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रैवन की लोककथाएँ - 1 - : 13 रैवन पानी ले कर आया // सुषमा गुप्ता

यह बहुत पुरानी बात है कि एक बार धरती पर बड़ा भारी सूखा पड़ा। कहीं पानी दिखायी नहीं देता था। सारी नदियाँ और नाले सूख गये थे। अब किसी न किसी को कुछ न कुछ तो करना ही था सो रैवन उठा और पानी ढूंढने के लिये चला।

वह एक टापू की आत्मा को जानता था जो हेज़ी टापू पर रहती थी और उसके पास पानी भी था पर वह यह नहीं जानता था कि वह टापू है कहाँ।

सो रैवन ने एक दिन एक नाव ली और समुद्र में चल दिया। वह सोच रहा था कि वह टापू की आत्मा से पानी चुरा कर ले आयेगा। जब वह करीब आधी दूर निकल गया तो बहुत घना कोहरा आ गया और वह अपनी जगह ही खो गया। उसको पता ही नहीं चल रहा था कि वह कहाँ है।

बहुत देर तक वह कोहरा छँटने का इन्तजार करता रहा पर कोहरा इतना घना था कि सूरज भी उस कोहरे को नहीं हटा पा रहा था। रैवन यह सोच ही रहा था कि वह क्या करे कि टापू की आत्मा नाव में बैठ कर वहाँ आया।

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उसने रैवन से कहा - "तुमको इस तरह यहाँ बाहर नहीं घूमना चाहिये। टापू पर तो कुछ भी नहीं है और इस मौसम की वजह से तुमको बहुत देर हो सकती है। वहाँ पर पानी नहीं है। पागल मत बनो और वापस लौट जाओ।" इतना कह कर वह टापू की आत्मा वहाँ से चला गया।

जब टापू की आत्मा चला गया तो रैवन घूम गया जैसे कि वह वापस जा रहा हो। पर वह बहुत दूर नहीं गया और सूरज की हल्की सी धारी के सहारे वापस वह टापू की तरफ बढ़ा।

वह उस टापू के रेतीले किनारे पर आ गया। वहाँ टापू की आत्मा उसको लेने आया और उसको अपने घर ले गया। वहाँ रैवन ने उस आत्मा से कहा कि वह बहुत प्यासा था। पर वह टापू की आत्मा अपने पानी को बहुत अच्छी तरह से छिपा कर रखता था।

रैवन ने भी सोच रखा था कि वह उसका पानी ढँूढ कर ही रहेगा। वह इधर उधर ध्यान से देखता रहा और इन्तजार करता रहा कि किसी तरह उसको पता चल जाये कि टापू की आत्मा ने पानी कहाँ छिपा कर रखा था।

एक दिन टापू की आत्मा अपनी पीठ गरम करने के लिये आग के पास सो रहा था कि उसकी ऑख लग गयी। रैवन ने देखा कि टापू की आत्मा तो सो गया तो रैवन उठा और बाहर से चिड़ियों की बीट उठा लाया। और वह बीट ला कर उसने टापू की आत्मा के कपड़ों पर मल दी।

फिर उसने टापू की आत्मा को उठाया और उससे पूछा कि उसमें से इतनी बदबू क्यों आ रही है। टापू की वह आत्मा सोने से पहले अंडे इकठ्ठे कर रहा था सो उसने सोचा कि शायद इसी काम को करते समय उसके कपड़ों पर वह बीट लग गयी हो।

रैवन ने शोर मचाना शुरू किया - "नहा कर आओ, जाओ और नहा कर आओ तुम बहुत बदबू फैला रहे हो।"

सो वह टापू की आत्मा नहाने की तैयारी करने चल दिया। उसने अपना बरतन उठाया और पानी लाने चल दिया। उस समय वह यह भूल गया कि उसने रैवन से यह कहा था कि उस टापू पर कोई पानी नहीं था।

रैवन भी यह देखता रहा कि देखँू यह पानी कहाँ से लाता है। टापू की आत्मा अपने घर से कुछ दूरी पर गया और एक पहाड़ी के चोटी के नीचे रुक गया जो काई से ढकी हुई थी। वहीं पर वह पानी का कुँआ था।

अब रैवन को पता चल गया था कि पानी कहाँ है। उसने उसे टापू की आत्मा से चुराने का प्लान बना लिया।

अगले दिन वह सुबह बहुत सबेरे ही उठा, पानी भरने के लिये एक बालटी ली और चुपचाप घर से चल दिया। वह पानी के कुँए पर जा पहुँचा।

वहाँ जा कर पहले तो उसने खुद ही बहुत सारा पानी पिया, फिर उसने अपनी पानी की बालटी भरी और फिर उस बालटी को चोंच में दबा कर उस जगह को उड़ लिया जहाँ सूखा पड़ रहा था।

वहाँ आ कर उसने अपनी चोंच से सारी जगह पानी बिखरा दिया, धरती पर भी और आसमान में भी। उस पानी के बिखरने से आसमान से बारिश होने लगी और चारों तरफ नदी नालों में पानी बहने लगा। इस तरह रैवन ने देश को सूखे से बचाया।

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं की एक अन्य पुस्तक - रैवन की लोक कथाएँ में से एक लोक कथा यहाँ पढ़ सकते हैं. इथियोपिया की 45 लोककथाओं को आप यहाँ लोककथा खंड में जाकर पढ़ सकते हैं.

(क्रमशः अगले अंकों में जारी...)

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