मंगलवार, 25 जुलाई 2017

शिखर तक संघर्ष ( भाग 6) // प्रकाश चन्द्र पारख

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प्रकाश चन्द्र पारख की पुस्तक - Crusader or Conspirator? by P C Parakh का हिन्दी अनुवाद

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अनुवादक - दिनेश माली

भाग 1  //  भाग 2 // भाग 3 // भाग 4 // भाग 5 //

14. कैप्टिव कोल ब्लॉकों का आवंटन

स्क्रीनिंग कमेटी के द्वारा प्राइवेट सेक्टर को कैप्टिव प्रयोग हेतु कोल ब्लॉक-आवंटन करने की प्रक्रिया सन 1993 में चालू हुई। मगर कैप्टिव माइनिंग के लिए कौन-कौनसे कोल ब्लॉक आवंटित किये जायेंगे, इस बारे में विस्तृत जानकारी नहीँ दी गई थी। कोल ब्लॉक की ज्योलोजिकल रिपोर्ट एक गोपनीय दस्तावेज़ था,और आवेदकों को इसकी पूरी जानकारी नहीं होती थी, वे लोग सी.एम.पी.डी.आई.एल. से चोरी-छुपे जानकारी हासिल करते थे। सन 1993 से 2002 तक केवल 15 ब्लॉक प्राइवेट पार्टियों को आवंटित किये गए थे अर्थात 1.5 ब्लॉक प्रतिवर्ष की दर से। अधिकतर ब्लॉकों के लिए आवेदकों की संख्या भी सीमित थी। धीरे-धीरे आवेदकों की संख्या बढ़ने लगी। सबको ब्लॉक मिल सके,इसलिए मंत्रालय ने उन ब्लॉकों को सब-ब्लॉकों में बाँटना शुरू कर दिया

जब मैंने मंत्रालय का चार्ज लिया तब प्रत्येक ब्लॉक के लिए आवेदकों की संख्या काफी बढ़ गई थी, यद्यपि इकाई अंक से ज्यादा नहीँ थी। बहुत सारे आवेदक हर ब्लॉक के चयन के मापदंड पूरे कर रहे थे। इस वजह से उनका निष्पक्ष चयन करना मुश्किल हो रहा था।एक ब्लॉक को अनेक सब-ब्लॉकों में बाँटकर सभी योग्य आवेदकों को आवंटित करना न केवल अव्यावहारिक बल्कि गलत भी था। खुली बोली द्वारा आवंटन करना इस समस्या का अच्छा समाधान हो सकता था। इससे न केवल निर्णय लेने में पारदर्शिता आएगी,बल्कि सरकार को अतिरिक्त राजस्व की भी प्राप्ति होगी।

सरकार के पास पहले से ही कोयले के रिजर्व और गुणवत्ता पर आधारित सही तथ्यात्मक आँकड़ों वाली जियोलोजिकल रिपोर्ट उपलब्ध थी। सी॰एम॰पी॰डी॰आई॰एल डिटेल एक्सप्लोरेशन कर चुकी थी। अगर सभी संभावित बोली-कर्त्ताओं को जियोलोजिकल रिपोर्ट देने के बाद खुली बोली लगाई जाती है तो यह कोयले के ब्लॉक आवंटित करने का समरूप, निष्पक्ष, पारदर्शी और तर्क-सम्मत तरीका रहेगा। इसके अतिरिक्त, नीलामी की यह विधि उन कंपनियों के लिए भी न्याय-संगत रहेगी, जिन्हें कैप्टिव ब्लॉक नहीँ मिले है और जिन्हें या तो कोयला आयात करना पड़ रहा है या फिर कोल इण्डिया से कोयला लेना होता है।

प्रधानमंत्री के कोयला-मंत्री का अतिरिक्त प्रभार लेने से पहले ही मैंने इस विषय पर एक डिस्कशन पेपर बना लिया था। सभी स्टेक होल्डरों को ओपन डिस्कशन में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया गया। इस डिस्कशन में उन सभी कंपनियों को आमंत्रित किया गया,जिनके आवेदन मंत्रालय में लंबे समय से लंबित थे। इसके अलावा,कॉनफेडरेशन ऑफ़ इंडस्ट्री (CII), फेडरेशन ऑफ इन्डियन चैम्बर्स ऑफ कॉर्मस एंड इंडस्ट्री (FICCI), फेडरेशन ऑफ इंडियन मिनरल इंडस्ट्री (FIMI) एवं एसोसियेटेड चैम्बर्स ऑफ कामर्स एंड इंडस्ट्री ऑफ इण्डिया (ASSOCHAM) और संबन्धित मंत्रालयों के अधिकारी भी इस विचार-विमर्श में शामिल हुए।केंद्र सरकार के विभिन्न विभागों की नीलामी के बारे में अलग-अलग राय थी,परंतु अधिकांश उद्योगपति और उद्योग संघ इस प्रक्रिया के पक्ष में नहीं थे। उनका मत था कि ई-नीलामी से कोल ब्लॉकों की कीमत बढ़ जाएगी, लेकिन यह पूरी तरह बेबुनियाद था। खुली नीलामी में प्रतिभागी अनुभवी व्यापारी थे।और वे कभी इतनी ऊँची बोली नहीँ लगा सकते थे कि उनकी खदान से निकलने कोयले की कीमत कोल इण्डिया की कीमत से ज्यादा हो जाए। स्वाभाविक है कि इंडस्ट्री वाले कोई भी मुफ्त में मिलने वाली चीज के पैसे क्यों देना चाहेगा ?वास्तव में कुछ हद तक कोर्पोरेट इण्डिया भी पारदर्शिता के खिलाफ था।

