बुधवार, 13 सितंबर 2017

रैवन की लोककथाएँ - 1 - : 12 रैवन का रंग काला क्यों है? // सुषमा गुप्ता

रैवन की यह एक बड़ी मजेदार कहानी है जिसमें वह गनूक से मिलता है। गनूक टिनग्रिट जनजाति का एक देवता है जो रैवन से भी बड़ा है। इस कथा में यह उसके पास से पानी ले कर आता है।

यह कहानी बताती है कि नदियाँ, झीलें और नाले आदि कैसे बने और रैवन का रंग काला कैसे हो गया। यह कहानी नम्बर 9 कहानी "रैवन इन्डियन्स के लिये रोशनी ले कर आया" जैसी है।

बहुत पुराने समय में जब रैवन काला नहीं था, सफेद और सुन्दर था उस समय वह इस दुनिया में कई ताकतवर लोगों के साथ काम करता था। उनमें से एक था सबसे ज़्यादा ताकतवर गनूक यानी "बैठा हुआ"।

एक बार जब रैवन नाव खे रहा था तो उसे गनूक भी अपनी नाव में बैठा दिखायी दे गया। गनूक रैवन को अपनी ताकत दिखाना चाहता था सो उसने अपना जादू का टोप उतारा और सारे समुद्र के ऊपर एक गहरा कोहरा फैला दिया।

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कोहरा इतना घना था कि रैवन अपनी नाव के सामने तक का हिस्सा नहीं देख पा रहा था।

गनूक अपनी नाव रैवन की नाव से दूर ले गया और रैवन को उसने अकेला छोड़ दिया। रैवन कुछ भी न देख पाने की वजह से समुद्र में बहुत देर तक इधर उधर घूमता रहा।

कुछ देर बाद ही उसको उस कोहरे से डर लगने लगा सो वह बहुत ज़ोर से चिल्लाया - "ओ गनूक, मेरे बहनोई, तुम कहाँ हो?"

पर गनूक चुप रहा, उसने कुछ जवाब नहीं दिया। वह रैवन को देखता रहा कि किस तरह वह चारों तरफ अपनी नाव खेता रहा और किस तरह समुद्र में खो सा गया। रैवन कोहरे को हटाने के लिये और उसको प्रगट होने के लिये पुकारता रहा।

आखिरकार गनूक अपनी नाव रैवन की नाव के पास ले आया और बोला - "साले साहब, क्या बात है? तुम इतना क्यों चिल्ला रहे हो?"

गनूक की आवाज सुन कर रैवन को कुछ चैन पड़ा। गनूक ने अपना टोप अपने सिर पर रख लिया। उसके टोप सिर पर रखते ही कोहरा छँटने लगा।

गनूक को देख कर रैवन बोला - "तुम मुझसे ज़्यादा ताकतवर हो।"

गनूक ने पूछा - "तुम यहाँ दुनिया में कितने दिनों से रहते हो?"

रैवन बोला - "मैं तो इस दुनिया के बनने से भी पहले पैदा हुआ था। और तुम?"

गनूक बोला - "जब से जिगर नीचे से आया।"

रैवन ने एक पल सोचा और बोला - "इसका मतलब है कि तुम मुझसे बड़े हो।"

इसके बाद गनूक ने रैवन को अपने घर डीकी नू टापू पर बुलाया। दोनों ने पेट भर कर खूब अच्छा खाना खाया और फिर गनूक ने रैवन को ताजा पानी पीने के लिये दिया।

रैवन ने पहले कभी ताजा पानी पिया नहीं था क्योंकि दुनिया में कहीं ताजा पानी था ही नहीं। वहाँ तो केवल समुद का ही पानी था। वह ताजा पानी उसको बहुत स्वाद लगा।

गनूक ने वह ताजा पानी पत्थर के एक बड़े कुँए में एक बड़े पत्थर से ढक कर रखा हुआ था।

क्योंकि रैवन को इस पानी का स्वाद बहुत अच्छा लगा तो वह थोड़ा सा पानी और पीना चाहता था पर माँगने से डर रहा था क्योंकि गनूक उससे ज़्यादा ताकतवर था।

खाना खाने के बाद रैवन ने गनूक को अपने और दुनिया के पैदा होने की कई कहानियाँ सुनायीं। गनूक कुछ देर तक तो रैवन की वह कहानियाँ सुनता रहा पर फिर जल्दी ही थक गया और ताजा पानी के कुँए पर पड़े हुए बड़े पत्थर पर सो गया।

जब रैवन ने देखा कि उसका बहनोई सो गया है तो उसने कुत्ते की थोड़ी सी टट्टी ली और उसको गनूक के नीचे रख कर उससे थोड़ी दूर हट गया।

दूर जा कर उसने गनूक से कहा - "अरे, जरा उठ कर देखो तो तुमने क्या कर दिया?"

यह सुन कर गनूक उठ बैठा और उसने अपने नीचे टट्टी देखी तो गनूक को लगा कि वह उसी ने गंदा किया है सो वह अपने आपको साफ करने के लिये समुद्र की तरफ दौड़ा।

रैवन तुरन्त ही उस कुँए की तरफ दौड़ा जिसमें वह ताजा पानी रखा हुआ था। उसने कुँए के ऊपर से वह पत्थर का ढक्कन उठाया और उसमें से थोड़ा सा पानी पी लिया।

जब उसकी प्यास बुझ गयी तो थोड़ा सा पानी उसने अपने मुँह में भर लिया और धुँआ निकलने के रास्ते से उड़ चला पर गनूक ने उसको रास्ते में ही रोक लिया।

गनूक ने उस धुँआ निकलने के रास्ते के नीचे आग जला दी और सफेद रैवन को काला करने के लिये धुँआ उड़ाना शुरू कर दिया। सो उस आग से उठे धुँए ने रैवन को काला कर दिया और इस तरह रैवन काला हो गया।

फिर गनूक को रैवन पर दया आ गयी और उसने रैवन को छोड़ दिया। रैवन अपने घर नास नदी की तरफ उड़ गया। उड़ते समय उसकी चोंच से उसके चुराये हुए ताजा पानी की कुछ बँूदें नीचे गिर पड़ीं। जहाँ जहाँ ये बँूदें गिरीं वहीं वहीं ताजा पानी के नदी, झील और नाले आदि बन गये।

इस तरह से रैवन काला भी हो गया और धरती पर वह मीठा पानी भी ले आया।

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं की एक अन्य पुस्तक - रैवन की लोक कथाएँ में से एक लोक कथा यहाँ पढ़ सकते हैं. इथियोपिया की 45 लोककथाओं को आप यहाँ लोककथा खंड में जाकर पढ़ सकते हैं.

(क्रमशः अगले अंकों में जारी...)

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