शनिवार, 30 सितंबर 2017

इटली की लोक कथाएँ–1 : 7 एक छोटा चरवाहा // सुषमा गुप्ता

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एक बार एक लड़का था जो भेड़ चराया करता था। वह लड़का साइज़ में एक छोटे से कीड़े से ज़्यादा बड़ा नहीं था।

एक दिन जब वह अपनी भेड़ों को चराने के लिये घास के मैदानों की तरफ जा रहा था तो वह एक अंडे बेचने वाली के पास से गुजरा। वह अंडे बेचने वाली एक टोकरी में अंडे भर कर उनको बेचने के लिये बाजार ले कर जा रही थी।

उसको देख कर उसे शरारत सूझी। उसने उस अंडे बेचने वाली की टोकरी की तरफ एक पत्थर फेंका और उस एक ही पत्थर से उस स्त्री की टोकरी में रखे सारे अंडे टूट गये।

इससे उस स्त्री को गुस्सा आ गया तो उसने उस लड़के को शाप दे दिया — “तुम इससे बड़े कभी नहीं होगे जब तक तुम तीन गाने वाले सेबों की सुन्दर बरगैगलीना को नहीं ढूँढ लोगे।”

उस दिन के बाद से वह लड़का फिर और बड़ा नहीं हुआ बल्कि और पतला दुबला होता चला गया। उसकी माँ उसकी जितनी ज़्यादा देखभाल करती वह उतना ही और पतला दुबला होता जाता।

एक दिन उसकी माँ ने उससे पूछा — “बेटा, तुझे क्या हो गया है? क्या तूने किसी का कुछ बुरा किया है जो उसने तुझे शाप दे दिया है? तू बड़ा ही नहीं होता।”

तब उसने अपनी नीचता की कहानी अपनी माँ को सुनायी कि कैसे उसने पत्थर मार कर एक अंडे बेचने वाली की टोकरी में रखे सारे अंडे तोड़ दिये थे।

और फिर उसने उस स्त्री के शब्द भी दोहरा दिये — “तुम इससे बड़े कभी नहीं होगे जब तक तुम तीन गाने वाले सेबों की सुन्दर बरगैगलीना को नहीं ढूँढ लोगे।”

उसकी माँ बोली — “अगर ऐसी बात है तो तुम्हारे पास इसके सिवा और कोई चारा नहीं है बेटा कि तुम उस तीन गाने वाले सेबों की सुन्दर बरगैगलीना को ढूँढो।”

यह सुन कर वह लड़का उस तीन गाने वाले सेबों की सुन्दर बरगैगलीना को ढूँढने चल दिया।

चलते चलते वह एक पुल के पास आया। वहाँ एक स्त्री एक अखरोट के खोल में बैठी झूल रही थी। उसने उस लड़के को देखा तो पूछा — “उधर कौन जा रहा है?”

चरवाहा बोला — “एक दोस्त।”

“ज़रा मेरी पलक तो उठा दो ताकि मैं तुमको देख सकूँ।”

चरवाहे ने उसकी पलक उठा दी तो उसने उसी तरफ देख कर पूछा — “तुम कहाँ जा रहे हो?”

“मैं तीन गाने वाले सेबों की सुन्दर बरगैगलीना को ढूँढने जा रहा हूँ। क्या तुमको उसका कुछ अता पता मालूम है?”

“नहीं वह तो मुझे नहीं मालूम है पर तुम यह पत्थर लेते जाओ शायद यह तुम्हारे काम आये।” कह कर उसने चरवाहे को एक पत्थर पकड़ा दिया। चरवाहे ने उससे वह पत्थर ले लिया और आगे चल दिया।

आगे जा कर उसको एक और पुल मिला जहाँ एक और छोटी स्त्री एक अंडे के खोल में बैठी नहा रही थी। उसने भी पूछा — “इधर कौन जा रहा है?”

चरवाहे ने जवाब दिया — “एक दोस्त।”

वह स्त्री बोली — “ज़रा मेरी पलक तो उठा दो ताकि मैं तुम्हें देख सकूँ।”

चरवाहे ने उसकी भी पलक उठा दी तो उसने उसको देख कर पूछा — “तुम कहाँ जा रहे हो?”

