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इथियोपिया की लोककथाएँ - 1 // 2 - न्याय में अंतर // सुषमा गुप्ता

इथियोपिया की लोककथाएँ - 1 // 1 - नौ हयीना और शेर यहाँ पढ़ें

2 न्याय में अन्तर

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एक बार एक शेर और एक हयीना दोनों खाना ढॅूढने निकले। शेर को एक बैल मिल गया और हयीना ने एक गाय पकड़ ली।

दोनों अपना अपना शिकार ले कर घर आये और दोनों ने उनको अपने अपने घर के सामने वाले पेड़ से बॉध दिया।

जब हयीना ने गाय पकड़ी तो कुछ ही दिनों में उस गाय के बच्चा होने वाला था। जब शेर ने देखा कि उसके पास तो केवल एक ही बैल है परन्तु हयीना के पास दो जानवर होने वाले हैं तो उसे एक चालाकी सूझी।

जब शेर ने देखा कि अब गाय के बच्चा होने वाला है तो उसने हयीना का ध्यान बॅटाने के लिये हयीना से कहा "जरा मेरे लिए थोड़ा सा पानी ला दो मुझे बहुत प्यास लगी है।" हयीना बेचारा उसके इरादों से बेखबर उसके लिए पानी लाने चला गया।


इत्तफाक से इसी बीच गाय ने एक बछड़े को जन्म दिया। शेर बछड़े को गाय के पास से उठा लाया और उसे अपने बैल के पास ला कर बिठा दिया।

थोड़ी देर बाद हयीना जब पानी ले कर वापस लौटा तो उसने शेर को पानी दिया और अपने घर की तरफ चला तो शेर बोला "देखो हयीना, मेरे बैल ने एक बछड़े को जन्म दिया है।"

हयीना ने तो कोई ध्यान ही नहीं दिया था परन्तु शेर की यह बात सुन कर उसको बहुत गुस्सा आया। वह बोला - "शेर भाई, तुम मजाक कर रहे हो। बैल थोड़े ही बच्चों को जन्म देते हैं वह तो गाय देती है। यह मेरी गाय का बछड़ा है तुम्हारे बैल का नहीं।"


शेर बोला - "नहीं, यह मेरे बैल का बछड़ा है क्योंकि यह मेरे बैल के पास बैठा है।"

हयीना ने फिर नम्रतापूर्वक कहा - "शेर भाई, किसी के पास बैठने से कोई किसी का बच्चा नहीं हो जाता। यह मेरी गाय का बछड़ा है तुम्हारे बैल का नहीं।" पर शेर अपनी ही बात पर अड़ा रहा।

जब शेर नहीं माना तो हयीना ने फैसले के लिए जंगल के सारे जानवरों को इकठ्ठा कर लिया क्योंकि उसको शेर की बात पर कतई विश्वास नहीं था कि एक बैल एक बछड़े को जन्म दे सकता है।

जंगल के सारे जानवर शेर और हयीना के घरों के पास आ कर इकठ्ठा हो गये पर सभी जानवर शेर से डरते थे इसलिये उन सभी ने एक आवाज में कहा "यह तो बैल का ही बछड़ा है कोई गाय भला बच्चा कैसे दे सकती है?"

तभी एक बन्दर जो जानवरों की भीड़ में सबसे पीछे खड़ा था आगे निकल आया। शेर ने उससे पूछा "अरे तुम कहॉ से आ रहे हो?"


बन्दर सिर खुजलाते हुए बोला "मुझे थोड़ी देर हो गयी सरकार। असल में धरती और आसमान में छेद हो गये थे सो मैं जरा उनमें पैबन्द लगा रहा था।"

शेर को उसकी यह बात सुन कर बहुत गुस्सा आया और वह बोला - "बन्दर, यह तुम क्या बेवकूफी की बात करते हो? धरती और आसमान में भला छेद होने का क्या काम? यह कैसे हो सकता है?"

इस पर बन्दर ने घुड़की मारते हुए कहा - "जैसे बैल के बछड़ा हो सकता है उसी तरह से धरती और आसमान में भी तो छेद हो सकते हैं सरकार।"

यह सुन कर तो शेर और भी ज़्यादा गुस्से में भर गया और बन्दर को पकड़ने दौड़ा पर बन्दर तो पहले ही एक ऊॅचे पेड़ पर चढ़ चुका था।


शेर तो गुस्से में था ही। बन्दर को पकड़ने के लिये दौड़ते समय वह एक गड्ढे में गिर गया और मर गया। यह सब देख कर हयीना तो मारे खुशी के वहीं मर गया।

अब बन्दर गाय का अकेला मालिक हो गया। एक हफ्ते तक उसने गाय का गाढ़ा गाढ़ा दूध इकठ्ठा किया और आठवें दिन जंगल के सब जानवरों को उस दूध पीने की दावत दी। बड़े ज़ोर शोर से दूध की दावत का इन्तजाम किया गया।


