, ‘‘मैंने जैसा आपका नाम सुना था, मेरे दिमाग में आपकी दुकान की जो कल्पना थी, वह कुछ और थी लेकिन यहाँ का हाल देखकर मुझे दुःख हो रहा है।’’ उत्तर में उन्होंने अपने दांत निपोर दिये। मैंने फिर बात आगे बढ़ायी, ‘‘अगली बार मैं जब बीकानेर आऊँगा, तो अपनी ‘मेमसाहब’ को लेकर पराठा खाने आऊँगा, तब तक इसे ठीक-ठाक करवा लीजिएगा।’’ उत्तर में उन्होंने अपने दांत निपोर दिये उस गली से बाहर निकले। दो बार दाहिने मुड़ने के बाद भुजिया गली पहुँच गये, तनिक खोजने के बाद बिसनलाल बाबूलाल की दुकान दिख गयी। वह साढ़े चार फुटी गली में स्थित दुकान थी जिसके प्रवेश द्वार पर एक सज्जन काउंटर के अंदर विराजमान थे। मुझे उनका चेहरा बाद में दिखा और पेट पहले क्योंकि वह उनके चेहरे से एक बित्ता बाहर था। दुकान की गहराई केवल आठ फुट थी। मैं दुकान का क्षेत्रफल देखकर अचंभित हो रहा था और सशंकित भी कि किसी गलत दुकान में तो नहीं घुस गया! उनसे नाम कनफर्म करने के बाद हम दोनों ने घर ले जाने के लिए भुजिया खरीदी। बाहर निकलते हुए मैंने उनसे पूछा, ‘‘आपका कारख़ाना यहीं आस-पास है क्या?’’ ‘‘हें हें हें, बहुत दूर है।’’

‘‘सेव बनाने के लिए कितनी भट्ठियाँ हैं?’’ ‘‘हें हें हें, हमें क्या मालूम जी!’’

‘‘आप मालिक हो और आपको यह नहीं मालूम कि आपके कारखाने में कितनी भट्ठियाँ हैं?’’ ‘‘हें हें हें, हम तो वहाँ जाते नहीं।’’

‘‘मैं इन्कमटेक्स वाला नहीं हूँ, आपका बिरादर हूँ, बिलासपुर से आया हूँ।’’

‘‘हें हें हें, वो तो ठीक है जी, हें हें हें।’’ उन्होंने जवाब दिया और मुँह मोड़कर दूसरे ग्राहकों से जुड़ गये लेकिन इतने प्रयास के बावजूद मैं उनसे भट्ठियों की संख्या नहीं उगलवा पाया। मैं और मरवाह जी उस सेठ की चर्चा करते एक दुकान पर खड़े-खड़े चाय सुड़की और आटो में बैठकर कार्यक्रम स्थल पर वापस आये। वहाँ नाट्यकर्मी नादिरा बब्बर के शिष्य नाटक की एकल प्रस्तुति कर रहे थे। शुरुआती दो प्रस्तुतियाँ बेदम थीं लेकिन अंतिम दो प्रस्तुतियाँ अद्भुत थीं, उन प्रस्तुतियों के बारे में बाद में बताऊँगा, उस समय तो मेरे दिमाग में पराठा वाला और भुजिया वाला झूल रहे थे। मैं सोच रहा था कि बीकानेर वाले इतना रहस्यपूर्ण व्यवहार क्यों करते हैं? समापन कार्यक्रम के दौरान वह रहस्य खुला जब आयोजक श्री अशोक गुप्ता ने एक समीक्षा व्यक्तव्य दिया। पूरा व्यक्तव्य आपके काम का नहीं है, केवल एक वाक्य काम का है। उन्होंने कहा, ‘‘आप सोचते होंगे के अशोक गुप्ता बड़ा आदमी है, पेसे वाल्ला है लेकिन ऐसा नई हे। कार बेचणे का धन्दा करता हूँ पर मेरे जेब में एक रूपिया नहीं होवे।’’ मुझे समझ में आ गया कि बीकानेर का हर धनिक ‘कथरी ओढ़ कर घी खाने वाला’ है। सब इतने चतुर और सतर्क हैं कि अपनी तिजोरी दूसरे के सामने कभी नहीं खोलते। मैं तो समझ गया, आप समझे कि नहीं?

