संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 31 : जहाँ छायावाद ने आकार लिया // उर्मिला शुक्ल

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प्रविष्टि क्र. 31

जहाँ छायावाद ने आकार लिया

उर्मिला शुक्ल

बालपुर छत्तीसगढ़ जैसे दूरस्थ इलाके का एक छोटा सा मगर गांव हैं। मगर इसका संबंध हिन्दी साहित्य के एक काल विशेष इस कदर जुड़ा है कि अगर ये गांव नहीं होता ;तो वो काल तो अवश्य होता ,उसके आधार स्तंभ भी वही होते जो आज हैं पर उसका नाम शायद ये नहीं होता ,जो आज है। जी हाँ मैं छायावाद की बात कर रही हूँ। आज हिन्दी जगत में शायद ही कोई होगा जो छायावाद के विषय में न जानता हो, मगर छायावाद के प्रणेता पं. मुकुटघर पान्डेय हैं, ये कम ही लोग जानते हैं । और उनके गाँव बालपुर को? उसे तो और भी कम लोग जानते होंगे। वो बालपुर जहाँ महानदी की लहरें हैं, कुररी (प्रवासी साइबेरियन पक्षी) की किल्लोलें हैं,और है छत्तीसगढ़ अंचल ही महक;मगर लग रहा था जैसे लोग ये सब भुला ही चुके थे ।नया नया बना छत्तीसगढ़ प्रदेश विकास की एक नई राह पर चल पड़ा था। ऐसे में छत्तीसगढ़ प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष ने तय किया कि हम सब बालपुर की यात्रा पर जायें । सो छत्तीसगढ़ के साहित्यकारों का एक दल बालपुर के लिये रवाना हुआ । हमारे दल में थे ललित सुरजन, श्रीमती माया सुरजन ,कहानीकार रमाकान्त श्रीवास्तव, व्यंग्यकार, प्रभाकर चौबे, रवि श्रीवास्तव, संतोष मांझी, महेन्द्र कुमार मिश्र अशोक सिंघई और मैं।

बालपुर की मेरी ये दूसरी यात्रा थी । इसके पूर्व लगभग पन्द्रह वर्ष पहले मैंने विप्र महाविद्यालय, बिलासपुर के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष श्री बाँके बिहारी शुक्ल के आयोजन में बालपुर की यात्रा की थी । उस यात्रा दल में हमारे साथ पत्रकार प्राण चड्ढा, डी.पी. विप्र महाविद्यालय के हिन्दी विभाग के प्राध्यापक, मेरे दोनों बच्चे और विप्र महाविद्यालय के हिन्दी साहित्य के विद्यार्थी भी शामिल हुए थे । उस समय हम एक छोटी बस लेकर चांपा, सक्ती और चन्द्रपुर होते हुए बालपुर पहुँचे थे । उस यात्रा का जिक्र यहाँ इसलिए जरूरी है कि उस समय मुकुटधर पान्डेय जी तो इस दुनिया में नहीं थे मगर उनका परिवार बालपुर में रहता था और हमें उनके छोटे भाई के घर मेहमान के तौर पर ठहरकर ,उनकी मेहमाननवाजी पाने की सुखद अवसर मिला था । मगर अब ? अब वहाँ उनके परिवार का कोई सदस्य नहीं रहता । और अब वहाँ ऐसा कोई प्रतीक या ऐसी कोई यादगार चीज भी नहीं है ;जिसे देखकर सहज ही जाना जा सके कि ये छायावाद के प्रणेता कवि का जन्म स्थल है । वहाँ मुकुटधर पान्डेय के जन्म का कोई नामोनिशान तक नहीं बचा है । कारण -प्रकृति की मार और गाँव में पूँजीवाद की घुसपैठ ;नदी पर कारपोरेट घराने का कब्जा और सरकार की साहित्य के प्रति उदासीनता । साहित्य से लगाव होने के कारण हमने ये महसूस किया था कि साहित्य के अपने पूर्वजों के प्रति ,हमारी कुछ जिम्मेदारी भी बनती है ।कुछ अधिक नहीं तो उस पावन भूमि का स्पर्श कर, उनके अवदानों को तो याद करना ही चाहिये । इसी सोच के चलते हमने बालपुर यात्रा की योजना बनायी थी ।हम सब सड़क मार्ग से हम बालपुर के लिए रवाना हुये। इस बार भी मंजिल तो वही थी मगर रास्ता अलग था। अबकी हम रायपुर से चलकर तुमगाँव के रास्ते अपनी मंजिल की ओर बढ़ रहे थे ।छत्तीसगढ़ में अब बहुत कुछ बदल गया था । कभी तुमगाँव से आगे बढ़ते ही घने जंगलों का सिलसिला शुरू हो जाता था, मगर अब ? अब वनों की अंधाधुंध कटाई के चलते ,तुमगाँव के आस-पास के वन खत्म ही हो चले हैं । यहाँ तक कि इस इलाके का प्रसिद्ध बाँध -कोडार- जो कभी वनों से इस कदर आच्छादित था कि बॉध नजर ही नहीं आता था, वो अब हमें सड़क से ही नजर आ रहा था । कुछ आगे बढ़ने पर वन कुछ सघन तो हुए थे मगर फिर भी अब पहले वाली बात नहीं थी ।

