सोमवार, 18 सितंबर 2017

रैवन की लोककथाएँ - 2 - : 11 रैवन और कौए का पौटलैच // सुषमा गुप्ता

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रैवन स्कागिट नदी के देश में बहुत ऊॅचे पर रहता था। वह बहुत ही आलसी था। गरमी के मौसम में जब सारे जानवर जाड़ों के लिये अपना अपना खाना इकठ्ठा करने में लगे रहते तो वह चट्टान से पेड़ों के तनों पर और पेड़ों के तनों से चट्टान पर कूदने का आनन्द लेता रहता था।

जब कभी उसका भाई कौआ उसको गिलहरी की मिसाल दे कर उससे यह कहता कि उसको गिलहरी की तरह रहना चाहिये तो रैवन बस हॅस देता पर उसने कभी भी उस समय के जाड़े के मौसम के लिये अपने खाने की कोई तैयारी नहीं की जब वहाँ की सारी जमीन बरफ से ढक जाती।

पर अब रैवन मुश्किल में था। जाड़ा आ गया था, चारों तरफ घुटनों तक ऊॅची ऊॅची बरफ पड़ी हुई थी और उसको भूख लग रही थी। उसको खाना पसन्द भी बहुत था। अब वह किसी ऐसे साथी को तलाश कर रहा था जो उसे अपना खाना दे सके।

उसको नर गिलहरी का ध्यान आया सो वह गिलहरी के पास पहुँचा। उसके पास बहुत सारी पाइन फल की गिरी रखी थीं और उसने और भी बहुत सारा खाना अपने घर में चारों तरफ छिपा रखा था।

वह एक पुराने फ़र के पेड़ में रहता था। रैवन ने उसके घर पहुँच कर उसके घर में झाँका और बड़ी नम्रता से उससे उसको थोड़ा सा खाना देने की प्रार्थना की।

पर जैसी कि गिलहरी की आदत थी उसने उसको डाँट दिया - "तुमने गरमी के मौसम में तो कभी काम किया नहीं और जाड़ों के लिये कुछ बचाया नहीं और साथ में मेरा मजाक भी बनाया। तुम इसी काबिल हो कि तुम भूखे रहो।"

रैवन तब भालू के पास गया पर भालू तो अपनी गुफा में खर्राटे मार कर सो रहा था। उसको तो जगाना भी मुश्किल था। रैवन ने उसकी गुफा में खाना तलाश करने की कोशिश की पर सारा खाना तो भालू पहले ही खा चुका था और अब वह वसन्त आने तक सोता ही रहेगा।

अब रैवन क्या करे? वह बहुत भूखा था। कौन ऐसा हो सकता था जो उसको खाना दे सके? सारे जानवर या तो गिलहरी की तरह बहुत ही कंजूस थे और या फिर भालू की तरह सो रहे थे और या फिर ठंड की चिड़ियों की तरह दक्षिण की तरफ चले गये थे। तब उसको ध्यान आया अपने भाई कौए का, वह उसको अपना खाना जरूर दे देगा।

यह सोच कर रैवन कौए के घोंसले की तरफ चला। वहाँ जा कर कौए से बोला - "कौए भाई, चलो तुम्हारे आने वाले पौटलैच के बारे में कुछ बात करते हैं।"

कौआ बोला - "पौटलैच? कैसा पौटलैच? मैंने तो अभी पौटलैच के बारे में कुछ सोचा ही नहीं है।"

रैवन ने उसके जवाब को अनसुना करते हुए उससे पूछा - "पर हर कोई तुम्हारे पौटलैच के बारे में बात कर रहा है।क्या तुम वहाँ गाना नहीं गाओगे?"

"गाना?" कौए ने यह तो कभी सोचा ही नहीं था कि कोई उसके गाने को सुनना भी पसन्द करता है। जबकि उन दिनों कौए की आवाज ऐसी नहीं थी जैसी कि आज है। उन दिनों वह बहुत मीठी हुआ करती थी और वह बहुत सुरीला गाना गाता था।

रैवन कौए के पौटलैच के बारे में ही बात करता रहा। वह बोला - "तुम तो बहुत हुनर वाले हो। तुम्हारी आवाज कितनी मीठी है। यदि तुमने अपने पौटलैच में गाना नहीं गाया तो सारे लोग बहुत निराश होंगे।"

कौआ बोला - "लेकिन कौन सा पौटलैच? कैसा पौटलैच? क्या तुमको वाकई मेरा गाना अच्छा लगता है?"

रैवन बोला - "हमें तुम्हारा गाना बहुत अच्छा लगता है कौए भाई। इस जाड़े ने तो सारे जंगल को ठंड में जमा रखा है और हम भी जाड़े में ठिठुर रहें हैं और भूखे हैं। तुम्हारा गाना हमें इस ठंड और भूख को कुछ देर के लिये भूलने में हमारी सहायता करेगा।

अब तुम खाने का इन्तजाम करो और मैं तुम्हारे पौटलैच के लिये मेहमानों को बुला कर लाता हूँ। खाना बनाते समय तुम अपने गाने का अभ्यास भी कर सकते हो।"

कह कर रैवन तो चला गया मेहमानों को बुलाने और कौए ने जो खाना जाड़ों के लिये इकठ्ठा करके रखा था उसको बनाना शुरू कर दिया।