मेरा नाम है सईद अयूब : 35 घंटे की लंबी रेलयात्रा के बाद जब मैं और बिलासपुर के पत्रकार-कृषक श्री बजरंग केडिया अलसुबह बीकानेर पहुँचे, तो सबसे पहले सईद अयूब हमें मिले। चार रातों से जगे हुए थे लेकिन खुश थे। स्टेशन के पास की एक होटल में चाय पिलाकर वे हमें आवास स्थल ‘आशीर्वाद’ ले गये। बीकानेर साहित्य और कला उत्सव में बहुत लोग आये थे, चारों तरफ़ के लोग जिनमें साहित्यकार थे, कलाकार थे, नाटककार थे, चित्रकार थे, फोटोग्राफर थे। नास्ते-चाय और भोजन का क़ाबिल-एतारीफ़ इंतज़ाम था। कार्यक्रम स्थल में सहज और सादगीपूर्ण सजावट थी। तीन दिन चले इस महोत्सव में एक भी ‘इन्डोर’ कार्यक्रम नहीं हुआ, सारे कार्यक्रम आस-पास गुज़रती ठंडी हवा और प्राकृतिक प्रकाश में आयोजित हुए। फोटोग्राफ़ और पेंटिंग्स की प्रदर्शनी लगी थी, ‘वर्क शाप’ चल रहे थे, साहित्यिक पुस्तकों के स्टाल लगे थे। खुली हवा में साँस लेते हुए साहित्यिक कार्यक्रम का आनंद लेना एक अनोखा अनुभव था। आयोजक श्री अशोक गुप्ता हम लोगों की भीड़ देखकर पुलकित थे। साथ ही हड़बड़ाए से दिख रहे थे, शायद उन्हें ऐसे बड़े मज़मे की कल्पना भी नहीं रही होगी। साहित्यकार और कलाकार आम तौर पर सिरफिरे होते हैं जिसे साहित्यिक भाषा में ‘संवेदनशील’ कहा जाता है। सिरफ़िरों की इतनी बड़ी भीड़ को सम्हालना और तीन दिनी कार्यक्रम शान्ति से निपट जाना, सच में, गज़ब हो गया। इस ‘गज़बनाक’ सफलता के पीछे लगभग एक दर्ज़न बजरंगबलियों की अथक मेहनत थी जिसका नेतृत्व सईद अयूब के हाथों में था। इस युवा की तारीफ़ में ‘सईद चालीसा’ लिखी जा सकती है। इसको काम के समय नींद नहीं आती, भूख नहीं लगती, गुस्सा नहीं आता। हरदम मुस्कुराते रहता है, हरदम तरोताज़ा रहता है, हरदम दौड़ते रहता है, हरदम सबसे मिलने के लिए लालायित रहता है, सबकी समस्या का समाधान उसके पास रहता है। सबसे बड़ी बात है कि लड़का कुँवारा है। अपनी बीवी बनाने लायक लड़की खोज रहा है, कुँवारी लड़कियों और उनके फ़िक्रमंद अब्बाओं के लिए यह खुशख़बरी हो सकती है। लड़का ‘गेरेंटीशुदा’ है, जेएनयू में पढ़ा है, यूपीयन है, अमेरिका के नागरिकों को हिन्दी भाषा पढ़ाता है, कमाऊ पूत है।

इच्छुक परिवार डॉ. पुरुषोत्तम अग्रवाल से संपर्क करें क्योंकि सईद अयूब सिर्फ उनका कहना मानता है और उनके ही निर्देश पर अपने साथियों को लेकर बीकानेर में डेरा डाले बैठा था।

