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इटली की लोक कथाएँ–2 : 5 जानवरों की भाषा // सुषमा गुप्ता

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एक बार एक बहुत ही अमीर सौदागर था जिसके एक बेटा था। उस बेटे का नाम था बोबो । बोबो बहुत ही तुरत बुद्धि मजाक करता था और सीखने के लिये हमेशा तैयार रहता था।

उसकी यह अक्लमन्दी देख कर उसके पिता ने उसको एक बहुत ही अक्लमन्द आदमी की देखरेख में रख दिया था और उसको उसे सारी भाषाएँ सिखाने के लिये कह दिया।

जब बोबो की पढ़ाई खत्म हो गयी तो वह घर आ गया। एक दिन वह अपने पिता के साथ बगीचे में घूम रहा था। वहाँ बहुत सारी चिड़ियें एक पेड़ पर बैठी बैठी इतनी ज़ोर ज़ोर से चीं चीं चीं चीं कर रही थी कि कुछ भी सुनायी नहीं पड़ रहा था।

सौदागर अपने कानों में उँगलियाँ घुसाता हुआ बोला — “ये चिड़ियें हर शाम मेरे कानों का परदा फाड़ती हैं।”

बोबो ने पूछा — “क्या मैं आपको बताऊँ कि ये चिड़ियें क्या कह रही हैं?”

उसके पिता ने उसकी तरफ आश्चर्य से देखा और पूछा — “तुम्हें कैसे पता कि ये चिड़ियें क्या कह रही हैं। तुम तो ज्योतिषी नहीं हो न, या हो?”

बोबो बोला — “नहीं नहीं, मैं ज्योतिषी तो नहीं हूँ पर मुझे मेरे गुरू ने मुझे कई जानवरों की भाषाएँ सिखायी हैं इसलिये मैं आपको यह बता सकता हूँ कि ये क्या कह रही हैं।”

सौदागर बोला — “अब तुम मुझसे यह मत कहना कि मेरा पैसा तुमको जानवरों की भाषा सिखाने में गया है। तुम्हारे उस गुरू ने क्या सोचा कि मैंने तुमको उसके पास जानवरों की भाषा सीखने के लिये भेजा था? मेरा मतलब तो यह था कि उसको तुमको आदमियों की भाषा सिखानी चाहिये थी न कि इन गूँगे जानवरों की।”

बोबो बोला — “क्योंकि जानवरों की भाषा समझना ज़्यादा मुश्किल होता है इसलिये उन्होंने मुझे उन्हीं की भाषा से सिखाना शुरू करने का विचार किया।”

उसी समय एक कुत्ता भौंकता हुआ भागा चला गया तो बोबो बोला — “क्या मैं आपको बताऊँ कि यह कुत्ता क्या कह रहा था?”

“नहीं नहीं। मुझे अब तुम्हारे इन गूँगे जानवरों के बारे में एक शब्द भी और नहीं सुनना। उफ, लगता है कि मैंने तो तुमको वहाँ पढ़ने के लिये भेज कर अपना पैसा ही बरबाद किया।”

वे चलते रहे चलते रहे। चलते-चलते वे एक खाई के किनारे आ गये। वहाँ कुछ मेंढक चिल्ला रहे थे। उनकी आवाज सुन कर पिता फिर दुखी हो कर बोला — “उफ, ये मेंढक भी मुझे बहुत तंग करते हैं।”

“पिता जी क्या मैं बताऊँ कि ये मेंढक क्या .... ़?”

