शुक्रवार, 11 अगस्त 2017

इथियोपिया की लोक कथाएँ - 2 // 11 सोना उगलने वाला गधा // सुषमा गुप्ता


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बच्चो इथियोपिया में एक प्रान्त है सिडामो। वहाँ की जमीन बहुत उपजाऊ है। वहाँ की मिट्टी काली है और वहाँ हमेशा हरियाली छायी रहती है।

कहते हैं कि एक बार सिडामो का एक आदमी बाजार से एक बोरा अनाज खरीद कर लाया। उसको मालूम नहीं था कि उसके बोरे में एक छोटा सा छेद भी था सो धीरे धीरे करके उसके बोरे का करीब करीब सारा अनाज रास्ते ही में बिखर गया।

जब वह घर पहुँचा तो उसने दुखी मन से अपना वह बचा हुआ अनाज अपने अनाज भंडार में रख दिया।

पर जब वह अगले दिन सुबह जागा तो क्या देखता है कि पिछले दिन जहाँ जहाँ अनाज बिखरा था वहाँ वहाँ वह अनाज उग आया है और वह इतना ऊँचा बढ़ गया है कि अब उसे कहीं कोई रास्ता नहीं सुझाई पड़ रहा है।

वह बेचारा आदमी उसी उगे अनाज के जंगल में बाहर जाने का रास्ता ढूँढते ढूँढते मर गया।

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तो ऐसा है वह सिडामो प्रान्त और ऐसे हैं वहाँ के लोग। वहाँ की जमीन तो इतनी ज्यादा उपजाऊ है पर लोग बहुत आलसी हैं।

उसी प्रान्त के पड़ोस के एक शहर में एक व्यापारी रहता था। उसने इस जगह के बारे में ऐसी कहानी सुनी तो उसने सोचा कि वह वहाँ जा कर अपनी दूकान लगायेगा।

वह वहाँ आया, उसने अपनी दूकान लगायी और कुछ ही समय में बहुत अमीर हो गया क्योंकि वहाँ के लोग अनाज उगाने की बजाय उसे बाजार में खरीदना ज़्यादा पसन्द करते थे।

पर वह व्यापारी इतना ज़्यादा पैसा होने के बावजूद भी खुश नहीं था क्योंकि वह देखता था कि इतनी सुन्दर उपजाऊ जमीन इन आलसी लोगों की वजह से बेकार हो रही है।

इसके अलावा उसने यह भी देखा कि वह अच्छी या बुरी जैसी भी चीज़ अपनी दूकान पर बेचने के लिये लाता वह बिना किसी परेशानी के बिक जाती।

इस बात से उसको अपने व्यापार में कोई मजा नहीं आ रहा था। कई बार उसने वहाँ के लोगों को समझाया कि तुम लोग ऐसा क्यों करते हो परन्तु उनकी समझ में कुछ आता ही नहीं था।

जब तक वह जवान था व्यापार के सिलसिले में वह इधर उधर दूसरे देशों में जाता भी रहता था परन्तु बूढ़ा होने पर तो उसको वहीं रहना पड़ता, उन्हीं बेवकूफ और आलसियों के बीच।

एक दिन उसको उन आलसी लोगों को सबक सिखाने की एक तरकीब सूझी। उसने अपना एक बहुत ही बूढ़ा और बीमार गधा लिया, उसके मुँह में उसने सोने के तीन सिक्के रखे और उसको बाजार में बेचने के लिये ले आया।

उसने कहना शुरू किया - "आओ आओ, ओ सिडामो के लोगों यहाँ आओ और देखो मैं तुमको एक तमाशा दिखाता हूँ।

तुम जानते ही हो कि मैं कितना बूढ़ा हूँ और अमीर भी। मेरे मरने के दिन अब करीब आ रहे हैं और इतना धन मैं अपने साथ तो ले जा नहीं सकता इसलिये मैं तुम लोगों को बताना चाहता हूँ कि मैं इतना अमीर कैसे बना।

तुम लोगों को यह भी मालूम है कि मैंने कभी हल नहीं चलाया, कभी फावड़ा नहीं चलाया पर फिर भी मैं अमीर हूँ क्योंकि मेरे पास यह गधा है, सोना उगलने वाला गधा।"