दूसरे दिन दोपहर को सब लोग ‘डेज़र्ट सफारी’ के लिए बस में बैठकर निकल गये। हम देर से पहुँचे, तब तक बसें जा चुकी थीं लेकिन एक खाली बस को रोककर सईद हम ‘लेट लतीफों’ का इंतज़ार कर रहे थे। धीरे-धीरे दस लोग अन्तिम खेप के रूप में हम लोग रवाना हुए। रास्ते में सईद ने बातचीत शुरू की जिसमें कुछ उपयोगी और ज्ञानवर्धक सूचनाएं मिलीं। उपरोक्त कुछ सूचनाएं इसी वार्तालाप के अंश हैं। कुछ और भी आपको बताने लायक है, जैसे, सईद ने घोषित किया, ‘‘मैं ऐसी लड़की से शादी करूँगा जो मेरे जैसे स्वभाव की हो।’’ ‘‘पति-पत्नी एक स्वभाव के होते ही नहीं सईद भाई।’’ मैंने कहा। ‘‘मैं शादी के पहले से ही सब बातें साफ़ कर लूँगा।’’

‘‘लडकियाँ बहुत होशियार होती हैं। शादी के पहले वह तुम्हारी हर बात मान जाएगी, शादी के बाद तबला बजाएगी।’’ ‘‘मैं तो खुले दिमागवाला हूँ, न दबाऊँगा और न दबूँगा।’’ ‘‘मान लो आपस में न पटी तो?’’ ‘‘तलाक दे दूँगा, मैं भी आज़ाद और वह भी।’’

‘‘तलाक दोगे, तो लड़की बड़ी रकम वसूलेगी।’’ मेरे पीछे बैठे व्यक्ति ने धमकाया।

‘‘हम लोगों में यह समस्या नहीं है। शादी के वक़्त मेहर की रकम तय होती है, बस, उतना ही देना होता है। मैं तो मेहर की रकम को शादी के समय ही अपनी बीवी के नाम बैंक में जमा करवा दूँगा।’’ सईद ने अपनी योजना बताई।

सईद अयूब की बात से मुझे समझ में आया कि लड़का दूरदर्शी है, खुले दिमाग का है, साफ़-साफ़ बातें करता है, बीवी को तलाक दे सकता है और एक से अधिक शादियाँ करने का हौसला रखता है। खुदा ख़ैर करे। इस ‘स्मार्ट’ बन्दे ने मुस्कुराते हुए इस उत्सव में मेरी जो बाट लगायी, उसे आगे बताऊँगा, तब तक आप इंतज़ार कीजिये।

मेरा नाम है पुरुषोत्तम अग्रवाल : आपने ‘मार्क’ किया होगा कि कुछ फ़िल्में किसी कलाकार के नाम से चल जाती हैं। हमारे ज़माने में दिलीप कुमार, राजकपूर, देवानन्द, सुरैया, मधुबाला, नर्गिस के नाम से फिल्में चल जाती थी, वैसे ही बाद में मेहमूद, साधना, राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन, धर्मेंद्र जैसे नाम दर्शकों को सिनेमा हाल तक खींच लाते थे। आजकल शाहरुख, सलमान, आमिर, ओमपुरी, परेश रावल आदि अपने नाम से फिल्म हिट करवा लेते हैं, उसी प्रकार बीकानेर साहित्य और कला उत्सव प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल के नाम से सफल हो गया। कार्यक्रम आयोजक ने अपने एक भाषण में कहा कि उनके कार्यक्रमों में किसी को भी मुख्य अतिथि या विशिष्ट अतिथि नहीं बनाया गया, लेकिन आयोजन में बड़ी चतुराई से प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल, श्री नरेश सक्सेना, श्री शीन काफ़ निज़ाम, श्री चंद्र प्रकाश देवल, श्री नंद भारद्वाज, श्री शिवरतन अग्रवाल आदि नामचीन हस्तियों को कभी मंच के उधर, कभी मंच के इधर बैठाकर उन्हें अघोषित ‘मुख्य’ या ‘विशिष्ट’ अतिथि बनाये रखा गया। इसका मतलब यह मत लगा लीजिएगा कि ये लोग उस योग्य नहीं थे, ये सब योग्य थे, महायोग्य थे लेकिन आप समझिए कि आयोजकों का दावा कितना हसीन था! आयोजक अशोक गुप्ता से मेरी मित्रता हाल की है, उनकी फेसबुक वाल पर चिपके हुए ‘दिल दहला देने वाले’ फ़ोटोग्राफ के आकर्षण में मैं उनकी वाल से लिपट गया और उन्हीं मनमोहक चित्रों पर नज़र घुमाते-घुमाते एक दिन अचानक ‘बीकानेर साहित्य और कला उत्सव’ के बारे में पढ़ा, तो मुझे लगा, आयोजन अच्छा होना चाहिए, सब आमने-सामने देखेंगे, फेसबुक के परिचित मित्रों से मिलेंगे, कुछ नये मित्र बनाएँगे, अपने आत्मकथात्मक उपन्यास ‘कहाँ शुरूकहाँ ख़त्म’ का प्रचार भी करेंगे।