पिता बोला — “भगवान करे शैतान तुमको और तुमको जिसने यह सिखाया है दोनों को उठा कर ले जाये।”

यह देख कर कि अपने बेटे के ऊपर उसका इतना पैसा बेकार गया सौदागर बहुत गुस्सा हो रहा था। उसको लग रहा था कि यह जानवरों की भाषा किसी जादू टोने से सम्बन्धित है।

यह सोच कर उसने अपने दो नौकरों को बुलाया और चुपचाप उनको अगली सुबह के लिये कुछ बता दिया।

बोबो को सुबह ही उठा दिया गया। एक नौकर ने उसको एक गाड़ी में बिठाया और वह खुद भी उसके साथ ही बैठ गया। दूसरा नौकर आगे बैठ गया और उसने घोड़े को चाबुक मार कर गाड़ी हाँक दी।

बोबो को पता ही नहीं था कि वे लोग कहाँ जा रहे थे। पर उसने देखा कि जो नौकर उसके पास बैठा था उसकी आँखें सूजी हुई थीं और वह कुछ दुखी भी था।

बोबो ने उससे पूछा — “हम लोग कहाँ जा रहे हैं? और तुम इतने दुखी क्यों हो?” पर उस नौकर ने कोई जवाब नहीं दिया।

तभी घोड़ों ने हिनहिनाना शुरू किया तो बोबो समझ गया कि वे क्या कह रहे थे। वे कह रहे थे — “यह हमारा जाना अच्छा नहीं है कि हम अपने छोटे मालिक को मौत की तरफ ले कर जा रहे हैं।”

दूसरा घोड़ा बोला — “यह तो उसके पिता का बड़ा बेरहम हुकुम है।”

बोबो ने अपने पास बैठे वाले नौकर से कहा — “तो क्या तुम लोगों को मेरे पिता ने यह हुकुम दिया था कि तुम लोग मुझे बाहर ले जाओगे और मार डालोगे?”

नौकरों ने आश्चर्य से पूछा — “आपको कैसे मालूम?”

बोबो बोला — “इन घोड़ों ने मुझसे ऐसा कहा। ठीक है तो तुम मुझे अभी अभी मार दो देर तक इन्तजार करा के मुझे क्यों परेशान करते हो?”

नौकर बोले — “पर हमारा दिल नहीं करता कि हम आपको मार दें। हम उस पाप से छूटेंगे कैसे?”

जब वे यह बात कर रहे थे तो उनका अपना कुत्ता भौंकता हुआ उनके पीछे दौड़ा। असल में वह घर से ही उस गाड़ी के पीछे पीछे भागता हुआ चला आ रहा था।

बोबो ने उसकी भी सुनी कि वह क्या कह रहा था। वह कह रहा था कि मैं अपने छोटे मालिक को बचाने के लिये अपनी जान भी कुर्बान कर दूँगा।

बोबो बोला — “अगर मेरे पिता बेरहम हैं तो क्या हुआ कम से कम और दूसरे लोग तो हैं जो मेरे वफादार हैं जैसे तुम ओ वफादार नौकर और यह कुत्ता जो मेरे लिये अपनी जान तक देने को तैयार है।”

नौकर बोले — “अगर ऐसा है तो हम कुत्ते का दिल निकाल कर ले जायेंगे और जा कर बड़े मालिक को दे देंगे। छोटे मालिक, आप भाग जायें यहाँ से।”

बोबो ने अपने नौकरों को और अपने कुत्ते को गले से लगाया और वहाँ से चला गया। सारा दिन वह इधर उधर घूमता रहा। जब रात हुई तो वह एक किसान के घर आया और उससे रहने की जगह माँगी। जब सब लोग मेज के चारों तरफ शाम का खाना खाने बैठे तो बाहर एक कुत्ता भौंकने लगा।

बोबो उसको सुनने के लिये खिड़की के पास गया और फिर आ कर बोला — “जल्दी करो। स्त्रियों और बच्चों को सोने के लिये भेज दो और तुम लोग अपने-अपने हथियार सँभाल लो और तैयार हो जाओ। कुछ डाकू आधी रात को यहाँ हमला करने वाले हैं।”

वहाँ बैठे सब लोगों को लगा कि यह आदमी पागल हो गया है। वे बोले — “तुम ऐसा कैसे कह सकते हो? यह सब तुमसे किसने कहा?”