यह सुन कर तो उस व्यापारी के चारों तरफ भीड़ लग गयी। व्यापारी फिर बोला - "देखो लोगों ध्यान से देखो। अगर मुझे सोने की जरूरत होती है तो बस मैं इस गधे की पूँछ ऊपर नीचे हिलाता हूँ और यह गधा मुझे सोने के सिक्के दे देता है।"

यह कह कर उस व्यापारी ने लोगों के सामने ही उस गधे की पूँछ को ऊपर नीचे किया और अपना हाथ गधे के मुँह पर रख दिया। देखते देखते गधे ने सोने का एक चमचमाता सिक्का व्यापारी के हाथ पर उगल दिया। सारे लोग यह देख कर आश्चर्यचकित रह गये।

तभी व्यापारी ने कहा - "अगर तुम लोग यह अपने आप करके देखना चाहो तो करके देख सकते हो।"

कई बेवकूफ लोग गधे की पूँछ की तरफ दौड़े पर एक अक्लमन्द आदमी गधे के मुँह की तरफ बढ़ा और अपना हाथ उसके मुँह पर लगा दिया। बेवकूफों ने गधे की पूँछ हिलायी और गधे ने तुरन्त ही उस अक्लमन्द आदमी के हाथ पर वैसा ही सोने का एक चमचमाता सिक्का उगल दिया।

एक अक्लमन्द आदमी चिल्लाया - "आश्चर्य, इस जानवर को तो मैं खरीदूँगा।"

व्यापारी बोला - "जनाब इतनी जल्दी नहीं। मैं इस गधे की बोली लगाता हूँ और फिर जो भी इसके सबसे ज़्यादा दाम लगायेगा यह गधा मैं उसी को बेचूँगा। यह तो व्यापार है न?"

व्यापारी ने बोली लगायी। उस अक्लमन्द जमींदार तथा उसके एक अमीर भाई ने अपनी सारी सम्पत्ति के बदले में उस गधे को सबसे ज़्यादा दाम लगा कर खरीद लिया।

अब व्यापारी तमाशा देखने के लिये दूर खड़ा हो गया। जमींदार अपने भाई से बोला - "पहले हम इस गधे से इसके लिये दी गयी कीमत तो वसूल कर लें।"

जमींदार के भाई ने उसकी पूँछ हिलायी और गधे के मुँह से तीसरा और आखिरी सोने का सिक्का भी जमींदार की हथेली पर आ गिरा। वह सिक्का उसने भीड़ में खड़ी एक गरीब औरत को दे दिया।

जमींदार बोला - "भाई, अब मैं यह खाली थैला इस गधे के मुँह के आगे लगाता हूँ और तुम उधर से गधे की पूँछ हिलाओ।" उन दोनों ने वैसा ही किया परन्तु काफी देर तक पूँछ हिलाने के बाद भी सोने का एक भी सिक्का गधे के मुँह से बाहर नहीं आया।

वहाँ खड़े सभी लोगों ने अपनी अपनी कोशिश की परन्तु कोई भी गधे के मुँह से सोने का सिक्का बाहर नहीं निकाल पाया। यह सब देख कर दूर खड़ा व्यापारी हँस पड़ा।

व्यापारी की इस हँसी पर जमींदार बहुत चिल्लाया। भीड़ इकठ्ठी हो गयी। जमींदार बोला - "तुमने हमें धोखा दिया है। कोई छोटा मोटा धोखा होता तो हम सह लेते परन्तु यह तो बहुत बड़ा धोखा है।"

व्यापारी बोला - "मैंने तुमको कोई धोखा नहीं दिया। जैसे हर चीज़ में एक भेद छिपा होता है वैसे ही इस गधे में भी एक भेद छिपा हुआ है। अगर तुम इस भेद को जान जाओगे तो यह गधा फिर से सोना उगलेगा।"

जमींदार गिड़गिड़ाया - "हमें वह भेद जल्दी बताओ आखिर हमने यह गधा पैसे दे कर खरीदा है।"

व्यापारी मुस्कुरा कर बोला - "तुम लोगों ने केवल गधा खरीदा है वह भेद नहीं। तुम लोगों को वह भेद जानने के लिये 100 सोने के सिक्के और देने पड़ेंगे।"