पिथौरा आने वाला था । यहीं से होकर बारनवापारा (अभ्यारण) का रास्ता है । यहाँ विश्राम गृह में हमारे चाच-पानी की व्यवस्था थी । सो हम सब पिथौरा विश्राम गृह पहुँचे । पिथौरा एक छोटा सा कस्बाई शहर है, जो सघन वनों से घिरा है । यहाँ से सड़क मार्ग दो हिस्सों में बँट जाता है । एक खल्लारी की पहाड़ियों से होता हुआ बागबहरा महासमुन्द की ओर जाता है और दूसरा साँकरा नाले से होकर, सरायपाली के रास्ते उड़ीसा होता हुआ कलकत्ता तक चला जाता है । हमें सरायपाली तक इसी रोड से जाना था । चाय के बाद हमारा सफर फिर शुरू हुआ । अब गाँवों का स्वरूप और उसकी बसाहट के साथ-साथ भाषा भी बदलने लगी थी । इधर की भाषा पर ओडिया का प्रभाव है और छत्तीसगढ़ी से कुछ कुछ अलग है। ये लरिया कहलाती है । मैं देख रही थी; गाँव से सड़क पर आकर मिलती पगडंडियों पर, सिर पर टोकरी रखे स्त्रियाँ और कँधे पर काँवर लिये पुरूष तेजी से बढ़े जा रहे थे । उनकी टोकरियों का आकार भी छत्तीसगढ़ से एकदम अलग, उडीसा की चलन का था । बाँस के चौड़े-चौड़े पट्टों से बनी ये चौकोर टोकरियाँ उड़ीसा की हस्त कला सुन्दर नमूना थीं। दिसंबर का महीना था। धान की फसल कट चुकी थी । सो अधिकाँश खेत खाली थे और उनकी ठूंठ निकालने के लिये उन्हें जला दिया गया था । अब ये एक नया चलन चल पड़ा है, जिसके तहत खेत की कटाई के बाद बची हुई ठूँठ को निकालने के लिए, किसान खेतों में आग लगा देते हैं । इससे ठूँठ निकालने की मेहनत बच जाती है । मगर खेतों में रहने वाले जीव-जन्तु भी तो जल कर खाक हो जाते हैं ।आज के जैव पर्यावरण के असंतुलन में इस आग का भी बड़ा हाथ है । फिर ये इलाका तो जंगलों से सटा हुआ है । सो यहाँ लगी आग जंगल को भी नुकसान पहुँचाती है ।आये दिन जंगलों में आग लगने की खबर आती है, मगर हम कितने स्वार्थी हो चुके है कि अपने फायदे के अलावा हमें कुछ नजर ही नहीं आता । 'मेरी सोच का सिलसिला थमा, राईस मिल के सायरन से।ये राईस मिलों का इलाका था। पांच बज गये थे ।सो मजदूरों की छुट्टी का सायरन बज रहा था।