बोबो बोला — “मुझे यह सब इस कुत्ते ने बताया जो अभी यहाँ भौंक रहा था। बेचारा जानवर। अगर मैं यहाँ न होता तब तो इस बेचारे का भौंकना बेकार ही जाता। तुम लोग मेरी बात मानोगे तो सुरक्षित रहोगे।”

किसानों ने अपनी बन्दूकें उठा लीं और छोटे पेड़ों की एक कतार के पीछे छिप गये और उनकी पत्नियाँ और बच्चे घर के अन्दर बन्द हो कर बैठ गये।

आधी रात को पहले एक सीटी की आवाज सुनायी दी, फिर दूसरी और फिर तीसरी और फिर उसके बाद दौड़ते हुए पैरों की।

ये आवाजें सुनते ही उन छोटे पेड़ों के पीछे से दनादन गोलियाँ चलने लगीं सो सारे चोर भाग गये। उनमें से दो चोर मारे भी गये। वे अपने हाथ में अपने चाकू पकड़े हुए कीचड़ में पड़े पाये गये।

बोबो की तो इसके बाद वहाँ बड़ी आवभगत हुई। हालाँकि किसान चाहते थे कि वह वहीं उन्हीं के साथ रहे पर उसने उनको बाई बाई कहा और अपने रास्ते चल दिया।

मीलों चलने के बाद शाम को वह एक और किसान के घर आया। वह यह सोच ही रहा था कि वह उसके घर दरवाजा खटखटाये या नहीं कि उसने पास में ही कुछ मेंढकों को टर्राते हुए सुना।

उसने उनको पास से सुना तो उनमें से एक मेंढक कह रहा था — “आओ और होस्ट को यहाँ फेंको। उसे यहाँ मेरे पास फेंको। अगर तुम उसे मेरे पास नहीं फेंकोगे तो मैं तुम्हारे साथ नहीं खेलूँगा।”

“पर तुम उसे पकड़ नहीं पाओगे और उसके दो टुकड़े हो जायेंगे। हमने उसे कितने सालों से पूरा का पूरा बचा कर रखा है। हम उसको तोड़ना नहीं चाहते।”

बोबो तुरन्त ही उस गड्ढे के पास गया और उसके अन्दर झाँका। उसने उस गड्ढे में देखा कि मेंढक एक पवित्र पतली सी चौरस पत्ती से एक गेंद की तरह से खेल रहे थे। बोबो ने उसको देखते ही क्रास का निशान बनाया।

एक मेंढक बोला — “यह होस्ट छह साल से इस गड्ढे में है। छह साल पहले जब शैतान ने किसान की बेटी को बहकाया था तो कम्यूनियन में होस्ट को निगलने की बजाय उस लड़की ने उस होस्ट को अपनी जेब में छिपा लिया था और फिर चर्च से घर जाते समय उसने उसको इस गड्ढे में फेंक दिया था।”

बोबो ने अब उस किसान के घर का दरवाजा खटखटाया तो उस किसान ने उसको शाम के खाने के लिये अन्दर बुला लिया।

वह जब किसान से बात कर रहा था तो उसको पता चला कि उसकी बेटी पिछले छह सालों से बीमार चली आ रही थी। कई डाक्टरों को दिखाया पर कोई भी यह नहीं बता सका कि उसको बीमारी क्या है और अब वह मरने वाली हो रही है।

बोबो बाला — “मुझे लगता है कि भगवान उसको सजा दे रहा है। छह साल पहले उसने चर्च का पवित्र होस्ट एक गड्ढे में फेंक दिया था। तुम लोग उस होस्ट को ढूँढो और उससे कम्यूनियन करवाओ तो वह बिल्कुल ठीक हो जायेगी।”

यह सुन कर उस किसान को बहुत आश्चर्य हुआ। वह बोला — “पर तुमसे यह सब किसने कहा?”