जमींदार दुखी हो कर बोला - "पर अब हमारे पास और सोना नहीं है। हमने तो अपना सारा सोना तुमको दे दिया। तुम हमको वह भेद बता दो तो हम वे 100 सोने के सिक्के तुमको गधे से उगलवा कर दे देंगे।"

व्यापारी बोला - "यह नहीं हो सकता। सिक्के तो तुमको पहले ही देने पड़ेंगे।"

इस पर दूसरे दो और अमीर आदमियों ने जमींदार और उसके भाई की सहायता करने का वायदा किया, इस शर्त पर कि वे भेद जानने के बाद गधे से उगले सोने को उनसे बाँट लेंगे।

व्यापारी सोना लेने के बाद बोला - "वह भेद कोई खास तो नहीं है, सीधा सा है। गधे से सोना उगलवाने के लिये गधे के मुँह में सोना रखना पड़ता है। देखो यह कैसे होता है।"

ऐसा कह कर उसने गधे के मुँह में दो सोने के सिक्के रख दिये। उसके नौकर ने गधे की पूँछ हिलायी और गधे ने वे दोनों सिक्के एक के बाद एक व्यापारी के हाथ पर उगल दिये। व्यापारी ने वे सिक्के अपनी जेब में डाले और अपनी दूकान की तरफ चला गया।

आज वह बहुत खुश था। वहीं से उसने लोगों से कहा - "अब तुम कोशिश करके देखो। भेद यही है कि अगर तुम सोना उसके मुँह में रखोगे तो वह सोना उगलेगा और जितना रखोगे उतना ही उगलेगा।"

अब जमींदार ने ऐसा ही किया तो गधे ने उसके रखे सिक्के ऐसे के ऐसे उगल दिये। अब व्यापारी ने पूछा - "अब बताओ, मैंने तुमको कोई धोखा तो नहीं दिया? तुमसे कोई झूठ तो नहीं बोला?"

जमींदार बोला - "बिल्कुल नहीं।" यह सुन कर व्यापारी ने अपनी दूकान बढ़ायी और अपने घर चला गया।

पर अगली सुबह वह भागा भागा बाजार आया क्योंकि उसे पता था कि गुस्से में भरी भीड़ उसका इन्तजार कर रही होगी।

वह सोच रहा था कि शायद उसके इस उदाहरण से वे लोग यह समझ जायें कि अगर जमीन से कुछ पाना चाहते हो तो पहले उसके अन्दर वह चीज़ रखो जो तुमको उससे लेनी है और इस बात से वे गुस्सा हो जायेंगे। पर ऐसा तो वहाँ कुछ भी नहीं था।

वहाँ तो गधा बीच में खड़ा था और उसके चारों तरफ बहुत सारे लोग खड़े थे। वे सब ऐसे आश्चर्यजनक गधे को देखने के लिये वहाँ दूर दूर से आये थे।

जमींदार भी बिल्कुल गुस्सा नहीं था बल्कि खुशी से गा रहा था, चिल्ला रहा था, नाच रहा था क्योंकि वह एक ऐसे आश्चर्यजनक गधे का मालिक था।

उसने व्यापारी को देखा तो चिल्ला कर बोला - "व्यापारी, तुमने सब सच कहा था। यह जानवर तो सचमुच ही बहुत आश्चर्य की चीज़ है। तुमने हम लोगों को खुश कर दिया, हम तुमसे बहुत खुश हैं।"

व्यापारी ने यह देख कर अपना सिर पीट लिया कि किन बेवकूफों और आलसियों से उसका पाला पड़ा था।

व्यापारी जब अपनी दूकान जाता तो रोज उस भीड़ से गुजरता और उसको बिना देखे दूकान तक जाने की कोशिश करता पर कभी ऐसा होता ही नहीं। वह उस भीड़ की तरफ जरूर देखता और उनकी बेवकूफी पर सिर पीटता हुआ आगे बढ़ जाता।

एक दिन वह व्यापारी बीमार पड़ गया और कुछ दिनों बाद मर गया। व्यापारी के मरने की खबर सुन कर आसपास वाले सब लोग उसको देखने के लिये आये।