डर के मारे मैं अपनी पत्नी को साथ बीकानेर नहीं ले गया क्योंकि वहाँ की चित्र प्रदर्शनी में ‘ऐसे-वैसे’ दृश्यों को उनके सामने कैसे देख पाऊँगा? इतने सारे लोगों के सामने यदि वे मुझे डाँटतीं, ‘इसलिए यहाँ आए हो?’ तो मेरी सार्वजनिक छवि बिगड़ने का अंदेशा था। वैसे घर में डाँटती हैं, तो कोई ख़ास बात नहीं, वह घर की बात घर के अंदर रहती है। ‘सौन्दर्य बोध’ की आधुनिक अवधारणा की आड़ में सौन्दर्य दर्शन करने की बेखौफ़ हिम्मत मुझमें नहीं है।

हाँ, तो मैं आपको प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल के बारे में बता रहा था लेकिन इधर-उधर भटक गया।

पुरुषोत्तम जी की ख्याति पूरे हिन्दी जगत में विचारक और प्रभावशाली वक्ता के रूप में है। जब से टेलीविज़न के न्यूज़ चैनलों में चर्चा करने के लिए दिखने लगे हैं, तब से उनकी लोकप्रियता में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। बिना डरे दो टूक टिप्पणियाँ अब बहुत कम सुनने को मिलती है, पुरुषोत्तम जी जब चर्चा में बैठते हैं तो किसी भी विषय पर उनकी संतुलित और सधी हुई बात बरबस मन मोह लेती है। इस उत्सव से उनका जुड़ना-कार्यक्रम का आकर्षण बिन्दु हो गया। न जुड़ने वाले भी इसलिए जुड़ गये कि ‘जब प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल जुड़ गये, तो मुझे भी जुड़ जाना चाहिए।’ मेरा अनुमान कि यह कारवां ऐसे ही कुछ विशिष्ट लोगों के जुड़ जाने की वज़ह से बढ़ता गया...।

पुरुषोत्तम जी से मेरी पहली मुलाक़ात बिलासपुर में 7अप्रैल, 2013 को हुई। वे मेरे द्वारा संचालित संगठन ‘विचार मंच’ के सौवें कार्यक्रम में अतिथि वक्ता के रूप में ‘लोकतन्त्र की विषमताएँ एवं संभावनाएँ’ विषय पर अपने विचार व्यक्त करने हेतु पधारे थे। उनके अध्ययन, मनन-चिंतन, नवोन्मेषी दृष्टि और प्रभावपूर्ण वक्तृत्व शैली ने मुझे बेहद प्रभावित किया। उसी दिन मैं उनका फैन बन गया। फेसबुक पर उनसे जुड़ने के बाद उनका मित्र समूह मुझसे जुड़ा, परिणामस्वरूप मेरी मित्र सूची समृद्ध होती गयी।

