शुक्रवार, 11 अगस्त 2017

इथियोपिया की लोक कथाएँ - 2 // 12 बोतल का साँप // सुषमा गुप्ता

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बहुत पुरानी बात है कि इथियोपिया में एक बार एक राजा पूर्व दिशा की तरफ गया, पश्चिम दिशा की तरफ गया, उत्तर दिशा की तरफ गया, दक्षिण दिशा की तरफ गया। उसने बहुत सारी चढ़ाइयाँ की और बहुत सारा खजाना लूटा।

अब क्योंकि राजा अक्सर बाहर रहता था इसलिये उसने अपना खजाना रखने के लिये एक बहुत बड़ा कमरा बनवाया और उसकी चौकीदारी के लिये एक आदमी तैनात कर दिया।

यह चौकीदार दूसरों से तो खजाना बचाने में बहुत चतुर था परन्तु उसने खुद ही खजाने में से चोरी करनी शुरू कर दी।

इस तरह कई साल बीत गये उसको चोरी करते करते। वह चौकीदार उस कमरे में से थोड़ा थोड़ा करके खजाना निकालता और उसको ले जा कर अपने भंडारघर में रख देता।

इस तरह उस चौकीदार ने राजा की सारी आलमारियाँ जो सोने चाँदी और रत्नों से भरी हुई थीं, सब खाली कर दीं और उन्हें पत्थरों से भर दिया।

अब राजा बूढ़ा हो गया और लड़ाई के घावों की वजह से अपंग भी हो गया तो अपना खजाना देखने और भोगने के लिये घर लौटा।

चौकीदार राजा के सामने गया और सिर झुका कर बोला - "अब तो जहाँपनाह लौट आये हैं - एक बार फिर शेर अपने घर आ गया है तो अब मेरे जैसे बूढ़े चौकीदार की यहाँ कोई जरूरत ही नहीं रह गयी है इसलिये अब मुझे इजाज़त दीजिये। आपके सिवा अब इस खजाने की रक्षा आपसे ज़्यादा अच्छी और कौन कर सकता है।"

राजा बोला - "तुम सच कहते हो। तुमने बहुत साल हमारी सेवा की है इसलिये सोने से भरी हुई यह बड़ी आलमारी उठा लो और खुशी खुशी अपने घर जाओ और सुखी रहो।" चौकीदार ने वह आलमारी उठायी और घर चला गया।

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चौकीदार के जाने के बाद राजा ने अपनी आलमारियाँ देखीं और देखा कि उसकी तो सारी आलमारियाँ पत्थरों से भरी पड़ी हैं। यह देख कर राजा ने अपने एक आदमी को उस बेईमान चौकीदार को लाने के लिये भेजा।

उधर चौकीदार अपनी सब सम्पत्ति ले कर दूसरे देश भाग जाना चाहता था परन्तु राजा का राज्य अब बहुत बड़ा हो गया था और चौकीदार के पास सोने चाँदी व रत्नों से लदे कई खच्चर थे।

इसलिये राजा के आदमियों ने उसको जल्दी ही राजा के राज्य की सीमा के बाहर निकलने से पहले ही पकड़ लिया और कहा - "महाराज तुमसे मिलना चाहते हैं और तुमसे कुछ कहना चाहते हैं।"

चौकीदार ने पूछा - "मगर महाराज मुझसे क्या बात करना चाहते हैं, मैंने तो कोई जुर्म नहीं किया।"

वह आदमी बोला - "यह तो उन्होंने हमें नहीं बताया पर तुमको उनके पास चलना जरूर है।"

जब चौकीदार महल में आया तो राजा ने उसको अपने सिंहासन वाले कमरे में बिठाया और बोला - "मैं तुमको एक बहुत छोटी सी कहानी सुनाना चाहता हूँ। तुम यहाँ बैठो और उस कहानी को ध्यान से सुनो ़ ़ ़

एक बार एक साँप रेंगता हुआ खेत में बने एक घर में घुस गया। वहाँ उसने दूध से भरी तंग गरदन वाली एक खुली हुई बोतल देखी। मौका देख कर वह उस बोतल की खुली गरदन में घुसा और धीरे धीरे उस बोतल की तंग गरदन में से रेंगता हुआ नीचे जा कर दूध पीने लगा।

साँप दूध पीता गया और पीता गया और पीता गया, जब तक वह उस बोतल का सारा दूध नहीं पी गया। दूध पीने की वजह से वह इतना मोटा हो गया कि उसके लिये अब उस बोतल की तंग गरदन में से बाहर निकलना नामुमकिन हो गया।

इतना कह कर राजा रुक गया और चौकीदार की तरफ देख कर मुस्कुराया।

चौकीदार ने पूछा - "क्या यही इस कहानी का अन्त है? मुझे लम्बे सफर पर जाना है इसलिये मैं ज़रा जल्दी जाना चाहूँगा।"

राजा बोला - "अन्त तो यह नहीं है पर तुम्हारे खयाल में साँप को उस बोतल में से बाहर निकलने के लिये क्या करना चाहिये? तुम्हारा क्या खयाल है?"