उन्होंने उसके घर की तरफ इशारा करते हुए दूसरे गाँव के लोगों से कहा - "देखो, यहाँ हमारा वह भला व्यापारी रहता था। वो ही हमारे देश में सोना उगलने वाला गधा लाया था। बड़े दुख की बात है कि वह अब हमारे बीच नहीं है।"

सामान्य रूप से लोग पूरे तरीके से बुरे तो नहीं होते पर हाँ पूरे तरीके से बेवकूफ हो सकते हैं, जैसे ये सिडामो के लोग। सिखाने के बावजूद वे कुछ भी नहीं सीख सके।

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं की एक अन्य पुस्तक - रैवन की लोक कथाएँ में से एक लोक कथा यहाँ पढ़ सकते हैं.

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सुषमा गुप्ता का जन्म उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ शहर में सन् 1943 में हुआ था। इन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से समाज शास्त्र और अर्थ शास्त्र में ऐम ए किया और फिर मेरठ विश्वविद्यालय से बी ऐड किया। 1976 में ये नाइजीरिया चली गयीं। वहां इन्होंने यूनिवर्सिटी औफ़ इबादान से लाइब्रेरी साइन्स में ऐम ऐल ऐस किया और एक थियोलोजीकल कौलिज में 10 वर्षों तक लाइब्रेरियन का कार्य किया।

वहां से फिर ये इथियोपिया चली गयीं और वहां एडिस अबाबा यूनिवर्सिटी के इन्स्टीट्यूट औफ़ इथियोपियन स्टडीज़ की लाइब्रेरी में 3 साल कार्य किया। तत्पश्चात इनको दक्षिणी अफ्रीका के एक देश़ लिसोठो के विश्वविद्यालय में इन्स्टीट्यूट औफ़ सदर्न अफ्रीकन स्टडीज़ में 1 साल कार्य करने का अवसर मिला। वहॉ से 1993 में ये यू ऐस ए आगयीं जहां इन्होंने फिर से मास्टर औफ़ लाइब्रेरी ऐंड इनफौर्मेशन साइन्स किया। फिर 4 साल ओटोमोटिव इन्डस्ट्री एक्शन ग्रुप के पुस्तकालय में कार्य किया।

1998 में इन्होंने सेवा निवृत्ति ले ली और अपनी एक वेब साइट बनायी- www.sushmajee.com <http://www.sushmajee.com>। तब से ये उसी वेब साइट पर काम कर रहीं हैं। उस वेब साइट में हिन्दू धर्म के साथ साथ बच्चों के लिये भी काफी सामग्री है।

भिन्न भिन्न देशों में रहने से इनको अपने कार्यकाल में वहॉ की बहुत सारी लोक कथाओं को जानने का अवसर मिला- कुछ पढ़ने से, कुछ लोगों से सुनने से और कुछ ऐसे साधनों से जो केवल इन्हीं को उपलब्ध थे। उन सबको देखकर इनको ऐसा लगा कि ये लोक कथाएँ हिन्दी जानने वाले बच्चों और हिन्दी में रिसर्च करने वालों को तो कभी उपलब्ध ही नहीं हो पायेंगी- हिन्दी की तो बात ही अलग है अंग्रेजी में भी नहीं मिल पायेंगीं.

इसलिये इन्होंने न्यूनतम हिन्दी पढ़ने वालों को ध्यान में रखते हुए उन लोक कथाओं को हिन्दी में लिखना पा्ररम्भ किया। इन लोक कथाओं में अफ्रीका, एशिया और दक्षिणी अमेरिका के देशों की लोक कथाओं पर अधिक ध्यान दिया गया है पर उत्तरी अमेरिका और यूरोप के देशों की भी कुछ लोक कथाएँ सम्मिलित कर ली गयी हैं।

अभी तक 1200 से अधिक लोक कथाएँ हिन्दी में लिखी जा चुकी है। इनको "देश विदेश की लोक कथाएँ" क्रम में प्रकाशित करने का प्रयास किया जा रहा है। आशा है कि इस प्रकाशन के माध्यम से हम इन लोक कथाओं को जन जन तक पहुंचा सकेंगे.

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