स्टेक-होल्डरों के संशय के बावजूद मेरा यह विचार था कि आवंटन प्रक्रिया में निष्पक्षता और पारदर्शिता लाने के लिए इससे अच्छा और कोई तरीका नहीं हो सकता। अतः मैंने पॉलिसी नोट बनाकर जुलाई माह के मध्य में कोयला राज्यमंत्री श्री दसारी नारायण राव के सन्मुख प्रस्तुत कर दिया।

खुली बोली की प्रक्रिया की साथर्कता की जाँच हेतु मैंने कानून विभाग से सलाह ली। साथ ही साथ,मैंने सी॰एम॰पी॰डी॰आई॰एल को निर्देश दिए कि किसी अंतर्राष्ट्रीय संस्थान की मदद से इस हेतु बोली दस्तावेज बनाए जाए एवं मूल्यांकन के मापदंड निर्धारित किए जाए, ताकि कैबिनेट की स्वीकृति मिलते ही खुली बोली की कार्यवाही शुरू की जा सके। ज्यादा से ज्यादा प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के लिए मंत्रालय की वेबसाइट पर कैप्टिव ब्लॉकों की तालिका अपलोड कर दी गई। इसके अतिरिक्त, अखबारों में विज्ञापन के माध्यम से भी इस बारे में अधिकाधिक प्रचार-प्रसार किया गया। मुझे विश्वास था कि कैलेंडर वर्ष खत्म होते-होते नई प्रक्रिया लागू हो सकती है। मगर इसमें आने वाली बाधाओं का मुझे अंदाज नहीं था।कोयला राज्यमंत्री ने कुछ स्पष्टीकरण मांगते हुए वह फाइल लौटा दी। 30 जुलाई 2004 को मैंने उनके सवालों का सटीक जवाब देते हुए फिर से उस फाइल को प्रधानमंत्री (तब तक कोयला मंत्री का अतिरिक्त प्रभार ले चुके थे) को प्रस्तुत कर दी।

प्रधानमंत्री द्वारा खुली बोली का अनुमोदन:-

20 अगस्त 2004 को प्रधानमंत्री ने खुली बोली द्वारा आवंटन की प्रक्रिया को मंजूरी दे दी। उन्होंने एक कैबिनेट नोट बनाने का आदेश दिया। प्रधानमंत्री की मंजूरी मिलने के कुछ ही समय बाद प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) से एक नोट आया, जिसमें खुली बोली द्वारा होने वाली समस्याओं का जिक्र किया गया था उसके साथ ही खुली बोली के विरोध में बहुत सारे सांसदों के पत्र भी आने लगे। उनमें श्री नवीन जिंदल भी एक थे।

कानून मंत्रालय द्वारा कोल माइंस नेशनलाइजेशन एक्ट में संशोधन के सुझाव:-

कोल माइंस नेशनलाइजेशन एक्ट की धारा 3(ए) और धारा 34 में प्रस्तावित संशोधन पर कानून मंत्रालय ने सितंबर 2004 को अपनी सलाह प्रदान की। कैबिनेट नोट प्रस्तुत करते समय मैंने प्रधानमंत्री कार्यालय के द्वारा उठाए गए सभी सवालों पर तर्क-संगत टिप्पणियाँ दी। मैंने आवश्यक वैधानिक सुधारों के लिए अध्यादेश जारी करने की भी सलाह दी, ताकि खुली बोली द्वारा आवंटन की प्रक्रिया जल्दी से जल्दी शुरू की जा सके।

राज्यमंत्री द्वारा प्रस्ताव को टालना:-

4 अक्टूबर को प्रधानमंत्री को प्रेषित करते हुए राज्यमंत्री ने इस प्रस्ताव पर निम्न टिप्पणी लिखी:-

“इस प्रस्ताव पर सहमत होना कठिन है कि स्क्रीनिंग कमिटी पारदर्शिता से निर्णय लेने में सक्षम नहीँ है। प्रतिस्पर्धात्मक बोली द्वारा आवंटन का प्रस्ताव खारिज कर दिया जाए, क्योंकि इससे कोल ब्लॉक आवंटन में और ज्यादा देरी होगी। कोल माइंस नेशनलाइजेशन एमेंडमेंट बिल, जिसमें वाणिज्यिक खनन के लिए कोल ब्लॉकों का प्रतिस्पर्धात्मक बोली द्वारा आवंटन करने का प्रस्ताव है, राज्य सभा में ट्रेड यूनियनों और अन्य के कठोर विरोध के कारण लंबित पड़ा हुआ है।"

