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इथियोपिया की लोक कथाएँ - 2 // 10 सुनहरा घोड़ा // सुषमा गुप्ता

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इथियोपिया के पूर्वी हिस्से में एक चरवाहा रहता था। उसके पास थोड़ी सी जमीन थी, कुछ भेड़ें, कुछ बकरियाँ, कुछ गायें, कुछ बैल और एक घोड़ा और एक घोड़ी थी।

हर साल वसन्त में वह घोड़ी एक बच्चे को जन्म देती थी और वह चरवाहा कुछ महीने तक उसको अपने पास रख कर बड़ा करके उसे बेच दिया करता था। उस पैसे से वह अपने परिवार के लिये नये कपड़े बनवाया करता था।

फिर एक बार वसन्त आया और फिर एक बार उस घोड़ी ने एक बच्चे को जन्म दिया। पर इस बार का बच्चा उस घोड़ी के पहले के सभी बच्चों से अलग था। इस बच्चे के बाल सुनहरे थे और जैसे जैसे वह बच्चा बड़ा होता गया वह बच्चा और भी ज़्यादा सुन्दर होता गया।

कुछ महीने बाद एक व्यापारी हर साल की तरह उस बच्चे को खरीदने के लिये उसके पास आया।

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चरवाहे ने पहले तो बच्चे की तरफ देखा और फिर व्यापारी की तरफ, और बोला - "यह बच्चा बहुत सुन्दर है। मैं अभी इसे आपको नहीं बेचूँगा। मैं इसको थोड़े दिन और अपने पास रखना चाहता हूँ।"

व्यापारी चला गया और घोड़े का बच्चा वहीं खाता खेलता बड़ा होता रहा। जैसे जैसे वह बड़ा होता गया उसका खाना भी बढ़ता गया।

हालाँकि चरवाहा उसको बेचना नहीं चाहता था परन्तु वह उसको अपने पास रख भी नहीं सकता था क्योंकि वह बहुत गरीब था और उसके खाने के खरचे का बोझ नहीं उठा सकता था।

उसने सोचा कि बारिश खत्म हो जाने के बाद जब जमींदार वहाँ आयेगा तो वह उस बच्चे को उस जमींदार को दे देगा।

कुछ हफ्ते बाद बारिश का मौसम खत्म हो गया और जमींदार गाँव में आया। गाँव के सभी लोग उससे मिलने गये। एक बड़ी दावत दी गयी उसके आने की खुशी में। उस दावत में गवैयों को भी बुलाया गया था। दावत खत्म होने के बाद सभी अपने अपने घर चले गये।

अगले दिन वह चरवाहा उस जमींदार के घर गया और बोला - "सरकार, आपके लिये मेरे पास एक भेंट है।"

जमींदार बोला - "अच्छा, कहाँ है वह भेंट?" जमींदार ने चारों तरफ अपनी निगाह दौड़ायी पर उसको कोई भेंट दिखायी नहीं दी।

इतने में चरवाहे का बेटा बाहर से वह सुनहरा घोड़ा ले आया। घोड़ा सचमुच ही बहुत सुन्दर था। जमींदार उस घोड़े को देख कर बहुत खुश हुआ। उसने सभी लोगों को वह घोड़ा दिखलाया। सभी ने उस घोड़े की बहुत तारीफ की क्योंकि उन लोगों ने ऐसा घोड़ा पहले कभी नहीं देखा था।

जब सब लोग उसका घोड़ा देख रहे थे तो चरवाहा अपने बेटे को ले कर दुखी मन से वहाँ से बाहर चला गया और फिर अपने घर चला आया।

उधर जब उस घोड़े की काफी तारीफ हो रही थी तो जमींदार ने पूछा - "अरे वह आदमी कहाँ है जो इस घोड़े को लाया था? मैं उसे इतना सुन्दर घोड़ा देने के लिये कुछ इनाम देना चाहता हूँ।"