मेरा नाम है अशोक गुप्ता : कोई व्यापारी यदि साहित्यानुरागी या कला प्रेमी हो जाये, तो समझ लीजिए की उसे खुजली वाला कोढ़ हो गया है जो उसे चैन से नहीं रहने देगा। मैं स्वयं व्यापारियों की ज़मात का हूँ इसलिए श्री अशोक गुप्ता के बारे में इस अभद्र भाषा का उपयोग करने की पात्रता रखता हूँ। बीकानेर साहित्य और कला उत्सव उसी दुखद बेचैनी की सुखद परिणति है। जिस व्यापारी में आर्थिक सामर्थ्य होता है, वह स्वयं को साहित्यप्रेमी घोषित करवाने के लिए अपने वित्त सामर्थ्य को काम पर लगाता है और किसी ऐसे ‘पैदल’ को तलाशता है जो उसको मंच पर स्थापित करे, उसकी जय-जयकार करवाये और साहित्यिक और कलात्मक गतिविधियों का आधार स्तम्भ बताये। जाहिर है, सब जानते हैं कि ‘धन’ ही धर्म का आधार है, राजनीति का आधार है, फिल्मों के निर्माण का आधार है, वैसे ही साहित्य और कला के वृहद कार्यक्रमों का भी धन ही आधार है, परन्तु अशोक जी ने अपने बुद्धि चातुर्य से धन-सामर्थ्य- बल के स्थान पर फेसबुक को अपना ‘पैदल’ बनाया और आप देखिये, यह अद्भुत सम्मलेन घटित हो गया।

अशोक गुप्ता मेरे जैसे व्यापारी और अन्य साहित्य कार्यक्रम आयोजकों के लिए एक प्रकाश स्तम्भ हो गये हैं जिन्होंने अपने धन का नहीं, वरन बुद्धि का प्रयोग करके इस आयोजन को सफल करके दिखा दिया। मैं तो अत्यंत उत्साहित हो गया हूँ कि ऐसा ही धांसू कार्यक्रम अपने शहर बिलासपुर में भी करूँ। बस, प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल का आसरा मिल जाये और सईद अयूब का सहारा। माँ कसम, बीकानेर से एक इंच ऊँचा कार्यक्रम करके बताऊँगा। किसी साहित्योन्मुखी धनिक की तलाश में हूँ, जैसे ही वह मुझे मिला, मैं गुरु-चेला को पटाता हूँ।

अशोक जी एक आदर्श पुरुष हैं, उनसे बहुत कुछ सीखने लायक है। मैंने पूरे उत्सव में उन्हें उत्तेजित होते, चिंतित होते, हड़बड़ी करते या दौड़ते-भागते नहीं देखा। हाँ, तनिक बेचैन से दिखाई पड़ते थे। इतना बड़ा आयोजन हो, तो ऐसी बेचैनी स्वाभाविक है। मैं सबको तो पहचानता नहीं, परंतु मैंने वहाँ अनुमान लगाया कि उत्सव में स्थानीय कार्यकर्ताओं की कमी थी और प्रतिभागी ही कार्यकर्ता की भूमिका में अवतरित हो गये थे। अशोक जी की एक ‘पोस्ट’ से मेरा अनुमान पुष्ट भी हुआ है। यह अशोक जी की विलक्षण नेतृत्व क्षमता का परिचायक है, सीखने लायक है। उन्होंने इस ‘पोस्ट’ में इन ‘दिहाड़ी’ वालों को मालदीव घुमाने ले जाने का आश्वासन दिया है जिसे पढ़कर मेरा मन बेहद दुखी हो गया। अब मेरी उम्र

67 वर्ष हो गयी है, आस-पास का समझ आता है लेकिन दूर-दृष्टि कमज़ोर हो गयी है अन्यथा मैं भी दस-बीस कुर्सियाँ इधर-उधर कर देता और अशोक जी के द्वारा प्रायोजित मालदीव यात्रा-दल की सूची में मेरा भी नाम होता! सच में, अखर गया।

मैं यह भी जानता हूँ कि इतने बड़े उत्सव में बेतहाशा ख़र्च होता है, फिर, ‘फ्री फंड’ वाले भी कार्यक्रम दाँत निपोरते घुस जाते हैं, ‘लोकल’ तो निःशुल्क थे ही। ज़रूर अशोक जी का पर्स भी हल्का हुआ होगा। अब चूँकि वन मैन शो था, इसलिए कुछ कहा नहीं जा सकता पर अशोक जी अपनी सज्जनता के कारण अपनी ज़ेब से काफ़ी ख़र्च हो जाने के बावजूद, मुझे उम्मीद है कि वे अपने मुँह से किसी से कुछ नहीं बताएँगे, स्वयं सह लेंगे।

मेरा नाम है द्वारिका : मैं बहुत दिनों से स्वयं को साहित्यकारों की ज़मात में शामिल करवाना चाहता था।