यह टिप्पणी दो कारणों से महत्त्वपूर्ण थी पहला, प्रतिस्पर्धात्मक बोली द्वारा कोल ब्लॉकों के आवंटन की पद्धति और राज्य सभा में लंबित पड़े कोल माइन्स नेशनलाइजेशन एमेंडमेंट बिल का दूर-दूर तक कोई संबंध नहीँ था। कोल सेक्टर ट्रेड यूनियन का विरोध वाणिज्यिक खनन निजी क्षेत्र के लिए खोलने से संबंधित था, खुली बोली से उनका कोई विरोध नहीं था। साफ जाहिर था कि इन असंगत मुद्दों को जोड़कर राज्यमंत्री जान-बूझकर भ्रम पैदा करना चाहते थे, ताकि निर्णय प्रक्रिया में देरी हो। दूसरा, बाद में श्री शिबू सोरेन ने इसी टिप्पणी का प्रयोग करते हुए प्रधानमंत्री का खुली बोली द्वारा आवंटन करने के निर्णय को पलट दिया।

श्री राव द्वारा भ्रामक टिप्पणी लिखने के बाद प्रधानमंत्री कार्यालय में इस विषय पर विचार-विमर्श के लिए एक बैठक हुई। इस बैठक में यह निर्णय लिया गया कि 28 जून 2004 तक प्राप्त सभी आवेदन पत्रों पर निर्णय स्क्रीनिंग कमेटी की प्रचलित पद्धति द्वारा लिया जाए। इस बैठक के बाद प्रधानमंत्री कार्यालय में कैबिनेट नोट में आवश्यक संशोधन के निर्देश देते हुए वह फाइल वापस कोयला मंत्रालय को लौटा दी।

दिसंबर के अंत में मैंने आवश्यक स्पष्टीकरणों एवं संशोधनों के साथ वह कैबिनेट नोट फिर से कोयला राज्यमंत्री को पेश किया, जिन्होंने वह नोट श्री शिबू सोरेन के पास अग्रसरित कर दिया। जो उस समय तक फिर से कोयला मंत्री बन चुके थे। जनवरी का आधा महीना निकल गया, किंतु श्री सोरेन ने कैबिनेट नोट को स्वीकार करके फाइल वापस नहीं भेजी।

प्रधानमंत्री द्वारा हस्तक्षेप:-

17 जनवरी 2005 को मैं प्रधानमंत्री से मिला और उन्हें बताया कि कोयला मंत्रालय की कुछ महत्त्वपूर्ण फाइलों को जान-बूझकर विलंबित किया जा रहा है।मैंने उनके हस्तक्षेप की गुजारिश की। कैप्टिव कोल ब्लॉक आवंटन में प्रतिस्पर्धात्मक खुली बोली का प्रस्ताव उन महत्त्वपूर्ण मुद्दों में से एक था। प्रधानमंत्री ने अपने प्रिंसिपल सेक्रेटरी श्री टी.के.ए. नायर को बुलाकर कोयला मंत्री से इस विषय में बात करने की हिदायत दी। उसी शाम मैंने श्री नायर को कैबिनेट नोट की स्वीकृति की अरजेंसी जताते हुए एक नोट लिखा ताकि संसद के आगामी बजट सेशन में आवश्यक विधायी संशोधन किए जा सकें। (परिशिष्ट 14-1)

श्री सोरेन द्वारा खुली बोली द्वारा प्रस्ताव की हत्या:-

प्रधानमंत्री को श्री राव तथा श्री सोरेन द्वारा अवरोध पैदा करने की जानकारी देने के बावजूद 25 जनवरी 2005 को श्री सोरेन ने उस फाइल पर अपनी टिप्पणी लिखी:

“ मैंने इस पूरे मुद्दे को अच्छी तरह से समझा और बतौर कोयला मंत्री मैं राज्यमंत्री (कोयला) की दिनांक 4.10.2004 को की गई टिप्पणी से पूरी तरह सहमत हूँ। अत: इस प्रस्ताव को और आगे बढ़ाने की कोई जरूरत नहीं है।"

श्री राव और श्री सोरेन दोनों ने मिलकर मेरे इस प्रस्ताव पर, जिसका उद्देश्य कोयले के ब्लॉकों का पारदर्शी तरीके से आवंटित करना था,पानी फेर दिया।

प्रस्ताव का पुनर्जीव:-

दिनांक 01.03.2005 को झारखंड के मुख्यमंत्री बनने के लिए श्री सोरेन ने कोयला मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया तो प्रधानमंत्री ने फिर से कोयला मंत्रालय का प्रभार संभाला। ऐसा लग रहा था मानो तकदीर भी मेरे साथ आँख-मिचौनी खेल खेल रही है। मैंने उस प्रस्ताव को पुनर्जीवित किया और नौ मार्च को कैबिनेट नोट बनाकर इनकी स्वीकृति के लिए प्रेषित कर दिया।इस कैबिनेट नोट को प्रधानमंत्री ने 24 मार्च को स्वीकृति दे दी। इसके बाद इसे संबंधित मंत्रालयों और राज्य सरकारों के पास उनकी टिप्पणी के लिए भेजा गया। सारी टिप्पणियाँ आने के बाद मैंने 21 जून को फाइनल नोट बनाकर राज्यमंत्री के माध्यम से कैबिनेट की सहमति हेतु प्रधानमंत्री के पास भेज दिया।

