मंगलवार, 13 जनवरी 2015

मंतव्य 2 - दिविक रमेश का संस्मरण : महादेवी जी का कुत्ता

(मंतव्य 2 ईबुक के रूप में यहाँ प्रकाशित है, जिसे आप अपने कंप्यूटिंग/मोबाइल उपकरणों में पढ़ सकते हैं. मंतव्य 2 संपादकीय यहाँ तथा राम प्रकाश अनंत का लघु उपन्यास लालटेन यहाँ पढ़ें)

 

 

जीवन की राहों में

महादेवी जी का कुत्ता

दिविक रमेश

बात 29 दिसम्बर, 1984 की है। सुबह 7.45 के लगभग प्रयागराज एक्सप्रेस इलाहाबाद स्टेशन पर पहुँची। उत्साह से भरा था। पता चला था कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग की ओर से आयोजित हीरक जयन्ती-समारोह :1984-85 में बाहर से अनेक वरिष्ठ साहित्यकारों (जैनेन्द्र, अज्ञेय, प्रभाकर माचवे, भोला भाई पटेल आदि) के साथ कदाचित सबसे कम उम्र का साहित्यकार मैं ही था। डॉ. निर्मला जैन (मेरी अध्यापिका और शोध-निर्देशिका) भी निमंत्रित थीं, लेकिन वे नहीं जा सकी थीं और जिनके बारे में संयोजक डॉ. प्रेमकान्त टंडन ने बाद में मुझे भेजे गये एक पत्र (21-1-1985) में लिखा- ‘‘आपके प्रति आभार! आप हमारे आयोजन में सम्मिलित हुए, हार्दिक आभार। आदरणीया डॉ. निर्मला जी नहीं आ सकीं, इसका हमें बड़ा दुःख है। उनके विदुष्यपूर्ण व्यक्तित्व का कुछ और ही प्रभाव होता है, उनकी उपस्थिति से हमारा आयोजन निश्चय ही अधिक गौरवान्वित होता, पर क्या किया जा सकता है।’’

कवि जगदीश गुप्त हिन्दी विभाग के अध्यक्ष थे और मेरे कवि रूप के वे बहुत प्रशंसक थे। समारोह के लिए उन्होंने ही मेरा चयन किया था। स्मरण हो आया है कि जब उनसे व्यक्तिगत रूप से अपरिचित था तो उन्हें अपने पहले कविता-संग्रह ‘रास्ते के बीच’(1977) की प्रति भेजी थी। इसी संग्रह को केन्द्र में रखकर उन्होंने पत्र लिखा था। अपने वरिष्ठों से अपवाद की तरह मिलनेवाले ऐसे पत्र बहुत ही प्रेरणादायी होते हैं। पत्र भाई ठाकुर प्रसाद सिंह प्रदत्त उ.प्र. हिन्दी संस्थान के आतिथ्य में, लखनऊ से भेजा गया था। चौधरी लांज, क. नं. 4 से। प्रातः 6 बजे, सुखशैय्या से जागते ही। ‘प्रिय दिविक रमेश’ के नाम। लिखा था-‘‘ ‘रास्ते के बीच’ पाने पर तुरन्त पत्र लिखकर इतने अच्छे संग्रह के लिए अपनी ख़ुशी, साधुवाद के साथ, ज़ाहिर करना चाहता था पर यह लोभ आ गया कि कविताएं पढ़ लूँ, तब क़लम उठाऊँ। यहाँ आते समय संग्रह साथ लेता आया, सब तो नहीं पर आधे से अधिक पढ़ गया। मैंने सोचा, मैं भी इसे ‘रास्ते के बीच’ ही क्यों न ख़त्म करूँ। अभी लौटने पर भी तो रास्ता तय करना है, बाक़ी इलाहाबाद पहुँचते-पहुँचते पढ़ लूँगा।

कल यहाँ पंत, महादेवी, अज्ञेय, विष्णुकांत शास्त्री, ह. प्र. द्विवेदी, परमानंद श्री., भगवती चरण वर्मा से लेकर बालशौरि रेड्डी तक हिन्दी के चतुर्दिक-समागत साहित्यकार गड्डमड्ड थे और प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, राज्यपाल-लेखपाल भी शामिल हुए। पुरस्कारों की धूम और दर्शकों के हुजूम के बीच जो अनुभव किया वह इस समय रूम में बैठकर संकेत से तुम्हें लिख रहा हूँ। पत्रकारों के प्रमुख मुख भी कलमवत् खिले हुए थे या भोजन पर बालकवत् पिले हुए थे। सो भाई खूब मज़ा लिया मेले का, ढेले का और सरकारी तबेले का।