चौकीदार बोला - "अगर उस साँप को उस बोतल में से बाहर निकलना ही है तो उसने जो दूध पिया है वह उसे उगल देना चाहिये।"

राजा बोला - "तुम ठीक कहते हो। पर क्या उसे सारा दूध उगल देना चाहिये?"

चौकीदार बोला - "अगर वह बाहर निकलना चाहता है तो उसे सारा ही दूध उगलना पड़ेगा।"

राजा बोला - "हाँ बिल्कुल ठीक, सारा का सारा।"

इतने में चौकीदार ने देखा कि राजा के सिपाही उस कमरे के हर दरवाजे से भाले लिये हुए चले आ रहे हैं। चौकीदार के पास अब कोई चारा नहीं था। उसने राजा का सारा खजाना वापस कर दिया।

राजा होशियार भी था और धीरज वाला भी। उसने अपने सिपाहियों को उस चौकीदार से खजाना छीनने की ऐसे ही आज्ञा नहीं दी थी बल्कि एक सीख वाली कहानी सुना कर उसको ऐसा करने पर मजबूर किया।

इस कहानी से हमको दो सीख मिलती हैं। एक तो यह कि धीरज और होशियारी से मुश्किल से मुश्किल परेशानी का हल आसानी से और बिना किसी अप्रिय घटना के निकल आता है।

दूसरे किसी भी आदमी को अपनी सीमा से बाहर कोई काम नहीं करना चाहिये। अगर वह चौकीदार थोड़ी सम्पत्ति चुराता तो शायद राजा को पता न चलता परन्तु क्योंकि उसने राजा की बहुत सारी सम्पत्ति चुरायी इसी वजह से उसको यह दिन देखना पड़ा।


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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं की एक अन्य पुस्तक - रैवन की लोक कथाएँ में से एक लोक कथा यहाँ पढ़ सकते हैं.

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सुषमा गुप्ता का जन्म उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ शहर में सन् 1943 में हुआ था। इन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से समाज शास्त्र और अर्थ शास्त्र में ऐम ए किया और फिर मेरठ विश्वविद्यालय से बी ऐड किया। 1976 में ये नाइजीरिया चली गयीं। वहां इन्होंने यूनिवर्सिटी औफ़ इबादान से लाइब्रेरी साइन्स में ऐम ऐल ऐस किया और एक थियोलोजीकल कौलिज में 10 वर्षों तक लाइब्रेरियन का कार्य किया।

वहां से फिर ये इथियोपिया चली गयीं और वहां एडिस अबाबा यूनिवर्सिटी के इन्स्टीट्यूट औफ़ इथियोपियन स्टडीज़ की लाइब्रेरी में 3 साल कार्य किया। तत्पश्चात इनको दक्षिणी अफ्रीका के एक देश़ लिसोठो के विश्वविद्यालय में इन्स्टीट्यूट औफ़ सदर्न अफ्रीकन स्टडीज़ में 1 साल कार्य करने का अवसर मिला। वहॉ से 1993 में ये यू ऐस ए आगयीं जहां इन्होंने फिर से मास्टर औफ़ लाइब्रेरी ऐंड इनफौर्मेशन साइन्स किया। फिर 4 साल ओटोमोटिव इन्डस्ट्री एक्शन ग्रुप के पुस्तकालय में कार्य किया।

1998 में इन्होंने सेवा निवृत्ति ले ली और अपनी एक वेब साइट बनायी- www.sushmajee.com <http://www.sushmajee.com>। तब से ये उसी वेब साइट पर काम कर रहीं हैं। उस वेब साइट में हिन्दू धर्म के साथ साथ बच्चों के लिये भी काफी सामग्री है।

भिन्न भिन्न देशों में रहने से इनको अपने कार्यकाल में वहॉ की बहुत सारी लोक कथाओं को जानने का अवसर मिला- कुछ पढ़ने से, कुछ लोगों से सुनने से और कुछ ऐसे साधनों से जो केवल इन्हीं को उपलब्ध थे। उन सबको देखकर इनको ऐसा लगा कि ये लोक कथाएँ हिन्दी जानने वाले बच्चों और हिन्दी में रिसर्च करने वालों को तो कभी उपलब्ध ही नहीं हो पायेंगी- हिन्दी की तो बात ही अलग है अंग्रेजी में भी नहीं मिल पायेंगीं.

इसलिये इन्होंने न्यूनतम हिन्दी पढ़ने वालों को ध्यान में रखते हुए उन लोक कथाओं को हिन्दी में लिखना पा्ररम्भ किया। इन लोक कथाओं में अफ्रीका, एशिया और दक्षिणी अमेरिका के देशों की लोक कथाओं पर अधिक ध्यान दिया गया है पर उत्तरी अमेरिका और यूरोप के देशों की भी कुछ लोक कथाएँ सम्मिलित कर ली गयी हैं।

अभी तक 1200 से अधिक लोक कथाएँ हिन्दी में लिखी जा चुकी है। इनको "देश विदेश की लोक कथाएँ" क्रम में प्रकाशित करने का प्रयास किया जा रहा है। आशा है कि इस प्रकाशन के माध्यम से हम इन लोक कथाओं को जन जन तक पहुंचा सकेंगे.

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