“मैं तीन गाने वाले सेबों की सुन्दर बरगैगलीना को ढूँढने जा रहा हूँ। क्या तुमको उसका कुछ अता पता मालूम है?”

“नहीं वह तो मुझे नहीं मालूम है पर तुम यह हाथी दाँत की कंघी लेते जाओ तुम्हारे काम आयेगी।” कह कर उसने चरवाहे को एक कंघी दे दी। चरवाहे ने वह कंघी अपनी जेब में रखी, उसको धन्यवाद दिया और आगे चल दिया।

चलते चलते वह एक नाले के पास आया जहाँ एक आदमी उस नाले के पास खड़ा खड़ा अपने थैले में कोहरा भर रहा था। उस चरवाहे ने उस आदमी से भी पूछा कि क्या वह तीन गाने वाले सेबों की सुन्दर बरगैगलीना को जानता था। पर उसने भी वही जवाब दिया कि वह उसको नहीं जानता था।

पर उस आदमी ने उस चरवाहे को एक जेब भर कर कोहरा दे दिया और कहा कि वह उसको अपने साथ ले जाये उसके काम आयेगा। चरवाहे ने उस आदमी से कोहरा लिया और उसको धन्यवाद दे कर आगे बढ़ गया।

चलते चलते वह एक चक्की के पास आया जो एक लोमड़े की थी। चरवाहे ने लोमड़े से भी पूछा कि क्या वह तीन गाने वाले सेबों की सुन्दर बरगैगलीना को जानता था।

लोमड़ा बोला — “हाँ मैं जानता हूँ कि वह सुन्दर बरगैगलीना कौन है पर तुमको उसे ढूँढने में बहुत परेशानी होगी। तुम यहाँ से सीधे चले जाओ तो वहाँ तुमको एक घर मिलेगा। उस घर का दरवाजा खुला होगा।

तुम उस दरवाजे से अन्दर चले जाना तो वहाँ तुमको क्रिस्टल का एक पिंजरा दिखायी देगा। उस पिंजरे में बहुत सारी छोटी छोटी घंटियाँ लगी हैं। उसी पिंजरे में वे गाने वाले सेब रखे हैं।

तुम वह पिंजरा उठा लेना पर वहाँ एक बुढ़िया का ध्यान रखना क्योंकि वहाँ एक बुढ़िया भी होगी। अगर उसकी आँखें खुली हों तो समझना कि वह सो रही है और अगर उसकी आँखें बन्द हों तो समझना कि वह सब कुछ देख रही है।”

उस लोमड़े की इस सलाह के साथ वह चरवाहा और आगे बढ़ा और उस घर तक आ गया जो उसको लोमड़े ने बताया था। उस घर का दरवाजा वाकई खुला हुआ था सो वह उस घर के अन्दर चला गया।

घर के अन्दर जा कर उसने देखा कि वहाँ एक क्रिस्टल का एक पिंजरा रखा है जिसमें घंटियाँ लगी हुईं हैं और उसी के पास एक बुढ़िया बैठी है जिसकी आँखें बन्द हैं।

क्योंकि उसकी आँखें बन्द थीं इसलिये लोमड़े के कहे अनुसार वह सब कुछ देख रही थी। उस बुढ़िया ने चरवाहे से कहा — “ज़रा देखना तो मेरे बालों में कहीं कोई जूँ तो नहीं हैं?”

उसने उस बुढ़िया के बालों में झाँका तो वहाँ उसको उसके बालों में कुछ जूँ दिखायी दीं। वह उसके सिर की जूँ निकालने लगा। जब वह उसके सिर में से जूँ निकाल रहा था तो उस बुढ़िया की आँखें खुल गयीं। अब उसको पता चल गया कि वह अब सो गयी थी।

उसको सोता देख कर चरवाहे ने तुरन्त ही क्रिस्टल का वह पिंजरा वहाँ से उठाया और भाग लिया। पर उस पिंजरे को ले जाते समय उसकी छोटी छोटी घंटियाँ बज उठीं और वह बुढ़िया जाग गयी। उसने उस चरवाहे के पीछे सौ घुड़सवार भेजे।