अब यह अच्छा काम करने बैठा हूँ कि एक प्रेरक कविताओं के संग्रह पर अपनी प्रतिक्रिया लिखने के काम से दिन शुरू कर रहा हूँ।

रामदरश जी तो कल मेरे कमरे में ही सोये थे। उनका अभिमत फ़्लैप पर देखा, दोनों कारण सही दिये हैं अपनी पसंदगी के। शमशेर भाई ने मोहभंग को रेखांकित करते हुए जो सच्ची और अर्थपूर्ण झाँकी देखी वह मुझे भी मार्मिक लगी। कविता विषयक कविताएँ पिछले दशक में काफी लिखी गयीं। त्रयी-1 की भूमिका में मैंने इस बात की ओर संकेत किया था।

आपके संग्रह की शुरुआत ही ऐसी कविता से होती है और आगे भी अनेक कविताओं में यह चेतना सक्रिय दिखायी देती है। मुझे ‘कविता : एक निर्णय’ का स्वर केन्द्रीय और सशक्त लगा-अन्य कविताओं में धागे की तरह पिरोया हुआ। सरहदों के अर्थ बदल देने का आमन्त्रण, आश्वासनों की लाश पर लाशें देख कर ही उपज सकता है। ‘मुक्तिबोध के नाम’ कविता की अन्तिम पंक्तियाँ ‘शक’ की गहरी चोट करती हैं। ‘दूसरे किनारे से’ में लीक न स्वीकारने की बात, राहों के अन्वेषण से अलग ले जाती हैं-एक निर्णय की ओर- सही ढंग से।

मुझे प्रकृति के साथ साहचर्य और रोज़मर्रा ज़िन्दगी की कशमकश के बीच उसे अर्थपूर्ण बनाने वाली कई कविताएँ विशेष पसंद आयीं-जैसे ‘इनके पक्ष में’। भाषाहीन पेड़ों के एहसास से संवेदनशील कवि का जुड़ना साहित्य में सहज रहा है, उसे प्रतीकात्मक अर्थ देकर आपने और आत्मीय बना दिया है। ‘काश मेरे भीतर बजी होती नब्ज़’ जैसी सशक्त पंक्ति के साथ शहर के आदमी में उपजे हुए परायेपन की अनुभूति का गहरा हो जाना स्वाभाविक है। ‘वे लोग इतने क़रीब आ गये हैं कि धब्बे बन गये हैं’ की बिम्बात्मता के मौलिक पक्ष को मैं चित्रकार के नाते अधिक पहचान रहा हूँ। अभी यही तक रास्ता तय किया है। हाँ, भाषा में ‘मालूम चलता’ जैसे प्रयोग अवश्य असाधरण लगे।

शेष फिर, संग्रह पाकर मुझे कितना परितोष है, क्या उसे अलग से भी कहना होगा? सद्भाव सहित (हस्ताक्षर-जगदीश गुप्त)’’