बोबो बोला — “मेंढकों ने।”

हालाँकि उस किसान को बोबो की बातों पर विश्वास नहीं हुआ पर फिर भी उसने उस गड्ढे में उस होस्ट को ढूँढा तो होस्ट तो गड्ढे में ही था सो वह उसको मिल गया।

फिर उस किसान ने उस लड़की का ठीक से कम्यूनियन भी करवा दिया और वह ठीक हो गयी। वह किसान तो सोच ही नहीं सका कि बोबो ने जो कुछ भी उसके लिये किया वह बोबो को इसके बदले में क्या दे।

पर बोबो को तो उससे कुछ चाहिये नहीं था सो वह उसको गुड बाई कह कर आगे चल दिया।

एक दिन जब दिन बहुत गरम हो रहा था तो बोबो को दो नौजवान मिले जो एक चेस्टनट के पेड़ के नीचे लेटे आराम कर रहे थे। उसने उनसे पूछा कि क्या वह भी वहाँ लेट सकता है। उन्होंने हाँ कर दी तो वह भी वहीं पैर फैला कर लेट गया।

उसने उनसे पूछा — “तुम लोग कहाँ जा रहे हो?”

“हम लोग रोम जा रहे हैं। क्या तुमको नहीं पता कि पहला पोप मर गया है और अब नया पोप चुना जाने वाला है?”

तभी उनके सिरों के ऊपर उस चेस्टनट के पेड़ के ऊपर चिड़ियों का एक झुंड आ कर बैठ गया तो बोबो बोला — “ये चिड़ियें भी रोम जा रही हैं।”

उन दोनों नौजवानों ने पूछा — “तुमको कैसे मालूम?”

“मुझे इन चिड़ियों की भाषा आती है।” उसने उनको और ध्यान से सुना और बोला — “ज़रा सोचो तो कि वे और क्या कह रही हैं।”

“क्या कह रही हैं?”

“वे कह रही हैं कि हममें से एक को पोप चुन लिया जायेगा।”

उन दिनों पोप का चुनाव इस तरह से होता था कि एक फाख्ता को सेन्ट पीटर्स स्क्वायर के ऊपर उड़ा दिया जाता था जहाँ बहुत सारी भीड़ इकठ्ठी रहती थी और वह फाख्ता जिस किसी के सिर पर भी जा कर बैठ जाती थी वही पोप होता था।

सो वे तीनों रोम चल दिये और जा कर सेन्ट पीटर्स स्क्वायर में भीड़ के साथ खड़े हो गये। फाख्ता को छोड़ दिया गया और वह फाख्ता चारों तरफ घूम कर बोबो के सिर पर आ बैठी।

खुशी की तालियों और प्रार्थनाओं के बीच बोबो को ऊपर उठा लिया गया और पोप के कपड़े पहना कर उसके सिंहासन के ऊपर बिठा दिया गया।

फिर बोबो भीड़ को आशीर्वाद देने के लिये उठा तो भीड़ के शोर के बीच में एक चिल्लाहट उठी। भीड़ में एक बूढ़ा बेहोश हो कर गिर पड़ा था। वह बूढ़ा एक मरे हुए के बराबर सा पड़ा था।

नया पोप उसकी तरफ दौड़ा तो उसने उसको पहचान लिया। वह तो उसका अपना पिता था। वह बूढ़ा तो अपने आपको नफरत से देख रहा था और अपने बेटे की बाँहों में मरने से पहले उससे माफी माँगना चाहता था।

बोबो ने उसे माफ कर दिया। बोबो बाद में चर्च का एक बहुत ही अच्छा पोप साबित हुआ।

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं की एक अन्य पुस्तक - रैवन की लोक कथाएँ में से एक लोक कथा यहाँ पढ़ सकते हैं. इथियोपिया व इटली की बहुत सी अन्य लोककथाओं को आप यहाँ लोककथा खंड में जाकर पढ़ सकते हैं.

(क्रमशः अगले अंकों में जारी….)

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