हम सरायपाली पहुँच चुके थे । यहाँ से हमें दूसरी दिशा में जाती सड़क पर मुड़ना था, जो सारंगढ़ को जाती है । अब सरायपाली से होकर सारंगढ़ तक सघन वनों का सिलसिला शुरू हो चुका था । बीच-बीच में छोटे-छोटे गाँव, कस्बे आते रहे,मगर जंगल का सिलसिला चलता ही रहा । जंगल का भी अपना एक सौन्दर्य होता है । उस सौन्दर्य में डूबते उतराते हम सारंगढ़ जा पहुँचे थे। यहाँ हमारे और मित्र मिले, जो अम्बिकापुर और रायगढ़ से हमसे पहले ही आ चुके थे । वहाँ की सांसद पुष्पा देवी सिंह ने हमारे ठहरने की व्यवस्था की थी । उनकी व्यवस्था में ही छत्तीसगढ़ प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन की बैठक हुई ;जिसमें सारंगढ़ और आस-पास के गाँवों के साहित्यकार मित्र भी शामिल हुये ।

रात्रि के भोजन पर हम पुष्पा देवी सिंह के आतिथ्य में राजमहल में आमंत्रित थे । भोजन जितना सुस्वादु था ,उससे कहीं अधिक प्रेम था उनके आतिथ्य में । उनका सभी को आग्रह पूर्वक भोजन कराना ,हमें अभिभूत कर गया था । लग ही नहीं रहा था कि हम किसी राज घराने में भोजन कर रहे हैं । ऐसी विनम्रता बहुत कम देखने में आती है । मुझसे तो उनका एक रिश्ता और भी निकल आया था, उनकी फुफेरी बहन गढ़फुलझर की राजकुमारी सुश्री पुखराज सिंह मेरी सहकर्मी रह चुकी थीं । जब ये ज्ञात हुआ, तो पुष्पा देवी ने उन्हें तुरन्त फोन लगाकर मेरी बात करवायी और मुझसे दोबारा आने का वादा भी लिया । रात को रूथानीय विद्यालय परिसर में कवि गोष्ठी आयोजित थी ।वहीं उसी विद्यालय परिसर में मैंने पहली बार उस पेड़ को देखा; जिसे महानीम कहते हैं । जिसके मैंने चर्चे सुने थे । मैंने सुना था कि प्रत्येक पन्द्रह साल बाद महानीम से ही जगन्नाथपुरी में कृष्ण, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियाँ बनायी जाती हैं । वो भी साधारण महानीम से नहीं । उस महानीम से, जो बहुत ही पुराना हो और जिसके पास साँप की बाँबी भी हो । मैंने देखा उस नीम को वास्तव में वो अपने नाम के अनुरूप वो महानीम ही था । इतना मोटा तना कि चार छः लोगों की बाहों का घेरा भी उसे अपने में समेट न पाये । एक बुजुर्ग अध्यापक ने मुझे बताया कि '' ये नीम चार सौ साल पुराना है ।'' मैंने देखा ,देखने में वो बिल्कुल नीम जैसा ही था । उसका तना, उसकी शाखायें, सब वैसी ही थीं ;मगर उसकी पत्तियाँ कुछ अलग थीं और उसकी सघनता इतनी अधिक थी कि मेरी नजरें देर तक उसकी शाखाओं और उपशाखाओं में ही उलझती रहीं । दूसरे दिन हमें सुबह सबेरे ही बालपुर के लिए निकलना था । सो हम सब अपने विश्राम स्थल की ओर रवााना हुये ।

अगले दिन अलसुबह हमारा काफिला बालपुर की ओर रवाना हुआ । हाँ । इसे काफिला ही कहना उचित होगा । पाँच, छः गाड़ियाँ एक के पीछे एक चली जा रही थीं । अब चंद्रपुर आ गया था । यूँ तो ये बहुत छोटा सा कस्बा है, मगर ख्यात बहुत है । इसकी ख्याति के दो कारण हैं । एक तो धार्मिक और दूसरा आर्थिक । यहाँ चन्द्रहासिनी देवी का मंदिर है । महानदी के किनारे स्थित ये मंदिर एक शक्तिपीठ है । हममें से बहुतों की इच्छा मंदिर के पुरातात्विक दर्शन की थी । मगर हमारी मंजिल तो बालपुर थी। सो हम महानदी के किनारे-किनारे बालपुर की ओर बढ़ चले । अब हमारा काफिला नदी के किनारे की पतली सी सड़क से होकर गुजर रहा था । राह में जब भी कोई गाँव आता, लोग अपने घरों से बाहर निकल निकल कर हमें देखने लगते । वे चकित थे कि अभी तो चुनाव का मौसम भी नहीं है ;फिर सुबह-सुबह इतनी सारी गाड़ियाँ, वो भी इस उपेक्षित राह पर ?