भले ही बात थोड़ी भटक गयी हो, लेकिन मुझे इस पत्र की याद आने पर इसे बताना ज़रूरी लगा। ख़ैर, दो बर्थ वाले प्रथम श्रेणी के कूपे में पूरी रात एकाधिकार रहा और अब मैं बिस्तर बाँध कर खिड़की के पास बैठा प्लेटफ़ॉर्म पर खोज़ी निग़ाह दौड़ा रहा था। टेलीफ़ोन पर बात हुई थी, तो डॉ. जगदीश गुप्त ने बताया था कि कोई न कोई स्टेशन पर लेने आएगा- शायद अब्दुल बिस्मिल्लाह। अच्छा लगा सुनकर। अब्दुल्ल बिस्मिल्लाह दिल्ली आते थे, तो मेरे पास ही ठहरते थे। जामिया मिलिया में, उनकी नौकरी के लिए मैं उन्हें नामवर जी के घर भी ले गया था। सिफ़ारिश भी की थी। उनका कवि रूप मैं जान चुका था और उनका संघर्ष भी। विचारधारा की दृष्टि से भी हम क़रीब थे ही। 1977 में उन्होंने वाराणसी से प्रकाशित अपने पहले कविता संग्रह ‘मुझे बोलने दो’ की प्रति भेजी थी। इतना सब सोचते-सोचते मैंने पाया कि स्टेशन पर मुझे लिवाने-ले जाने वाला कोई प्राणी नज़र नहीं आ रहा था। निश्चिंतता थी तो एक ही। पिछले प्रथम श्रेणी के डिब्बे में जैनेन्द्र कुमार जी सपत्नीक थे और वे भी हिन्दी विभाग की हीरक जयन्ती से सम्बद्ध आयोजन के लिए ही आ रहे थे। उनसे नयी दिल्ली स्टेशन पर ही भेंट हो चुकी थी। विश्वास था कि जैनेंद्र जी को अवश्य कोई लेने आया होगा। हल्का-सा बिस्तर और सूटकेस पकड़े मैं नीचे उतर आया था। कुली कर लिया। सोचा सामान हल्का है, तो क्या, कुली को तो काम मिलना ही चाहिए। तभी डॉ. जगदीश गुप्त मिल गये। साथ ही विश्वविद्यालय के विद्यार्थी भी। काम आसान हो गया। पता चला कि अज्ञेय जी भी इसी गाड़ी से आये हैं। सब लोग प्लेटफॉर्म से बाहर आये। लेने आने वालों में डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी, डॉ. प्रेमकान्त टण्डन (संयोजक), राय जी आदि भी थे। हम लोगों को कारों में बैठाकर सिविल लाइन्स के ट्यूरिस्ट बंग्लों में ले आया गया। यहाँ ठहरने का बहुत ही अच्छा प्रबन्ध देखकर अच्छा लगा। लोगों के आत्मीय आदर-सत्कार ने बहुत ही प्रभावित किया। विभाग से जुड़े सभी नारी-पुरुषों ने बहुत ही आवभगत की।

चाय-नाश्ता हुआ। स्नान कर तरोताज़ा हुआ। उद्घाटन का समय 3.30 बजे का था। सोचा थोड़ा घूम लिया जाये। नीचे उतर कर आया, तो पता चला कि जैनेन्द्र, श्रीमती जैनेन्द्र और जगदीश गुप्त महादेवी जी के यहाँ जाने को तैयार थे। मुझे भी किसी ने कहा, शायद हिन्दी विभाग की निर्मला अग्रवाल ने, कि मैं भी साथ जाना चाहूँ तो चला जाऊँ।

हम सब अब इलाहाबाद कि खुली सड़कों पर थे। काफी रास्ता तय करने के बाद हम पेड़ों से भरी एक कोठी के सामने खड़े थे। यही घर था महादेवी वर्मा जी का। मैं याद करने लगा था उनके घर के बारे में पढ़ी बातें। महादेवी जी के द्वारा पालिता लड़की ने बताया कि वहाँ सुबह से हमारी (‘हम’ में मुझे छोड़ दिया जाये, मैं तो पिच्छलग्गू जैसा था। मैं यूँ भी अपने बारे में बहुत कम गलतफ़हमियाँ पालता हूँ।) प्रतीक्षा की जा रही थी। पता चला कि जैनेन्द्र जी इलाहाबाद में महादेवी जी के ही घर पर टिका करते हैं, लेकिन इस बार नहीं। हम लोग अन्दर आ गये। एक पुरानी-सी कार पोर्च में खड़ी थी। उसके बाद कुछ कुर्सियाँ रखी हुई थीं। श्रीमती जैनेन्द्र, जगदीश गुप्त और मैं बैठ गये। जैनेन्द्र जी खड़े रहे। कारण पूछा, तो बताया- ‘‘मैं आप सब के बीहाफ (behalf) पर महादेवी जी के स्वागत के लिए खड़ा हूँ। बैठे रहने में मुझे संकोच हुआ। फिर एक पेड़ को जो नींबू जाति का था, को देखने के बहाने खड़ा हो गया। तभी पता चला कि महादेवी जी ने सबको अन्दर बुलाया है। जूते बाहर उतार कर हम लोग उनके कमरे में गये। मेरे लिए सब कुछ नया-नया था। कमरे में महादेवी जी और गंगा प्रसाद पाण्डेय के चित्र थे। भगवान की मूर्तियाँ थीं।