राजमंत्री द्वारा इस प्रस्ताव को पटरी से उतारना:-

प्रधानमंत्री के पास फाइल भेजते समय राज्यमंत्री ने निम्न टिप्पणी की:-

“कैबिनेट को इस निर्णय से होने वाले प्रभावों पर विस्तार से गहराई में जाकर सोचने की जरूरत है। प्रतिस्पर्धात्मक बोली में भाग लेने के कारण कीमतों पर होने वाले प्रभाव की वजह से पावर कंपनियाँ विरोध कर रही है।"

खुली बोली की प्रणाली से बिजली की कीमतों पर कोई खास असर नहीँ पड़ेगा, इस मुद्दे पर कई बार विस्तार से बहस हो चुकी थी। बार-बार इन मुद्दों को उठाने का अर्थ खुली बोली प्रणाली को जितना विलंबित किया जा सके, करना था ताकि पुराने ढर्रे वाली आवंटन प्रक्रिया चलती रहे। खेद की बात है कि राज्यमंत्री अपने इस प्रयास में सफल हुए।

प्रधानमंत्री के प्रिंसिपल सेक्रेटरी श्री नायर ने 25 जुलाई को कोल बियरिंग राज्यों के मुख्य सचिवों तथा संघ सरकार के उपयोगकर्ता मंत्रालयों के सचिवों की एक बैठक बुलाई। इस बैठक में मैंने यह समझाया कि प्रस्तावित खुली बोली प्रणाली से कोल ब्लॉकों के आवंटन में पारदर्शिता आएगी और इससे राज्य सरकार और संबंधित केन्द्रीय मंत्रालयों की भूमिका में किसी भी प्रकार का परिवर्तन आने की आशंका नहीँ है।खुली नीलामी से जो भी राजस्व प्राप्त होगा, उससे एक विशेष फंड बनाया जाएगा,जिसका प्रयोग संबंधित कोयलांचलों में सामाजिक और दूसरी मूलभूत सुविधाएँ उपलब्ध करवाने में किया जाएगा।इसलिए राज्यों को इस प्रस्तावित नीति का समर्थन एवं स्वागत करना चाहिए।

इस बैठक में यह निर्णय लिया गया कि कैबिनेट नोट में राज्य सरकारों के विचारों को जोड़ा जाए,और, चूँकि कोल माइंस नेशनलाइजेशन एमेंडमेंट बिल को पास होने में काफी समय लगेगा,इसलिए जब तक नई प्रतिस्पर्धात्मक बोली की प्रणाली प्रभाव में नहीँ आ जाती है,तब तक प्रचलित प्रणाली से आवंटन जारी रखा जाए।

अब यह साफ हो गया था कि खुली बोली के लिए किसी की भी राजनैतिक मंशा नहीँ है, इसलिए इस प्रस्ताव को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। अगर राजनैतिक मंशा होती तो अध्यादेश के जरिए कोल माइंस नेशनलाइजेशन एक्ट में संशोधन किया जा सकता था। प्रधानमंत्री कार्यालय की इच्छा के अनुरूप मैंने कैबिनेट नोट में राज्य सरकार के प्रतिनिधियों के विचारों को सम्मिलित कर आवश्यक संशोधन किए और राज्यमंत्री को प्रेषित कर दिया। राज्यमंत्री ने मेरे रिटायर होने के इंतजार में दिसंबर 2005 तक वह फाइल अपने पास रोककर रखी। मेरे रिटायर होने के बाद दिनांक 12.01.06 को प्रधानमंत्री को फाइल भेजने के बजाए निम्न टिप्पणी के साथ फाइल लौटा दी–

“प्रधानमंत्री कार्यालय ने कोल माइंस नेशनलाइजेशन एक्ट में आवश्यक संशोधन में होने वाली देरी को ध्यान में रखते हुए निर्देश दिया है कि जब तक एक्ट में संशोधन न हो जाए,तब तक प्रचलित पद्धति के अनुसार आवंटन की प्रक्रिया चालू रखी जाए और इस विषय में जल्दबाजी की कोई आवश्यकता नहीँ है।"

मेरे मंत्रालय छोड़ने के बाद कोल ब्लॉकों की खुली बोली को दूसरे सभी खनिजों को भी उसी पद्धति के आवंटन करने के बहाने उस विषय को कोयला मंत्रालय से खनिज मंत्रालय में ट्रांसफर कर दिया गया। चूँकि इस संशोधन के लिए दूसरे मंत्रालय की सहायता मिलनी चाहिए, इसलिए यह सुनिश्चित कर लिया गया कि प्रचलित पद्धति और कुछ सालों तक चलेगी।

उपरोक्त घटनाक्रम से साफ जाहिर है कि न तो औद्योगिक संस्थान और न ही राजनैतिक प्रणाली निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से खुली बोली को लागू करने के इच्छुक थे। उनका भरसक प्रयास यही था कि खुली बोली प्रणाली को लागू होने से जब तक संभव हो,तब तक रोका जाए।