अब महानदी कुछ और करीब आ गयी थी और दूर से उसका दूसरा किनारा नजर आने लगा था । हम कुछ और आगे बढ़े, तो सड़क के किनारे-किनारे दलदली सी जलकुम्भी भरी जमीन नजर आने लगी थी और उस जलकुम्भी में कुछ बगुले अपना आहार तलाश रहे थे । मैंने मुकुटधर पान्डेय की 'कुररी' के प्रति' कविता पढ़ी थी । जिसमें वे एक भटके हुए कुररी (प्रवासी पक्षी) से सवाल करते हैं - '' बता मुझे ऐ विहग विदेशी, अपने जी की बात । बिछड़ा था तू कहाँ, आ रहा जो कर इतनी रात ।''

छत्तीसगढ़ का अद्भुत सौन्दर्य किसी माया जाल से कम नहीं है । इसे ही लक्ष्य करते हुए वे उससे फिर पूछते हैं- ''देख किसी माया प्रांतर का चित्रित चारू दुकूल । क्या तेरा मन मोहजाल में गया कहीं था भूल ़ ़ ़ यह ज्योरना रजनी हर सकती क्या तेरा न विषाद । या तुझको निज जन्मभूमि की सता रही है याद ।'' उनकी इन पक्तियों ने कुररी को देखने की ललक तो बहुत पहले जगा दी थी, अब वो ललक और भी बढ़ गयी थी । मेरी नजरें अब कुररी को तलाश रही थीं । वहाँ बहुत से जाने पहचाने और अनपहचाने जल पाखी नजर आये, हमें लगा इनमें कुररी भी होंगे । मगर कुछ स्थानीय लोगों ने बताया कि ये कुररी नहीं है । वे इस मौसम में ही मिलते हैं मगर इस वर्ष अभी तक नजर नहीं आये हैं? हम दिसंबर में वहाँ गये थे। वो सर्दी का मौसम था। इसी मौसम में यहाँ प्रवासी पक्षी आते रहे हैं;मगर इधर छत्तीसगढ़ में गर्मी इस कदर बढ़ गयी है,कि कई बार तो सारी सर्दी बीत जाती है पर सर्दी का अहसास तक नहीं होता है। इस वर्ष भी दिसंबर आ चुका था;मगर सर्दी का नामोनिशान भी नहीं था।ऐसे में साइबेरियन पक्षियों का टिक पाना मुमकिन ही नहीं था । फिर भी मैं देर तक उन जल पक्षियों में कुररी को तलाशती रही । फिर गाँव से बहुत से लोग हमें लिवाने आ गये थे और हम उनके साथ गाँव की ओर चल पड़े थे ।