तुलसी के चित्र थे। भारतीयता की पूरी छवि फूट रही थी। हाँ बीच में रूम हीटर की उपस्थिति अज़ीब लग रही थी। टी.वी. कुछ खप रहा था। टी.वी. के सम्बन्ध में महादेवी जी ने बताया कि पोते की ज़िद पर ख़रीदा था। लेकिन वह उन्हें पसन्द नहीं था। उनके अनुसार, जब देखो तब एक लड़का और लड़की नाचते नज़र आते हैं। यह बताते हुए उनकी मुख-मुद्रा, जिसमें थोड़ी मुस्कान और थोड़ा तिरस्कार भाव था, देखने लायक थी। तभी उनकी पालिता लड़की ने समाचार सुनने के लिए टी.वी. शुरू किया। संयोग देखिये, किसी फिल्म का एक अंश दिखाया जा रहा था जिसमें नायक और नायिका नाच रहे थे। टी.वी., महादेवी जी के द्वारा फौरन बंद करवा दिया गया। हाँ, यह तो बताना भूल ही गया। जब महादेवी जी जैनेन्द्र के सामने आयीं, तो दोनों खूब गले मिले। भाई-बहन का बहुत ही आत्मीय और मीठा मिलन था। जैनेन्द्र जी उनके पास ही दीवान पर बैठ गये थे। जगदीश गुप्त जी कुर्सी पर और श्रीमती जैनेन्द्र और मैं ज़मीन पर बैठ गये।

महादेवी जी इन्दिरा गाँधी की हत्या को लेकर बहुत भावुक हो उठी थीं। बात तो चली थी भोपाल में फिसलने के कारण उनके घुटने में आयी चोट से लेकिन उन्होंने इन्दिरा गाँधी के छलनी हुए शरीर का ज़िक्र करते हुए शब्दों में हृदय विदारक चित्र खींचकर बात को एक दूसरा ही मोड़ दे दिया था। जगदीश जी ने महादेवी जी से ‘शब्द’ (सबद) सुनाने का अनुरोध किया। भावुकता में ही महादेवी जी ने अपनी एक कविता सुनाई-प्रियदर्शनी -‘लेकिन वरा क्यों तुमने मरण त्योहार’...कुछ ऐसी ही। यह मेरा प्रबल सौभाग्य ही था कि उनके मुँह से उनकी कविता सुनने का अवसर मिला। बहुत ही सहज और आत्मीय भाव से भरी लग रही थीं। अपने हाथों से बनाई एक मिठाई भी खिलाई। उन्होंने रहस्य में रखते हुए बताया था कि उन्होंने एक विशेष मिठाई बनाई है-फूल और फल से, जो हानिकारक नहीं है। असल में जगदीश गुप्त (शायद अपने मोटापे के कारण) और जैनेन्द्र जी ने मिठाई खाने से मना किया था। जब मिठाई हमारे सामने आयी, तो वह ‘गुलाब-जामुन’ थी। हम खूब हँसे थे। उन्होंने हमें रामगढ़ के सेब भी बहुत ही प्यार से खिलाये थे। उनका आग्रह अद्भुत था।

हम, यानी जैनेन्द्र जी, श्रीमती जैनेन्द्र और मैं विदा लेकर बाहर आ गये। जगदीश जी डॉ. धीरेन्द्र वर्मा के सम्बन्ध में कुछ शब्द लिखवाने के लिए वहीं अन्दर रह गये थे। बाहर सेवकों ने बताया कि महादेवी जी किसी भी पेड़ को काटने-कतरने नहीं देतीं। दातुन तक के लिए टहनी तोड़ना वर्जित है।