खुली बोली के प्रस्ताव का अनुमोदन न होने के बावजूद भी मैंने प्रचलित प्रणाली में जितना संभव था, समरूपता और पारदर्शिता लाने का प्रयास किया।अखबारों में विज्ञापनों तथा मंत्रालय की वेबसाइट पर आवंटन के लिए उपलब्ध ब्लॉकों के बारे में जानकारियाँ उपलब्ध कराई। सभी आवेदकों को सामान्य दर पर जियोलोजिकल रिपोर्ट दी जाने लगी,ताकि आवेदन करने से पूर्व वे इस संपदा के बारे में अच्छी तरह जांच-परख कर सकें। कोयले के खनन के लिए सफल आवेदकों को ज्वाइंट वेंचर बनाने के लिए प्रेरित किया,ताकि छोटे आवेदकों को भी कैप्टिव माइनिंग का लाभ मिल सके।जहाँ ज्वाइंट वेंचर बनाना संभव नहीँ था,वहाँ लीड पार्टनर चयन करने की सुविधा दी गई, जो कोयले का खनन करके दूसरे सहयोगियों को वितरित करेगा। नीति निर्देशों में उपरोक्त परिवर्तन करने से सारे योग्य आवेदकों को समावेश करना संभव हो सका। खुली बोली प्रणाली के अभाव में इससे ज्यादा निष्पक्ष विकल्प संभव नहीँ था।

15.महालेखा परीक्षक यानि सीएजी सही और प्रधानमंत्री गलत क्यों?

महालेखा परीक्षक अर्थात कंप्ट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल (सीएजी) श्री विनोद राय ने कोयला आवंटन घोटाले को जनता के सामने लाकर एक अत्यंत ही सराहनीय कार्य किया। विभिन्न मंत्रियों की दलीलें और प्रधानमंत्री का संसद में दिया गया वक्तव्य भी पूरी तरह से असंतोषजनक नजर आता है। श्री पी. चिंदबरम और श्री सलमान खुर्शीद ने सीएजी की आलोचना में जो भी तर्क दिये हैं; सही कहें तो इतने असंगत है कि उन पर तो टिप्पणी भी नहीँ की जा सकती।इस अध्याया में मैं संसद में प्रधानमंत्री द्वारा दिये गय वक्तव्य का विश्लेषण करना चाहूँगा।

स्क्रीनिंग कमेटी के बारे में :-

महालेखा परीक्षक ने लिखा कि स्क्रीनिंग कमेटी अपनी सिफारशे करते समय कोई निष्पक्ष एवं पारदर्शी तरीके का अनुसरण नहीँ कर रही थी। प्रधानमंत्री ने कहा कि बहुत सारे घटकों के आकलन के बाद स्क्रीनिंग कमेटी कोल-ब्लॉकों के आवंटन की सिफ़ारिश करती थी। इसके अलावा, आवंटन संबंधित फैसला कमेटी के सभी सदस्यों का सामूहिक फैसला होता था, इसलिए यह कहना सही नहीं है कि स्क्रीनिंग कमेटी द्वारा आवंटन प्रणाली में पारदर्शिता एवं निष्पक्षता का अभाव था।

प्रधानमंत्री का यह तर्क आवंटन नीति में परिवर्तन लाने वाली प्रणाली की जड़ पर करारा प्रहार था यदि स्क्रीनिंग कमेटी द्वारा किया जा रहा आवंटन सही था तो फिर उन्होंने खुली बोली वाली प्रणाली का अनुमोदन क्यों किया? कुछ तो कमियाँ थी स्क्रीनिंग कमेटी की आवंटन प्रक्रिया में? जब तक कोल ब्लॉकों के आवेदन कम थे, तब तक तो स्क्रीनिंग कमेटी द्वारा आवंटन प्रक्रिया को कुछ हद तक पारदर्शी एवं निष्पक्ष माना जा सकता है, मगर जैसे-जैसे आवेदनों की संख्या बढ़ती गई, वैसे- वैसे स्क्रीनिंग कमेटी द्वारा निष्पक्ष व पारदर्शी निर्णय लेना कठिन होता चला गया।

सीएजी की रिपोर्ट के अनुसार रामपिया और डिपसाइड रामपिया के लिए 105 आवेदन मिले थे। अब आप ही सोचिए इतने सारे आवेदकों को निष्पक्षतापूर्वक पारदर्शी तरीके से कैसे आवंटित किया जा सकता है? मुझे तो इकाई अंकों में आवंटन करना मुश्किल लग रहा था, तो सैकड़ों आवेदन में निष्पक्ष और पारदर्शी निर्णय कैसे संभव है?