कोई भी कितना भी अच्छा लेखक हो, कवि हो, या ये हो या वो हो, जब तक वह पुराने पापियों के बीच घुसकर खड़ा नहीं होता, उसे मान्यता नहीं मिलती। वैसे भी साहित्य में मेरा कोई योगदान नहीं रहा है, पर पिछले वर्ष मेरा उपन्यास ‘कहाँ शुरूकहाँ ख़त्म’ प्रकाशक को ढेर सारा रुपया देकर प्रकाशित हुआ, तो मेरा दिल भी साहित्यकार कहलाये जाने के लिए मचल गया। मैंने कभी किसी साहित्यिक कार्यक्रम में भाग नहीं लिया था, इसलिए श्री अशोक गुप्ता का ‘बीकानेर कला एवं साहित्य उत्सव’ मेरे लिए एक ऐसे अवसर के रूप में प्रगट हुआ जिसमें मुझे अखिल भारतीय स्तर पर पहचाने जाने की संभावना दिखी। यह बात दूसरी है कि वहाँ मेल-मुलाक़ात का माहौल नहीं बना, सब अपने-अपने समूह में विचरते रहे जैसे- बीकानेरी समूह, लखनवी समूह, जयपुरी समूह, दिल्ली समूह, वृद्ध समूह, युवा समूह, युवती समूह आदि। अधिकतर लोग अपनी लकदक या मेक-अप दिखाने या उपस्थिति दर्ज़ कराने के लिए आये थे, परंतु इसमें गलत क्या है- सब अपनी ज़ेब के पैसे ख़र्च कर आये थे। कुछ लोग अपनी लिखी कविता सुनाने आये थे, इसीलिए उनका दिल रखने के लिए आयोजक ने भरपूर लम्बी और बहुत लम्बी काव्य गोष्ठियाँ रखी। उसी प्रकार मैं भी अपने एक्सपोजर के लिए लालायित था।

मौक़ा ऐसे मिला कि जब नवनीत पांडे जी ने मुझे ‘प्रोफ़ाइल’ भेजने का संदेश दिया, तो मैंने उत्तर दिया, ‘‘मेरी कोई फ़ाइल नहीं है, तो ‘प्रोफ़ाइल’ कैसे बनाऊँ?’’ अब आप बताइये, ज़िंदगी भर व्यापार किया, अचानक एक पुस्तक छपवा ली तो इत्ती सी उपलब्धि पर भला कोई प्रोफाइल बनती है? मैंने उस संदेश में एक वाक्य और जोड़ दिया था, ‘‘सिनेमा का मुझ पर प्रभाव विषय पर बोलने के लिए मुझे तीस मिनट का समय दिया जाये।’’

25 अक्तूबर की रात को मुझे एक संदेश मिला, ‘‘सर, 3 नवम्बर को 11.30 से 12.00 बजे तक का समय सिनेमा पर आपके व्यक्तव्य के लिए निर्धारित किया गया है। आपके व्यक्तव्य का विषय क्या होगा सर?’’- सईद अयूब, कन्वेनर, बीकानेर आर्ट एण्ड लिटरेचर फेस्टिवल।

आपसे क्या झूठ बोलना, मेरा मन मयूर नाचने लगा। समय कम था, हमें बिलासपुर से 30 अक्तूबर कि शाम को बीकानेर के लिए निकलना था। हाथ में पाँच दिन थे और जीवन भर देखी फिल्मों के प्रभाव पर 30 मिनट में बोलना था! मेरे दिमाग में सौ-पचास फिल्में तैर गयीं और मैं भटक गया। फिर सईद जी ने संदेश दिया, ‘‘सर, क्या जान सकता हूँ कि कौन-कौन सी फिल्मों के बारे में आप बात करेंगे? बस जिज्ञासावश पूछ रहा हूँ। बुरा मत मानियेगा।’’ मैंने जवाब दिया,‘‘फिल्मों की भीड़ ने मुझ पर हमला कर दिया है। हर फिल्म मुझसे सवाल कर रही है- अरे, मुझे कैसे छोड़ दोगे? यह बिलकुल उस तरह है जैसे किसी बच्चे से पूछा जाए-तुम किसे ज़्यादा मोहब्बत करते हो, अम्मी को या अब्बा को? आज दिन भर में तय करने की कोशिश करूँगा कि किन फिल्मों पर चर्चा करना मुझे अपने और श्रोताओं के जीवन से जोड़ेगा। कल आपको अवश्य बताऊँगा। एक गीत याद आ रहा है- इतनी बड़ी महफ़िल और इक दिल, इसको दूँ या उसको दूँ।’’