बालपुर की यात्रा पर आने से पहले सम्मेलन के अध्यक्ष ने मुकुटधर पान्डेय जी के परिवार से सम्पर्क किया था । सो वे अपने वादे के मुताबिक वहाँ पहले से मौजूद थे । मुकुटधर पान्डेय के अलावा उनके भाई लोचन प्रसाद पान्डेय, बंशीधर पान्डेय और विद्याधर पान्डेय के परिवार के सदस्य भी हमसे मिलने आये हुए थे । मुकुटधर पान्डेय के अन्य भाई भी साहित्य के चितेरे रहे हैं । मुकुटधर पान्डेय को जहाँ हिन्दी और छत्तीसगढ़ी दोनों भाषाओं पर अधिकार प्राप्त था । वहीं लोचन प्रसाद पान्डेय और बंशीधर पान्डेय ने छत्तीसगढ़ी साहित्य में कई उपलब्धियाँ पायी थीं । बंशीधर पान्डेय तो छत्तीसगढ़ी के प्रथम उपन्यासकार माने जाते हैं । मुकुटधर पान्डेय के बच्चों में से अब उनके सुपुत्र दिेनेश प्रसाद पान्डेय ही जीवित बचे हैं । मगर अपनी अस्वस्थता के चलते वे नहीं आ पाये थे । लोचन प्रसाद पान्डेय के नाती सदाशिव पान्डेय और विद्याधर पान्डेय के नाती शिव कुमार पान्डेय और उनके बेटे खास हम लोगों से मिलने के लिए ही बालपुर आये थे । उन सबके साथ हम लोग उनके पुराने घर को देखने गये, जो अब जीर्णावस्था में है । मुकुटधर पान्डेय का जन्म जिस घर में हुआ था, वो तो बहुत पहले ही महानदी के भीतर समा गया था । दरअसल महानदी कटाव के कारण निरन्तर बालपुर की ओर सरकती चली आ रही है । इसके चलते कुछ वर्षो के अन्तराल में तट से सटे घर नदी में समा जाते हैं । नदी के इस कटाव को रोका जा सकता है, मगर अब तक इसकी कोई कोशिश नहीं की गयी है । यही कारण है कि बालपुर गाँव जो कभी बहुत बड़ा गांव हुआ करता था, अब लगातार सिमटता चला जा रहा है । और अब तो महानदी भी अब सिमटती चली जा रही है । उसके यूँ सिमटने का एक कारण है यहाँ कारपोरेट जगत की घुसपैठ । महानदी के पानी पर अब 'जिंदल' का कब्जा है । उसके प्लाँट के लिए महानदी से सीधी सप्लाई होती है । मोटे-मोटे पाईप नदी का सारा पानी सोखे ले रहे हैं । मैंने देखा कि महानदी में जगह-जगह टीले से उभर आये थे, उसे देखकर लग ही नहीं रहा था कि ये वही नदी है जिसके तांडव को देखकर मुकुटधर पान्डेय ने ये पंक्तियाँ लिखी थीं -

''बहा देती थी कोसो कभी ,मत्त नागों को भी तू जीत ।

रोक सकती है तुझको आज, क्षुद्र तम यह बालू की भीत ।''

सचमुच दोहरी मार झेल रहा है बालपुर । एक ओर तो गाँव से सटकर बहती नदी का गाँव की ओर सरकते चले आना और दूसरी ओर नदी के पानी पर कारपोरेट जगत का इस तरह कब्जा कि गांव वालों को पानी तक नहीं मिलता है । सो किसानों के हिस्से में तो दोहरा दंश है न । यही कारण है कि गाँव से लोग लगातार पलायन कर रहे हैं । पान्डेय जी का परिवार भी अब गाँव से बाहर दूर शहरों में जा बसा है । सदाशिव पान्डेय और शिवकुमार पान्डेय जी ने एक छोटी बैठक भी आयोजित की थी । हम सब उसमें शामिल हुए । यह देखकर हमें बहुत अच्छा लगा कि उन्होंने हिन्दी और छत्तीसगढ़ी साहित्य की अमूल्य धरोहर को सहेज कर रखा है । उनके सौजन्य से हमने मुकुटधर पान्डेय की उन दुर्लभ जीर्ण होती कृतियों को देखा, स्पर्श किया और महसूस किया कि अब इनके संरक्षण की आवश्यकता है । इस बात को लेकर सदाशिव पान्डेय भी चिंतित थे । उन्होंने बताया कि उन्होंने इस सिलसिले में लगातार कोशिशें की हैं । वे मंत्रियों से भी मिल चुके हैं पर उन्हें आश्वासन तो मिला, मगर बात बनी नहीं ।

हम बालपुर से लौट रहे थे । उस बालपुर से जो छायावाद का नामकरण करने वाले मुकुटधर पाँन्डेय का जन्म स्थान है मगर वहाँ उनके नाम पर कुछ भी नहीं है। मुझे याद हो आया था शेक्सपियर का गाँव । उनका वो घर जो ,अब अंग्रेजी साहित्य जगत की अमूल्य धरोहर है । वे लोग कितने गर्व से बताते हैं कि ये वो घर है जहाँ शेक्सपियर रहते थे । ये वो कुर्सी है जिस पर वे बैठते थे । यहाँ तक कि उनकी वो कलम भी संरक्षित की गयी है जिससे वे लिखते थे । और हम ? हम तो अपने पूर्वज साहित्यकारों के गाँव तक को नहीं बचा पा रहे हैं । ये सोचकर मन खिन्न सा हो उठा था ।

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ए-21, स्टील सिटी,

अवंति विहार, रायपुर (छ.ग.)

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