2. ऑडिट की भूमिका -

प्रधानमंत्री ने कहा कि लोकतंत्र में सरकार के किसी नीति में बदलाव के कार्यान्वयन हुई देरी पर ऑडिट का नकारात्मक टिप्पणी करना सही नहीं है। नीति बनाना सरकार का काम है, सीएजी का नहीँ।

सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में कहीँ सरकार की नीति के बारे में टिप्पणी नहीं की। सीएजी ने केवल इतना ही कहा कि एक ऐसी नीति जो सरकार ने खुद आठ साल पहले बनाई थी, उसके सही समय पर क्रियान्वयन नहीँ होने के कारण प्राइवेट पार्टियों को 1.86 लाख करोड़ रुपए का फायदा हुआ। इस फायदे का कोई तो आधार रहा होगा? आखिरकार यह फायदा राजकोष (एक्सचेकर) की कीमत पर ही तो था। अगर राजकोष की यह हानि सीएजी नहीँ बताती तो इस संसदीय लोकतंत्र में और कौन बताता?

3. नीति कार्यान्वयन में असामान्य विलंब -

सीएजी के अनुसार प्रचलित प्रशासनिक अनुदेशों में सुधार कर प्रतिस्पर्धात्मक बोली सन् 2006 से शुरू की जा सकती थी। प्रधानमंत्री का कहना था कि सीएजी का यह कथन सही नहीं है क्योंकि अधिकांश कोयला और लिग्नाइट बीयरिंग राज्यों जैसे पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, झारखंड, ओड़िशा और राजस्थान में विपक्ष की सरकारें थी। ये सारे राज्य नई प्रणाली का घोर विरोध कर रहे थे, इसलिए यह मुद्दा पूरी तरह से विवादास्पद था।

प्रधानमंत्री का उपरोक्त बयान पूरी तरह से सत्य नहीं है, अगर राजनैतिक मंशा होती तो यह प्रणाली 2006 की जगह 2004 से लागू की जा सकती थी। प्रधानमंत्री ने राज्यों में विपक्ष की सरकारों के एकमत नहीँ होने पर कटाक्ष अवश्य किया, मगर उन्होंने यह कही भी नहीँ कहा कि श्री राव और श्री सोरेन इस नीति को लागू करवाने में लगातार अवरोधक का काम कर रहे थे। जानबूझकर षड्यंत्र कर रहे थे। सारे कानूनों को मद्देनजर रखते हुए और कानून विभाग की सलाह नई नीती को प्रारम्भ करने के लिए एक बिल सन् 2004 में तैयार किया जा चुका था। पॉलिसी में प्रस्तावित बदलाव में जान-बूझकर देरी की जा रही थी।

4. अनुचित लाभ (अनड्यू गैन) का आकलन -

प्रधानमंत्री ने सीएजी के आकलन में तकनीकी स्तर पर कई खामियाँ निकाली। जैसे-

1.    खनन योग्य औसत रिजर्व पर आधारित आकलन सही नहीँ है।

2.    कोल इंडिया में प्रत्येक खदान की उत्पादन कीमत अलग-अलग है। इसका मुख्य कारण उनकी जियो-माइनिंग अवस्था, उत्खनन विधि, सरफेस फीचर, सरंचनात्मक मूलभूत सुविधाएँ और इर्द-गिर्द सेटलमेंटों की संख्या इत्यादि। कोल-इण्डिया अच्छी मूलभूत सरंचनात्मक सुविधा वाली जगह पर काम करती है, जबकि कैप्टिव माइनिंग के लिए आवंटित कोल-ब्लॉक अत्यंत ही कठिन भौगोलिक अवस्थाओं वाली जगह पर दिए गए थे।

4.    निजी की खदानों के लाभांश का कुछ हिस्सा टैक्स द्वारा और कुछ एम.एम.आर.डी. बिल ( जो संसद में विचारधीन हैऔर जिसमें लाभांश का 25% हिसा स्थानीय क्षेत्रों के विकास में उपयोग करने का प्रावधान है) के द्वारा सरकार के पास आएगा। इसके अलावा,प्राइवेट कंपनियों को दिए गए कोल-ब्लॉक केवल उनकेअपने प्रयोग के लिए हैं। इसलिए कोल इण्डिया के मूल्यों के आधार पर आवंटित ब्लॉकों की कीमत का आकलन करना अनुचित है।

निस्संदेह अलग-अलग खदानों से कोयला निकालने में खर्च अलग-अलग होता है और इसमें भी कोई संदेह नहीं है कि कोयले का विक्रय मूल्य इसकी गुणवत्ता के आधार पर होता है।

पर इसलिए औसत वास्तविकता का प्रतिनिधित्त्व करता है। यह भी सही नहीं है कि कोल इण्डिया की खदानों की गुणवत्ता अच्छी है पर उसकी उत्पादकता कम और ओवरहेड ज्यादा है। यह तर्क कि कैप्टिव माइंस के लाभांश का कुछ हिस्सा टैक्स के माध्यम से सरकार के पास वापस आ जाता है, इसलिए सीएजी के आकलन को गलत कहना पूरी तरह असंगत लगता है। प्राइवेट कंपनियों को आवंटित कोल ब्लॉक केवल उनके कैप्टिव प्रयोग में कम आते है, इस वजह से उनका वित्तीय लाभ घट नहीँ जाता है। जब तक कि उनके आउटपुट की कीमतों पर किसी प्रकार का नियन्त्रण न हो,अतिरिक्त वित्तीय लाभ तो होगा ही।