जब चरवाहे ने देखा कि वे घुड़सवार उसके काफी पास आ गये हैं तो उसने अपनी जेब में रखा पत्थर का टुकड़ा निकाल कर अपने पीछे फेंक दिया।

जमीन पर पड़ते ही उस पत्थर का एक बहुत बड़ा पहाड़ बन गया। उस बुढ़िया के कुछ घोड़े उससे टकरा कर मर गये और कुछ की टाँगें टूट गयीं। घोड़े बेकार होने की वजह से वे और आगे नहीं जा सके और वे सब घुड़सवार वापस लौट गये।

उन घुड़सवारों को वापस आया देख कर उस बुढ़िया ने अब की बार 200 घुड़सवार उसके पीछे भेजे। चरवाहे ने एक नया खतरा देखा तो अपनी जेब से हाथी दाँत की कंघी निकाल कर अपने पीछे फेंक दी।

वह कंघी जहाँ गिरी थी वहाँ एक शीशे जैसा चिकना पहाड़ खड़ा हो गया जिस पर चढ़ते ही सारे घोड़े फिसल फिसल कर गिर पड़े और मर गये। सो वे 200 घुड़सवार भी वापस चले गये।

उनको वापस आया देख कर उस बुढ़िया ने अब की बार 300 घुड़सवार भेजे। इतने सारे घुड़सवारों के देख कर उस चरवाहे ने अपनी जेब से कोहरा निकाल कर फेंक दिया। वह कोहरा सारे में फैल गया और वे सारे घुड़सवार उस कोहरे में खो कर रह गये।

इस बीच वह चरवाहा वहाँ से बच कर भाग तो लिया पर रास्ते में उसको प्यास लग आयी। रास्ते में उसके पास पीने के लिये कुछ भी नहीं था सो उसने सोचा कि वह पिंजरे में से गाने वाला एक सेब निकाल कर खा लेता है।

उसने पिंजरे में से एक सेब निकाला और उसको काटा तो उसमें से एक छोटी सी आवाज आयी — “सेब ज़रा धीरे से काटो वरना मुझे बहुत तकलीफ होगी।”

यह सुन कर उसने वह सेब बड़ी धीरे से काटा। उसमें से उसने आधा सेब खाया और दूसरा आधा सेब अपनी जेब में रख लिया। फिर वह अपने रास्ते चल पड़ा।

चलते चलते वह अपने घर के पास वाले कुँए पर आ गया। वहाँ उसने अपनी जेब में से दूसरा आधा सेब निकालने के लिये हाथ डाला तो वहाँ उसको उसका बचा हुआ सेब तो नहीं मिला, हाँ एक छोटी सी लड़की वहाँ जरूर खड़ी थी।

चरवाहा तो यह देख कर आश्चर्यचकित रह गया। वह लड़की बोली — “मैं सुन्दर बरगैगलीना हूँ और मुझे केक बहुत पसन्द है। मुझे केक खाना है मुझे बहुत भूख लगी है।”

उस कुँए के चारों तरफ एक दीवार थी और बीच में पानी खींचने के लिये एक छेद था सो चरवाहे ने उस सुन्दर बरगैगलीना को उस कुँए की दीवार पर बिठा दिया और उससे कहा कि जब तक वह उसके लिये केक ले कर आता है वह उसका वहीं इन्तजार करे।

इसी बीच बदसूरत नाम की एक दासी वहाँ आयी। वह वहाँ उस कुँए से पानी खींचने आयी थी।

उसको वहाँ वह सुन्दर सी छोटी सी लड़की दिखायी दी तो उसने अपने मन में सोचा — “यह कैसे हुआ कि यह तो इतनी छोटी सी है और इतनी सुन्दर है और मैं इतनी बड़ी हूँ और इतनी बदसूरत हूँ।”

यह सोच कर ही वह दासी इतनी गुस्सा हुई कि उसने उस छोटी सी लड़की को कुँए में फेंक दिया। जब चरवाहा उस छोटी सुन्दर बरगैगलीना के लिये केक ले कर वहाँ आया तो उसने देखा कि उसकी सुन्दर बरगैगलीना तो वहाँ थी ही नहीं।

उसका दिल टूट गया। कितनी मुश्किल से तो वह उसको ले कर आया था और अब जब वह मिल गयी थी तो वह गायब भी हो गयी।