कौए की गाना गाने की हिचक अब जा चुकी थी और जैसे जैसे वह खाना बना रहा था वह अपने गाने का अभ्यास भी करता जा रहा था। जैसे जैसे वह दावत और अपने गाने के बारे में सोच रहा था वह बहुत ही खुश हो रहा था।

उधर रैवन सब जानवरों को कौए की पौटलैच की दावत के लिये बुलावा देता घूम रहा था। बीवर, मरमौट और भालू तो सो रहे थे और रोबिन और बतख दक्षिण की तरफ चले गये थे।

सबको बुलाते समय वह उनसे कह रहा था - "तुम मेरे पौटलैच में जरूर आना। मैंने उसकी तैयारी में बहुत मेहनत की है। रैवन के पौटलैच में बहुत सारा खाना होगा।

कौआ खाना बनाने में मेरी सहायता कर रहा है और वह गाना भी गायेगा। दावत में फ़र्न की जड़ें होंगीं, जंगली आलू होंगे, सूखे बेर होंगे, मछली होगी, माँस होगा। मेरे पौटलैच में जरूर आना बड़ा आनन्द रहेगा।"

रैवन ने गिलहरी को अपने पौटलैच में नहीं बुलाया क्योंकि उसने उसको खाना देने से मना कर दिया था पर बाकी सब जानवरों को बुलाया।

सबको बुलावा देने के बाद जब वह कौए के पास लौट कर आया तो उसने देखा कि कौआ तभी भी खाना बनाने और गाना गाने के अभ्यास में लगा हुआ था।

रैवन ने उसे बताया - "सारे जानवर आ रहे हैं इसलिये तुमको सबके लिये ठीक से खाना तैयार कर लेना चाहिये। वे सब दूर दूर से आयेंगे तो भूखे होंगे। तुम्हारा गाना भी बहुत अच्छा है इसलिये तुम्हारा पौटलैच भी बहुत ही बढ़िया रहेगा।"

सारे जानवर आने लगे और रैवन ने उन सबका अपने पौटलैच में स्वागत किया। उन जानवरों में हिरन था, पहाड़ी बकरा था, चूहा था, खरगोश था। सारे मेहमानों को बिठाया गया और खाना लाया गया।

कौआ भी बैठा और वह अपना खाना शुरू करने ही वाला था कि रैवन ने खाना खाने से पहले उससे गाना गाने की फरमायश की। उसने कौए से कहा - "कौए भाई, भरे पेट गाना गाने से ठीक नहीं रहता। तुम खाना खाने से पहले अपना गाना सुनाओ।"

सो कौए ने खाना छोड़ कर गाना गाना शुरू कर दिया। जब भी वह एक गाना गा कर बीच में रुकता तो रैवन उसको फिर और गाना गाने के लिये उकसाता और कौआ फिर से गाना गाने लग जाता।

उसके मेहमान भी जो उसके खाने से अपना पेट भरने में लगे हुए थे उन्होंने भी कौए से गाना गाने की बार बार जिद की। वह इतने सारी फरमायशों को ना नहीं कर सका और इस तरह कौआ गाना गाता ही चला गया - एक के बाद एक।

कौए को गाना गाते गाते सारा दिन बीत गया और रात हो गयी। उसकी आवाज फटने लगी और अब वह केवल काँव काँव ही कर पा रहा था।

जैसा कि पौटलैच का रिवाज था बचा हुआ खाना सारे मेहमानों ने ले लिया और उसे अपने घर ले गये। रैवन ने भी अपना हिस्सा उठाया और अपने घर चला गया।

कौआ वहाँ सफाई ही करता रह गया और अब उसके लिये वहाँ खाने के लिये कुछ भी नहीं बचा था।

कौए ने सोचा कि अब वह आगे भूखा नहीं रहेगा क्योंकि और जानवर भी उसको अपने पौटलैच में बुलायेंगे। क्योंकि वहाँ का ऐसा ही रिवाज था कि जो जानवर जिसके घर पौटलैच खा कर जाते थे वे उस जानवर को बदले में अपने घर की दावत में बुलाते थे।

कौआ सारा जाड़ा इन्तजार करता रहा परन्तु उसको किसी भी जानवर का बुलावा नहीं आया।

जानते हो ऐसा क्यों हुआ? ऐसा इसलिये हुआ क्योंकि हर जानवर तो रैवन के पौटलैच में आया था कौए के पौटलैच में नहीं। इसी लिये जब भी किसी ने पौटलैच किया तो उसने रैवन को बुलाया, कौए को नहीं।

इस तरह रैवन तो फिर कभी भूखा रहा नहीं और कौए को फिर कभी खाना मिला नहीं।

इधर कौआ सारे जाड़े भूखा ही रहा और उसकी आवाज भी इतना गा गा कर इतनी ज़्यादा खराब हो गयी थी कि उसकी वह सुरीली आवाज फिर कभी वापस नहीं आयी। वह सारे जाड़े लोगों के घरों में खाना माँग माँग कर ही गुजारा करता रहा।

इसी लिये आज भी हम कौए को लोगों के घरों में खाना माँगते हुए और काँव काँव करते हुए पाते हैं।

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं की एक अन्य पुस्तक - रैवन की लोक कथाएँ में से एक लोक कथा यहाँ पढ़ सकते हैं. इथियोपिया की 45 लोककथाओं को आप यहाँ लोककथा खंड में जाकर पढ़ सकते हैं.

(क्रमशः अगले अंकों में जारी...)

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