सीएजी ने अपने आकलन के लिए कोल इंडिया की औसत उत्पादन कीमत एवं औसत विक्रय मूल्य लिया है।आकलन आकलन ही होता है,यथार्थ तो नहीं हो सकता। पर सीएजी के पास इससे अच्छे आकलन का और कोई अच्छा तरीका नहीं था।

दूरदर्शन पर किए गए एक साक्षात्कार एवं दिनांक 28.10.12 टाइम्स ऑफ़ इण्डिया के एक लेख में तत्कालीन कानून मंत्री श्री सलमान खुर्शीद ने लिखा कि सीएजी ने यह स्पष्ट नहीँ किया कि 1.86 करोड़ रुपयों में से सरकार को कितना मिलता? सीएजी को यह भी तो बताना चाहिए था। सीएजी कोई त्रिकालदर्शी तो है नहीं कि ये बता सकते कि आक्शन में सरकार को क्या मिलता?

न्यूज एक्स टीवी चैनल पर सरकार के बचाव में साक्षात्कार देते हुए कोयला मंत्री श्री प्रकाश जायसवाल ने कहा कि कोल ब्लाकों के आवंटन में किसी प्रकार का ऊपरी दबाव नहीँ था। जब उनके मंत्री होते एक भी कोल ब्लॉक आवंटित नहीँ किया गया था, तो उन्हें कैसे पता कि आवंटन के समय ऊपरी दबाव आया था जब अरबों-खरबों की संपति मुफ्त में दी जा रही हो तो ऊपरी दबाव नहीं होना असंभव है।

दबाव कई तरह के होते हैं। सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाला काम, बिजनेस में भागीदारी, घूस, ब्लैकमेल या डराने-धमकाने आदि के रूप में। दोस्तों और परिजनों से भी दबाव आता है। मैंने लगभग ये सारे दबाव देखे हैं। कुछ लोग दबाव सहन कर पाते हैं, तो कुछ ढह जाते हैं।

यहाँ यह कहना आवशयक है कि उन पर भले ही कितने हो दबाव आए हो प्रधानमंत्री ने न तो मुझ पर कभी कोई दबाव डाला या न ही किसी व्यक्ति विशेष के पक्ष में सिफारिश की।

हिंडालको के केस में भी जिसमें सीबीआई ने एक प्राथमिकी दर्ज की है। पीएमओ ने सिर्फ मेरिट के आधार पर पुन: जाँच करने के निर्देश दिए।

कोलगेट पर श्री विनोद रॉय की रिपोर्ट को कई लोगों ने ‘ओवरएक्टिविज्म’ की संज्ञा दी है। मेरी दृष्टि से श्री राय ने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत कर अपना संवैधानिक उत्तरदायित्व निभाया है।

यह दुर्भाग्य की बात है कि हालांकि प्रधानमंत्री खुली बोली प्रणाली को लागू करने में करना छह रहे थे,मगर वह अपनी पार्टी और अपनी सरकार में निहित स्वार्थी लोगों के विरोध के कारण ऐसा कर नहीं पाए। अगर सरकार सही समय पर सही निर्णय ले लेती तो न यह कोलगेट घोटाला होता, न ही सीबीआई जाँच और उसके बाद होने वाली मुकदमेबाजी,जो सालों चलेगी और जिसमें करोड़ों रुपए की बरबादी होगी।

16.कोयले की ई-मार्केटिंग

हमारे देश में कोयले का विशाल भंडार होने के बावजूद भी कोयले की हमेशा कमी रही है। इसकी वजह से कोयले की काला बाजारी, कोल माफिया इस उद्योग के अभिन्न अंग रहे है। राजनैतिक संरक्षण के कारण कोयलाञ्चल में कोल माफिया का जबर्दस्त प्रभाव है। कोल इंडिया के अधिकारियों का तबादला तो ये लोग आनन-फानन में करा सकते है। यहाँ तक कि इन क्षेत्रों के कलेक्टर और एसपी भी इनसे समझौता किए बिना जिले में लंबे समय तक टिक नहीं सकते।

कोयले की कालाबाजारी के बहुत तरीके है,मगर सबसे आसान तरीका यह है कि स्थानीय उद्योग विभाग के अधिकारियों से मिलकर बोगस इंडस्ट्रीज का रजिस्ट्रेशन करा कर कोयले का आवंटन कराना और फिर उस कोयले को काले बाजार में बेचना।कोल इंडिया के अधिकारी भी इस गोरखधंधे का हिस्सा है। कई दशकों से यह रैकेट चल रहा है और इस रैकेट को कोल इंडिया में निर्विवाद रूप से मान्यता प्राप्त है।

इस रैकेट की तह में अवैज्ञानिक व गलत मूल्य नीति है, कोयले का मूल्य डिमांड और सप्लाई के संतुलन से नहीं होता,बल्कि राजनैतिक आदेश से होता है। यह प्रक्रिया तो रातोंरात तो बदली नहीं जा सकती थी,किन्तु इस क्षेत्र में एक पहल तो की जा सकती थी।

कोल इंडिया की दो अनुषंगी कंपनियों बीसीसीएल और ईसीएल में, सबसे अच्छी ग्रेड का कोयला है, और यहीं पर कोल माफिया का सबसे अधिक प्रभाव है। कोल माफिया कालाबाजारी से करोड़ों रुपए कमाते हैं और ये कंपनियाँ सालों से घाटे में चल रही हैं।