दावत में सबके साथ बन्दर ने भी दूध पिया। वह दूध पीता गया और पीता गया और पीता गया। उसने इतना दूध पिया कि उसका पेट गले तक भर गया।

कुछ दूध उसके पेट पर भी गिर गया। जब बन्दर उस दूध को चाटने के लिये नीचे झुका तो उसका पेट फट गया और वह भी मर गया।

इस पर जंगल के सारे हयीनाओं ने मिल कर सोचा कि इस बन्दर ने हमको दावत पर बुलाया था इसलिए इसको मरने के बाद जमीन में नहीं बल्कि आसमान में गाड़ना चाहिये।

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ऐसा सोच कर वे सभी हयीना एक के ऊपर एक चढ़ते गये और आसमान तक पहॅुच गये। तभी सबसे नीचे वाले हयीना के पॉव में एक चींटी ने काट लिया और सारे हयीना नीचे गिर गये। इस तरह उनकी उस बन्दर को आसमान में गाड़ने का प्लान फेल हो गया।

(क्रमशः अगले अंकों में जारी)

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं की एक अन्य पुस्तक - रैवन की लोक कथाएँ में से एक लोक कथा यहाँ पढ़ सकते हैं.

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सुषमा गुप्ता का जन्म उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ शहर में सन् 1943 में हुआ था। इन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से समाज शास्त्र और अर्थ शास्त्र में ऐम ए किया और फिर मेरठ विश्वविद्यालय से बी ऐड किया। 1976 में ये नाइजीरिया चली गयीं। वहॉ इन्होंने यूनिवर्सिटी औफ़ इबादान से लाइब्रेरी साइन्स में ऐम ऐल ऐस किया और एक थियोलोजीकल कौलिज में 10 वर्षों तक लाइब्रेरियन का कार्य किया।

वहॉ से फिर ये इथियोपिया चली गयीं और वहॉ एडिस अबाबा यूनिवर्सिटी के इन्स्टीट्यूट औफ़ इथियोपियन स्टडीज़ की लाइब्रेरी में 3 साल कार्य किया। तत्पश्चात इनको दक्षिणी अफ्रीका के एक देश़ लिसोठो के विश्वविद्यालय में इन्स्टीट्यूट औफ़ सदर्न अफ्रीकन स्टडीज़ में 1 साल कार्य करने का अवसर मिला। वहॉ से 1993 में ये यू ऐस ए आगयीं जहॉ इन्होंने फिर से मास्टर औफ़ लाइब्रेरी ऐंड इनफौर्मेशन साइन्स किया। फिर 4 साल ओटोमोटिव इन्डस्ट्री एक्शन ग्रुप के पुस्तकालय में कार्य किया।

1998 में इन्होंने सेवा निवृत्ति ले ली और अपनी एक वेब साइट बनायी- www.sushmajee.com <http://www.sushmajee.com>। तब से ये उसी वेब साइट पर काम कर रहीं हैं। उस वेब साइट में हिन्दू धर्म के साथ साथ बच्चों के लिये भी काफी सामग्री है।

भिन्न भिन्न देशों में रहने से इनको अपने कार्यकाल में वहॉ की बहुत सारी लोक कथाओं को जानने का अवसर मिला- कुछ पढ़ने से, कुछ लोगों से सुनने से और कुछ ऐसे साधनों से जो केवल इन्हीं को उपलब्ध थे। उन सबको देखकर इनको ऐसा लगा कि ये लोक कथाएँ हिन्दी जानने वाले बच्चों और हिन्दी में रिसर्च करने वालों को तो कभी उपलब्ध ही नहीं हो पायेंगी- हिन्दी की तो बात ही अलग है अंग्रेजी में भी नहीं मिल पायेंगीं.

इसलिये इन्होंने न्यूनतम हिन्दी पढ़ने वालों को ध्यान में रखते हुए उन लोक कथाओं को हिन्दी में लिखना पा्ररम्भ किया। इन लोक कथाओं में अफ्रीका, एशिया और दक्षिणी अमेरिका के देशों की लोक कथाओं पर अधिक ध्यान दिया गया है पर उत्तरी अमेरिका और यूरोप के देशों की भी कुछ लोक कथाएँ सम्मिलित कर ली गयी हैं।

अभी तक 1200 से अधिक लोक कथाएँ हिन्दी में लिखी जा चुकी है। इनको "देश विदेश की लोक कथाएँ" क्रम में प्रकाशित करने का प्रयास किया जा रहा है। आशा है कि इस प्रकाशन के माध्यम से हम इन लोक कथाओं को जन जन तक पहॅुचा सकेंगे.


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