उस चरवाहे की माँ भी उसी कुँए पर पानी भरने आती थी। एक दिन पानी भरते समय उसकी बालटी में एक छोटी सी मछली आ गयी।

वह उस मछली को घर ले गयी और उसको खाने के लिये तल लिया। माँ ने वह तली हुई मछली खुद भी खायी और अपने बेटे को भी खिलायी। और उसकी हड्डियाँ बाहर फेंक दीं।

उस मछली की हड्डियाँ जहाँ जा कर गिरीं वहाँ एक पेड़ उग आया और समय के साथ साथ वह पेड़ इतना बड़ा हो गया कि उसने चरवाहे के घर की रोशनी रोक दी।

यह देख कर उस चरवाहे ने उस पेड़ को काट डाला और उसकी लकड़ी को आग जलाने के काम में लाने के लिये घर के अन्दर रख लिया।

यह सब करते करते चरवाहे की माँ मर गयी और अब वह घर में अकेला रह गया। वह और भी दुबला होता जा रहा था। वह अपने बड़ा होने के लिये कुछ भी करता पर वह बड़ा ही नहीं हो पा रहा था।

रोज सुबह ही वह घास के मैदानों में चला जाता और रात होने पर ही घर लौटता। घर आ कर उसको बहुत आश्चर्य होता जब वह देखता कि सुबह जो बरतन वह गन्दे छोड़ गया था वे सब साफ रखे हैं और उसका घर भी साफ है।

उसने सोचा कि यह जानने के लिये कि उसके घर में उसके पीछे यह सब कौन कर रहा है उसको एक दिन घर में रुकना ही पड़ेगा।

सो अगले दिन वह घर से बाहर जाने के लिये निकला तो पर बाहर नहीं गया। वह वहीं दरवाजे के पीछे छिप गया और देखता रहा कि उसके घर में उसके पीछे कौन आता है।

कुछ समय बाद ही उसने देखा कि लकड़ी के ढेर में से एक बहुत ही सुन्दर सी लड़की निकली। उसने उसके सारे बरतन साफ किये, घर को झाड़ा बुहारा, उसका बिस्तर ठीक किया। फिर उसने आलमारी खोली और केक खाया।

बस इसी समय वह चरवाहा उछल कर दरवाजे के पीछे से बाहर निकल आया और उससे पूछा — “तुम कौन हो और तुम अन्दर कैसे आयीं?”

लड़की बोली — “मैं सुन्दर बरगैगलीना हूँ। वह लड़की जिसको तुमने अपनी जेब में रखे आधे सेब में पाया था। जब तुम मुझको वहाँ कुँए पर बिठा कर चले गये तब वहाँ एक बदसूरत दासी आयी और उसने मुझे कुँए में धकेल दिया। कुँए में गिर कर मैं मछली बन गयी।

उसके बाद तुम लोगों ने मुझे तल कर खा लिया और मेरी हड्डियाँ बाहर फेंक दीं। वहाँ गिर कर मैं एक पेड़ बन गयी। तुमने वह पेड़ काट कर उसकी लकड़ी अपने घर में रख ली। अब जब तुम घर में नहीं होते तो मैं सुन्दर बरगैगलीना बन जाती हूँ।”

चरवाहा यह सुन कर बहुत खुश हो गया कि उसको सुन्दर बरगैगलीना फिर से मिल गयी थी। अब वह चरवाहा दिन दूना रात चौगुना बढ़ने लगा था और उसके साथ साथ वह सुन्दर बरगैगनीना भी बढ़ने लगी।

जल्दी ही वह चरवाहा बढ़ कर एक सुन्दर नौजवान हो गया और सुन्दर बरगैगलीना भी बड़ी हो कर और सुन्दर हो गयी। दोनों ने आपस में शादी कर ली और दोनों खुशी खुशी रहने लगे।

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं की एक अन्य पुस्तक - रैवन की लोक कथाएँ में से एक लोक कथा यहाँ पढ़ सकते हैं. इथियोपिया की 45 लोककथाओंको आप यहाँ लोककथा खंड में जाकर पढ़ सकते हैं.

(क्रमशः अगले अंकों में जारी...)

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