कोल कंपनियों के अध्यक्षों की एक अनौपचारिक बैठक में मैंने नॉन कोर सेक्टर का कोयला ई-मार्केटिंग द्वारा बेचने का प्रस्ताव रखा। केवल बीसीसीएल के तत्कालीन सीएमडी श्री पार्थ भट्टाचार्य, जो बाद में कोल इंडिया के चेयरमैन बने,इस प्रस्ताव से सहमत थे। बाकी सब लोगों को यह प्रस्ताव बहुत अव्यवहारिक लगा।

क्योंकि प्रधानमंत्री से मेरी इस विषया में बात पहले ही हो चुकी थी। उनकी औपचारिक सहमति के लिए एक नोट प्रेषित किया। प्रधानमंत्री ने परीक्षण के तौर पर 1.6 लाख टन कोयला ई-मार्केटिंग द्वारा बेचने की सहमति दी। यह पहला परीक्षण टेस्ट बीसीसीएल में नवंबर 2004 में किया गया। परीक्षण बहुत सफल रहा और 1.32 लाख टन कोयले पर बीसीसीएल को 1.5 करोड़ रुपए का अतिरिक्त राजस्व प्राप्त हुआ।

श्री सोरेन द्वारा ई-ऑक्शन को रोकना -

बीसीसीएल में ई-ऑक्शन को भारी सफलता के बाद में सारी कोल कंपनियों में ई-ऑक्शन लागू करना चाहता था। इस बीच श्री सोरेन फिर से कोयला मंत्री बना दिए गए। मैंने एक नोट बना कर राज्य मंत्री श्री राव के द्वारा श्री सोरेन को भेजा। ई-ऑक्शन की सफलता ने कोयला-माफियाओं को पहले से ही विचलित कर दिया था। वे नहीँ चाहते थे कि ई-ऑक्शन सारी कोल कंपनियों में लागू हो। पहले तो ये फाइल राज्यमंत्री ने अपने पास एक महीने तक रखी और फिर यह लिखते हुए कि इस विषय पर कोई निर्णय लेने के पहले एक विस्तृत प्रजेंटेशन लेने की आवश्यकता है, फाइल को श्री सोरेने के पास भेज दी। श्री सोरेन ने कोई प्रजेंटेशन नहीँ लिया, मगर झारखण्ड का मुख्यमंत्री बनने के लिए कोयला मंत्री के पद से इस्तीफा देने के पूर्व उन्होंने आदेश दिया कि भविष्य में ओर कोई ई-ऑक्शन नहीँ होगा। कोयले की मार्केटिंग में पारदर्शिता लाने का यह प्रस्ताव फूल की तरह खिलने से पहले ही मुरझा गया। दूसरी कोल कम्पनियों में ई-ऑक्शन लागू करने वाली फाइल मंत्रियों के पास विचारधीन पड़ी हुई थी, तभी मुझे गुहावटी से एक टेलीग्राम आया कि एनईसीएल से जाने वाली प्रत्येक रैक पर कोल माफिया पाँच लाख रुपये का प्रीमियम लेते हैं। एनईसीएल के कोयले की गुणवत्ता ज्यादा अच्छी है। थोड़ी बहुत सल्फर की मात्रा अवश्य है, मगर कोयले की कैलोरिफिक वैल्यू बहुत ज्यादा है। इसलिए इस कोयले की उत्तर प्रदेश और बिहार की र्इटों की भट्टियों में ज्यादा डिमांड है। एक तरफ एनर्इसीएल घाटे में चल रही थी और दूसरी तरफ कोल माफिया उसी कोयले से करोड़ों रुपए कमा रहे थे। मैंने कोल इण्डिया के चेयरमैन को एनईसीएल का सारा कोयला ई-मार्केटिंग से बेचने की सलाह दी। जो नतीजे हमें मिले, वे सब हमारी कल्पना से परे थे। कोल इंडिया को एक रैक कोयला बेचने पर नोटिफाइड प्राइस से ऊपर पच्चीस लाख से ज्यादा प्रीमियम मिलने लगा।

जब श्री सोरेन ने झारखण्ड का मुख्यमंत्री बनने के लिए कोयला मंत्रालय से त्यागपत्र दिया तब फिर से प्रधानमंत्री ने कोयला मंत्रालय का प्रभार संभाला और उन्होंने सारी कोल कम्पनियों में ई-ऑक्शन लागू करने की अनुमति प्राप्त दे दी। मेरे रिटायर होने तक ई-ऑक्शन बहुत गहराई तक अपनी जड़ें जमा चुका होता और अब किसी भी मंत्री के लिए उसे रद्द करना असंभव था।

मेरा विचार था कोयले के उत्पादन के कम से कम पच्चीस प्रतिशत की ई-ऑक्शन से मार्केटिंग की जाए।ताकि घरेलू कोयले की कीमतें पारदर्शी और वैज्ञानिक तरीके से तय की जा सके।

(क्रमशः अगले अंकों में जारी....)

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