यह सुन कर जमींदार के नौकरों ने अन्दर बाहर चारों तरफ देखा परन्तु चरवाहे और उसके बेटे का तो कहीं पता ही नहीं था। वे दूर दूर तक उनको ढूँढने के लिये भी गये पर वह चरवाहा और उसका बेटा उनको कहीं दिखायी नहीं दिये।

जमींदार एक मिनट तक तो चुप रहा फिर बोला - "देखो, वह गरीब आदमी मुझे इतनी कीमती भेंट देगया और बदले में कुछ भी नहीं ले गया, इसे कहते हैं उदारता।"

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं की एक अन्य पुस्तक - रैवन की लोक कथाएँ में से एक लोक कथा यहाँ पढ़ सकते हैं.

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सुषमा गुप्ता का जन्म उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ शहर में सन् 1943 में हुआ था। इन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से समाज शास्त्र और अर्थ शास्त्र में ऐम ए किया और फिर मेरठ विश्वविद्यालय से बी ऐड किया। 1976 में ये नाइजीरिया चली गयीं। वहां इन्होंने यूनिवर्सिटी औफ़ इबादान से लाइब्रेरी साइन्स में ऐम ऐल ऐस किया और एक थियोलोजीकल कौलिज में 10 वर्षों तक लाइब्रेरियन का कार्य किया।

वहां से फिर ये इथियोपिया चली गयीं और वहां एडिस अबाबा यूनिवर्सिटी के इन्स्टीट्यूट औफ़ इथियोपियन स्टडीज़ की लाइब्रेरी में 3 साल कार्य किया। तत्पश्चात इनको दक्षिणी अफ्रीका के एक देश़ लिसोठो के विश्वविद्यालय में इन्स्टीट्यूट औफ़ सदर्न अफ्रीकन स्टडीज़ में 1 साल कार्य करने का अवसर मिला। वहॉ से 1993 में ये यू ऐस ए आगयीं जहां इन्होंने फिर से मास्टर औफ़ लाइब्रेरी ऐंड इनफौर्मेशन साइन्स किया। फिर 4 साल ओटोमोटिव इन्डस्ट्री एक्शन ग्रुप के पुस्तकालय में कार्य किया।

1998 में इन्होंने सेवा निवृत्ति ले ली और अपनी एक वेब साइट बनायी- www.sushmajee.com <http://www.sushmajee.com>। तब से ये उसी वेब साइट पर काम कर रहीं हैं। उस वेब साइट में हिन्दू धर्म के साथ साथ बच्चों के लिये भी काफी सामग्री है।

भिन्न भिन्न देशों में रहने से इनको अपने कार्यकाल में वहॉ की बहुत सारी लोक कथाओं को जानने का अवसर मिला- कुछ पढ़ने से, कुछ लोगों से सुनने से और कुछ ऐसे साधनों से जो केवल इन्हीं को उपलब्ध थे। उन सबको देखकर इनको ऐसा लगा कि ये लोक कथाएँ हिन्दी जानने वाले बच्चों और हिन्दी में रिसर्च करने वालों को तो कभी उपलब्ध ही नहीं हो पायेंगी- हिन्दी की तो बात ही अलग है अंग्रेजी में भी नहीं मिल पायेंगीं.

इसलिये इन्होंने न्यूनतम हिन्दी पढ़ने वालों को ध्यान में रखते हुए उन लोक कथाओं को हिन्दी में लिखना पा्ररम्भ किया। इन लोक कथाओं में अफ्रीका, एशिया और दक्षिणी अमेरिका के देशों की लोक कथाओं पर अधिक ध्यान दिया गया है पर उत्तरी अमेरिका और यूरोप के देशों की भी कुछ लोक कथाएँ सम्मिलित कर ली गयी हैं।

अभी तक 1200 से अधिक लोक कथाएँ हिन्दी में लिखी जा चुकी है। इनको "देश विदेश की लोक कथाएँ" क्रम में प्रकाशित करने का प्रयास किया जा रहा है। आशा है कि इस प्रकाशन के माध्यम से हम इन लोक कथाओं को जन जन तक पहुंचा सकेंगे.

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