बड़ी मुश्किल से फिल्मों की भीड़ में से छह फिल्म को मैंने चर्चा के लिए चुना, ‘श्री 420’, ‘मदर इंडिया’, ‘मुगल-ए-आज़म’, ‘दो आँखें बारह हाथ’, ‘अनाड़ी’ और ‘आनंद’। इस सभी को मैंने आदि से अंत तक ‘यू ट्यूब’ में देखा क्योंकि मुझे इन फिल्मों से वे टुकड़े निकालकर ‘आडिएन्स’ को दिखाने थे जो असरदार थे। तीन पृष्ठ का एक आलेख तैयार किया, एक विशेषज्ञ की मदद से फिल्म के उन टुकड़ों को निकालकर अपने कंप्यूटर में ‘सेव’ किया, फिर उसे ‘पेन ड्राइव’ में डाला। ‘रिहर्सल’ करने के समय मैंने देखा कि प्रस्तुतीकरण में 40 मिनट लगेंगे, तो मैंने सईद जी को दस मिनट का अतिरिक्त समय देने हेतु संदेश दिया लेकिन वे संभवतः व्यस्तता के कारण उत्तर नहीं दे पाये होंगे।

मैं पूरी तैयारी के साथ अपना ‘वीडियो प्रोजेक्टर’ लेकर बीकानेर पहुँचा। वहाँ पहुँचने पर मालूम हुआ कि श्री दुर्गा प्रसाद अग्रवाल (जयपुर) भी इसी विषय में बोलेंगे लेकिन समय, तीस मिनट। इसलिए हम दोनों ने फिल्मों के दृश्य न दिखाने और केवल वार्तालाप प्रस्तुत करने का निर्णय लिया। फिर, दूसरे दिन मालूम हुआ कि प्रसिद्ध फिल्म समीक्षक श्री राकेश मित्तल (इंदौर) भी सिनेमा पर बोलेंगे लेकिन समय, वही तीस मिनट! फिलहाल, हम तीनों ने आपस में बात करके एक योजना बनायी और तीस मिनट की आपसी वार्ता प्रस्तुत करने का निर्णय लिया।

तीसरे दिन ‘सिनेमा और हम’ विषय पर कार्यक्रम शुरूहुआ, हम तीनों ने अपने विचार रखे। बाईसवें मिनट पर ‘डाइस’ पर अशोक गुप्ता जी आये और उन्होंने मुझे वार्ता समाप्त करने का इशारा किया, मैं मध्य में बैठा था, मैंने दुर्गा प्रसाद जी और राकेश जी को उंगली से कोंचा और बात ख़त्म करने के लिए संकेत किया। उसके बाद श्रोताओं में से एक सज्जन उठे, प्रश्न करना चाहते थे लेकिन समय की कमी थी, मना हो गया। ज़िद करके वे ‘डाइस’ तक आ गये लेकिन तब भी मना हो गया क्योंकि समय की कमी थी! इस प्रकार केवल बाईस मिनट में भारत के हिन्दी सिनेमा पर तीन विशेषज्ञों की वह चर्चा सम्पन्न हो गयी। मेरा अखिल भारतीय स्तर पर स्थापित होने का वह सुनहरा अवसर समय की कमी की वजह से मेरे हाथ से निकाल गया। मुकेश जी का गाया एक गीत आपको याद होगा : ‘वो तेरे प्यार का गम, इक़ बहाना था सनम, अपनी क़िस्मत ही कुछ ऐसी थी कि दिल टूट गया।’

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संपर्क - होटल श्री जगदीश लाज, करोना चौक, सदर बाज़ार, बिलासपुर (छत्तीसगढ़)-495001

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