तभी एक अद्भुत दृश्य देखा। एक रिक्शा में कुछ लोग आये। वे अपने साथ एक काले रंग का कुत्ता बाँध कर लाये थे। महादेवी जी की पालिता लड़की को बुलाया गया। आने पर वह कुत्ता उसे दिखा कर पूछा गया-‘‘यही है न वह कुत्ता?’’ लड़की ने मना कर दिया और एक बार फिर कुत्ते का हुलिया बताया। मैंने पूछा, बात क्या है। बताया गया कि महादेवी जी का एक प्रिय कुत्ता कुछ पहले गुम हो गया। उन्होंने कुत्ते के लिए अख़बार में इश्तहार छपवा दिया और साथ ही ढ़ूँढ़ कर लाने के लिए कुछ इनाम देना भी तय किया। तब से इलाहाबाद की गलियों में संदेहास्पद स्थिति में पाये गये कुत्तों को पकड़-पकड़ कर महादेवी जी के यहाँ लाने की होड़ मच गयी। एक तो मामला महादेवी जी के कुत्ते का था और ऊपर से इनाम की उम्मीद। मुझे लगा कि इलाहाबाद के कितने ही कुत्ते तो, पकड़े जाने के डर से भाग गये होंगे। तभी किसी ने मज़ाक में कहा, शायद काशी। बहुत ही मज़ा आया था मुझे यह किस्सा सुन कर।

इसके बाद हम अमृत राय जी के यहाँ पहुँचे। सच कहूँ तो, इतनी भव्य विशाल कोठी देखकर लगा कि क्या ये सचमुच प्रेमचन्द के बेटे की है? डॉ. जगदीश गुप्त ने अमृत राय जी से मेरा परिचय कराया, तो उन्होंने कहा कि हम एक बार कहीं मिल चुके हैं। मैंने याद करने की कोशिश की। शायद हम बीकानेर में आयोजित राजस्थान प्रगतिशील लेखक सम्मेलन के अवसर पर मिले थे। अमृत राय जी खुल कर मिले।

ठहाकों वाला खुलापन था। जल्दी में थे, इसलिए सुधा जी (अमृत राय जी की पत्नी) ने सबके लिए जूस का प्रबंध किया। जूस उनके घर के फलों के थे। जूस पीने के बाद हम चलने के लिए गाड़ी में बैठे। जगदीश जी ने अमृत राय जी से समारोह में अवश्य आने के लिए आग्रह किया। अमृत राय जी ने ‘हाँ’ तो ज़रूर की, लेकिन उनकी मुद्रा से लग रहा था कि वे नहीं आएंगे। उन्होंने कहा भी-‘‘मेरे लिए तो जैनेन्द्र ही मुख्य हैं। जगदीश जी भी समझ गये थे। जगदीश जी ने कुछ संदेश लिखने को कहा, तो उन्होंने उनसे भी इन्कार कर दिया-साफ़-साफ़। यह बात मुझे अच्छी नहीं लगी थी।

अज्ञेय और जैनेन्द्र जी से पहले भी भेंट होती रही थी, चाहे कम ही, पर यहाँ उनसे नजदीक से मिलने के बेहतर अवसर थे। समारोहों की यह अतिरिक्त उपयोगिता होती है कि हम व्यक्तियों की पहचान में माहिर या प्रमाणिक हो जाया करते हैं। अज्ञेय और जैनेन्द्र के व्यवहार में मैंने एक ख़ास अन्तर पाया जिसे मैंने आगरा से आये डॉ. सुरेश कुमार से सांझा किया। उन्होंने मुझसे सहमति प्रकट की। मैंने अनुभव किया कि अज्ञेय उतने सहज नहीं हैं जितने जैनेन्द्र। अज्ञेय पूर्वाग्रही से लगे। हर बार। जैनेन्द्र उस सीधी गाय की तरह लगे जिनके आसपास बच्चे भी निर्द्वन्द्व भाव से खेलने को छोड़े जा सकते हैं। बहुत आत्मीय और सबके से लगे थे जैनेन्द्र। अज्ञेय कुछ ख़ास के ही लगे थे हालांकि उनसे जब भी मिला, उन्होंने बहुत ही सौम्य मुस्कुराहट दी थी। हर बार पहचानने को अभिव्यक्त भी किया जबकि प्रभाकर माचवे को इस संदर्भ में अलग पाया। हर बार लगा कि मुझे अपना नाम बताने पर ही उन्होंने मुझे पहचाना। क्यों, कारण नहीं जानता। जानने की कोशिश भी नहीं की। मेरी तो प्रकृति ही है प्रायः नाम भूल जाने की। शक्लें फिर भी याद रह जाती हैं। हाँ एक अपवाद, कम से कम मेरे संदर्भ में, से भी अवगत कराना चाहूँगा। समारोह के सभागार में मैं अज्ञेय जी की बगल में बैठा था। मंच पर कुछ ऐसा घटा कि अज्ञेय जी ने मुझे सहभागी बनाया और हँसे। शायद मैं तब बेध्याना था। अज्ञेय जी का उस तरह हँसना मुझे किसी अजायबघर की चीज़ से कमतर नज़र नहीं आ रहा था। पता नहीं मैं हँसा था या मैंने हँसी का अभिनय किया था। बाद में अज्ञेय जी ने अपनी प्रसिद्ध कविता ‘नाच’ का बहुत ही प्रभावशाली बल्कि कहूँ, अद्भुत और मार्मिक पाठ प्रस्तुत किया था। पूरा हॉल मंत्रमुग्ध था। तब मैंने सीख ली थी कि रचना का अच्छा होना ही ज़रूरी नहीं होता, उसका अच्छा पाठ भी ज़रूरी होता है। यह मैंने उस कवि से सीखा था, जो कविता को पठित के स्थान पर लिखित के पक्षधर और प्रबंधक थे।

रात के भोजन के वक़्त (भोजन कुलपति की ओर से था) एक ख़ास सुख मिला डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी से मिलकर। बातचीत से मुझे वे बहुत ही अध्यनशील और स्वाभिमानी लगे। दिन में उनके मंच पर बैठने के ढंग से ही पता चल गया था। उनसे बात करने का मेरा यह पहला ही मौक़ा था। मुझे त्रिलोचन जी और पत्नी प्रवीण जी की बातें याद आ रही थीं। इलाहाबाद के इस आयोजन में आने से संबद्ध मेरे संकोच को देखकर त्रिलोचन जी ने कहा था-‘‘तुम्हें ज़रूर जाना चाहिए। लोगों से मिलना भी चाहिए। वे तुममें न रुचि लें, तब भी। तुम उनमें रुचि लो।’’ पत्नी ने कहा था-‘‘ऐसी जगह ज़रूर जाना चाहिए। तुममें प्रतिभा है। लोगों से मिलोगे, तो वे तुम्हें जानेंगे। अच्छा रहेगा।’’ चतुर्वेदी जी से बात करके मुझे अच्छा लग रहा था।

भोजन के बाद कार्यक्रम तो श्री अशोक त्रिपाठी के साथ परिमल प्रकाशन के श्री शिवकुमार सहाय से मिलने का था लेकिन देर बहुत हो चुकी थी। इलाहाबाद के ही हाईकोर्ट के काफी वरिष्ठ वकील उपाध्याय जी की कार में मैं और डॉ. सुरेश कुमार बंग्लो की ओर चले। उपाध्याय जी के मिलनसार स्वभाव के बारे में सुरेश कुमार जी से दिन में ही सुन लिया था। उपाध्याय जी बहुत ही मज़ेदार आदमी निकले। वे पहले हमें अपने घर ले गये। घर में घुसते ही कुछ गाय दिखीं। इस हिस्से का नाम उन्होंने गाँव रखा था। इसके बाद हम बड़े से हॉलनुमा ड्राइंगरूम में आ गये। इलाहाबाद में इतने बड़े मकान में आने का यह मेरा तीसरा अनुभव था। इससे पूर्व महादेवी जी और अमृत राय जी के मकानों का ही अनुभव लिया था। उपाध्याय जी के यहाँ उम्दा कॉफी पी। पता चला कि वे बहुत ही विद्वान व्यक्ति हैं। तेलुगु उन्हें बहुत ही अच्छे से आती थी। लगा कि हर भारतीय को अपनी मातृभाषा के साथ-साथ, कम से कम एक अन्य भारतीय भाषा आनी ही चाहिए। मैंने भी तो कभी बांग्ला सीखी थी, पर अभ्यास के अभाव में सब छूट गया।

बंगला आ गया था। सीढ़ियों पर चढ़ते-चढ़ते पहली मंजिल आयी, तो सुरेश कुमार से विदा ली और मैं दूसरी मंजिल पर स्थित अपने कमरे की ओर चल पड़ा।

divik_ramesh@yahoo.com

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